“वसंत और तबस्सुम की अंतरजातीय शादी, इस औद्योगिक शहर के एक छोटे से हिस्से में, जहाँ ये लोग बसर कर रहे थे, एक किस्म के लोगों को पसंद नहीं आई थी… बल्कि नागवार दुस्सहासिकता लगी थी. मेरा पत्रकार मित्र विजय बता रहा था कि शहर के उस हिस्से में, जहाँ की आबादी गरीब और पिछड़ी हुई थी, फिरकापरस्ती की जड़ें गहरी पैठाने की कोशिशें गाहे बगाहे जारी रहती हैं. इस वक्त लोग वसंत और तबस्सुम के बारे में बात करते हैं, और इस पर एतराज है कि इन लोगों ने समुदाय की परवाह ना करते हूए कानून के दम पर शादी कर ली. मुझे गुस्सा आता था कि लोग किसी और की अमन-ओ-मुहब्ब्त की ज़िंदगी से किस तरह परेशान हो जाते हैं, और उनके जींस में दबी हुई वह कट्टरता फूटने लगती है. यह बेहूदी बात अब खुलकर ज़ाहिर हो रही थी.

वसंत उस दिन पूरी दोपहर बातें करता रहा… अक्षरश: याद रखा तो संभव नहीं, मगर आज जो याद है, उसकी बातों का सार यह था, खुद के साथ और बाकी सबको ख़ारिज करते हुए चलना एकदम आसान भी नहीं होता. यार, मैं पूरे यकीन के साथ, हिम्मत के साथ और अफ़सोस के साथ चीख-चीखकर कहना चाहता हूँ कि धर्म या धर्मावलंबियों ने इंसानियत का बेड़ा गर्क कर रखा है. आदमी को सिर्फ़ आदमी या घटिया आदमी बनाने में धर्म के पागलपन का बहुत बड़ा हाथ है. उन्नीस सौ बानब्बे और दो हज़ार दो के बाद तुम देख लो हालात कितने घटिया और एंटी ह्यूमेन हो गए हैं… इन दस सालों के दौर में देख लो. यार शर्मनाक फिर भी यह है कि वे खुद को ‘विकास पुरुष’ कहते हैं, और हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस पर यकीन कर लेता है !

वसंत की बातों के बाद मैं फिर शांत नहीं रह सका. शाम को तबस्सुम से मिला तब उसने वसंत की इन बातों को आगे बढाते हुए कहा था, वे लोग नहीं चाहते कि कोई भी उनकी स्थापित मान्यताओं में कोई विचलन पैदा करने की जुर्रत करे या करने का जरिया बने… हम, वसंत और मैं अक्सर दीन और इल्म में फर्क करते हैं. और हमारी साझी समझ यह है कि इल्म दीन से बड़ी चीज होती है. मगर वो तो इल्म से ही मरहूम लोग हैं… जंगली…!”

आइये पढ़ते हैं ‘शेखर मल्लिक’ की लम्बी कहानी आज हमरंग पर ……|

मुहब्बत ही दीन-औ-ईमां मेरा  

शेखर मल्लिक

शेखर मल्लिक

 

आज उसके सिरहाने मुझे और मेरे साथ सबको, जिसकी वह अज़िज़ है, उसके बोल पड़ने की ख्वाहिश – ओ – इन्तजार है… ! एक बेचैनी की इन्तेहा कर देने वाला इन्तजार…!तबस्सुम कभी खामोश नहीं रही… आज मुझे उसे इतना खामोश देखकर तकलीफ हो रही है. लगता है कि ये ख़ामोशी बस एक झूठ की तरह हमारे ज़ज्बातों का इम्तिहान लेने चली आई है. बस कुछ लम्हें और हैं, कि जैसे बीते हज़ार लम्हों की तरह बीत जायेंगे… फिर एक खुशगवार हवा खिड़की, रोशनदान और दरवाजे से इस कमरे में भर जायेगी और सब कुछ पहले की तरह चलने लगेगा… फिर हम ऐसा कुछ हो जाने की नौबत ही नहीं आने देंगे ! हम एक अपवाद, एक गुंजाइश और एक बेहतरीन इंसानी ज़ज्बे को महफूज़ रखने के लिये कुछ भी करेंगे…

एकदम शुरू के दिनों की बात करूँ तो, तबस्सुम से जाने कितने ही मसलों पर बात होती थी. उसने कितने ही मुद्दों पर बेबाक बेलाग अपनी बात कही है… एक बात जो मुझे इस अफ़साने का आगाज़ करते हुए ही याद आती है, जब उसने सरलीकृत करते हुए ऐसे ही कही थी, कि कहानियों में, मेरा ख्याल है कि, आप अफसानानिगार लोग इरादतन किसी करेक्टर को अक्सर ‘आयडल’ बना कर पेश कर देते हैं, जबकि वाकई में ऐसा कुछ होता नहीं ! आम आदमी का भी मोरल होता है, वही मोरल और उसूल उसकी ताकत हैं. यह उसकी खासियत नहीं, सिर्फ़ एक सही बात है. उस आम आदमी को भी आप कहीं ना कहीं से अपने ‘ओप्टीमिज्म’ में आदर्श के रैपर में लपेट डालेंगे ! मैं बहस करता हूँ कि, हमेशा और हर किस्म की कहानी में ऐसा नहीं होता. अक्सर कहानी या गल्प में यथार्थ को बयान करते हुए भी हमें उस ‘अपेक्षित’ या ‘बेहतर’ की आकांक्षा को अभिव्यक्त करना ही होता है, और आदर्श और आशावाद के बिना सृजनात्मकता बाँझ और निरुद्येस्य हो नहीं जायेगी ? फिर कुछ लोग अपवाद के तौर पर अच्छे भी निकल ही आते हैं तबस्सुम ! या इतने की गुंजाइश तो रहती ही है. उसे रेखांकित किया जाना चाहिये… और वही पाने का सपना ही हर उद्देश्यपूर्ण कला का मोटिव होता है.

तबस्सुम हँसती है, “ज़नाब ! खूब… वो तो मैं भी समझती हूँ… आप तो क्रिएटिव सेन्स पर बाकायदा लेक्चर देने लगे !” और मैं झेंप जाता हूँ. शुक्र है कि ऐन वक्त पर वसंत किचन से चाय की तीन प्यालियों के साथ नमूदार हो जाता है, और गुफ्तगू की नोंक मर्दों की पाक-कला सबंधी रूझान और प्रतिभा पर मुड जाती है…

वसंत से जब मेरी बात होती थी तो कहता था, तबस्सुम बेहद संजीदा और दानिशमंद लड़की है, इसलिए उसे पसंद आई. ‘मॉड’ होना एक बात है, और प्रोग्रेसिव होना दूसरी बात. उसकी कल्चर में ही देखो कितने लोग अपने को मॉडर्न कहते हैं, मगर भीतर से तहजीब के पल्लू के पीछे वही कबीलाई मानसिकता ! और हमारे लोगों को देखो, यहाँ भी वही चीज तुम्हें शर्मसार कर देगी ! यार, ईश्वर, कुरान, चर्च के नाम पर दबंग ताकतें हेज आलवेज बीन द डिसाइसिव बट नेगेटिव फ़ोर्स इन मैनकाईंडस् लाइव…

मैं कहता, महान दार्शनिक ! आपकी तबसुम बे-इन्तेहा खूबसूरत भी है, यह नहीं बोलोगे ?

वसंत मुस्कुराने लगता. इस किताब से आशनाई वाले को कोई जिंदा शख्स अच्छा लगना, बड़ी राहत की खबर थी !

हम घुमक्कड़ थे उन दिनों… अक्सर मोटर साइकिल लेकर शहर से बाहर घूमने निकल जाते थे. चांडिल की तरफ एनएच – ३३ पर आगे यूँ ही चले जाते और नव निर्मित होते अपार्टमेंट्स, कोलोनियाँ, विहार, बड़े बड़े माल, बिग बाज़ार, शो रूम, होटल के रूप में शहर के बढ़ते दायरे को देखते. कभी डिमना झील की तरफ, कभी दलमा की पहाड़ियां… ये घुमक्कड़ी तबस्सुम के मिलने के कुछ दिनों बाद खत्म हो गयी… क्योंकि हमें उसके साथ बातें करने के लिये वक्त चाहिए था, दूसरे वह इस तरह हमारे साथ शहर से बाहर नहीं जा सकती थी…

***

“…रेस्पेक्टेड सीनियर्स एंड माई डियर फ्रेंड्स ! हमारे सामने… पूरी इंसानी इतिहास के हवाले से मैं यह बात कहती हूँ कि, कुछ मुसलसल मुद्दे रहे हैं कि जिन पर हम बहुत कम गुफ्तगू करना चाहते हैं. एक सेक्स, दूसरा इश्क और तीसरा मजहब…! सेक्स तो आज भी ‘टैबू’ है. आप बात नहीं करेंगे, मगर मैं करूंगी… क्योंकि ये मेरी जात यानि विमेनहूड के वास्ते लिबरेशन और सब्जेक्ट ऑफ सेलिब्रेशन का सरोकार है, क्योंकि इसी मरकज़े-मुद्दे पर लोग हमें संगसार करते हैं !… दूसरा, इश्क तो बेशक इक आग दरिया है, खून का दरिया भी है. आप खापों में कितनों को मारेंगे ? खाप कहाँ नहीं हैं, चौखट के अंदर और बाहर, हर जगह… कोडरमा में मेरी हत्या करते हैं… क्योंकि मैंने अपने मुताबिक जीना चाहा था… दिल्ली में आप चलती बस में मुझे बेरहमी से भोगकर मार डालते हैं, और फिर कहा जाता है कि रेप सिर्फ ‘इण्डिया’ में होता है… तब भंवरी और फूलन जैसों के साथ जहाँ होता है, वह इंडिया है या आपकी पवित्र ‘भारत-भूमि’ ?…

साथियों, मेरे पास सवाल बहुत हैं, और ज़वाब भी मुझे ही, हमें ही ढूँढने हैं क्योंकि मैं उनके ज़वाबों से इत्तेफाक नहीं रखती. वे सिर्फ़ बेहतरीन सवाल पैदा कर सकते हैं… और मज़हब पर कहूँ तो, लोग मानते हैं सबकी मंजिल वही खुदा या ईश्वर है… खुदा में फ़ना होने के सब जुदा-जुदा रास्ते हैं… तो फिर हम सब कबीर, बुद्ध या भगत सिंह क्यों नहीं हैं ? मज़हब के वास्ते आप कत्ल क्यों करते हैं ? कौम, नस्ल और देश को क्यों बाँट डालते हैं ?

डियर फ्रेंड्स, मैं सिर्फ दरम्याने-आदम की मोहब्बत को मानती हूँ. आज इक्कीसवीं सदी का पहला डिकेड गुजर जाने के बाद भी मुझे लगता है, इन टॉपिक्स साफ़ बात करने, बात करने से मेरा मतलब जुनूने इश्क और जुनूने मजहब में डिफ्रेंशिएट करने के लिए हमारी सोसाईटी के पास “गट्स” नहीं है, इच्छाशक्ति नहीं है और बहरहाल इरादा भी नहीं है…

दोस्तों, इन तल्ख-लफ़्ज़ों से अपनी बात को अंजाम देती हूँ…

हर जुबां खामोश है

सब होंठ सिले हैं

हद-ऐ-बेशर्मी है

लोग बात नहीं करते…

***

साभार google से

साभार google से

वसंत ने बताया था कि, इसी तकरीर के बाद जो ‘स्नातकोत्तर हिंदी विभाग’ में आयोजित सेमिनार- ‘धर्म, लैंगिकता और समाज’ में तब्बसुम ने दिया था, वह तब्बसुम की इज्जत करने लगा था. और यह सयाने लोग कहते ही हैं कि इश्क का आगाज पहले पहल इज्जत करने के अहसास से होता है. तब्बसुम और वसंत कुमार दोनों मेरे स्नातकोत्त्तर हिंदी के सहपाठी… वसंत और मैं तो बी० ए० से ही सहपाठी और दोस्त रहे हैं, और तब्बसुम को वसंत ने हमारे बीच उसी भाषण या पर्चा पाठन के बाद शामिल किया था. मुझे ताज्जुब हुआ था कि तीन साल स्नातक और लगभग इतना वक्त एम.ए. में साथ रहने के बाद भी हमने कभी तब्बसुम को जाना-पहचाना नहीं था ! हमने उसके पर्चे को ब्लॉगस् और फेसबुक पर सर्कुलेट भी किया था… हमारी संजीदा चर्चा-बहसों और बेतकल्लुफ ठहाकों वाले समूह में तबस्सुम पहली और आखिरी जनाना बनी. दूसरी कोई इसलिए नहीं, क्योंकि उसके जैसी हम कोई और नहीं पा सके !

तब्बसुम के वालिदैन भुवनेश्वर में रहते हैं. अब्बाजान उत्कल यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर हैं. तब्बसुम बातचीत में अंग्रेजी लफ़्ज़ों और नफीस उर्दू-हिंदी का इस्तेमाल करती है, और इससे उस पर अपने वालिदों के घरेलू और शैक्षिक तहजीब का साफ असर देखा जा सकता है. अम्मी लिंग्विस्टिक में रिसर्च स्कोलर रही हैं. भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में देश की एक अग्रणी संस्था में कार्यरत हैं. घर पर उर्दू ही बोली जाती है, जो उनकी पहली जुबान है. और बकौल तब्बसुम, ‘अम्मीजान को भाषा की नफासत से जितनी मोहब्बत है, उसे लापरवाही से बोलने वालों से उतनी ही अदावत !’ तब्बसुम की स्कूलिंग केन्द्रीय विद्यालय में हुई. उसे हिंदी-उर्दू अदीब में दिलचस्पी अपने घर के माहौल से मिली. बारहवीं के बाद उसने कहा कि वह हिंदी में डिग्री करेगी. ग्रेजुएशन के लिए साझा राय यह बनी कि बेटी किसी हिंदी प्रदेश की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करे. उस वक्त तब्बसुम के मामूजान ने पहल की. और तब्बसुम को जमशेदपुर में पढ़ाई के लिए उनके यहाँ रखा गया. तब्बसुम के मामू और मामी भी तन्हा रहते रहे. उनके कोई औलाद नहीं. इसलिए उनकी इस ख्वाहिश को इज्जत बख्शी गई. दूसरा, इकलौती बेटी को अपने से दूर रखना पड़ा तो, इन्हीं के पास रखना मुफीद समझा गया. सो तब्बसुम ‘इस्पात शहर’ टाटानगर उर्फ जमशेदपुर आ गई. चूँकि पहली पसंद, वीमेंस कॉलेज में दाखिले की तारीखें निकल चुकी थीं… साल भर इन्तजार कर पूरा सत्र गंवाने से मुफीद यही था कि कॉऑपरेटिव कॉलेज में दाखिला दिला दिया गया…

वसंत कुमार की फ्लैशबैक स्टोरी लाइन यह है… वसंत के पिता ठेका मजदूर थे और एक साथी मजदूर की गलती से ऑन ड्यूटी दुर्घटना का शिकार हो गए. चूँकि वह ठेका मजदूर थे, इसलिए ठेकेदार ने सिर्फ दिखाने भर के लिए कुछ रकम देकर ‘कम्पनशेसन’ की खानापूर्ति कर ली. असंगठित क्षेत्र के होने की वजह से वसंत के परिवार को किसी लाभ पर दावा नहीं मिल सका. घर में लंगड़े पिता और माँ… बस तीन आदमी. माँ मोहल्ले के बच्चों को ट्यूशन देती थी, बाद में वसंत ने भी कुछ ट्यूशन पकड़ लिये…

वसंत मुझसे कोई बात छुपाता नहीं है, और तब्बसुम भी दोस्तों के बीच पर्दादारी रखना यारी के असूलों के खिलाफ समझती है… तो इस नाते हम तीनों के बीच हर बात साझा होती रहती है. घर की और निजी, सब तरह की बातें… अपने-अपने सपने और मोर्चों की चर्चाएँ… कॉलेज कम्पाउंड, जब वसंत के माँ-पिता बिहार में अपने पैतृक गाँव गए हों, तो उसके घर या फिर जुबली पार्क के सेंटर फॉर एक्सीलेंस भवन की तरफ वाली पेड़ों से झड़े सूखे पत्तों से घिरे एकांत बैचों पर बैठे हुए… दोस्तों को हमेशा हम किसी ना किसी मुद्दे पर भिडे हुए पाए जाते रहे, कभी सिंगुर-नंदीग्राम, कभी तहरीर चौक, कभी किसी जोरदार कविता या कहानी पर, कभी लोकपाल का मसला तो कभी मलाला युसुफजाई पर फायरिंग… हमारा ग्रुप अमूमन छह: दस दोस्तों का था, मगर हम तीन लोग मजलिस में फिक्स थे…

“तुम लोगों को सिर्फ़ डिबेट करना आता है… और बरखुरदार आपको,” वह संजीदगी से मुझे देख रही थी, “हर आदमी में एक अदद किरदार… ताकि आप एक मुसलसल अफसाना तर्जुमा कर सकें ! डियर, ज़मीनी मोर्चे पर जाईये, देखिये… जो हो रहा है, और क्यों हो रहा है, उसकी पड़ताल कीजिये. ये करने की आपको ना फुर्सत है, ना तबियत…! सवाल कीजिये… ज़मीन के लोगों के साथ लड़िए. बस लंबे लंबे डिटेल्स वाली कहानियाँ मत लिखा कीजिये…” तबस्सुम पता नहीं क्यों मुझे उकसाती रहती.

“तो आपके मुताबिक लेखक को एक्टिविस्ट भी होना चाहिए ?” मैं उसे समझने की कोशिश करता.

“जी हाँ, हुजूर ! लिखना मिशन नहीं है क्या? अपने लिखने को खुद अमल कीजिये.”

“मगर इस देश में लिखने से पेट नहीं चलता. और कार्यकर्ता के जैसा होने के लिये वक्त चाहिए. प्रेक्टिकल दिक्कत ये है तबस्सुम कि पेट पालने का जुगाड़ करने के बाद हमारे पास लिखने तक को वक्त की मुफलिसी है, तो और चीजों के लिये वक्त कहाँ से लाएं.?” मैंने तर्क पेश किया.

“दोस्त ! वक्त का रोना काहिली है. इसी छोटी सी हयात में, इन्हीं चौबीस घंटों में आपको जिंदा रहते हुए वो सब करना चाहिए जिससे आपकी ज़मीर ना मारी जाय ! नाईजिरीयाई लेखक केन् सरो वाइवा का एक स्टेटमेंट सुनाऊं? वह बोलता है,” उसने कोट किया, “द राइटर केन नॉट बी अ मेयर स्टोरी टेलर… ही केन नॉट बी अ मेयर टीचर… ही केन नॉट मेयरली एक्सरे सोसाइटीज वीकनेस… इट्स इल… इट्स पेरिल्स… ही ऑर शी मस्ट बी एक्टिवली इन्वोल्व्ड शेपिंग इट्स प्रेजेंट एंड इट्स फ्यूचर…”

वह नेट पर बहुत कुछ पढ़ती रहती थी… यह उसकी गवाही थी !

तब्बसुम ने एक दिन कहा, जिंदगी जीने के लिये सिर्फ एक चीज की ज़रूरत है – मोहब्बत और सब्र ! और मज़े से जीने के लिये इससे ज्यादा कुछ मांगना बेमानी है… फिर भी लोग बेवजह ऐसा कुछ करते रहते हैं, जिसका जिंदगी को फकत जीने से कोई वास्ता नहीं है… कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि अगर ऐसा होता या नहीं होता तो.

मैंने पूछ लिया – “मसलन?”

“मसलन, राह चलते कुत्ते पर पत्थर फेंकना, इबादत करना, आदत और फायदे के मुताबिक कुछ चीजों को सही और बहुत सी चीजों को गलत कहना… वगैरह.”

वसंत बोला, “तबस्सुम, शायद तुमने पढ़ा होगा, धर्म अफीम है, बल्कि मैं बोलता हूँ इससे ज्यादा साफ कहा जा सकता है, यह मोर्फिन है, जो आदमी को सोचने समझने से मरहूम कर देता हैं, या जानवराना जुनुनियत में डाल देता है…”

“अच्छा ! और मुहब्बत भी यही करता है? यह जुनून में सब जायज़-नाजायज़ करवा देता है” मैंने कुतर्क किया, जानबूझकर कि देखूं तबस्सुम क्या कहती है ?

“मुहब्बत का जूनून और तासीर दूसरी चीज है. मुहब्बत में नाजायज़ कुछ नहीं होता यार ! कहाँ तुम मुहब्बत के आजाद फलक को मज़हब के तंग कोठे से मिला रहे हो, बहुत फर्क है यार !” तब्बसुम ने कहा था और कॉफी का कागजी कप होठों से लगा लिया था. हम लोग बिस्टूपुर रीगल मैदान के पास स्नैक्स की दुकान पर खड़े थे…

इक उम्दा रौशनी सी है मुहब्बत

पूरी कायनात पर खुशगवार धूप सी फैली हु ई

एहसासपुरसुकून

आबे हयात को मीठा बनाती हुई

वो तसल्ली कि जैसे सीने पर रखा हुआ सर

और गाफिल सुकून औएतबार में…

मज़हब परस्ती कोई और शै है,

मुब्तिला है इसकी गिरफ्त का बंदा

सिर्फ़ तक्सीम के कारोबार में

तबस्सुम की एक क़ाबीले-गौर काबिलियत यह है कि वह फटाक से नज़्म और शेर बुन लेती है… उसका नज्म बोलने , पढ़ने का अंदाज बहुत उम्दा है. वह कहती है कि, वह अपनी क्रिएटिविटी को ‘सेन्स ऑफ क्रिएटिंग समथिंग आउट ओफ नथिंग’ मानती है. इट्स अ प्रिविलेज माय डियर फ्रेंड… अगर आपको कुदरत ने एक आर्टिस्ट का हुनर दिया है. सिर्फ़ ये करो कि इस आर्ट को ईमानदार और ज़मीनी, बयाने-हकिक़त बनाओ…

मैं उन दिनों, जब से वसंत ने ही बताया था, और सबूत के तौर पर तबस्सुम की हस्तलिपि में उसकी एक निजी नज़्म पेश की थी, वसंत से पूछता रहता था कि यार, तबस्सुम बेहद खूबसूरत है, शाईस्ता है… काफी जहीन है… सुलझी हुई और आज़ाद-ख्याल लड़की है. बेशक वह जिसे पसंद करेगी, लोग उस बंदे पर रश्क करेंगे… मगर वह मुस्लिम है, तू हिंदू है. हमारी सोसाईटी इस मामले में कभी इतनी लिनियेंट नहीं रही है. बात इस शहर की हो या कहीं की… “तुम दोनों को रिवोल्ट करना होगा…”

“भाई, यह फ़िल्मी, किताबी बातें नहीं लगती?”वसंत का जवाब तुरंत एक ठोस इरादे की तरह भारी लगता, बेहद भारी, “जरूर ! मुहब्बत में मजहब की कोई जगह नहीं होती ! मैं किसी मुसलमान से इश्क नहीं करता… वह किसी हिन्दू से प्रेम नहीं करती… बल्कि हम एक-दूसरे को प्यार करते हैं, ठीक वैसे और उतना ही, जैसे और जितना दो ज़िंदा लोग आपस में कर सकते हैं.”

“फिल्म और किताब ही क्या, आर्ट जिंदगी से ही पैदा होता हैं दोस्त… जिंदगी इनके मुताबिक नहीं होती !”

***

साभार google से

साभार google से

सर्दी के दिनों की मुलायम गरमाहट वाली धूप थी. ग्यारह बजे का पीरियड शुरू होने में पांच मिनट था. तबस्सुम कुछ लड़कियों के साथ आ रही थी. वसंत ने उसे पुकारा तो बाकि लड़कियों खिलखिलाती आगे बढ़ गई. तबस्सुम हमारी ओर आने लगी. उसकी चाल में भी एक साथ नजाकत और एक संजीदापन था.

“आज प्रत्युष सर का लेक्चर है… जानते हो समय के कितने पाबंद हैं, और तुम दोनों अभी तक धूप खा रहे हो?” वह पास आकर खड़ी हुई.

“तबस्सुम, इस बच्चे को एक डाउट है.” वसंत ने मेरी ओर ऊँगली उठा दी.

“किसके बारे में ?”

“हमारे.”

“क्या?” तबस्सुम मेरा मुँह देख रही थी…

“चलो यार क्लास में देरी हो जाएगी…” मैं दोनों की तीखी नजरों से बचने के लिए रास्ता ढूंढने लगा.

वसंत हँसी दबाते हुए, खड़ा हो गया. हम कक्षा की ओर चलने लगे. वसंत जोर से हंसा अचानक, “यह सोचता है, हमें मुश्किल होगी !”

तबस्सुम जो उसकी हंसी से चौंकी थी, माज़रा समझ गई और वसंत के कंधे पर हाथ रखकर संजीदा चेहरा बनाकर बोली, “रियली ?” और दोनों ठहाका मार हँसने लगे… मैं शर्मिंदा सा उन दोनों के साथ कदम-दर कदम मिलाए बढ़ रहा था.

जोर-ए-इश्क है

बाज आता नहीं

मुहब्बत ही दीन औइमां मे रा

काजी, तिरे मज़हब से कोई वास्ता नहीं…

तबस्सुम की बुलंद आवाज़ सिर्फ उस दिन ही नहीं, आज भी मेरी यादों में बा-जोश बुलन्द है.

***

एम ए की परीक्षाओं के बाद हमारी व्यक्तिगत मजलिस-मुलाकातें – इंटरव्यू, नौकरी की तलाश आदि भागदौड के बीच पहले घटीं, फिर कम से कमतर होकर खात्मे के संगीन मुकाम पर पहुंच ही गयीं थी. बस मौका निकाल कर मोबाइल पर हाल-चाल ले लिया या फेसबुक पर ‘जिंदगी साझा’ कर लिया !

मैं एक इंटरव्यू के सिलसिले में भोपाल गया हुआ था, भोपाल से सागर जाना था, फिर वहाँ से अपने शहर के लिए सीधी ट्रेन थी. मैं भोपाल स्टेशन पर ही था, जब मोबाईल में कम्पन्न हुआ और तबस्सुम का नाम उभरा. दिल धक् !

“हम निक़ाह करेंगे. तुम आओ तो मैरिज रजिस्ट्रार के पास अर्जी डाल दी जाय…”

मैं खुश और परेशान दोनों… !

मामूजान खिलाफ थे, मगर अम्मी-अब्बा को कोई परेशानी नहीं थी. बल्कि वे लोग खुद तय तारीख को जमशेदपुर पहुँच रहे थे. “वसंत की और से भी दो गवाह चाहियें, उसकी माँ और तुम…! शादी घरवालों की रज़ा से हो रही है, और अफसानानिगार साहब आप भी इसका हिस्सा बनेंगे… कल को इसमें आपको कोई ‘कच्चा माल’ हासिल हो तो हम नाचिजों को ना भूलिएगा !…” इसके आगे वह हँसी और बोली थी कि मोबाइल पर तफसील से ये बातें नहीं बताई जा सकतीं… अपना खर्च काहे बढ़ाओगे ?

अर्जी दे दे गई. तबस्सुम के वालिद मामू की नाखुशी के मद्देनज़र उसे महीने भर के लिये अपने साथ कोलकाता ले गए… मामू क्यों खुश नहीं थे, ये तबस्सुम ने शादी के बाद एक शाम बताया था. बहरहाल, महीने भर बाद हम सब मिले, पुराने दोस्त भी आये… और वैधानिक शादी मुकम्मल हुई, फिर मुबारकबाद और जश्न का छोटा सा विस्फोट… सभी खुश थे. ज़ाहिर था कि हम अपने दोस्तों की फ़तह में अपनी फ़तह देख रहे थे.

तबस्सुम खुद सबसे ज्यादा मस्त ! वसंत को सबसे पहले उसी ने अपनी नज़्म का गुलाल फेंक छेड़ा,

मेरा मुस्तकबिल मेरे सामने है…

मेरा शहंशाह-ऐ-दिल मेरे सामने है…

तमन्ना जो जाहिर थी तुमपे मिरे मालिक

शख्स मेरा मुझे हो हासिल, मेरे सामने है…

एक बारगी लगा था, कि सब कुछ ठीक से निपट गया… एक संशय और डर जो मेरे भीतर रेंग रहा था… मुझे हमेशा परेशान किए हुए था, अब कांटा निकल जाने की मानिंद सुकून दे रहा था. फिर सब आराम से चलने लगा… कम से कम जाहिराना तौर पर. हम फिर अपनी जिंदगी की रवानगी में बहने लगे और लग रहा था कि तबस्सुम-वसंत अपने शरीके हयात में गाफ़िल हैं !… यह स्वभाविक ही तो था…

***

डेढ़ महीने दूर्गापुर में एक निजी कंपनी में नौकरी करने के बाद उससे पीछा छुड़ाकर मैं वापस जमशेदपुर आ गया था. मेरा लिखना पढ़ना पूरा चौपट हो चुका था वहाँ, और मैं हर दिन ग्राहकों से झूठ बुलवाने वाली इस नौकरी से आज़िज़ आ गया था. मैं  हमेशा अपनी शर्तों और उसूलों के साथ नौकरी करने का हिमायती रहा हूँ. इसलिए एकाधिक बार नौकरियां छोडीं…

साकची गोलचक्कर पर टेम्पो से उतरा तो बारीश हो रही थी. मैं भीगता हुआ ही चल पड़ा था कि कुछ पहचानी हुई आवाजें मेरे बगल में चल रहे छाते से आ रही थीं… तबस्सुम और वसंत मुझे पुराने बस स्टैंड के पास एस.एन.पी. एरिया वाली सड़क पर पैदल जाते हुए मिले. देखकर तो वसंत ने लगभग कंधे से सटा लिया और तबस्सुम ने हंसकर कहा, “अगर इजाजत हो तो दो बोल बोल दूं…

मुबारक है वो लम्हा

जब यार के गले से मिल के हम,

खुद को भूल गए

मयस्सर बस इक तड़प थी अर्से से…

अब जो सुकून में बदल गई !

“मगर अब तो आपको आफिशियली भाभीजान बुलाना पड़ेगा !”

“बेहतर है कि तुम अनओफिशियल ही रहो…” तबस्सुम मेरे कंधे पर धप्पा जमाते हुए बोली, “तबस्सुम ही कहा करो… हम अजीज लोगों को नाम से बुलाते हैं…” उसने किस खूबी से मेरे शरारती तंज को भोंथरा कर दिया था…

मैंने पूछा कि और सब कैसा चल रहा है? इसके जवाब में वसंत ने बताया कि वह और तबस्सुम शोध के लिए प्रवेश परीक्षा मैं बैठ रहे हैं. यूजीसी-नेट की तैयारी भी चल रही है. और इस बीच तबस्सुम ने एक निजी स्कूल ज्वाइन किया है.

मैंने कहा, “मेरा मतलब घर से था.”

“ठीक है, आपको घबराने की जरूरत नहीं.” तबस्सुम हँस दी “और आप कितने दिन की छुट्टी पर आये हैं ?”

“हमेशा की… मैंने वह नौकरी छोड़ दी.” मैंने कह दिया.

“क्यों ?” वह थोड़ी परेशान हुई.

“मेरा ईमान रोज-ब-रोज कत्ल होता था वहाँ.”

“तुम नहीं सुधरोगे…” वसंत को हँसी आ गयी, मगर तबस्सुम ने राय दी, “अब यहीं कहीं देख लो, अपना शहर है. कुछ ना कुछ तुम कर ही लोगे. मुझे मालूम है. और इधर अपनी जगह रहकर तुम ढंग से कुछ लिख-विख सकते हो. ..” मैंने सिर हिलाया. वह बोली, “तो घर आ जाओ शाम को, ठीक है ?”

“हाँ, आऊँगा.” मुझे भी मन कर रहा था कि कुछ वक्त इन दोनों के साथ बैठूं.

मैं समझता हूँ कि धर्म-भीरु संस्कारों में धर्म और ईश्वर की संकल्पना को ठुकरा कर मुक्त सोचने या बात करने की हिम्मत किसके या कितनों के पास हैं ? वर्जित प्रदेश में पाँव रखने का माद्दा कितने रखते हैं ? और रखते हैं तो बहुत जल्द ही उन्हें आइसोलेशन का स्वाद भी चखना पड़ जाता है… वसंत के घर में स्थितियाँ इतनी सरल बुनावट में पेश नहीं हुईं थीं, जितनी की बाहर से लगी थीं… श्रीमती आभा मिश्रा ने इकलौते और पढ़े लिखे बेटे के मोह और प्रभाव में यह संबंध स्वीकार जरूर किया था, मगर उनके पैदायशी संस्कार उन्हें एकाएक कैसे मुक्त कर जाते ?

तबस्सुम ने ससुराल में देखा, उसके छूने भर से चीजें अछुत हो जाती थीं, जिन्हें तुलसी जल या गोबर जल से धोया जाता. उसके कपड़े सुख रहे हों तो उस अलगनी से परहेज किया जाता… तीन कमरों के मकान में धरम की फांक पड़ गई, माँ-पिता के कमरे में तबस्सुम नहीं जा सकती थी. और श्रीमती मिश्रा अपने कमरे में स्टोव पर अपना और अपाहिज पति का खाना खुद पकाया करती थी. उसने अपनी बहु से कहा, “बेटा, बुरा मत मानना, बस मैं और तेरे ससुर अपने मन को नहीं मना सकेंगे… बस इस उम्र में जैसे हम रहें, रह लेने दो. बाकि तुम लोग खुश रहो…”

कुछ दिनों के बाद स्थिति यह थी, तबस्सुम नर्सरी में पढाते हुए पी० एच० डी० कर रही थी… वसंत एल० आई० सी० अभिकर्ता बन गया था… व्यस्ताओं और अर्थोपार्जन के दबाव के कारण उसने पी० एच० डी० छोड़ दी थी… चाहे तबस्सुम इसे ‘स्थगित’ करना कहे.

***

फोटो ज़फर अंसारी

फोटो ज़फर अंसारी

तबस्सुम के नज्म और कविताएँ अख़बारों और अदीबी रिसालों में छपते थे. वह शहर के मुशायरों में भी शिरकत करने लगी थी. वह हर रविवार की शाम को पड़ोस की उन औरतों और बच्चियों को, जो शहर में जुदा जुदा काम-धंधों में दिन तमाम करती थीं, तालीम देने और संगठित करने की कोशिश करती थी. जिंदगी महत्वाकांक्षाओं के वर्क लपेट कर ऊँची उड़ानों में गाफिल हो जाना चाहती थी. इन दिनों की मुझसे हुई उनकी बातें ठोस होती थीं, जिंदगी की सख्त परत पर ख्वाबों के बाग रोपने से लेकर सपनों की फसल काटने की हरी हरी बातें… शादी के बाद सात महीने बीत चुके थे.

वसंत मिला था, तो हम देर तक बातें करते रहे. यार, कुछ ठीक नहीं लग रहा… मानता हूँ कि मुझे भी तब एक संदेह रहता था, मगर तबस्सुम के सामने इसे मानने से डरता था. चलो, घर के लोगों ने एडजस्ट किया. लेकिन हम बहुत दिनों से नोटिस कर रहे हैं, कि कोई बात है जो तह के नीचे चल रही है. ऐसा लग रहा कि हमारे इर्द-गिर्द के कुछ लोग हमारा साथ होना बर्दाश्त नहीं कर रहे…

यह किसी दब सी गई तकलीफ़ का एकाएक मरोड़ देकर उभर आने जैसा था. वसंत उस दिन पूरी दोपहर बातें करता रहा… अक्षरश: याद रखा तो संभव नहीं, मगर आज जो याद है, उसकी बातों का सार यह था, खुद के साथ और बाकी सबको ख़ारिज करते हुए चलना एकदम आसान भी नहीं होता. यार, मैं पूरे यकीन के साथ, हिम्मत के साथ और अफ़सोस के साथ चीख-चीखकर कहना चाहता हूँ कि धर्म या धर्मावलंबियों ने इंसानियत का बेड़ा गर्क कर रखा है. आदमी को सिर्फ़ आदमी या घटिया आदमी बनाने में धर्म के पागलपन का बहुत बड़ा हाथ है. उन्नीस सौ बानब्बे और दो हज़ार दो के बाद तुम देख लो हालात कितने घटिया और एंटी ह्यूमेन हो गए हैं… इन दस सालों के दौर में देख लो. यार शर्मनाक फिर भी यह है कि वे खुद को ‘विकास पुरुष’ कहते हैं, और हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस पर यकीन कर लेता है !

वसंत की बातों के बाद मैं फिर शांत नहीं रह सका. शाम को तबस्सुम से मिला तब उसने वसंत की इन बातों को आगे बढाते हुए कहा था, वे लोग नहीं चाहते कि कोई भी उनकी स्थापित मान्यताओं में कोई विचलन पैदा करने की जुर्रत करे या करने का जरिया बने… हम, वसंत और मैं अक्सर दीन और इल्म में फर्क करते हैं. और हमारी साझी समझ यह है कि इल्म दीन से बड़ी चीज होती है. मगर वो तो इल्म से ही मरहूम लोग हैं… जंगली…!

“मैं इन औरतों – बच्चों की क्लास लेती हूँ, तो मेरी जैसी ‘बद’ औरत के पास जाने की मनाही है. यदि मैं पढूं-लिखूँ तो इन्हें नागवार है !

“तो आखिर उन्हें एतराज़ किस बात पर है ?”

” एतराज़ !…” तबस्सुम वसंत की ओर देखकर बोली जो दिवार पर छिपकली को देख रहा था, छिपकली ने एक बड़ा सा तिलचट्टा अपने जबड़े में दबोच लिया था और उसे धीरे धीरे निगल रहा था… “एतराज़ उन्हें मेरे मुसलमान होने पर है, और इन्हें मेरे हिन्दू होने पर… जबकि हम मानते हैं कि हम इन दोनों में से कुछ नहीं हैं, सिवाए खालिस इंसान के ! हमारे इन ख्यालों से ही सबको एतराज़ है. हमारे एक साथ होने से इनको एतराज़ है… हमारी जिंदगी और मुहब्बत पर एतराज़ है.”

“वो लोग चाहते हैं कि हम साथ नहीं रहें !” वसंत ने दीवार से नजरें हटकर मेरी तरफ देखा…

“या एक ऑप्शन है कि मैं मज़हब और नाम बदल लूँ…!”

इस छोटे से शहर में वे लोग कौन हो सकते थे, इसका अंदाजा करना इतना मुश्किल नहीं था…! यह बात साफ-साफ तबस्सुम ने फोन पर कुछ दिनों बाद बताई, “जानते हो, कल मुझसे बाजार में क्या कहा गया ? मज़हर मियाँ फरमा रहे थे, एक काफ़िर से शादी करके तुमने गलत किया. अब बुतपरस्ती करने लग जाना… तुमसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है…? फिर ये क्या कि तुम इज्जतदार घर की खातूनों, मासूम बच्चियों को बरगलाने का वाहियात काम कर रही हो… ज़िनाकारी की राह पर घसीट रही हो… तुम खुद को क्या समझती हो ?… ना मस्जिद कभी गई, ना रोजे, ना दीनी तालीम से से कोई वास्ता… कौन सी किताब में पढ़ा है ये सब कुफ़्र…?ये बदकारी इनको क्यों सीखा रही हो ? अल्लाह तुम्हें दोज़ख नसीब करे…

तुम बताओ, इतनी नफरत मैंने उसके चेहरे पर देखी मेरे लिये… कल यही मज़हर मामू जान से परमिशन लेकर मेरी हर मदद को तैयार रहता था, कभी “आपा ये ला दूं, आपा ये कर दूं…!”

वसंत और तबस्सुम की अंतरजातीय शादी, इस औद्योगिक शहर के एक छोटे से हिस्से में, जहाँ ये लोग बसर कर रहे थे, एक किस्म के लोगों को पसंद नहीं आई थी… बल्कि नागवार दुस्सहासिकता लगी थी. मेरा पत्रकार मित्र विजय बता रहा था कि शहर के उस हिस्से में, जहाँ की आबादी गरीब और पिछड़ी हुई थी, फिरकापरस्ती की जड़ें गहरी पैठाने की कोशिशें गाहे बगाहे जारी रहती हैं. इस वक्त लोग वसंत और तबस्सुम के बारे में बात करते हैं, और इस पर एतराज है कि इन लोगों ने समुदाय की परवाह ना करते हूए कानून के दम पर शादी कर ली. मुझे गुस्सा आता था कि लोग किसी और की अमन-ओ-मुहब्ब्त की ज़िंदगी से किस तरह परेशान हो जाते हैं, और उनके जींस में दबी हुई वह कट्टरता फूटने लगती है. यह बेहूदी बात अब खुलकर ज़ाहिर हो रही थी. अब सवाल यह था कि, किस तरह इस बात और हालात का सामना-संभालना हो. मैं इन दोनों की सेफ्टी को लेकर परेशान था. विजय और मैं प्रशासन की मदद लेने के बारे में कह रहे थे, मगर तबस्सुम और वसंत को लगता था, कि वक्त के साथ यह गुब्बार जैसा जो कुछ है, बैठ जाएगा.

दिन कुछ सरक सरक कर बीत रहे थे… इस छोटे शहर में, जिसे मुंबई का ‘लघु संस्करण’ कहा जाता है… दिन कभी तो वक्त के अश्व पर भागते हैं और कभी गज की गति से चलते हैं.

तबस्सुम ने शाम की बैठकी में बताया था, मामू ने निक़ाह के वक्त ही एतराज किया था. “हिन्दू लड़के से निक़ाह ! होश में नहीं हो क्या तुम ? अंदाज़ा है तुमको, तुम्हारे अम्मी अब्बू को मालूम हो तो…” वह चीखे तो तबस्सुम ने रोककर कहा, “उनको बता दिया है मामू. उन्हें मेरे फैसले पर एतराज नहीं है. उनकी सोच आप जैसी…”

“उन्हें क्यों होगा एतराज़ ! उन्होंने इस शहर में वो नहीं देखा है जो हमने देखा है. हिन्दू तुमको अपना लेंगे ? अगर तुम ये समझती हो तो इस गलतफहमी की बहुत भारी कीमत चुकाओगी तुम. मुझे इन पर कोई एतबार नहीं.”

“हर कोई एक जैसा नहीं होता मामू. वसंत हिन्दू नहीं है. उसके लिये मैं मुसलमान नहीं हूँ…”

“बहस मत करो तबस्सुम.” मामू की आवाज़ ऊँची हो गई. घर में कोई उनसे कभी जुबान-दराजी नहीं करता. जो उन्होंने कहा, जो सोचा, वही किया.

तबस्सुम ने बताया कि उस बहस के बाद वे मेरे वालिदान से भी बोल चुके थे कि बेटी गलत कदम उठने जा रही है. एक गैर-कौम में आप अपनी लड़की कैसे दे सकते हैं… उन्हीं काफ़िरों ने क्या ज़ुल्म नहीं किए हैं हम पर…? आपको नहीं पता चलता, क्योंकि आप ने सिर्फ़ सुना है. हमने झेला है. हमने देखा है, क़त्ले-आम… महज़ अपनी जिद और मज़हबी सनक में हम मुसलामानों को जानवरों की तरह मारा गया…

तबस्सुम को अपने बदन खोलकर दिखाते हुए, मामी के सामने ही वे बोले थे, “देख लो, ये आग में जलने के जो निशाँ है, उसी दंगे में हासिल हुए हैं…” तबस्सुम ने मामू की नंगी पीठ पर जली चमड़ी को देख नज़र दूसरी तरफ कर ली.

तबसुम ने समझ लिया था मामू के भीतर हिंदुओं की तरफ किसी हद तक, अगर नफ़रत-अदावत नहीं भी कहो तो, तीखी भावना है… गैर-दोस्ताना…

तबस्सुम ने देखा कि वे मज़हर जैसों की तरफ ज्यादा हैं… मामू की अपनी थिंकिंग है, और उसके लिये उनके पास अपने माजी के हिसाब से बुने हुए तर्क… उनके मन में एक गाँठ, डर है जो वर्षों पहले के जमशेदपुर दंगे की वज़ह से है. वे हिंदुओं पर शक करते हैं, और मज़हर की हरकतों को एक तरह से जायज या अपने डिफेंस में ही मानते हैं. उसे रोकते नहीं, मूक समर्थन देते हैं !

उन्होंने तो यह भी कहा था कि, हिन्दू और मुसलमान के बीच निक़ाह का अंजाम देख लो… न्यूज़ देखती हो कि नहीं ? कोलकाता में रिजवान नाम का लड़का का क्या हुआ…? क़त्ल कर दिया ना हिंदुओं ने !

***

वह दिन रविवार था. मैं सुबह ही वहाँ चला आया था क्योंकि तबस्सुम ने मुझे पिछली शाम कहा था कि नाश्ते पर आपका इंतज़ार करेंगे. सुबह की धूप ठीक हमारे सामने तिरछी, अड़हूल की झाड़ पड़ रही थी. वसंत ने कॉफी की तीन प्यालियाँ सामने रखीं और तब्स्सुम सूजी का हलवा पेश करते हुए मुस्कराती हुई बोली, “आजकल परेशान से रहते हो ?”

“परेशान ! नहीं… बस जॉबलेस होने की वज़ह से शायद…”

“वो बात नहीं… कुछ और बात है.” तबस्सुम ने मुझसे कहा और वसंत की तरफ देखकर भौंहें उठाईं.

“यार तुम परेशान मत रहा करो. हम ठीक हैं… देखो… देख रहे हो ना तेरे सामने बिलकुल दुरुस्त बैठे हैं.” वसंत ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा और कॉफी बढ़ाई.

मैं कुछ देर चुप रहा… समझ में नहीं आता कि इन दोनों से क्या कहूँ ! कहूँ भी तो मेरी बात फ़िज़ूल की लगेगी.

“विजय को बुला लें ? मेरा दोस्त है…” कुछ देर की चुप्पी और दो-तीन चुस्कियां ले चुकने के बाद मैंने अचानक पूछा. तबस्सुम हँसी, “बुला लो यार… हम यारों के यार से भी याराना कर लें ! वसंत, एक और नाश्ता तैयार करना होगा.”

मैंने विजय को बुलाया, तो उसने कहा कि अभी प्रेस से फोन आया है, वह दस बजे तक वहीँ से आ जायेगा, सो नाश्ते की तक्क्लुफ़ ना की जाय.

“आप लोग समझ नहीं रहे हैं. जिंदा लोग किताबों में लिखे हुए की तरह सीधे नहीं हैं, पेचीदे हैं. कौन किस बात पर किस तरह की खिचड़ी पका लेगा, आप अंदाज़ा नहीं कर सकते.” विजय ने भी आते ही गुफ्तगू में संजीदगी को जारी रखा. “कोई शहर हर तरफ एक जैसा नहीं होता. यहाँ सिर्फ़ तालीमयाफ़्ता, अमन और तरक्कीपसंद बंदे नहीं हैं…”

“विजय यार, प्रेस वालों की तरह हर चीज में नेगेटिव सूंघने की आपकी तबियत है.शादी हमने की है.हमारे वालिदों को एतराज न हुआ, तो सोसाईटी के ये सरमायेदार क्यों सीने पर कौम के अलां-फलां बोझ लिये जा रहे हैं ?”

“क्योंकि लगभग हर मूर्ख, गरीब आदमी के भीतर धर्म और आस्था के बहाने से ऐसी लिजलिजी प्रतिबद्धता है, जो उसे ज़रा सा फुसला देने से आदमखोर हो जाती है.”

“और फुसलाने वाले बहुत हैं. उनका अपना मतलब है.” मैं बोल उठा.

“चलो, ठीक है. यह है. तो हम जैसों को अपने हाल पर छोड़ दीजिए, जो अपनी ज़िंदगी जीने के तौर तरीकों पर सोसाइटी की मुहर नहीं लगाना चाहते. आज की तारीख में आप जिस तरह से जीने के लिये कह रहे हैं, वो ख्याल ही हमारे लिये नाजायज़ है.” तबस्सुम का चेहरा सख्त हो गया था.

“मेरा ख्याल है, और यकीन मानिये, ये एक मजबूरी का ख्याल है कि आप इस शहर से चले जायं… उड़ीसा में आपके वालिद हैं. आप दोनों वहाँ रहें, तो सेफ रहेंगे… तस्लीमा को अपना मुल्क छोडना पड़ा. यह भी तो मजबूरी है…”

“विजय, वैसी कोई नौबत हम दोनों नहीं देखते… आप हमें भगौड़ा बनने को कह रहे हैं ! ठीक है, ऐसा हुआ तो देखा जायेगा. ”

“कुछ दिनों में आप खुद देखिएगा कि क्या क्या होगा… शायद हमें आपको ये सलाह देने का कोई जायज़ हक़ नहीं है, लेकिन मैं और आपके ये अज़ीज़ दोस्त बस अपनी फिक्र ज़ाहिर कर रहे हैं. आपका मिसाल इस वक्त बहुत ज़रूरी चीज है… आपकी सलामती इस लिहाज़ से ज़रूरी है.”

विजय के साथ मैं भी वहाँ से निकला था. रास्ते में विजय ने कहा था, “ये लोग पागल तो नहीं हैं ? यार, ज़ूनिनी और भावुक होने के साथ थोड़ा समझदार भी होना चाहिये. तुम देखना, कुछ गडबड होगा. इस तरह की शादियाँ इस देश में नंगीं हथेलियों पर तलवार की धार परखने की तरह हैं…”

क्योंकि ये पूरा वक्त-ए-दौर ऐसे मौकों पर घात लगाने में उस्ताद है. हमेशा की तरह सतह पर दिखने वाली ये कौमी आक्रामकता, अपने ‘कोर’ में वाकई इससे भी वीभत्स और नृशंस हो जाती है. जैसे लोग ‘प्रगाश’ को अँधेरे में जाने का फतवा दे सकते हैं, इल्म-ओ-तालीम की, आज़ादी की मांग करने वाली कमसीन मलाला को सिर में गोली दागने की मानसिकता से लैस हैं… जो, तस्लीमा को सच लिखने-बोलने पर उसका क़त्ल करने पर अमादा हो सकते हैं…

google से साभार

हिन्दू-मुस्लिम के दरम्यानी प्रेम और वैवाहिक रिश्ते के एवज में अनगिनत, गुमनाम, तरक्की-पसंद लड़के-लड़कियों का कत्ल कर अपने जातीय दम्भ और परस्पर नफ़रत को पोसते रहे हैं… यानि इंसानी आज़ादी की मुखालफ़त करने वाले वैसे जाहिल हर जगह हैं, इन दोनों कौमों में हैं…

***

“तुम्हीं को कॉल करने वाली थी. कल एक जलसे में शिरकत करने का न्यौता है, सोच रही हूँ जाऊँ कि ना जाऊँ” तबस्सुम सप्ताह भर बाद मुझे साकची गोल-चक्कर के पास मिली तो कह रही थी.

“क्यों ?

“मज़हर आया था…”

“फनकार को ये थोड़ी देखना…”

“यार, वो चाहते हैं कि मैं उस जलसे में नज्में पढूं जो खालिस दीनी तालीम, वगैरह-वगैरह को प्रोमोट करने के लिये रखी गई है. वहाँ मैं ?”

“हूँ… इस पैंतरे को तो मैं भी नहीं समझ पा रहा… खैर तुम्हें इस मंच से अपने ख्याल रखने को मिल रहा है तो जाओ… मैं भी चलूँगा… विजय से भी कहता हूँ…”

शुक्रवार के दिन शाम छह: बजे ज़लसे का आगाज़ हुआ. शहर के ही नहीं, बाहर से भी दानिशमंद, दीन पर बोलने में उस्ताद तक़रीरदां मौजूद थे… मैं पिछली सीट पर विजय के साथ बैठ गया. विजय के पास प्रेस की आईडी थी, इसलिए हमें यहाँ आने में कोई दिक्कत नहीं हुई.

तीन वक्ताओं के बोल चुकने के बाद, जो जाहिर था कि मज़हब, रसूल, दीन इत्यादि विषय पर बेहतरीन वक्ता थे, तबस्सुम को मंच पर नज़्म पढ़ने के लिये पुकारा गया… इस्तकबाल करते हुए संचालक ने कहा कि हमारे शहर की बेहद संजीदा, कोंटेम्प्रोरी शायरी की उभरती हुई नस्ल की एक मज़बूत गज़लगो, दीन ओ मज़हब की खिदमतगार शायरा… बेगम तबस्सुम…

मैंने इस तवारूफ़ पर तबस्सुम के चेहरे पर एक चौंक देखी… विजय ने मेरा चेहरा देखकर धीरे से कहा, “तबस्सुम यहाँ और क्या उम्मीद कर सकती थी !”

तबस्सुम ने पहली नज़्म का उन्वान “मज़हब उर्फ़ धर्म” बताया और सरे-महफ़िल अजीब सी भिनभिनाहट होने लगी… माइक से निकलती हुई तबस्सुम की पतली आवाज़ मज़लिस में फ़ैल गई…

तुझको अजीज़ जैसे तेरा कुरआन है

मुझे भी मेरा भगवान है…

कोई फर्क नहीं तुममें मुझमें

दंगों के दौर में हम दोनों हैवान हैं…

मज़हब तेरा महबूब मेरा

फिर कातिल तेरा क्यों ईमान है ?

“ये एक काफिर की जुबान है…” किसी सीट से आवाज़ आई… और एक लिजलिजी हँसी हाल में भर गई…

इसके बाद संचालक महाशय अपनी ज़गह से उठे थे और तबस्सुम के बगल में जा खड़े हुए. तबस्सुम ने इशारा समझ कर माइक छोड़ दिया…

बाद में हम आडिटोरियम के बाहर ऑटो ले रहे थे तो मज़हर आया और अपने साथ वाले आदमी के कंधे पर हाथ रखे हुए बोला, “आपा, सैयद साहब ने अंदर जो समझाया है, उसे भूलिएगा मत. वरना हर्ज आपका ही होगा. हम आपके दुश्मन नहीं हैं. यह भी याद रखियेगा…”

***

सप्ताह भर पहले वसंत ने तबस्सुम की तबियत खराब होने की खबर दी तो मैं सीधे वहाँ पहुँचा. तबस्सुम की कुहनी में घाव था, पट्टियाँ बंधी थी और बुखार भी था. वह आंखें बंद कर लेटी थी.

“क्या हुआ यार?” वसंत ने चाय के लिये पूछा तो मैंने टालते हुए सवाल किया .

“सच बताऊँ, ये लोग कोई साजिश कर रहे हैं.”

“मतलब… ? अब क्या हुआ ? कोई सीरियस बात हुई क्या…”

उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगे हुए थे ! एक डरा हुआ अल्पसंख्यक समुदाय और एक सुरक्षित बहु संख्यक समुदाय… ऐसी घटनाओं पर अपने अपने तरीके से ‘रिएक्ट’ करता है… इस देश में ऐसा होने की पृष्ठभूमियाँ हैं !

***

उसी दिन अफरोज़ भी हमारे साथ आकर बैठा था. हम उसे करीबन साल भर बाद देख रहे थे. वह अपने हैदराबाद वाले बड़े भाई के पास चला गया था और वहाँ किसी सॉफ्टवेयर कम्पनी में लग गया था. उसका निक़ाह तय हो गया था और अगले महीने वहीं हैदराबाद में अपनी कुलीग के साथ शादी करने वाला था. उसी के सिलसिले में और निमंत्रण देने वह जमशेदपुर आया था.

तबस्सुम ने दरवाजे पर उसे देखते ही कहा, “पुरानी बयार आज इधर कैसे चली आई ?” अफरोज़ ने वसंत और मुझसे गर्मजोशी से हाथ मिलाया. “यारों हमें भी उम्र भर की कैद-ए-बा-मशक्कत होने वाली है… सोचा पुराने खैर ख्वाहों से दो घड़ी को मिल आऊँ…”

हम हँसे, तबसुम ने दिल्लगी की, “किससे ? हुज़ूर मिस् मिर्ज़ा तो अब वहाँ नहीं रहीं !”

हम फिर हँसे. मगर सबसे ज्यादा हँसने वालों में अफरोज़ था.

“और आपको क्या हुआ ? आपके जैसी जिंदादिल मोहतरमा बिस्तर पर नहीं सुहाती !” उसने हंसना रोक कर पूछा.

“कुछ नहीं, मौसम बदलने से तबियत नासाज़ हो ही जाती है…” तबस्सुम की आवाज़ उसकी जिस्मानी कमज़ोरी का अंदाज़ा दे रही थी…

अफरोज़ न्यौता देकर ज्यादा देर नहीं बैठा. या तो बीमार तबस्सुम के आराम में खलल नहीं डालना चाहता होगा, या वहाँ बैठना उसे पुराने दिनों के बरक्स कुछ अनायास ही असहज लगा होगा…

वो समझ सकता था कि हम लोग चाहकर भी हैदराबाद उसके निकाह पर मौजूद होने नहीं जा सकेंगे. बहरहाल जब वह अपनी बेगम के साथ निकाह के बाद जमशेदपुर आयेगा तब हमलोग सेलिब्रेट करेंगे, हमारी इस बात पर वह मान गया. उस दिन वह कार्ड बाँटने और दूसरी मसरुफियतों का हवाला देकर जल्द चला गया.

हमारी कॉलेज की यार-गिरोह का सबसे हंसमुख सदस्य अफरोज़. हमेशा कुछ ना कुछ खाता रहता और अपने रिश्तेदारों, जिनसे ना हम मिले होते, ना कभी भी मुलाकात की कोई गुंजाइश होती, की मिमिक्री करके हमलोगों को हँसाता रहता था. हम उसे चिढ़ाने के लिये ‘मल्टी पर्सनालिटी डिजास्टर’ कहते. वह इस पर हँसता. तबस्सुम की तबियत दुरुस्त होने पर एक शाम को जुबली पार्क की तरफ हम निकले. घूमते घूमते चर्च एरिया की सड़क और फिर बिस्टुपुर की तरफ हम टहलते हुए निकल आये. इतने दिनों बाद हम मिले थे उससे. बाकी दोस्तों की ख़बरें जितनी जिसके पास थीं, बाकियों को अद्यतन करता रहा. इन्हीं बातों के बीच अफरोज ने वसंत से एक निजी सवाल पूछा तो वसंत झूठ ना बोल सका.

“अफरोज़ ! हमें परेशान किया जा रहा है. शहर छोड़ने या एक दूसरे को छोड़ देने को प्रेसराइज किया जा रहा है. क्या कहें दोस्त… “

पुरी बात सुनने-समझने के बाद आफरोज़ बिफर पड़ा था, “किस हरामजादे में हिम्मत है ? सॉरी तबस्सुम … जुबान से गाली निकल गई. मगर मैं बोलता हूँ… ठेका लिया है इन्होंने ? आदमी की पर्सनल जिंदगी किसी की जागीरदारी नहीं है कि अपने फैसले की नाक उसमें घुसेड दे. तुमलोग बिलकुल ठीक कर रहे हो. ज्यादा तवज्जो मत दो. कोई भी वसंत, चाहे तुम्हारी तरफ का या तबस्सुम की तरफ का, अगर तुम दोनों को मज़हब के नाम पर तकलीफ दे रहा है… मुझे बताओ मैं खबर लेता हूँ…”

वसंत ने उत्तेजित अफरोज़ को समझाया था कि फिक्र करने की जरूरत नहीं. अगर हालात वाकई जानलेवा हो गए तो वे शहर छोड़ देंगे…

***

वसंत ने अफ़रोज को बताया कि कुछ दिन पहले क्या हुआ था… तबस्सुम की तबियत बिगड़ने की वज़ह क्या थी… मैं भी उस शाम को सोचने लगा… दरवाज़ा खोलकर वसंत उत्तेजित होकर बोल रहा था… “कल रात तक छत पर सुखाये कपड़े पड़े रह गए. आठ – सवा आठ बजा होगा. तबस्सुम उठाने गई. फिर इसकी चीख आई तो मैं ऊपर भागा… किसी ने पत्थर मारा था. पत्थर भारी और नुकीला था. इसकी बांह में लगा, घाव गहरा है, देखो… पूरा लथपथ हाथ लिए ये उतरी, इतनी ब्लीडिंग. फिर…” वसंत की आवाज इतनी महीन हो गई थी कि लगा उसकी रुलाई फूट पड़ेगी… उसने मेज़ पर रखा एक मुचड़ा हुआ लिफ़ाफा मुझे दिया, “ये देखो इसकी स्कूल के पते पर यह किसी ने भेजा है, पढ़ो इसे… वे लोग हमको यह ‘मैसेज’ देना चाहते हैं…”

यह कोई दिस्ते कागज का पन्ना था, जिस पर लाल स्याही से लिखा हुआ था… मैले से कागज पर लिखावट फीकी थी, मैं फिर भी अपने आंकलनों से आपको बता सकता हूँ कि सबसे ऊपर एक घार्मिक निशान बना था. उस कागज पर कुछ इस तरह के मज़मून थे…

तुम लोगों ने पाप किया है. यदि यह सोचा है कि कोई कुछ नहीं कहेगा और हम इस पाप को बर्दास्त कर लेंगे तो भूल है, तुम लोगों का. हमारे धर्म और आस्था पर चोट करने का, दुस्साहस किया है तुमने… हमारे धर्म और हिंदुत्व की शुचिता पर अक्षम्य आघात किया है… तुम बाबर की संतान ने एक धर्मपरायण हिंदू युवक को मार्ग से भटकाने का काम किया है… और हमारी माताओं-बहनों की मति भ्रष्ट करने की धूर्तता में लिप्त हो, यह भी हमें ज्ञात है. तू म्लेच्छ की संतान ! तुने कैसे सोच लिया कि इतना उपद्रव मचा कर दंड से वंचित रह सकोगी !

हम यह कतई बर्दाश्त नहीं करेगे. तुम लोगों की भलाई इसी में है कि इस विवाह को भूल मान लो और संबंध विच्छेद कर लो. किन्तु होश रहे, यह मत सोचना कि यहाँ से भाग कर जाओगे और कहीं भी रह लोगे… हमारे समर्पित कार्यकर्त्ता तुम्हें ढूंढ निकालेंगे… फिर अपने परिणाम के तुम लोग स्वयं उत्तरदायी होगे…

तुम्हारे शुभचिंतक,

…………………….

जय हिंदू, हिंदुत्व, हिंदुस्तान !

यह तल्ख और सीधी – साफ़ धमकी थी… किसी सुलझे हुए, शातिर, खूंखार दिमाग से निकले हुए लाल लाल अंगार थे वे शब्द…

***

उस शाम जब तबस्सुम को होश आ गया था. उसने अपने गिर्द नजरें फेरी, मुझे लगा वह मुझे देखकर मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी, मैंने भी मुस्कुरा दिया… इस वक्त शायद बे-लफ्ज ये मुस्कुराहटें ही सबसे कारगर मलहम थीं.

कुछ देर मुझे अपलक देखते रहने के बाद सहसा उसकी कमजोर जुबान में एक नज़्म फूटा, जिसके कुछ अल्फाज़ मैं आपसे साझा कर सकता हूँ, (तबस्सुम से माफ़ी के साथ कि इस वक्त मेरा जेहन इतना परेशान है कि मुझे पूरा-पूरा याद नहीं आ रहा है…)

उनको गुमां है,

कि वे बेहद बेशुमार ताकतवर हैं

कि वो एक रोज

हमारे दिलों को रौंद कर

उस जमीन पर

इंसा-इंसा का फर्क बोएंगे…

मगर मेरे दोस्त

मुहब्बत-ए-आदम की हमें भी लत है बुरी,

हमें भी जिद है कि

देखेंगे हद उनकी…

देखेंगे हद उनकी…

इस के बाद मुझे लगा था, मेरे चेहरे पर रुलाई के निशान आ गए होंगे. वसंत ने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया. तभी अफ़रोज ने दस्तक दी थी.

अफ़रोज बहुत संजीदा होकर चुप चल रहा था… हमलोग अब प्रेस क्लब के बगल से होते हुए कीनन स्टेडियम के पास खुली जगह पर आकर बैठ गए थे. अफ़रोज ने कहा, “तुमलोग कानूनन शादीशुदा हो. कोई तुम्हें ऐसे हेरास्ड कर रहा है तो ये अगेंस्ट द ला है… और एनिथिंग ऑर एनी एक्ट अगेंस्ट द ला इज अ क्राइम !”

मैं समझ नहीं पा रहा था, आखिर मैं उनकी मदद करूं तो कैसे करूं ? अफ़रोज यही कह कर गया था और विजय भी जोर दे रहा था कि हमें पुलिस के पास इस घटना की प्राथमिकी दर्ज़ करा देनी चाहिए. कायदे से तो, मैं भी मानता था कि, यही करना ठीक है. आखिर कानून व्यवस्था भी कोई चीज है. कोई जंगल राज तो नहीं हैं कि जो चाहे, जैसा चाहे आपकी जिंदगी को हांकने लगे ! “आफ्टर आल दे आर लीगली वेडेड कपल !” मगर सच कहूँ तो मुझे इस बात का ज्यादा यकीन था कि, इससे खुद तबस्सुम के सामने परेशानियां दूसरी शक्ल ले लेंगी. हालातों को सुलझाने के बजाय उनका राजनीतिकरण कर दिया जायेगा. फिर वही पोगा-पंथी उपदेश, वही नामुराद फतवे !

नफरत और मुहब्बत दोनों इंसानी जज्बे ही तो हैं, इंसान दोनों में पागल हो जाता है. लेकिन क्या कोई तरकीब ऐसी नहीं कि मुहब्बत का जूनून, नफरत के पागलपन पर हावी हो… और उसे मिटा डाले!

वसंत और तबस्सुम ने अचानक फैसला किया था और मुझे फोन किया…“भाई, हम दोनों ने एक दफे फिर कुछ तय किया है. तुम्हारे पास आ रहे हैं…”

आते ही तबस्सुम ने कहा, “आज मेरे लफ्ज तुम्हें परेशान नहीं करेंगे… बस साथ बैठने की तलब हुई सो यहाँ हूँ.”

मैं उसके घाव की तरफ देख रहा था. वसंत ने कहा, “पहले से बेहतर हैं. दरअसल हमने तय किया है कि, हम यहीं रहेंगे, साथ रहेंगे.”

“तो अब…?”

“अब क्या… हमने पहले भी कहा था और हर बार यही कहेंगे कि हम इंसानी जज्बातों के परे किसी धर्म को नहीं मानेंगे. देखते हैं, यह लोग किस हद तक जा सकते हैं. वैसे भी तबस्सुम को छोड़ने का ख्याल भी मेरे लिए अनहोनी की तरह है. और ये शहर हमें अजीज़ है, क्योंकि यहीं हम मिले और एक हुए.”

तबस्सुम के होठों पर एक मुस्कान आई और फिर दब गई.

मुझे दोनों के चेहरों पर मजबूती एक सी दिख रही थी…

तभी तबस्सुम ने धीरे से कुछ कहा, और मुझे बेचैनी होने लगी… “अगर हममें से किसी को कुछ हो गया तो, दूसरा इस शहर से नफरत करने के लिये भी कैसे जियेगा…”

***

मझहर की तरह वसंत को धमकी की शक्ल में समझाने या राय देने वालों में रंजित पांडेय, नवीन शर्मा, प्रताप सिंह, अली, दिलावर और भी लड़के थे. ये सब प्रकट में चोराहे पर खुद को फिरकापरस्त गुटों के कार्यकर्ता होने के नाते अपनी अपनी कौम का खैर-ख्वाह होने का दावा-दिखावा करते और एकदूसरे की मुखालफ़त करते दिखाई पड़ते रहते थे. इससे अपने समुदाय में उनकी क़द्र कायम रहती… मगर शहर के कोनों, अंधेरों में साथ बैठकर शराब पीते, जुआ खेलते और खुराफाती मंसूबे बनाते रहते थे… इनको कोई कुछ नहीं कह सकता था, क्योंकि ये फलाना फलाना पार्टियों के स्थानीय नेताओं के अपने आदमी हुआ करते थे.

वसंत को शहर में तो बिजनेस कम मिलता. वहाँ दूसरे पुराने और तेज तर्रार अभिकर्ताओं से कठिन मुकाबला था. छोटे मजदूरों और दुकानदारों के पास बराबर जाकर उन्हें योजनाओं की जानकारी देना और प्रेरित करना पड़ता था. शहर के लगभग बाहर बसती जा रही कोलोनियों और बस्तियों में वह जाता रहता. प्रताप सिंह को वह पहचानता नहीं था. किसी ने फोन पर कहा था कि बीमा करने के लिये उसे नई स्कीम की जानकारी चाहिए. नाम, पता देकर आने के लिये इसरार किया. मानगो की एक गली में बने अपार्टमेंट की तीसरी मंज़िल के दरवाजे पर लगी नाम-तख्ती पर दूसरा नाम लिखा था, “अर्जुन सिंह, एडवोकेट”…

डोरबेल बजाने के बाद एक महिला ने दरवाजा खोला और नाम जानने के बाद अंदर आकर बैठने को कहा. प्रताप अर्जुन सिंह का छोटा भाई था. “नमस्ते नमस्ते ! वसंत जी… मकान ढूँढने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई ?” प्रताप हाथ जोड़े अंदर के कमरे से आ गया.

“नहीं, दिक्कत कैसी ? कहिये…”

“कहना तो बहुत सब है मिश्रा जी. जिंदगी का कौन ठिकाना… हें ? हमारी पार्टी का कोई एंटी साला कभी छातिये पर गोली दाग दे तो किस्सा खत्म ! हें ? हमरा भी एक ठो बीमा – उमा करा दीजिए.” प्रताप हँसा. तीस-बत्तीस का यह आदमी जिस तरह से बात करता था, वसंत को कुछ ठीक नहीं लगा.

इस दफे एक दूसरी महिला नाश्ता ले कर आई और सामने चाय-टेबल पर रख दिया. “लीजिए, काम धंधे की बातें तो होंगी, पहले कुछ ले लीजिए.”

“नहीं, चाय ही काफी होगी…” वसंत ने इंकार किया.

“अरे… लीजिए भाई, शर्म संकोच काहे करते हैं !” प्रताप हँसा.

“तब मौज से हैं ना ?” प्रताप ने अपनी चाय सुड़कते हुए उसकी ओर घूर के देखा. वसंत की नज़र उठी… “मतलब परिवार ठीक से है ना? देखिये, आप हमारी बिरादरी के हैं… हम राजपूत और आप ब्राह्मण… थोड़ा ऊपर नीचे, पर हैं तो आर्यों के बच्चे ना. साला, मुसला सबका मुँह गांड हो गया… आपने तो फाड़ दी साले कटुवों की…!” प्रताप जोर से हँसा, “उनकी जात की लड़की का ‘ले’ लिया…! बहुत, बहुत अच्छा… देखिये मगर खबरदार… आपको एक ठो अंदर की बात बताते हैं… आपका इस कांड से कुछ हमारे लोग भी गुस्साए हैं आपसे… लेकिन आपको नुकसान नहीं करेंगे… वो तो उस… छोड़िये. हाँ, साले मियाँ सब से सावधान रहिये… उनका तो ‘जल’ रहा है…”

***

यानि तबस्सुम पर हमले के बाद से वे, चाहे जिधर के भी हों, खामोश नहीं बैठे थे. भौतिक और गैर भौतिक तरीकों से उनका मनोबल तोडना चाहते थे. सब इसी मकसद का उपक्रम था…

उनका इस तरह सुख से रहना, इन्हें कतई गवारा नहीं था… एक हिंदू और एक मुसलमान, एक दम्पति के रूप में कैसे रह सकते थे. उनके सीने पर अपने धर्म के प्रति दायित्व का बोझ बढता जा रहा था.

उस रात तबस्सुम ने फेसबुक पर अपने स्टेट्स पर लिया-“दुनिया फिरकापस्ती से सिर्फ एक ऐसी जगह में तब्दील हो सकती हैं, जहाँ नफरत ही एक तन्हा उसूल बच जाता है. जबकि इंसान के पास ‘मुहब्बत’ नाम का वो जज्बा है, जिससे वह अपनी जमीन को जन्नत में बदल दे.”

मैं जानता था कि दोनों अंदर से किस तरह परेशान हैं. दोनों ने आपस में जो बेपनाह मुहब्बत की है. जो हमेशा से एक जैसी बरकरार है… जो आइंदा भी रहेगी, उसके लिए, खुद के वजूद के लिए एक निहायत फूहड़, क्रुरु और ताकतवर विपक्ष से उन्हें लड़ना है. तबस्सुम और वसंत इसी शहर में थे, इसी शहर में रहना चाहते थे और इस शहर में रहने के लिए लड़ रहे थे. अपने अज़ीज फैसले को अमल में जीने की दुश्वारियां वे जानते तो थे…!

तबस्सुम की बात ने मुझे कहीं एक तसल्ली दी थी कि, शायद वे इस बेमुरौबत शहर को छोड़ भी दें, लेकिन उस नौबत से पहले यह लड़ाई उस नौबत को चुनौती दे रही थी.

तबस्सुम और वसंत की जंदगी ने मुझे उकसा दिया था कि मैं उन पर कुछ लिखूं. चाहता था कि वह अफ़साने की शक्ल में हो…  मैं तबस्सुम की वह हिदायत या चेतावनी भी नजरअंदाज करना चाहता था, कि हम लेखक किसी चरित्र को सिर्फ आर्दश, उदात् या विशिष्ट बनाकर पेश करने के आदी होते हैं. मैं उनकी जिंदगी की… उनकी फिलासोफी की कतरनें, जो मुझे बेहद जरूरी और सहेजकर रखी जाने वाली लगने लगी थीं, को नोट्स की तर्ज पर सहेजता जा रहा था.

ऐन तमाम मुश्किलातों में भी तबस्सुम रोजमर्रे के कामों की मानिंद शायरी करती जा रही थी. हम चाय पर साथ बैठते या आर्ट और मिडिया की अलग-अलग गतिविधियों में सक्रिय शहर के महाविद्यालय – करीम सिटी कॉलेज के जोशीले लड़के लड़कियों के साथ कार्यक्रम में हुलस कर शामिल होते. वसंत और तबस्सुम हमेशा साथ ही दिखाई पड़ते मानो वाकई एक-दूसरे की परछाई हों. अब तो ऐसा लगने लगा था कि एक के बगैर दूसरे को देखो तो, कोई कमी सी लगेगी या वह मुख़्तसर अधूरा लगेगा. वज़ह शायद यह थी कि, घर के बाहर दोनों एक-दूसरे को अकेला छोड़ने से कतरा रहे थे…

तबस्सुम ने अपने वालिदों को इन सबके बारे में बताकर परेशान नहीं करने का फैसला किया था. मामू बता सकते थे, मगर निकाह के दिन से मामू ने तबस्सुम और उसके वलिदों से बातचीत बंद ही कर दी थी… अब्बा को एकाध महीनों में रिटायर हो जाना था. जबकि अम्मी की नौकरी के दिन अभी बाकी थे. और अब तो उसके निक़ाह के बाद उन्होंने भुवनेश्वर में एक फ़्लैट ले भी लिया था. इतनी दूर उन्हें इन वाहियात चीजों के बारे में इत्तिला कर ना सिर्फ़ उनको परेशान करना होता, बल्कि मामू जान से रिश्ते और भी बिगड़ते. निक़ाह के वक्त मामू की गैर-पसंदगी और गुस्सा वे देख चुके थे. जिसने उन्हें तकलीफ दी थी. वरना इसमें शक नहीं कि अगर अब्बा-अम्मी को इल्म होता कि उनकी इकलौती बेटी और दामाद के साथ यह हो रहा है, वे चुप न् बैठे होते… कुछ भी करते, चाहे उन्हें भुवनेश्वर ही बुला लेते… कई बार मन डोला कि चले ही जांय यह शहर छोड़कर. अब्बा-अम्मी का इतना रसूख है. वे वहाँ सब ठीक करा देंगे… मगर यह आसान विकल्प होता ! ये दोनों मुझे जब ये सब कहते तो लगता, उसूल परस्ती और असल बहादुरी क्या चीज है !

तबस्सुम चाय बढिया बनाती है ही और सूजी का हलवा बेहद लजीज…! वसंत के मकान की छत हमारा अड्डा होता, चाहे कोई भी मौसम हो. सर्दी में हम अंगीठी या बोरसी लिए जमे रहते. कभी फैज़ को… कभी नाजिम हिकमत को… कभी शिम्बोर्स्का को पढ़कर सुनाते… पेन ड्राईव में डाउनलोड की हुई फ़िल्में देखते… या जगजीत, इकबाल बानो, नुसरत फ़तेह अली खान को सुनते…

ऐसे ही एक शाम उसने मुझे ‘स्टोर्निंग सोरैया एम’ को यू-ट्यूब पर दिखाया और हम स्तब्ध रह गए थे. फिर उसी ने सन्नाटे को तोडकर पहली टिप्पणी की थी, मजहब के नाम पर जुल्म करना जिनकी फितरत होती है, ऐसे लोग की पैदाइश ही कायनात का एक गंदा हादसा है. नेकी और बदी का सीधा फलसफा यह है कि आप, बतौर इंसान, हर जिंदा शै से मुहब्बत करते हैं या नफरत… आप क्या बनाते हैं, और क्या नेस्तनाबूद कर डालते हैं…

दरअसल तबस्सुम और वसंत का तो एक ही फलसफा था ना… सिर्फ एक, मुहब्बत ! जिंदगी से, जिंदा लोगों से…

मुझे सुखद आश्चर्य होता था कि, कोई दो लोग आपस में मुहब्बत में इतने गाफ़िल, इतने रत हो सकते हैं कि सिर्फ इस मुहब्बत को हर चीज, हर संबंध, हर तरफ… अपने इर्द-गिर्द… बस पाक मुहब्बत के असर को ही एक मात्र मुसलसल तौर पर फैलते-पसरते देखना चाहते हैं… इतनी शिद्दत से. ऐसा कोई अपवाद था, जो मेरे सामने मौजूद था.

मैंने उन्हें बता दिया था कि उनकी जिंदगी के पहलुओं को लेकर एक चीज लिख रहा हूँ… अभी मुकम्मल नहीं की है. उन्हें कुछ हिस्से पढ़कर सुनाता भी. तबस्सुम को अगर कोई भी लाइन खुद की तारीफ में लगती तो चीखकर कहती-‘फ़ौरन काटो इसे!” मैंने कागज पर तब जरुर काटा, मगर जेहन से नहीं !

***

वसंत एल० आई० सी० अभिकर्ताओं के किसी सेमिनार में पटना गया हुआ था. तबस्सुम अकेली थी. रात के बारह साढ़े बारह के आसपास उसके दरवाजे पर दस्तक हुई… उसे एक लाजिम डर लगा. उसने डर से दरवाजा नहीं खोला. वह उस वक्त सोई नहीं थी, स्टडी टेबल पर बैठ कुछ पढ़ रही थी… कुछ देर दरवाजा पिटने के बाद वे लोग चले गए थे. वे लोग कोई भी हो सकते थे… मुखौटा लगाए हुए लोगों की असली पहचान दोगली होती है.

अगली सुबह दरवाजा पर एक पर्चा चिपका हुआ मिला…एक धर्मपरायण हिन्दू परिवार में तेरा कोई स्थान नहीं . हिंदू का धर्म भ्रष्ट करने तुमने अपराध किया है. ईश्वर हमें विधर्मियों का ध्वंस करने की शक्ति दे… अपना भला चाहती हो तो यहाँ से चली जाओ… अन्यथा अपने परिणाम की स्वयं उत्तरदायी होगी.

तबस्सुम हंस पड़ी धमकी देने वाले आखिर क्या सोचते थे ! फोन किया तो वसंत सेमीनार का दूसरा दिन छोड़ भागकर वापस शहर लौटा था. मुझे फोन कर बुलाया और मैंने जोर देकर यह मनवाया कि थोड़े दिनों के लिये दोनों भुवनेश्वर हो आएं… तब तक अगर यहाँ के सिरफिरे किसी और मुद्दे में व्यस्त हो जायेंगे. लोकसभा चुनाव आने वाले थे और पार्टियों को इन प्यादों की दरकार महसूस होगी ही…

अगली रात जब तबस्सुम खिड़की बंद करने गई, चूँकि हवा ठंडी हो गई थी. खिड़की के बंद होते, शीशे के पल्लों को भेदती हुई एक गोली उसके पेट में घुस गई… वसंत अपनी बीमार माँ को दवाई देकर कमरे में वापस आ ही रहा था और… पटाखे की तरह के इस धमाके, शीशे की छनक और तबस्सुम की कराह की आवाजें एकमुश्त उसके कान तक पहुंचीं…

इस वक्त मैं टाटा मेन हॉस्पिटल के इमरजेंसी वार्ड में उसके सिरहाने वसंत के कंधे पर हाथ लपेटे चुपचाप खड़ा हूँ… सात घंटे से अधिक वक्त से बेहोश तबस्सुम के पास. डॉक्टरों ने गोली निकाल दी है… वह खतरे से बाहर है… उसके होश में आने का इंतजार कर रहे हैं हम लोग… इस बीच तबस्सुम के वालिदेन भुवनेश्वर से आ गए हैं, पुलिस अपनी औपचारिकताएँ पूरी कर, बयान आदि लेकर तफ्तीश में लग गई है… शहर के कुछ साहित्यकार खबर मिलते ही भागे आये हैं, उनकी लाजिम शिकायत है कि तबस्सुम या हममें से किसी ने भी कभी इन सबके बारे में किसी से कुछ नहीं कहा… प्रेस नोट बनाते हुए एक पत्रकार लोकल मिडिया के साथी पत्रकार से लिखवा रहा है, ‘विवाहिता को अज्ञात हमलावरों ने गोली मारी. खतरे से बाहर. दम्पति ने अंतर्जातीय विवाह किया था !’

…बहुत कुछ घट चुका है, वह तफ़सील से कहने की जरूरत नहीं…

बस घड़ी की टिक-टिक दिल की धड़कन की तरह बज रही है. शांत लेटी हुई, साँस लेती हुई तबस्सुम को देखकर यही लग रहा है, कि जैसे ही होश में आएगी, एक नज्म सुनाएगी… और कायल कर देगी !


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    By: शेखर मल्लिक

    युवा कथाकार, प्रलेसं से संबद्ध
    द्वारा बी.डी.एस.एल. महिला महाविद्यालय,
    घाटशिला 832303.
    पूर्वी सिंहभूम, झारखण्ड.
    मोबाइल – 09852715924
    मेल- [email protected]

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    लाईट हाउस सिनेमा: कहानी (शेखर मल्लिक)

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