अपने भीतर खुद को खोजने की छटपटाहट एक ऐसे मैदान में ला खडा करती है जहाँ इंसानी वजूद के स्थापत्य के लिए सीधे जिंदगी से मुठभेड़ करनी होती है | स्त्री वर्ग की मुक्त मानवीय अभिव्यक्ति को आवाज़ प्रदान करती ‘शालिनी श्रीवास्तव’ की कहानी …..| – संपादक 

शालिनी श्रीवास्तव

        शालिनी श्रीवास्तव

मेरे हिस्से की धूप

मौसम ज़्यादा गर्म नहीं था फिर भी सुधा का गला बार-बार सूख रहा था। वो बेचैन-सी अपने पलंग पर बस करवटें बदल रही थी। नींद आंखों से कोसों दूर थी। दिमाग में सुभाष के कहे शब्द गूंज रहे थे, आज वो अपने आप को जि़ंदगी के सबसे कठिन मोड़ पर खड़ा हुआ महसूस कर रही थी। उस पर मां-बाप के दिए गए संस्कारों का बोझ था, ‘पति परमेश्वर होता है,…. जोडि़यां ऊपर से बनकर आतीं हैं….।’ इस तरह के जुमले उसने अपनी मां के मुंह से सुने थे। बोझ इतना भारी था कि आज घुटन भरी जि़ंदगी सामने खड़ी है और वह इससे इंकार भी नहीं कर पा रही है, शायद लड़कियों को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हक़ ही नहीं होता है। उन्हें बचपन से पराई अमानत, कर्ज, बोझ, जिम्मेदारी आदि संज्ञाओं से पुकारा जाता है। उन्हें अपनी जि़ंदगी के फैसले लेने का कोई हक़ नहीं होता, उन्हें तो बस परिवार को चलाना और उसे संवारना आना चाहिए पर फिर इन सब बातों को भूलकर सुधा ने इतनी बड़ी गलती कैसे कर ली। उसने सपने देखने की जुर्रत की और उन्हें पूरा होने की भी, वो कैसे भूल गई कि उसे अपनी जिं़दगी के फैसले लेने का कोई हक़ नहीं।
‘‘या तो तुम्हें अपना स्कूल छोड़ना होगा या मुझे।’’ सुभाष के इन शब्दों से आज सुधा टूट कर बिखर गई है। उसका सबसे बड़ा सपना चकनाचूर हो गया है। वो कैसे समझाए सुभाष को बस इसी सोच में करवटें बदल रही है।
कुल तीन महीने पहले ही सुधा और सुभाष की शादी तय हुई थी। सुधा के दूर के रिश्ते के मामा जी ने उसके मां-बाप को सुभाष के बारे में बताया था। ‘‘दीदी लड़का पढ़ा-लिखा है एम0 बी0 ए0 किया है। घर का मकान है आपकी सुधा खुश रहेगी।’’ मां-पिता ने बिना सुधा से पूछे लड़के वालों को लड़की देखने के लिए बुला लिया, सुधा एक साधारण, सांवले रंग वाली लड़की है। घर वालों को डर था कि कहीं लड़का, लड़की को देखकर नापसंद न कर दे इसलिए सुधा की बड़ी दीदी को उसे ठीक से सजाने को कहा गया। सुधा ने अपनी बड़ी बहन से पूछा ‘‘ दीदी अगर लड़का मुझे पसंद नहीं आया तो ?’’ तब दीदी ने बड़े प्यार से सुधा को समझाया कि यहां लड़की को अपनी पसंद और नापसंद बताने का हक़ नहीं होता। इसे बेशर्मी कहा जाता है। सुधा ने तर्क रखते हुए कहा-‘‘क्यों ? क्या सिर्फ उसे ही नापसंद और पसंद का ठप्पा लगाने का हक है और अगर वो मेरे लायक न हुआ तो ?’’
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और मां ने धीमी आवाज़ में बाहर से कहा- ‘‘ वो लोग आ गए हैं, जल्दी तैयार हो जाओ।’’ और सुधा नुमाइश में रखी चीज की तरह सबके सामने बैठा दिया गया। लड़के वालों की तरफ से सबने बारी-बारी से सुधा से बात की। कुछ देर बाद माहौल गम्भीर हो गया। बारी फैसले की थी यानी उन्होंने सुधा को पास किया या फेल! इन सबके बीच सुधा मन-ही-मन जल रही थीं उसे अपना अपमान-सा महसूस हो रहा था। सुधा के पिताजी सुभाष के पिता के आगे हाथ जोड़ रहे थे।…..छिः…. कितना शर्मनाक दृश्य था वह सुधा के लिए। उसे लग रहा था जैसे उसने लड़की होकर कोई गुनाह कर दिया है। सुभाष के पिता ने दहेज में एक मोटी रकम और घर का सारा सामान तय किया। शादी तय हो गई थी पर सुधा के मन जैसा कुछ भी नहीं हुआ। वह अंदर ही अंदर अपमान की इस आग में जल रही थी। तभी एक और पहाड़ टूटा जब लड़के के पिता ने कहा कि उन्हें पसंद नहीं कि उनकी होने वाली बहू नौकरी करे- ‘‘सुधा का स्कूल छुड़वा दीजिए। अब वह क्या करेगी पढ़ाकर ? अब तो उसे घर के काम-काज पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए। तभी तो वह अच्छी बहू साबित होगी।’’ सुधा की मां ने झुकी गर्दन के साथ कहा- ‘‘जी हां, बिल्कुल! आप बेफिक्र रहिए शादी से पहले स्कूल छोड़ देगी। ’’
यही कोई तीन वर्ष पहले सुधा ने स्कूल में पढ़ाना शुरु किया था पर उस वक्त उसने सिर्फ मन बहलाने के लिए स्कूल में पढ़ाना शुरु किया था। बड़ी बहन की शादी के बाद घर खाली-सा हो गया था। सुधा घर में अकेली रहती थी। मां-पिता, भाई सब अपना-अपना जीवन जीते थे। ऐसे में सुधा को अकेलापन खाए जाता था। एक दिन अपनी सहेली द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर उसने विचार किया और लड़-लड़ाकर स्कूल में पढ़ाने जाने की अनुमति ले ली। अपने जीवन के अकेलेपन को दूर करने का उसे ये एक आसान तरीका लगा। सुधा की मां को सुधा का स्कूल में पढ़ाने जाना पसंद नहीं था। वह सुधा के पिता से खूब कहती….‘लड़कियों का घर से बाहर जाना अच्छा नहीं है।’ पर सुधा के पिता ने सुधा को इतनी इजाज़त दे ही दी मगर धीरे-धीरे उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास होने लगा कि यह कोई मन बहलाने का जरिया नहीं है बल्कि एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और धीरे-धीरे बच्चों के बीच रहकर उसने एक सपना देख लिया। वह एक अच्छी अध्यापिका बनना चाहती थी। वह जानती थी कि आज जिन बच्चों को वह पढ़ा रही है वे ही देश का भविष्य हैं। उसे बच्चों के बीच रहना, उन्हें पढ़ाना बहुत अच्छा लगता था। बच्चे भी उसे बहुत पसंद किया करते थे। बड़ी क्लास के लड़के-लड़कियां उसे अपना दोस्त और हमदर्द मानते थे। और यही कारण था कि वे लोग अपनी व्यक्तिगत परेशानियां भी सुधा के साथ बांट लिया करते थे। उसे बच्चो की आत्मा तक पहुंचने का जुनून था। शायद इसीलिए वह सभी की चहेती थी। वो जितना समय स्कूल में रहती बहुत खुश और सक्रिय रहती थी। कई बार घर से किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से आंसू भरी आंखें लिए सुधा स्कूल आती पर बच्चों के बीच रहकर वह सब कुछ भूल जाती। यहां आकर उसे बड़ा सुकून मिलता था। सुधा को अपनी इस जि़ंदगी से बहुत प्यार था। और उसके जीवन का उद्देश्य भी यही था कि वह ऐसी अध्यापिका बने जिसे बच्चे अपने आदर्श के रूप में देखें। अब सुधा के लिए स्कूल, स्कूल न होकर उसका सपना बन गया था। उसे शादी से कोई एतराज नहीं था पर वह शादी भी अपने उसूलों के अनुसार करना चाहती थी। उसे समाज के बनाए ये ढकोसले, दहेज के रीति-रिवाज़ पसंद नहीं थे। उसे लड़की होने पर गर्व था। पर जिस तरह उसने अपने पिता को सुभाष के पिता के सामने सिर झुकाए खड़ा देखा तो उसे महसूस हुआ कि आज इक्कीसवीं सदी में खड़े होने के बावज़ूद लोग आज भी जात-पांत, ऊंच-नीच, रीति-रिवाज़ों के चक्कर में पड़े हैं वरना लड़की के पिता को गर्व से सिर ऊंचा कर के अपनी बेटी के लिए वर खोजना चाहिए। क्योंकि वह अपनी बेटी उनके हवाले कर रहे हैं उन्हें इस बात का कर्ज महसूस होना चाहिए। सुधा के दिमाग में इस तरह के विचार उमड़ते रहते थे। पर आज जब यह सब उसके साथ हो रहा है तो वह इसका विरोध भी नहीं कर पा रही है। पर वह इतनी आसानी से हार नहीं मानेगी। उसने मन में ठान ली कि वह सुभाष से इस बारे में बात करेगी शायद वह उसे समझे। आखिर वह भी तो नए विचारों वाला लड़का है। हो सकता है वह भी इन बातों का विरोध करे। इन सब बातों को सोचते-सोचते सुधा की आंख लग गई और जब वह सुबह उठी और तैयार होकर स्कूल जाने लगी तभी उसकी मां ने उसे पीछे से आवाज़ दी- ‘‘सुधा अपने स्कूल में भी बता देना कि तुम्हारी शादी तय हो गई है। अब तुम सिर्फ कुछ दिन ही और काम कर पाओगी।’’ सुधा ने धीरे स्वर में जबाव दिया-‘‘हां! कह दूंगी।’’
आज सुधा का मूड उखड़ा-उखड़ा था। आज पहली बार उसका मन पढ़ाने में नहीं लग रहा था। कुछ एक अध्यापिकाओं ने टोका भी पर सुधा ने उन्हें कुछ भी न बताना उचित समझा। सुधा स्टाफ रूम में बैठे हुए अपना कुछ काम कर रही थी कि तभी उसके फोन की घंटी बजी। उसने फोन देखा नम्बर अजनबी था फिर उसने हरा बटन दबाकर फोन रिसीव किया- ‘‘हैलो।’’
‘‘ हां हैलो! सुधा बोल रही हो क्या ?’’
‘‘ जी हां ! आप कौन ?’’
‘‘ मैं सुभाष ! कैसी हो ?’’
‘‘ मैं…. मैं… ठीक हूं,….. आप…. आप… कैसे हैं ?’’
‘‘अच्छा हूं, वैसे शाम तक कितने बजे तक काम कर के फ्री हो जाती हो ?’’
‘‘ जी यही कोई आठ-साढ़े आठ बजे तक !’’
‘‘ ठीक है मैं शाम को फोन करूंगा, अपना ख्याल रखना। बाय।’’
‘‘ बाय। ’’
सुभाष के फोन से उसे कुछ उम्मीद तो नज़र आई। अब उसे शाम का इंतज़ार था। वह सोच रही थी कि वह आज सुभाष को ज़रूर अपनी परेशानी बताएगी। और उसे आशा थी कि वह भी उसका समर्थन ज़रूर करेगा।
शाम को घर के सभी सदस्य खाना खाकर सोने जाने की तैयारी कर रहे थे। तभी सुधा के फोन की घंटी बजी, सुधा ने बिना किसी देरी के फोन रिसीव किया और फोन लेकर अपने कमरे में चली गई।
‘‘ हैलो !’’
‘‘ हां, खाना खा लिया? ’’
‘‘ हां, खा लिया। ’’
‘‘ सब काम खत्म कर लिया या अभी भी कुछ बाकी है ?’’
‘‘ नहीं ! सब काम खत्म कर लिया, आप बताऐं ?’’
‘‘ नहीं, कुछ नहीं मैं भी अभी-अभी अपने रूम में आया हूं, जो शादी के बाद हमारा होगा।’’
सुधा को सुभाष की इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी उसे तो बस अपने सवालों के जबाव चाहिए थे। और हिम्मत करते हुए उसने सुभाष से पूछ ही लिया- ‘‘ आपको नहीं लगता, दहेज लेना गलत है, हमें इसका विरोध करना चाहिए, अगर हम नौजवान ही इसका समर्थन करेंगे तो इस बुरी प्रथा को कौन रोकेगा ? आपको अपने माता-पिता से इस बारे में बात करनी चाहिए।’’
सुभाष ने थोड़ी देर चुप रहकर सुधा की बात का जबाव दिया- ‘‘ देखो सुधा! ये हमारे बड़ों का मामला है और बेहतर होगा कि इस मसले पर हम ना सोचें… और तुम भी न….! कितनी रोमांटिक बातें कर रहा था और तुम हो कि समाज सुधार की बातें लेकर बैठ गईं। यह तो दुनिया का नियम है, मैंने भी अपनी बहन की शादी में लड़के वालों की हर मांग पूरी की थी। कितने सपने देखते हैं मां-बाप, हमारी शादी के लिए, क्या उन्हें अपने सपने पूरे करने का कोई हक़ नहीं ?’’
सुधा, सुभाष की इन बातों को सुनकर हैरान रह गई और सोचने लगी कि सपने पूरा करने का यह कौन-सा तरीका है ? सुभाष, सुधा के साथ अपने आने वाली जि़ंदगी के सपने सजाने लगा। एक ऐसी जि़ंदगी, एक ऐसी दुनिया जहां सुधा के सपनों के लिए कोई जगह नहीं थी। सुभाष की बातों को बीच में टोकते हुए एक रात सुधा ने सुभाष से कहा- ‘‘ सुभाष ! मैं, शादी के बाद भी पढ़ाना चाहती हूं। मैं अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करना चाहती हूं। पढ़ाना मेरा सपना ही नहीं वरन मेरा जुनून भी है, क्या तुम मेरे सपने को पूरा करने दोगे ?’’
सुभाष झल्लाते हुए बोला- ‘‘मैं, हमेशा तुम से अपने बारे में बातें करना चाहता हूं और तुम हो कि देश और दुनिया की बातें करने लगती हो। तुम जानती हो, मेरे घर में यह सब करने की आज़ादी नहीं मिलेगी। एक लड़के, एक बहू का फर्ज होता है कि वह अपना घर अच्छे से संभाले। सास-ससुर की सेवा करे। और तुम न जाने किस सपने को लेकर जी रही हो।’’
उस दिन भी सुधा चैन से नहीं सो पाई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या किया जाए ? सुभाष भी उसकी बातों को नहीं समझता। पर सुधा मुश्किलों से लड़ने वाली लड़की थी, वह जानती थी कि सुभाष की ऐसी सोच के जिम्मेदार उसके माता-पिता और समाज हैं जो इन सब बातों को फर्ज की आड़ में लड़कियों पर थोपता है। पर ऐसा नहीं है कि लोग आज दहेज जैसी बुरी प्रथाओं का विरोध नहीं कर रहे पर न जाने क्यों लोग पढ़े-लिखे होकर भी सही और गलत में अंतर नहीं कर पाते। सुधा हमेशा कोशिश करती रहती थी कि सुभाष की सोच को बदल पाए। इसलिए हर रात जब वह दोनों बातें करते थे तो सुधा जानबूझकर कोई न कोई ऐसी घटना सुभाष को ज़रूर बताती थी जिससे सुभाष सिर्फ अपनी निजी जिं़दगी के बारे में न सोचकर समाज के बारे में भी सोचे। मगर सुधा को अपनी हर कोशिश असफल होती दिखती थी। सुभाष, सुधा से प्यार करने के दावे करता था। और हमेशा उसे खुश रखने के वादे किया करता था पर सुधा की खुशी जिसमें है उसे उस जि़ंदगी और सपने से ऐतराज था, यह कैसा प्यार है सुभाष का ? अगर वह वाकई मुझसे प्यार करता है तो वह क्यों मुझे मेरे सपने पूरा करने में मेरी मदद नहीं करता ?
सुधा हमेशा लोगों की परवाह करती थी, वह सिर्फ अपनी ही नहीं वरन् अपने से जुड़े हर व्यक्ति की परवाह करती थी पर सुभाष को बहुत सीमित दायरे वाली जि़ंदगी पसंद थी। वह सिर्फ अपने बारे में सोचता था। उसे सिर्फ अपने फायदे की चिंता थी। फिर चाहे उसकी किसी भी काम से दूसरों को कितना ही नुकसान क्यों न हो ? सुधा, सुभाष की आदतों सुधारने का प्रयास करती पर सुभाष हर बार उसे ही गलत ठहरा देता। सुभाष, सुधा पर नाराज़ होता कि वह अकेले बाज़ार क्यों जाती है ? उसे अकेले नहीं जाना चाहिए। घर से बाहर बहुत कम जाना चाहिए, और जब सुधा, सुभाष से तर्क करती तो वह उसे अपना पौरुषत्व दिखाता और उसे लड़की होने का ताना देता। सुधा भी उससे बहस करती पर जब सुभाष पर सुधा के तर्कों का कोई जबाव नहीं होता तो वह उसे अपने गुस्से से चुप करा देता पर कभी भी सुधा द्वारा दिये गए तर्कों और सवालों को जबाव उसके पास नहीं होता। होता भी कैसे ! सुधा हमेशा सही बात कहती थी जबकि सुभाष के पास सिर्फ समाज के ढकोसले वाली बातें होतीं थीं जो सिरे से ही बेबुनियाद होतीं थीं।
एक रात सुधा, सुभाष से किसी विषय पर बातें कर रही थी और सुधा ने सुभाष से अपने किसी मित्र के बारे में बातें कीं तभी सुभाष ने चौंकते हुए कहा- ‘‘ क्या तुम्हारे पुरुष मित्र भी हैं ?’’
‘‘हां ! तो मेरे साथ ही पढ़ाते हैं, इसमें हर्ज ही क्या है ? आपके साथ भी तो कई लड़कियां काम करती होंगी ?’’ सुधा ने मजबूती के साथ कहा।
‘‘हां ! करती हैं पर मैं तुम्हारी तरह उनसे दोस्ती नहीं करता फिरता।’’
सुधा झल्लाते हुए बोली- ‘‘क्या मित्रता करना गुनाह है ?’’ अगर आप साथ काम करते हैं तो एक-दूसरे से मित्रता हो ही जाती है फिर पुरुष और स्त्री इनमें क्या अंतर है ? बस इंसान के विचार अच्छे होने चाहिए और वे सब अच्छे इंसान हैं। क्या ऐसे लोगों से मित्रता करना गलत है ? सुभाष पर जब सुधा के प्रश्नों कोई जबाव नहीं बना तो उसने फोन काट दिया। सुधा ने भी दोबारा फोन नहीं किया। अगले दिन जब सुधा स्कूल में क्लास ले रही थी तभी फोन की रिंग बजी। फोन सुभाष का ही था। सुधा ने क्लास से बाहर आकर फोन रिसीव किया-
‘‘हैलो !’’
‘‘हां !’’
‘‘ सुधा मुझे माफ कर देना, मैं रात को कुछ ज़्यादा ही गुस्सा हो गया था। दरसल मैं बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि मेरे सिवाय कोई और पुरुष तुम्हारे जीवन में हो।’’ तब सुधा भी नरम होते हुए बोली- ‘‘देखो सुभाष हमारे रिश्ते में विश्वास का होना बेहद ज़रूरी है और अगर हम एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करेंगे तो हमारा रिश्ता मजबूत नहीं बनेगा।’’ सुभाष सुधा की बातों को समझ रहा था। ‘‘अच्छा छोड़ो’’ मैंने बात का रुख बदलने की कोशिश की। ‘‘तुम्हें कुछ बताना था।’’
‘‘हां कहो ना !’’ सुभाष बोला। ‘‘ वो आज मेरी सहेली का जन्मदिन है, शाम को फोन करने में थोड़ी देरी हो जाएगी।’’ सुभाष अपनी नाराज़गी दबाते-छुपाते हुए बोला- ‘‘ जाना पर घर जल्दी आ जाना।’’
‘‘हां-हां, मैं घर जल्दी आ जाऊंगी, अब मैं फोन रखती हूं। क्लास में जाना है। बाय!’’
‘‘बाय! शाम को बात करेंगे।’’
फोन को काटते हुए सुधा क्लास में आ जाती है। वह सुभाष के विचारों को समझती है पर उसे लगता है कि वह धीरे-धीरे उसे बदल देगी।
शाम को पार्टी से जल्दी लौटकर उसने सुभाष को उसी समय पर फोन किया जिस समय पर रोज सुभाष उसके फोन का इंतज़ार किया करता था। सुभाष खुश था कि सुधा ने उसका कहना माना और घर जल्दी आ गई। फिर सुधा से उसकी सहेली के बारे में पूछने लगा। सुधा भी सुभाष के इस बदले व्यवहार से खुश थी। पर यह खुशी भी ज़्यादा देर रह न सकी। बातों ही बातों में जब सुभाष ने कहा- ‘‘क्या तुम्हारी सहेली नीची जाति की है ? तुम्हें शर्म नहीं आती इन नीची जात के लोगों से दोस्ती रखते हुए, हमारे यहां तो इन लोगों को घर में नहीं घुसने दिया जाता और तुम उनके साथ बैठकर खाना भी खा लेती हो। यहां यह सब नहीं चलेगा।’’
एक और पाबंदी। सुधा जिस जात-पांत के भेद को लेकर अपने घर में लड़ा करती थी और एक हद तक उसने अपने घर से इस भेद-भाव को दूर किया है वहीं यही भेद-भाव वाली मानसिकता अब उसे अपने ससुराल में झेलनी पड़ेगी। यहां तो उसे अपने घर जितना बोलने की भी आज़ादी नहीं होगी। जिन समाज के नियमों का विरोध वह हमेशा करती थी आज उसे अपने ही घर में उन नियमों को मानने वाले लोग मिल रहे हैं।
शादी को सिर्फ महीना भर रह गया है। सुधा के पिता शादी की तैयारियों में दिन-रात जुटे हुए हैं। दूर के रिश्तेदारों को फोन कर दिया गया है। सुधा का छोटा भाई कार्ड छपवाने के लिए मैटर तैयार कर रहा था तभी सुभाष के माता-पिता घर पर आए। सुधा के मां-पिता ने पूरे जोश के साथ उनकी आवभगत की। पिताजी उनके सामने इस तरह कमर झुकाए खड़े थे जैसे अपने बेटे की शादी वो मुझसे कराकर हम पर कोई एहसान कर रहे हैं। पर सुधा को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक ये कैसे आ गए। सुधा का दिल कई चिंताओं से घिर गया पर जब जाते-जाते सुभाष के पिता ने पिताजी को एक लिस्ट थमाई तो सुधा की समझ में सारी बात आ गई। सुभाष की मां बड़े प्यार से कहती है- ‘‘ध्यान रहे भाईसाहब यदि लिस्ट के मुताबिक सामान न हुआ तो रिश्तेदारों में हमारी नाक कट जाएगी।’’
‘‘कटती है तो कट जाए।’’ सुधा अंदर ही अंदर कुछ कह रही थी और सोच रही थी कि आखिर किस जाल में सुधा और उसका परिवार फंस गया है। आखिर ये शादी खुशियां तो लाई नहीं बल्कि उसके और उसके परिवार के लिए परेशानियां लेकर आई है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह कौन-सी वज़ह जो उसके पिता को सुभाष के पिता की हर बात माननी पड़ रही है। क्या लड़की का पिता होना अपराध है ? सुधा इन सब का विरोध करना चाहती है परंतु उसके विरोध का साथ देने वाला यहां कोई नहीं था। उसे तो बस एक बोझ समझा जा रहा था जिसे किसी भी हाल में घर से बाहर करना था जैसे वह कोई कबाड़ है, घर का कोई बेकार सामान जिसे वे किसी भी कीमत पर घर में नहीं रखना चाहते। अब उसे समझ आ रहा था कि क्यों लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता है। अगर वाकई सुधा अपने मां-बाप पर एक बोझ थी तो क्यों उसे भी पैदा होते ही नहीं मार दिया गया ? क्यों उसे बीस-बाइस साल पालने-पोसने का दोगुना बोझ उसके मां-बाप ने उठाया ? सरकार क्यों नहीं कानून बना देती कि समाज में सिर्फ लड़के ही पैदा हों लड़कियां पैदा न की जाऐं। क्यों दहेज के ये भूखे लोग नहीं समझते कि जिसे वो अपनी शान और रुतबा मानते हैं असल में वे सौदा करते हैं, अपने बेटे की बोली लगाते हैं और जो सबसे ऊंची बोली लगाते हैं वे अपने लड़के की शादी उन लड़कियों से करा देते हैं, लेकिन समाज की इन चौकड़ी का खेल देखिये ! इसमें खरीदने वाला दयनीय अवस्था में दिखाई देता है। जबकि जो व्यक्ति वास्तविक रूप से दया का पात्र होना चाहिए वो सिर ऊंचा किए समाज में घूमता है। वैसे गुनहगार दोनों ही हैं जो दहेज लेता है वह भी और जो देने वाला है वह भी। क्यों मां-बाप लड़के-लड़कियों में भेद-भाव करते हैं ? वह लड़की को अच्छी शिक्षा क्यों नहीं दिलवाते ? वे क्यों नहीं सोचते कि अगर लड़की कामयाब और समझदार बन जाएगी तो उसके जीवन में किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं होगी। वह स्वयं अपनी योग्यता से अपना जीवन साथी चुन सकती है।
एक तरफ सुधा की शादी की तैयारियां तेज़ी से चल रहीं थीं और दूसरी तरफ सुधा का मन इन सब बातों से बेचैन था कि अब उसके उद्देश्य का क्या होगा ? वो अच्छी तरह से जानती थी कि सुभाष के घर वाले उसे पढ़ाने जाने की इजाज़त नहीं देंगे। अब सुभाष भी सुधा की बातों को नहीं सुनता था एक रात सुधा की कही किसी बात पर सुभाष ने सुधा को धमकी भी दी थी। उसने उसे बताया कि उसके कई लड़कियों से संबध रह चुके हैं। सुधा यह न सोचे कि वह शादी के बाद किसी भी रूप से सुधा पर निर्भर रहेगा। अगर सुधा उसके मन मुताबिक नहीं रही तो उसे अपनी पुरानी जि़ंदगी में लौटने में ज़्यादा वक्त नहीं लगेगा। उसने सिर्फ सुधा के लिए ही उन लड़कियों को छोड़ा है वरना वो सब आज भी सिर्फ सुभाष का इंतज़ार करतीं हैं। सुधा सुभाष के खिलाफ जाकर सिर्फ और सिर्फ अपना ही वैवाहिक जीवन बर्बाद करेगी। सुभाष किसी भी कीमत पर सुधा को यह एहसास दिलाना चाहता था कि वह उससे शादी कर के उस पर एहसान कर रहा है वरना उस जैसी बदसूरत लड़की से कौन शादी करेगा ! सुभाष के इन शब्दों में सच्चाई है। हमारे समाज में आज भी लड़की को सिर्फ उसकी दैहिक सुंदरता से ही अच्छा या बुरा होने का खिताब दिया जाता है। लड़की देखने में सुन्दर हो तभी उसे पसंद किया जाता है। सुभाष, सुधा को सिर्फ घर में रखे किसी सामान की तरह देखना चाहता था। वो सुधा को सिर्फ घर में काम करने वाली, सास-ससुर की सेवा करने वाली एक आदर्श बहू के रूप में देखना चाहता है। पति जो कहे बस वही सही है। सुधा जैसी लड़कियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है या दूसरे शब्दों में कह लीजिए उन्हें जि़ंदगी अपने तरीके से जीने की आज़ादी नहीं है। वो हमेशा पिता, भाई, पति और समाज इनकी ही मर्जी से जीती है।
शादी की तैयारियां जोरों से हो रहीं थीं। अब घर वालों की तरफ से भी सुधा पर दबाव बढ़ने लगा था कि वह अब स्कूल छोड़ दे पर सुधा का मन कुछ और ही चाहता था। इन सब परेशानियों के बीच सुधा की लगन और मेहनत को देखते हुए स्कूल में उसे उप-प्रधानाचार्या का पद प्रस्तावित किया गया था पर सुधा ने इस पद को संभालने से मना कर दिया। इतने तनाव और परेशानियों को झेलते हुए सुधा को अगर कहीं थोड़ा सुकून मिलता था तो वह स्थान था उसका स्कूल जहां वह सबसे ज़्यादा सुकून महसूस करती थी। पर अगर उससे उसका स्कूल भी छिन जाएगा तो वह क्या करेगी ?
सुधा का मन अब सुभाष से बात तक करने का नहीं करता था। वह बहाने बनाकर सुभाष का फोन काट दिया करती थी। ऐसा लगता था कि वह अब बस हाड़-मांस की एक कठपुतली है जिसे नचाने के लिए डोर दूसरों ने थाम रखी है। एक दोपहर सुधा स्कूल की किसी गोष्ठी में बैठी थी तथा सभी के विचार सुन रही थी तभी यकायक उसके फोन की घंटी बजी। फोन की घंटी की आवाज़ से सभा में थोड़ा व्यवधान आ गया। और सभी का ध्यान सुधा पर केन्द्रित हो गया। सुधा ने हड़बड़ाकर फोन काट दिया और फोन को बैग में डाल दिया। डेढ़-दो घंटे बाद जब गोष्ठी समाप्त हुई तब उसने सुभाष को फोन लगाया। उसे पता था कि सुभाष उससे नाराज़ होगा फिर भी उसने उससे बातें करने के लिए फोन किया। सुभाष ने सुधा का फोन रिसीव नहीं किया। कई बार फोन करने के बाद सुभाष ने फोन रिसीव किया और फोन उठाते ही जहर से भी ज़्यादा जहरीले शब्द उगले- ‘‘कहां थीं अब तक ? और क्या कर रहीं थीं ? ऐसा क्या था जो मेरे फोन से भी ज़्यादा ज़रूरी था ? और तुमने मेरा फोन काट दिया, अपने किसी यार के साथ थीं क्या ?’’ सुभाष के शब्द सुधा के कानों थप्पड़ की तरह गूंजने लगे। ‘‘सुभाष इस तरह की भाषा क्यों बोल रहे हो ?’’ रोते हुए सुधा ने पूछा।
‘‘ ये कौन-सा तरीका है बात करने का ? मैं उस समय स्कूल में चल रही एक गोष्ठी में थी। और फोन रिसीव नहीं कर सकती थी।’’ कारण सुनते ही सुभाष और नाराज़ हो गया- ‘‘क्या ? स्कूल अभी तक चल रहा है ? और क्या होता है ये गोष्ठी ? ये सब लड़कियों को बिगाड़ने का तरीका है। इसी तरह लड़कियों को गुमराह किया जाता है।’’ सुधा ने सुभाष को समझाने का खूब प्रयास किया पर सुभाष ने सुधा की एक बात नहीं सुनी और फरमान जारी कर दिया या तो कल से स्कूल छोड़ दो या मुझे ! फैसला अब तुम्हारे हाथ है। सुधा सुभाष की बातें सुनकर फफक-फफक कर रो पड़ी पर उस पत्थर दिल इंसान पर कोई असर नहीं हुआ। उसने सुभाष को खूब समझाने का प्रयास किया पर सुभाष उसकी बातें सुनने और समझने को तैयार ही नहीं था। उस रात सुभाष का फोन नहीं आया। सुधा ने भी सुभाष से बातें करना उचित नहीं समझा वह अपने कमरे में बत्तियां बंद किए अंधेरे में बैठी सोच में डूबी रही आखिर इस शादी से किसका जीवन सुधरने वाला है ! सुभाष जिस तरह का इंसान है उसके साथ जीवन कैसे काट सकती है वो? उसने तो अपने माता-पिता की पसंद को अपनाने का पूरा प्रयास किया पर…….. ये शादी नहीं है आत्म हत्या है जो उस विवश होकर करनी पड़ रही है। सुधा ने जिस तरह से जीवन साथी की कल्पना और रूपरेखा बनाई हुई थी, सुभाष कभी भी उसके अनुरूप नहीं था। उसने तो कभी सुधा और उसके सपने को समझा ही नहीं और आज तो हद ही हो गई। उसके चरित्र पर शक किया जो इंसान शादी से पहले उस पर इस तरह के आरोप लगा सकता है क्या वह शादी के बाद ऐसा नहीं कर सकता ? क्या वह कभी उसे सम्मान देगा या इसी तरह हमेशा उसे अपमानित होना पड़ेगा ? क्या उसे हमेशा एक स्त्री होने की सजा भुगतनी पड़ेगी ? आखिर कब तक ? सुधा बिलख उठी और फूट-फूट कर रो पड़ी। उसकी आंखों के सामने बार-बार उसके माता-पिता का चेहरा घूम रहा था। उसे अपने पिता के चेहरे पर लाचारी और बेबसी साफ दिखाई दे रही थी, ऐसे में सुधा क्या कर सकती थी ? उसका जीवन एक नागपाश में फंस चुका था। सुधा चीख-चीख कर इस नागपाश से मुक्त होना चाहती थी। वह अपने जीवन को फिर से पाना चाहती थी। शादी को बस अब बीस दिन रह गये थे। सारी तैयारियां हो चुकीं थीं। रिश्तेदारों, मुहल्लेवालों सभी जगह शादी के कार्ड पहुंच चुके थे। अब इस शादी से मना करना सुधा के लिए आसान नहीं था। उसके पिता ने न जाने किस तरह पैसों का इंतजाम करके सारी व्यवस्था की थी। पर क्या शादी के बाद भी मेरे माता-पिता को सुकून मिल पाएगा ? ऐसे लोगों को क्या भरोसा है अगर भविष्य में इन्होंने अपनी मांग बढ़ा ली तो तब क्या होगा ? शादी से इनकार न करने का दूसरा पहलू यह भी था कि सुधा की बदनामी होगी उस पर न जाने किस-किस तरह के आरोप लगेेंगे यहां तक कि उसे चरित्रहीन होने तक का मेडल दिया जा सकता है। यही सब सोचते-सोचते सुधा रोते हुए सो गई। जब सुधा सुबह जगी तो तकिया अभी तक आंसुओं से गीला था। रात को जिस सवाल के साथ वो सोई थी वह अभी भी नाग की तरह अपने फन उठाए खड़ा था। अब उसे फैसला लेना था उसे अपने आप को और अपने परिवार को उन लालची लोगों से बचाना था जिन्हें सिर्फ काम करने वाली उनके इशारों पर चलने वाली कठपुतली चाहिए थी।
सुधा रोज की तरह तैयार हुई और अपने पिता के पास जा कर साहस जुटाते हुए सारी बातें बताईं और समझाया कि इस शादी से वो, सिर्फ उसका जीवन बर्बाद कर रहे हैं और शादी से मना कर दिया। सुधा की मां ने अपनी बेटी को समझाने का प्रयास किया। वहां उपस्थित सारे लोग सुधा के इस फैसले से सकते में आ गए। घर का रंगीन माहौल सन्नाटे में बदल गया। सुधा इन सब बातों के लिए तैयार थी उसे अंदेशा था। उसके इतने बड़े फैसले से घर और घर वालों पर क्या असर होगा ? वह कांप रही थी। पर उसका स्वर निर्भीक था। चारों तरफ से समझाती हुईं आवाजें़ आईं- ‘‘बेटी ऐसा न कर, घर-परिवार की बहुत बदनामी होगी। अपने मां-बाप के बारे में सोच!’’ सब लोग सुधा पर दबाव डालने का प्रयास कर रहे थे पर सुधा के पिताजी अब तक खामोश थे। उन्होंने एक निगाह से सुधा को देखा। उन्होंने सुधा के चेहरे पर एक साथ कई भाव उभरते हुए महसूस किए। वह भी अपनी बेटी की बातों को समझते थे। उन्होंने उसके साहस की तारीफ की और उसके आंसू पोंछकर उसे गले से लगा लिया। उन्हें भी पता था कि जिन लोगों के हाथों वो अपनी बच्ची को सौंपने जा रहे थे वो लोग लालची हैं। उन्होंने कहा-‘‘बेटा तेरे सपने तेरे हैं और उन्हें पूरा करने का तुझे पूरा हक़ है।’’
और सुधा रोज़ की तरह पढ़ाने गई। आज उसके अंदर एक नई आभा थी एक नई चमक जो घनघोर बारिश के बाद निकलने वाले सूरज में होती है।

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