धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी

धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी

धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी पेशे से भले ही पत्रकार हैं लेकिन उनकी सामाजिक और जनवादी सोच उन्हें बाजारवाद के दौर में प्रचलित पत्रकारिता की परिभाषा से अलग करती है | उनकी यह छोटी सी कहानी उनकी इसी खासियत को दर्शाती है | : संपादक 

लघुकथा-

मेरा जूता है जापानी…

गांव का कल्लू अब कालीचरण बन गया है। फटा पजामा पहन कर प्राइमरी स्कूल जाने वाला अब ब्रांडेड सूट पहनने लगा है। अपने पिता के हाथ से बनाए जूते उसे रास नहीं आ रहे हैं। क्योंकि अपना कल्लू अब कालीचरण जो हो गया है।
कल्लू कुछ दिन पहले ही एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर आसीन हो गया है। बूढ़े बाप की खुशी का ठिकाना नहीं है। बेटे ने उसे दिल्ली आने की टिकट जो भेजी थी। बाप को लगा कि अपने लाड़ले के लिए कुछ तोहफा ले जाऊं। लेकिन, क्या ले जाएं, यह कुछ समझ नहीं आ रहा। घर में खाने के लिए रखे अनाज के अलावा कुछ नहीं था। रात भर उसके मन में सवाल कौंदता रहा कि बेटे को क्या दें कि वह खुश हो जाए। लेकिन, सवाल का जवाब उसे नहीं मिला। अगले दिन वह उनींदी आंखों से जागा तो देखा कि पत्नी उसके सामने खड़ी है। वह बोला, काय री, क्या देख रई, पहले मेंरो मौं नहीं देखों का? पत्नी बोली, ऐसो मौं तुमाऔ कबहूं नहीं देखो , क्या हो गऔ, ऐसे गुमसुम तो कबऊ नहीं रए। वह बोला, मौड़ा कौं का ले जांए, जो समझ नईं आ रऔ? पत्नी बोली, बाय जूता ले जाऔ, । जिंदगी से तो पैनत आ रऔ तुमाए बने जूता। पत्नी की बात सुन कर कल्लू के बाप का मन खुश हो गया। उसे पुराने दिन याद आने लगे कि कैसे वह फैक्टरी से कभी अपर, कभी सोल तो कभी कुछ सामान चुरा कर लाता था और अपने बेटे के लिए शानदार जूते बना कर उसे पहनाता था। उसने अपने जीवन में बस यहीं चोरी करने का अपराध किया था, जिसका दोषी वह खुद को कभी नहीं मानता था। क्योंकि जूते पहनते ही कल्लू का खिला चेहरा देख उसे ऐसा लगता था कि उसने गंगा नहा ली हो।
उसने अपने पास रखे सामान को निकाला और कल्लू के लिए जूता बनाने में जुट गया। देर रात तक मशक्कत करने के बाद उसने कल्लू के लिए आकर्षक जूते तैयार किए। अगले दिन दोनों पति – पत्नी ट्रेन में बैठ कर दिल्ली के लिए चल दिए। पूरे रास्ते बूढ़ा बाप कल्लू के बचपन का वह चेहरा याद करता गया, जो उसे उसके बनाए जूते मिलने पर खिल जाता था। अब उसका बेटा लाट साहब बन गया था। बिना मोजों के जूते पहन कर खेतों में दौड़ने वाला कल्लू अब उसके बनाए जूते पहन कर टाइल्स पर चलेगा। इन्हीं सब खुशियों की लहरों में गोते लगाते कब दिल्ली आ गया उसे पता ही नहीं चला।
स्टेशन पर बेटा लेने आ गया था। टैक्सी में बैठ कर वह उसके फ्लैट में पहुंचा तो अपने बेटे का रुतबा देख कर खुशी से फूला नहीं समाया। बाप ने बिना कुछ बोले भरी हुई आंखों से अपने बेटे को जूते दिए। जूते देख कल्लू जोर-जोर से हंसने लगा। इस बार उसकी हंसी बूढ़े बाप को समझ नहीं आई। वह हंसते – हंसते बोला, बापू ये क्या उठा लाए, अब मैं ये नहीं जापानी कंपनी का जूता पहनता हूं। कल्लू ने फट से अपने पैर से जूता उतारा और अपने बाप के हाथ में दे दिया। बेटे का जूता हाथ में लेकर बाप की आंखें छलछला गईं। इधर कल्लू पटर – पटर बोले जा रहा था कि बापू ये जूता जापानी कंपनी का है, हजारों रुपये का आता है। तेरे जूतों से ज्यादा आराम दायक है। बाप को रोते देख कल्लू चुप हो गया। बोला क्या हुआ बापू, खुश नहीं हुए। बूढ़े बाप ने जूते का सोल उखाड़ दिया। यह देख कल्लू अचंभित हो गया। बोला बापू बुरा लगा क्या, मुझे माफ कर दो। बाप बोला जूता गुस्सा में नईं फाड़े हैं कल्लू, तोय जाय दिखा रहे के पैसन की चमक में तू अपने बाप के प्यारई कौं भूल गऔ। जो जापानी जूता तू पैने हैगो, जो भी हमई ने बनाऔ है, जापे नाम अकेलो उतैको है, लेकिन जा देखों सोल पर निशान हमरोई लगे।
यह देख कल्लू की आंखें भलभला गई और उसे भी बचपन का वह नजारा याद आ गया, जब बाप के बनाए जूते को पहन कर वह खिलखिला जाता था। और आज वहीं जूता किसी और नाम से उसे पसंद तो आ रहा था, लेकिन बाप के हाथ से दिया हुआ नहीं।

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