(‘डॉ. नन्दलाल भारतीलघुकथाओं के ख्यातिलब्ध एक दलित चिन्तक और लेखक हैं हिंदी की तमाम विधाओं पर काम करते हुए अपनी बात पाठकों तक पहुंचाते हैं…मुर्दाखोर दलित समाज की विसंगति और संघर्ष की विजय गाथा सी, कविता के समिश्रण से अनूठी शैली में लिखी गई  एक उत्कृष्ट कहानी है ) संपादक 

मुर्दाखोर 

नंदलाल भारती

मजदूर बाप सुखीराम,नाम भर ही सुखीराम था।उसके जीवन में पग-पग पर कांटे और पल-पल दर्द था। ऐसे दर्द भरे जीवन में और मुर्दाखोरों यानि छुआछूत के पोशकों जाति के नाम पर कुत्ते बिल्ली जैसा दुव्र्यवहार करने वाले,पैतृक सम्पति हथियाने,आदमी होने का सुख  छीन लेने वाले शोषक  समाज के चंगुल में फंसा बंधुवा मजदूर सुखीराम सत्याग्रह कर बैठा था बेटे सुदर्शन को एम.ए. तक पढ़ाने का। उसका सत्याग्रह पूरा भी हुआ था । सुखीराम के सत्याग्रह की बात स्वामीनरायन बस्ती के मजदूरों से बड़े गौरव से कहता। वह बस्ती के मजदूरों को उकसाता रहता था कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजें ना कि दबंग जमींदारों के खेत खलिहानों में मजदूरी करने को। स्वामीनरायन बी.ए.पास सुदर्शन  को बतौर नजींर पेश  करता। वह कहता बाप ने तो बहुत सत्याग्रह किया जमीदार की हलवाही करते हुए और अपने सत्याग्रह में पास हो गया। सुदर्शन को मजदूर बनाने की जमींदार की लालसा पूरी नही हो सकी। देखो वह श हर चला गया, भगवान उसकी मदद करें उसे बाप की तरह सत्याग्रह ना करना पड़े।

सुदर्शन गांव से शहर की ओर कूंच तो कर गया पर उस के पास शहर में कोई ठिकाना ना था कई बरसों तक शहर में नौकरी की तलाश  में बावला सा फिरता रहा पर वह मेहनत मजूदरी करने में तनिक नही हिचकिचाया। मेहनत मजदूरी कर झुग्गी का किराया और खुराकी चलाने लायक कमाने लगा था। इस सबसे जो बचता वह अपने बाप को  मनिआर्डर कर देता। बाप को लगता  बेटा को सरकारी अफसर की नौकरी मिल गयी । वह मूंछ पर ताव देते हुए कहता अरे बस्ती वालों तुम भी अपने बच्चों को उंची पढ़ाई कराओ । बिना पढ़ाई के नसीब नही बदलेगा, देखो मेरे बेटवा को, हर महीने मनिआर्डर कर रहा है भले ही सौ रूपये का । सुदर्शन बस्ती  के लिये उदाहरण बन गया था परन्तु बेरोजगारी की समस्या से उबर नही पा रहा था। पांच वर्ष की भागदौड़ और निराशा से दिल्ली में होकर भी उसे दिल्ली दूर लगने लगी। पल-पल बदलते दिल्ली के रंग में उसे दिल्ली सेे दूर जाना कैरिअर संवरने की तरकीब लगने लगा। वह इतना धनिखा तो था नही कि वह नौकरी खरीद सके। दिल्ली की मण्डी में झल्ली ढोकर मां बाप के सपनों को पूरा कर सके। दिल्ली में उसे अपना भविष्य मरता हुआ नजर आने लगा था। अन्ततः उसने दिल्ली को अलविदा कहने का मन बना लिया ।

एक दिन वह पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से रेल में बैठ गया, दूसरे दिन वह झलकारीबाई की त्याग भूमि की ओर प्रस्थान कर गया। रेल से उतरते ही वह रेलवे स्टेशन के मेन गेट से बाहर निकला और अपना भविष्य तलाशने निकल पड़ा । अनजान शहर में कई दिनों की भागदौड़ के बाद उसके सोए नसीब ने करवट बदला और उसे एक अर्धशासकीय असत्कारी कम्पनी में अस्थायी क्लर्क की नौकरी मिल गयी। क्षेत्र प्रमुख रामपूजन साहब शुरूआती दौर में शिक्षक की भूमिका में नजर आये। तीन महीना तक निष्चिन्तता के साथ नौकरी किया। चौथे माह के प्रारम्भ में रामपूजन साहब का तबादला हो गया। उनकी जगह रजिन्दर गिद्धू आ गये। गिद्धू साहब तो उपर से बड़े भलमानुष थे। सुनने में आया कि रामपूजन साहब का तबादला गिद्धू साहब करवाकर खुद कार्यालय प्रमुख बन गये। गिद्धू साहब के कार्यभार संभालते ही सुदर्शन पर मुसीबतों के पहाड़ गिरने लगे। गिद्धू साहब कहने को तो अहिंसावादी थे पर शोषित गरीब को आंसू और उसके भविष्य का कत्ल करने में उन्हें तनिक हिचक नही होती थी। सुदर्शन छोटी जाति का है गिद्धू साहब को यह खबर डां.विजय प्रताप साहब से पहले ही लग गयी थी। अब क्या गिद्धू साहब ने कार्यालय प्रमुख बनते ही सुदर्शन को बाहर का रास्ता दिखाना तय कर लिया ।

इस षड्यंत्र  में डां.विजय प्रताप साहब विभाग में जनरल मैनेजर थे उनका पूरा सहयोग गिद्धू साहब को मिल रहा था। इन्ही के षड्यंत्र से गिद्धू साहब कार्यालय प्रमुख बने थे जिनके अधीनस्थ तीन संभाग के दर्जनो जिले थे। मामूली ग्रेजुयेट गिद्धू साहब डां.विजय प्रताप साहब के अंध भक्त थे उनके लिये शबाब,शराब और कबाब की व्यवस्था गिद्धू साहब करते थे। जिसकी वजह से पूरे विभाग में गिद्धू साहब का रूतबा सबसे उपर था। रूतबे का प्रभाव दिखाकर गिद्धू साहब ने जातीय अयोग्यता के कारण सुदर्शन को नौकरी से निकलवा दिया । वैसे भी इस सत्कारी विभाग में अछूतों को नौकरी नही दी जाती थी। रामपूजन साहब ने सुदर्शन की जाति नही उसकी तालिम और काबलियत देखकर नौकरी की सिफारिस की थी पर गिद्धू साहब को सुदर्शन फूटी आंख नही भाता था। गिद्धू साहब ने जातीय षड्यंत्र के तहत् नौकरी से तो निकलवा दिया। सुदर्शन सतकारी विभाग में नौकरी करने के लिये सत्याग्रह पर उतर गया । इस विभाग में जैसे कुछ सौ साल मंदिरों और स्कूलों में अछूतो का प्रवेष वर्जित था उसी तर्ज पर सतकारी विभाग 19वी शताब्दी के आखिर में भी अघोषित रूप से अछूतों को नौकरी देने की मनाही थी।

सुदर्शन का संघर्ष रंग लाया आखिकार असतकारी विभाग के जमींदार व्यवस्था ने उसे बहाल तो कर दिया। बहाली के बाद गिद्धू साहब का अत्याचार बढ़ गया। अत्याचार के खिलाफ विभाग में कोई सुनने को तैयार नही था। गिद्धू साहब  सुदर्शन का कैरिअर बर्बाद करने में जुट गये। धीरे-धीरे सी.आर. करने में जुट गये। डां.विजय प्रताप साहब की सह तो गिद्धू साहब को भरपूर प्राप्त थी ही । विभाग में छोटे कर्मचारी से लेकर उच्च अधिकारी तक अधिकतर प्रथम एवं द्वितीय वर्ण के लोग थे, मध्य भारत के दफ्तर  में तो सुदर्शन अनुसूचित जाति का इकलौता कर्मचारी था और सभी का कोपभाजन बनता था। वह चाहता तो उसे सरकारी नौकरी के लिये भी कोशिश कर सकता था। असतकारी विभाग में ज्वाइन करने के बाद कई परीक्षाएं दी, पास भी कर गया था पर अत्याचार के खिलाफ सत्याग्रह का फैसला कर लिया था। इसलिये अत्याचार के खिलाफ मौन शब्दबीज बोने लगा जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनायी देने लगी थी। डां.विजय प्रताप साहब ने गिद्धू साहब की समझाइस पर सुदर्शन का प्रमोशन न करने की कसम खा रखी थी । सुदर्शन बड़ी ईमानदारी से काम करता । काम को पूजा समझ संस्थाहित में आगे रहता। समय से आता देर से जाता पर वह जमींदार व्यवस्थापकों की निगाह में अच्छा कर्मचारी नही था क्योंकि उसके पास उच्चजातीय योग्यता नही थी। कई जातिवाद के पोशक उच्चधिकारी तो ऐसे थे जिनको अंग्रेजी क्या चार लाइन हिन्दी में भी लिखने पर पसीना छूट जाता  था पर वे उच्च अधिकारी थे क्योंकि वे जातीय योग्यता की दृश्टि से योग्य थे। सुदर्शन उच्चशिक्षित होकर भी अयोग्य था।

सुदर्शन अपने सत्याग्रह पर अडिग था अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ मौन संघर्षरत था । असतकारी विभाग में वह अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद हासिल करना चाहता था। विभाग की कई आन्तरिक परीक्षाओं में बैठा भी परीक्षा तो पास कर जाता पर डां.विजय प्रताप साहब के इशारे पर इन्टरव्यू में फेल कर दिया जाता था। डां.विजय प्रताप साहब अब जनरल मैनेजर बन चुके थे पूरे विभाग की डोर उनके हाथ में थी। सुदर्शन की लगन को देखकर परेशान करने की नियति से गिद्धू साहब उसको काले पानी भेजने के नाम पर आंतकित करने का प्रयास करते रहते थ। सुदर्शन को तबादले से डर तो नही था क्योकि वह सत्याग्रह पर उतर चुका था । उसे ये भी पता चल चुका था कि डां.विजय प्रताप, देवन्द्र प्रताप, अवध प्रताप आर.पूजन, सुरेन्द एस.द्वारिका पी.रजिन्दर गिद्धू जैसे मुर्दाखोर उसका कैरिअर बर्बाद कर देगें। उसे तो बस एक ललक थी  कि असतकारी कम्पनी में वह डटा रहे जहां शोषितों का प्रवेश वर्जित जैसा है। वह शोषित समाज के प्रतिनिधि कर्मचारी के रूप में विभाग काबिज रहते हुए अपनी प्रतिभा दिखाना चाहता था परन्तु मुर्दाखोर किस्म के रूढि़वादी अफसरों ने सारे रास्ते बन्द कर दिये थे । कहते है ना जहां चाह वही रहा। उसकी प्रतिभा उभर कर आने लगी जिससे वह मुर्दाखोर अफसरों की आखों में खटकने लगा था। विभाग में सुदर्शन को नौकरी करते तीस साल हो चुके थे पर तरक्की अभी भी कोसो दूर थी। डां विजय प्रताप रिटायर होकर भी रिटायर नही हो रहे थे, कम्पनी के उच्च पद से चिपके हुए थे। सुदर्शन का कैरिअर समाप्त तो हो ही चुका था पर उसे अपनी योग्यता,कर्म और श्रम पर विश्वास था । कम्पनी में डां.विजय प्रताप  की दबंगता को लेकर दबी जबान विरोध होने लगा था। एक दिन उनके एक विरोधी ने सरेआम दफतर में जूता माार दिया। अब वे दफतर में मुंह दिखाने लायक नही बचे थे पर उनके मुर्दाखोर चमचे  जिन्हे उनकी तरह ही कमजोर, शोषित  वर्ग की तबाही में  उतना ही मजा आता था जैसे जीवित पशु नोच-नोच कर खाने में लकड़बग्धे को। इसी आमनुशता का शिकार सुदर्शन भी था। नौकरी में उसके जीवन के तीस से अधिक मधुमासों को मुर्दाखोरो ने पतझड बना दिया गया था पर श्रमवीर सुदर्शन का विश्वास  सदकर्म से नही उठा था । कोई मुर्दाखोर उसे बिना वजह परेशान करता तो वह कहता ‘सांच बात शहतुल्ला कहे सबके चित से उरतल रहे।’ मुर्दाखोर उसके मुंह निहारते रह जाते। सुदर्शन जब कभी अधिक परेशान हो जाता तो वह एकान्त में बैठकर गुनगुना उठता,

सच लगने लगा है, कुव्यवस्थाओं के बीच थकने लगा हूं,

वफा,कर्तव्य परायणता पर, शक की कैंची चलने लगी है,

google से साभार

ईमान पर भेद के पत्थर बरसने लगे है।

कर्म-पूजा खण्डित करने की साजिशें  तेज होने लगी हैं,

पूराने घाव तराशे जाने लगे हैं

भेद भरे जहां में बर्बाद हो चुका है, कल आज

कल क्या होगा, क्या पता,

कहां से कौन तीर छाती में छेद कर दें,

चिन्तन की चिता पर बूढा होने लगा हूं,

उम्र के मधुमास पतझड़ बन गये हैं,

पतझड़ बनी जिन्दगी से, बसन्त की उम्मीद लगा बैठा हूं,

कर्मरत् मरते सपनों का बोझ उठाये फिर रहा हूं,

कलम का साथ बन जाये कोई मिशाल, अपनी भी

इसी इन्तजार में शूल भरी राहों पर, चलता आ रहा हूं……….

विभाग के मुर्दाखोर अफसर सुदर्शन के कैरिअर को बर्बाद तो कर चुके थे अब उसेे पागल करार करने के फिराक में जुटे रहते थे पर वह साजिशॉ से बेखबर कर्म-पूजा पर ध्यान केन्द्रित किये रहता था। सुदर्शन के बाप उसे अफसर देखने की  इच्छा में मरण शय्या पर पड़ चुके थे। पिता की बीमारी की खबर पाते ही सुदर्शन छुट्टी की अर्जी लगाकर गांव की ओर चल पड़ा। सुदर्शन को देखते ही सुखीराम उठ बैठे, जैसे उन्हें  जिन्दगी का उपहार मिल गया हो।

स्वामीनरायन देखो बेटा को देखते ही उम्र मिल गयी। स्वामी नरायन बेटा अफसर बन गये ।

सुदर्शन बाप की आंखों में देखते हुए बोला बाबा जीत-जीत कर हारता रहा हूं पर जल्दी ही सपना पूरा होने की उम्मीद है। बेटा बड़ा दुख होता है, यह जानकर कि पढ़े लिखे उच्च वर्णिक अफसर पुराने जातीय भेदभाव की मुर्दाखोरी से नही उबर पाये है।

ये मुर्दाखोर किस्म के नर पिशाच लोग,

सज्जनों को आंसू देना,अपनी विरासत समझते है,

छल-प्रपंच में माहिर ये दोगले, आदमी के दिल को चीर कर रख देते है।

छीन को यतीम तक कर देते है, झूठी शान के दीवाने हिटलर

नरपिशाच की बाढ़ में बह जाते हैं, वक्त के ताल बेपर्दा होकर बदनाम हो जाते हैं।

सुदर्शन-बाबा जातीय व्यवस्था की तासिर शोषित  वर्ग के लोगों का जीवन तबाह करने की है।

बाबा जाति व्यवस्था दुर्जनों की डरावनी नीति है,

सज्जनों को डंसती-सताती मित्ति है, इन खुदगर्जो की महफिलों में,

सच्चे नेक की कब्र खोदी जाती है।

भेद-चम्मचागीरी औजार ऐसा जिससे, सोने की डाल काटी जाती है

कर्म-श्रमवीर को रूसुवाई दी जाती है।

सुदर्शन-यही तो गम है अपनी जहां से।

कल नर के वेश में शैतान ने, श्रमवीर का जनाजा निकाला था,

आज माथे पर मुर्दाखोर के कु-करनी का रौब दहक रहा था,

वह जीता सा जुबान की तलवार भांज रहा था,

लुटे नसीब का मालिक अदना कर्म-पथ पर चला जा रहा था।

स्वामीनरायन-बेटा वैदिक काल में अखण्ड भारत के वक्रवर्ती सम्राट महाराजा की तनिक सी गलती से आज युगों बाद भी मूलनिवासियों जो लगभग ग्यारह सौ से पन्द्रह सौ उपजातियों में बंट चुके है,को दण्ड भुगतना पड़ रहा है।

सुदर्शन- कैसी गलती बाबा ……..?

स्वामीनरायन-बेटा ऐ कैसी आजादी है आजाद होकर भी हम शोषित, हाशिये के लोग, कमेरी दुनिया के लोग दिख रहे है । हमारे समाज का वही हाल है- ‘झंखै खरभान जेकर खाले खलिहान, महाराज बलि ने दान क्या कर किया कि वैदिक काल में अखंड  भारत के राजा सोने की चिडि़या कहे जाने वाले देश  के मूलनिवासी वर्तमान में शोषित  रंक हो गये। महाराजा बलि गुरू शुक्राचार्य  की बात मानकर छली वामन को अपना सर्वस्व दान नही करते तो आज शोषित  वर्ग की दुर्दशा  ना होती बेटा,

सच लगन लगा है,कुव्यवस्थाओं के बीच थकने लगा हूं,

वफा,कर्तव्यपरायणता पर शक की कैची चलती रही है

ईमान पर भेद के पत्थर बरसने लगे है,

कर्मपूजा खण्डित करने की साजिश होती रही है,

जातिवाद के पुराने घाव तराशे जा रहे हैं,

भेद भरे जहां में शोषित  वर्ग बर्बाद हो चुका है

क्ल क्या होगा कुछ पता नही,कहा से कौन तीर छाती में छेद कर दे,

यही सोच-सोच सोच बूढ़ा हो गया हूं,

उम्र के मधुमास पतझड़ बना दिये गये है,

पतझड़ बनी जिन्दगी से बसन्त की उम्मीद लगाये बैठा हूं,

कर्मरत् मरते सपनों का बोझ उठाये फिर रहा हूं,

कलम बने हथियार,शोषित  समाज की बन जाये मिशाल

इसी इन्तजार में शूल भरी राहों पर चलता जा रहा हूं………

बेठा सुदर्शन अपने कर्म से विचलित ना होना, कर्म एक दिन जरूर निखरेगा, वैसे ही जैसे शिला घिस-घिसकरअनमोल रत्न बन जाती है। भले ही मुर्दाखोरो ने तुम्हारा भविष्य चौपट कर दिया हो। इस बस्ती के बच्चों के लिये तुम उदाहरण हो।

सुदर्शन-हां बाबा मै जानता हूं मेरे घर-परिवार के अलावा बस्ती के लोगों की उम्मीदें मुझसे हैं उन्हीं की दुआओं का प्रतिफल है कि दर्द में भी सकूंन ढू़ढता जा रहा हूं पर बाबा,

अपने  जहां के कैसे-कैसे लोग,तरासते खंजर कसाई जैसे लोग,

अदना जानकर लूटते हक, छिन जाते आदमी होने का सुख,

कर रहे युगों से कैद नसीब,अपने  जहां के लोग……

कैसा गुमान,वार, रार,तकरार, करते रहते लहुलूहान,

अदने का जिगर, भले ना हो कोई गुनाह, देते रहते,

भय षोशण,उत्पीड़न दिल को कराह………..

अपनी जहां उमें उम्र गुजर रही,अदने की जिन्दगी दर्द की षैय्या पर,

मुष्किलें हजार काटों का सफर,बेमौसम अंवारा बादल बरस रहे

डूबती उम्मीदें किनारे नही मिल रहे……

अदना  हिम्मत कैसे हारे,मुर्दाखोरों की महफिल में सत्याग्रह कर रहा

हौशले की पतवार से जीने को सहारा ढू़ढ़ रहा,मुर्दाखोरों से चैकन्ना,

खुली आंखों से सपना बो रहा……..

स्वामीनरायन-शावाश मेरे लाल, तू जरूर बस्ती का नाम रोशन करेगा। मुर्दाखोरों के बीच रहकर भी तुम सत्याग्रह कर रहे हो अपने सपने बो रहे हो क्या यह सफलता से कम है। बेटा जो लोग गरीब,हाशियें के आदमी, शोषित  वर्ग का उत्पीड़न,षोशण करते हैं, हक छिनते हैं, उनको आसूं देते हैं, वे लोग मुर्दाखोर तो ही होते है। ऐसे लोगों के बीच तुम टिके हुए हो यह तुम्हारी उच्च शैक्षणिक योग्यता और काबिलियत का सबूत है वरना ये लोग लील गये होते । बेटा तू जरूर अफसर बनेगा, बेटा मुसाफिर का सपना जरूर पूरा होगा। मुर्दाखोर तुम्हें नही रोक पायेंगे। तुम्हारे साथ तुम्हारे मां-बाप और पूरी बस्ती की दुआयें है। देखो तुम्हें देखकर मरणासन्न सुखीराम के चेहरे पर रौनक आ गयी है। उनकी सेवा सुश्रुशा करो उठकर चलने लगेगे। मैं घर चलता हूं बूढी  इन्तजार कर रही होगी, मेरे खाने के बाद ही वह खाना खायेगी कहते हुए स्वामीनरायन बाबा उठे और अपने घर की ओर लपक पड़े।

सुदर्शन बाप का इलाज करवाकर शहर लौट आया। मन लगाकर नौकरी करने लगा। बाप के स्वास्थ की चिन्ता तो सताती रहती थी पर पापी पेट का सवाल था नौकरी तो करनी थी पर यह नौकरी तो दर्द के दरिया में डूबकर सुदर्शन को करनी  पड़ रही थी ।चैतीस साल की विभागीय सेवा में पांच छः बार प्रमोशन के अवसर तो आये पर वह हर परीक्षा पास करने के बाद मुर्दाखोर अफसरों के इशारे पर प्रमोशन से दूर फेक दिया जाता था। मुर्दाखोरों ने रगजीत, कामनाथ, रतीन्द्रनाथ जैसे कई अन्य मुर्दाखोरों की पौधे भी तैयार कर कर दिये थे जो विभाग को अपनी जागीर समझकर जमींदारी-सामन्तवादी सल्तनत कायम करने का भरपूर प्रयास कर रहे थे।सुदर्शन दर्द के दरिया में डूबा हुआ तो था ही, उसका कैरिअर तो पहले ही सामन्तवादी मुर्दाखोरो ने चौपट कर दिया था। उसे अब कैरिअर की चिन्ता तो थी नही बस वह इसलिये सत्याग्रह कर रहा था कि उस जैसे लोगों के लिये विभाग का दरवाजा खुले परन्तु सामन्तवादी लोग भी बहुत ढ़ीठ मुर्दाखोर थे। सुदर्शन नौकरी की उम्र के आखिरी छोर पर पहुंच चुका था इसी बीच फिर एक परीक्षा हुई उसमें भी वह पास हो गया पर पहले कि भांति फिर फेल कर दिया परन्तु सत्याग्रही सुदर्शन बोर्ड आफ डायरेक्टर के दफतर के सामने बैठ गया, बोर्ड आफ डायरेक्टर कोे सुदर्शन के सत्याग्रह के सामने झुकना पड़ा। सुदर्शन अफसर बन गया यह खबर उसके बाप को जीवनदायिनी साबित हुई और बस्ती के लिये दीवाली। असतकारी कम्पनी सतकारी के नाम से जानी जाने लगी और इस अंतरराष्ट्रीय कम्पनी के दरवाजे सब के लिये खुल गये। जमींदारी-सामन्तवादी मुर्दाखोर सल्तनत का अन्त हो चुका था।सुदर्शन का मुर्दाखोरो ने बहुत उत्पीड़न, शोषण किया, यदि उसके साथ न्याय हुआ होता तो वह बहुत बड़ा अफसर बनकर रिटायर होता इसका उसे मलाल तो था पर खुशी इस बात की थी कि वह मुर्दाखोरों का गरूर तोड़ चुका था सुदर्शन सत्याग्रह के पथ पर चलकर। भले ही छोटा अफसर था पर चहुंओर उसके सत्याग्रह की जयजयकार थी और मुर्दाखोरों की निन्दा।

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