मृगतृष्णा की कविताएँ पढ़ते हुए महज़ पढ़ी नहीं जाती बल्कि मानवीय आन्तरिकता से होकर निकलती महसूस होती हैं ……

पत्नी  

google से साभार

आजकल उजाला होने से ठीक पहले

पत्नी की आँखें देखने लगती हैं

पके सावन और हरे जेठ के सपने

कि उसका राजकुमार भटक रहा है नंगे पाँव

किसी आबनूस के जंगल में

जंगली फूलों की झोली गले में लटकाये

देवदार की कमर को छूता है हथेलियों से

और बांध देता है अपनी उम्र वाली रेखा

बांसुरी की टहनियों से पूछता है कि आख़िर

कितनी पुरानी हो सकती इश्क़ कार्बन डेटिंग

पत्नी देखती है कि उसका राजकुमार

सीने पर उगा रहा है जंगली बेल

और लांघती जाती है पहाड़ दर पहाड़

नदी करवट बदलती है उसकी पीठ पर और

रेत घड़ी से सरकती रहती है पिछली रात

वो मरुन परदे से छानती है चटख धूप

फिर कुछ यूं पीती है उसे एक सांस में जैसे

छुपकर हलक़ से उतारा गया हो टकीला शॉट

पत्नी आजकल हड़बड़ाकर नहीं उठती

भूल जाती है अक्सर कि दो कप चाय में

चुटकी भर चीनी चाहिए या चम्मच भर नमक

वो हिसाब लगाती है कि नमक ज़्यादा जरूरी है

पीनी चाहिए चाय या

घूँट भर उसकी भाप

राशन की दुकान के बजाय

क्यों न चला जाए इलायची के उस बाग़

नदी मिलती है समंदर में या

समंदर होने को चाहिए, नदी का साथ

पत्नी महसूसने लगी है आजकल

लाल और सफ़ेद से इतर दूसरे रंगों का आत्मविश्वास

आईने ने सामने खड़ी हो

पहनती है नंगी देह पर हर रंग का लिबास

वो हिसाब लगाती है

कि सिर पर ज़्यादा ज़रूरी है छतरी का होना

या भादों की बरसात

सीधे पल्लू का आँचल या

निर्वस्त्र नितांत अकेले

रातभर किसी धौलाधारी झील का साथ

बैठ जाना सबसे ऊंचे पहाड़ पर

और फैला देना बाँहों का आकाश

आख़िर क्या ज़्यादतम ज़रूरी हो सकता है

घर संवारने वाली कोई पत्रिका

या फ़िर आधे दामों में बिकता कोई सेकेण्ड हैण्ड ट्रैवलॉग

घर को महकाए पवित्र धूप और किसी मंत्र से

या रात तितलियों की मौत पर छेड़ दे होतभोर रुदाली राग

पत्नी सकपका जाती है जब

जागती आखों वाले सपने में

बिना चेहरे का कोई कमउम्र पुरुष

उससे करता है रोमांस

और पूछता है प्रेम जताने का कोई नया पाठ

पत्नी सीख रही है आजकल सिर्फ़ प्रेमिका होना

और स्त्री को जूडे में लपेट पीछे

फेंक देती है बेपरवाह

एक अघोरी सुबह 

शईद मिर्ज़ा

रात सोने से पहले आँखों में

काजल धौलाधार लगाना

किसी धौलाधारी झील वाले सपने से हडबडाकर

रात की चिता पर उठ बैठना

नज़र बादल होना

मौत की दिशा वाली खिड़की का आसमान होना

सप्तऋषि तारामंडल के पड़ोस में

अपनी चाहनाओं एक जुगनू जला देना

रात के जंगल में काले पेड़ों पर हरा खोजना

किसी पहाड़ी नाले में

उम्मीद की शकुंतला को बहा देना

(चूँकि वर्तमान को गुज़रे वक़्त की भूख लगती आई है इसलिए)

पलटकर कमरे में फिर लौटना

और महबूब का बासी ख़त चबाना

गोल्डेन पर्दों के बीच

मिल्की वाईट फिश हो जाना

भुरुकवा को हीरा समझ पूरब से नोंच खा जाना

सांस वाली गर्दन को पहाड़ी नदी से सहलाना

दुनियादारी के जूते पैरों में पहनकर

(हाइवे नंबर चौबीस के ज़माने याद करना)

ग्लॉसी पेपर की उम्रदराज़ मैगजींस में

दिल के दंगों पर बुक मार्क लगाना

फिर हड़बड़ाना और हडबडाकर

खाक़ी झोले की हर क़िताब बदहवास सा सूंघना

प्रीतम की नज़्म से ट्रुथ एंड डेयर खेलना

ज़वाब में तीन की जगह ग्यारह डॉट्स लगा देना

रात की दोपहर में राग पीलू शाम सुनना

बरसता है ये ज़माना बहुत

एक अघोरी सुबह में

अपनी चमड़ी से महबूब के लिए एक लिबास बुनना

यार पिता

पिता को लिखे ख़त में

न चाहते हुए भी मैंने…

पितावश …सम्बोधित किया था

‘प्रिय पिता’

पिता हमेशा से ही जटिल बने रहते हैं

मेरे शब्दों में

जैसे भावनात्मक चक्रव्यूह में

में होते हैं

जब मेहमान के आधी रात आगमन पर

माँ असमंजस में पड़ जाती है

कि दाल में नमक बढ़ाऊं कि पानी

वे जटिल बने रहते हैं

उतने ही

कि मैं नहीं पूछ पाती उनसे

लम्बे अंतराल पर मिलते ही

….”यार पिता और सुनाओ! कैसे हो?”…

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जैसे माँ की छातियों से

चिपका रहता है वात्सल्य

पिता संग परछाईं सा लगा रहता है

पितापना

आजकल… पिता तनकर

नहीं खड़े होते

बस स्मृतियों के कोने से

लुढ़कते चले आते हैं

ऊन के गोले की तरह बिना बताये

और उनके पीछे -पीछे घिसटती चली आती है

एक पूरी सर्द उम्र …..

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मेरे आकार लेते व्यक्तित्व में

पिता डेरा डाले  रहते हैं

अधिकार सहित

जैसे पुश्तैनी मक़ान की

एकलौती दीवार घड़ी

भाँय भाँय वाले सन्नाटे के साथ

परिधि की सीमा में

करती रहती है दो दो हाथ अकेले

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पिता को चढ़ गया था एक बार मीठा पान

उन्हें बेसलीक़ा लगती थीं

ठट्ठाकर हंसने वाली लड़कियां

ये जानते हुए भी

मुझे कई बार पड़ते हैं बेतहाशा हंसी के दौरे

दुनिया को कई दफा  मैंने

अस्सी घाट की सीढ़ियों पर बैठ

उड़ाया है बैक टु बैक क्लासिक रेगुलर में

यार पिता ! ये बताओ

मध्यम वर्गीय लड़कियां क्यों नहीं कर पाती

प्रेयस को टूटकर प्यार

माँ देखो तुम भौंचक्की मत हो जाना

मेरी इस ढीठ स्वीकारोक्ति से

कि तुलनात्मक रूप से मुझे

पिता की बेटी कहलाना अधिक पसंद है

दोष तुम्हारे उस ताने का भी उतना ही है

‘ कि बिलकुल अपने बाप पर गयी है’

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