कुछ रचनाएं वर्तमान समय की विद्रूप विभीषिकाओं को बेहद स्पष्ट स्वरूप में सामने ला खड़ा करती हैं | ये रचनाएं मानव अंतर्मन को गहरे तक हिला देती हैं जहाँ इंसान खुद को एक बड़े सवाल के सामने जबावदेह के रूप में खड़ा पाता है यह सोचते हुए कि आखिर हम कहाँ आ गये हैं …… कुछ ऐसी ही कविता है निवेदिताकी ….| संपादक 

मुसलमान

तारीख के जंगलों से निकलतीं यादें: स्मृति कोलाज (निवेदिता)

निवेदिता

अम्मी ने मेरे गले की ताबीज उतार दी
और मेरी पेशानी चूम लिया
अम्मी ने कहा खुदा तुम्हें सलामत रखे
मैं हैरान था
जिस ताबीज के लिए वह जाने कितने मजारों से दुआएं मांगी
और पीर के कदमों में सजदा किया
आज अम्मी ने वो ताबीज उतार दी
छुटपन में अक्सर मेरे दोस्त पूछते थे
तुम्हारे गले में क्या लटक रहा है ?
मैं कहता अम्मी की दुआएं
फिर पूछता तुम्हारे हाथ में ये लाल , पीले ,सुनहरे धागे क्यों लटक रहे हैं
वो कहता अम्मा का आशिर्वाद
फिर हमसब हंस पड़े
सृष्टी के छोर तक फैलते हुए
हम जानते हैं दुनिया की हर माँ
अपने बच्चों को बद की नजर से दूर रखने का जतन करती हैं
हमारी ताबीज और मोहन के हाथों में बंधे धागे कभी बदले नहीं
पर बहुत कुछ था जो बदल रहा था
कुछ था जो पक रहा था हमारे-उसके दरमयान
जब गुजरात जला
हम जले
जब मुजफ्फ़रनगर जला
हमारी आत्मा जली

पता नहीं चला कब मैं मुसलमान बना
कब मोहन हिंदु होने के दर्प से भर गया
ये सब किस तरह हुआ ?
एक देश के कई शहरों में
जिसकी सड़कों पर
राष्ट्रवादी अभियान की चीखें थीं
पैरों तलें इतिहास कुचला गया था
जमीन रक्त से भीग गयी थी
माँ ने एक दिन पूछा था
तुम और मोहन पहले की तरह ही मिलते हो ना
मेरा मन कसैला हो गया
नहीं पता हमारे बीच
कब छीटदार रेशमी पोशाक पहने शैतान घुस आया था
जो किसी पशु से निकले फेफड़े की तरह डोलता रहता
भड़कीली मुद्रा में देश गान गाता
देश गान भयावह समवेत चीख में बदल जाता
और तलवारें निकल आती
बड़ी बड़ी रक्त रंजित तलवारें
एक दिन हमने देखा मनुष्य से ऊँचा हो गया धर्म
और देश से ऊँची हो गयी नस्ल
माँ की दुआएं भी हिन्दू और मुसलमान हो गयी
ताबीज अब मुसलमान था
और रंगों से झिलमिल धागे हिंदु
अपनी ही दुआं से डर गयी माँ
और जब हम लपकते आग से भाग रहे थे
अम्मी ने मेरी ताबीज उतार दी
और कहा अब लोग जान नहीं पाएंगे तुम्हारी पहचान
अम्मी की आखों में गहरे –गहरे बादल तैर रहे थे
मैं भाग रहा था
अपने ही देश में अपनी पहचान छुपाये …….!

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    By: निवेदिता

    4 अप्रैल 1965 में बिहार के गया में जन्मी निवेदिता ने अपने सफर की शुरुआत रंगमंच और छात्र आन्दोलन से की।
    पटना विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया। माँ इन्दु रानी झा, पिता नीतिरंजन झा की पहली सन्तान।
    पत्रकारिता का लम्बा अनुभव। विभिन्न अखबारों नवभारत टाइम्स, आज, राष्ट्रीय सहारा, नई दुनिया में कई वर्षों तक काम किया। अभी स्वतन्त्र पत्रकार के रूप में दिल्ली, पटना से प्रकाशित होने वाले दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का काम जारी। फिलहाल ग्रीन पीस इंडिया में मीडिया कंसलटेंट के रूप में कार्यरत। महिला मुद्दों पर बेहतरीन पत्रकारिता के लिए उन्हें 2010-11 का लाडली मीडिया अवार्ड एवं वन वर्ल्ड अक्षयपात्रा मीडिया अवार्ड 2012 मिला। नेशनल फाउंडेशन ने 1997 में बच्चों की स्थिति पर काम करने के लिए मीडिया फेलोशिप दिया। यूएनएफपीए के तहत विजनरी लीडरशिप फेलोशिप 2004 में मिला। बालिका शोषण की अनकही कहानी – 1999 में बुक फॉर चेन द्वारा प्रकाशित की गयी। केन्या, फिलीपींस, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान, अरब अमीरात में यात्रा करने के बाद पटना में रह रही हैं।

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