गहरे प्रतीक संदर्भों में वर्तमान सामाजिक हालात और राजनैतिक व्यवस्था के बनते कथित तांबई परिदृश्य के बीच से बारीक पड़ताल के साथ आम जन और मानव जाति व् उसकी मनः स्थिति को तलाशने का प्रयास करती शहनाज़ इमरानीकी यह कविताएँ …..| – संपादक 

मेरा शहर भोपाल

शहनाज़ इमरानी

शहनाज़ इमरानी

शहर में भीड़ है
शहर में शोर है
शहर को खूबसूरत बनाया जा रहा है
पूंजीपतियों के सेवक ले रहे है
ऊँचे वेतन और विशेषाधिकार
रिश्वत ,दलाली और कमीशन की मोटी रक़म
रौशनियों में डूबा शहर
जिसकी रात अब जागती है देर तक
फिर भी इसमें खुले आम लूटा जाता है इंसान
भीड़ में कोई पहचानी आवाज़ नहीं रोकती अब
सब कुछ समतल होता जाता है
मर चुकी संवेदनाओं दे साथ जीने लगा है शहर
अब बहुत तेज़ दौड़ने लगा है मेंरा शहर।

 

आदमी ज़िंदा है

बदल गया है सच
परिस्थतियों के साथ
सब अनसुना हो गया है
दिन मांगते हैं न्याय
इंसान में इंसान होने की
गुंजाइश कम
अटकलों, संदेहों, और अंदेशों पर
लटका समय और खोखले वादे
देखने का नज़रिया कैसे बदले
नेता माँ बाप नहीं
जनता के नौकर हैं
जनता हाथ जोड़े खड़ी रहती है
लाठी किसी के भी हुकम से चले
सहना जनता को पड़ता है
योजनाये बहुत हैं, करोड़ों का बजट है
पर सरकार खुशहाली का निवाला
कुबेरों को खिलाती है
बेशर्मी की चर्बी बढ़ती जाती है
बढ़ती जाती स्लम बस्तियाँ
धर्म बन जाता एक हथियार
उन्माद से भरे हैं लोग
रोज़ नई घटती घटनाओं के साथ
घटना का ताक़तवार गवहा
होंठ सी कर घर से बाहर निकलता है।

 

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