हर पल, हर दम, मरती, दम तोडती आधी दुनिया की तस्वीर, रचनात्मक दृष्टि से उकेरती साहित्यिक हस्ताक्षर बनती खुद आधी दुनिया ……. सराहनीय प्रयास हमरंग पर स्वागत के साथ …| – संपादक 

मैंने एक लड़की को मरते देखा

अंजली पूनिया

एक ने दूसरे के कान में कुछ फुसफुसाया
मैंने नैतिकता को भुलाकर सुनना चाहा
कह रहा था – “शी इज़ हॉट।”
मैंने कानों में गर्म शीशा पिघलते पाया
हाँ ‘हॉट’ हूँ।

भीतर तक अंगारा सुलगते देखा
मुलायम पनीर को
जली रोटी-सा खंगर होते देखा
चूल्हा जा बैठा उसकी आँखों में
आँख को धुँआ होते देखा
नमक था ज्यादा
औंधे मुह थाली जा पसरी
ज़मीन को थाली होते देखा
उसको ताने सुनते देखा
समय से ज्यादा बूढ़ा पाया
खुल-खुल जाते रेशम को
रस्सी-सा खुरदरा पाया
फेयरनेस क्रीम ने
सलोनी हिरणी का गला रेता
गोरा लहू टपकते देखा
पुश-अप ब्रा के साथ
टमी-टकर को बिकते देखा
खुद को उनके खांचे में गिरते पाया
शीशे के कलेजे को चीर कर
उसे ख़ुद की वैधता ढूंढते पाया
तब काजल से गहरा
उसकी आँखों को पाया
होठों की लीपापोती से ज्यादा लाल
उसके भीतर की आग को धधकते देखा
उसकी बनावटी-फुसलाती हंसी को
जब कभी सुनकर देखा
दर्द चू कर कानों से दिल में उतर आया
जिस दिन जीती वो लड़-झगड़कर
खुद को ‘ उस ‘ से आगे देखा
‘ उसके ‘ अहं को लहू-लुहान पाया
महिला सुरक्षा के लिए
जब मोमबत्ती थामे पुरुषों को देखा
ज़हरीली आंच ने मीठा ढोँग रचाया
नज़रों के फ़रेब से खुद को चोरी होते देखा
उसी नज़र ने जब दूसरी को लूटा
अपनी नज़र को मैंने झुकाया
इसकी-उसकी सबकी नज़र में
इस खोट को देखा
फिर भी प्यारे फरेबी जाल में लिपटा
चमकीली मकड़ी को पाया
उधड़ी-बुनी ऊन-सा
सिलाइयों पर लिपटते-उतरते देखा
उसके मन की सिलाइयों का ज़ख़ीरा
मेरे शरीर को ही बुन पाया
मेरी बुलबुल तेरी बुलबुल
काट ले , आधी-आधी कर ले बुलबुल
संपत्ति सा बिकते उसको देखा
उसके नाखूनों को अपनी पीठ में चुभते देखा
मगर ख़ून टपक कर आँख से क्यों आया !
सुरमे को बारूद बनते देखा
मैंने एक ‘ लड़की ‘ को मरते देखा

 

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