बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक र्रोप में सामने आना एक अवसर देता है अपने साहित्यिक, मानवीय अतीत को वर्तमान समय के साथ मूल्यांकन करने का | इस दिशा में ‘पद्मनाभ गौतम’ के लिखे संस्मरण बेहद रोचक और आत्मीय होते हैं | छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि में बैकुंठपुर को केंद्र में रखकर लिखा गया  “मैं, उस नगर की कविता”  संस्मरण का तीसरा और अंतिम भाग …..सम्पादक 

मैं, उस नगर की कविता 

मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक)

पद्मनाभ गौतम

(तीसरा और अंतिम भाग )

कार्यक्रम से वापसी पर चिरिमरी के कुछ कवि मित्रों ने बताया कि ऐसा करना तो उन कवि महोदय का शगल है तथा वे पहले भी अन्य कवियों के साथ ऐसी हीहरकत कर चुके हैं। फिर क्या था, बदले की आग में जलते हुए हमने बैकुण्ठपुर में विशेष रूप से एक कार्यक्रम आयोजित किया। उस आयोजक को मीठी-मीठी बातों में फाँस कर बुलाया, उनके नगर के कई कवियों के साथ। आश्चर्य की बात कि वह बांगड़ू हमारे फांदे में आ भी गया। मुझे पूरा विश्वास हो गया – ‘कविता नशा धतूर’। धतूर क्या कोकीन-चरस सब कुछ। कार्यक्रम का आरंभ होने पर समस्त आमंत्रितों को मंच पर बिठाकर सम्मानित किया गया, उसे छोड़कर। उसे कार्यक्रम के अंत में कविता पढ़ने के बुलाया गया, तब, जब श्रोताओं में हमारे अलावा केवल इंतज़ाम अली अर्थात दरी उठाने वाले और पानी पिलाने वाले ही बचे थे, व कवि ने स्वयं ही कविता पाठ के लिए बुलाए जाने की उम्मीद छोड़ दी थी। अंत में लगा कि वह वरिष्ठ युवा कवि शर्मिन्दा होकर रो ही देगा। इस तरह उसकी बेइज्जती करने के बाद हमारा कलेजा ठण्डा हुआ। उसके गृहनगर मनेंद्रगढ़ में भी बहुत दिनों तक उसकी इस बेइज्जती का वर्णन चटखारे लेकर किया जाता रहा। आज यह सब सोचता हूं तो खुद पर हँसी आती है, परंतु उससे कहीं ज्यादा अपने ही ऊपर तरस भी।

बैकुण्ठपुर का प्रसिद्ध झुमका बांध

बैकुण्ठपुर का प्रसिद्ध झुमका बांध

     इस बीच एक- दो महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में भी जाना हुआ। एक कार्यक्रम था साहित्यिक पत्रिका परस्पर के विमोचन का । कोरिया जिले की पूर्वी सीमा पर स्थित जिले सरगुजा के मुख्यालय अम्बिकापुर में एक अपेक्षाकृत परिपक्व साहित्यिक बिरादरी है, तब के समय में जिसके अगुवा विजय गुप्त, अनिरूद्ध नीरव, प्रभुनारायण वर्मा, आनंद बहादुर तथा श्याम कश्यप ‘बेचैन’ इत्यादि हुआ करते थे। इन्होंने साहित्यिक पत्रिका ’परस्पर’ के विमोचन का कार्यक्रम रखा था, जिसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ कथाकार संजीव थे। काव्यपाठ में बैकुण्ठपुर से सोढ़ी जी जी तथा मेरा नाम था। जाने कैसे उस कार्यक्रम में मेरा नाम भी आ गया था। आज सोचने पर पाता हूँ कि वस्तुतः आमंत्रितों के कद के हिसाब से मैं इस कार्यक्रम के योग्य नहीं था। उधर कार्यक्रम के ठीक पहले आनंद बहादुर ने, जो संभवतः मेरे चयन से असंतुष्ट भी थे, हमारे सामने बड़ी विकट परिस्थिति खड़ी कर दी। उन्होंने कहा कि हम ’परस्पर’के विमोचन कार्यक्रम के साथ ही बैकुण्ठपुर में पश्चिम बंगाल के एक शायर तथा आनंद बहादुर के गुरु रौनक नईम का एक समानांतर कार्यक्रम रखें व उनके बंगाल से आने-जाने का व्यय वहन करें।  इससे रौनक जी का ’परस्पर’ के विमोचन में आना आसान हो जाता। बडा असमंजस था। धन तथा जन दोनों से ही कमज़ोर थे हम। कहीं से धन की व्यवस्था भी हो जाती, तब भी इतने कम समय में बैकुण्ठपुर जैसे स्थान पर कार्यक्रम करवा पाना अत्यंत कठिन था।  हमारे लिए यह ठीक वैसा ही था जैसे कि हुगली के स्टीमर को बैकुण्ठपुर के गेज नाले में तैराना। बेमन से कार्यक्रम में गए व जैसा कि अपेक्षित था, आनंद बहादुर हमसे अप्रसन्न थे तथा हमें देख कर निरंतर मुंह बिचकाते रहे। मैं उनकी सोच समझ सकता था । इसका पश्चाताप आज भी है कि हमने इतने अच्छे गज़लगो से मिलने अवसर खो दिया, आज की परिस्थिति में हम ऐसा कदापि न होने देते। रही बात संजीवजी के सामने कविता पढ़ने की, तो  वह एक अलग ही अनुभव रहा। जो भी हो  इस सब के बीच प्रभुनारायण वर्मा जी और श्याम ’बेचैन’ जी जैसे मन के सच्चे, सरल तथा स्पष्टवादी साहित्यकारों से परिचय बढ़ा हुआ तथा साहित्यिक मार्गदर्शन भी मिला।

भोलाप्रसाद मिश्र

भोलाप्रसाद मिश्र

       कई याद रह जाने वाली घटनाओं में से एक घटना और भी है। एक बार कस्बे में रायपुर से दैनिक-देशबन्धु के सम्पादक ललित सुरजन जी पधारे। कह लीजिए कि अपने छत्तीसगढ़-भ्रमण कार्यक्रम के अंतर्गत आए, कुछ समय विश्राम किया व आगे निकल गए।  जिनको जानकारी थी, उन्होंने छिपा कर रखा। सुरजन जी के जाने के बाद यह रहस्योद्घाटन किया गया कि वे आए थे तथा कुछ विशिष्ट लोगों से ही मिले। ’बउरे गाँव ऊँट आवा, कोउ देखा, कोउ देखबौ न भ’ (पागलों के गाँव में ऊँट आया, किसी ने देखा, किसी ने देखा भी नहीं)। बड़ी कोफ्त हुई। अब तो लोग चर्चाओं में सुरजनजी की ही बात करते, उस पर तुर्रा यह  कि वे उन लोगों से मिल कर गए, हमसे नहीं। हम लोगों को भला कौन जानता है। एकाएक वे कुछ लोगों के ‘सुरजन दादा’ हो गए। इस मिथ्या-प्रचार से निबटने का मुझे एक ही तरीका दिखा। एक दिन मैंने सुरजनजी की साहित्यिक पत्रिका ’अक्षरपर्व’ व दैनिक समाचार-पत्र ’देशबन्धु’ के रविवारीय संस्करणों में छपी गज़लों व कविताओं का पुलंदा बनाकर सबके सामने पटक दिया। तब जाकर लोग शांत हुए। प्रसंगवश, ‘अक्षरपर्व’ में छपी रचनाओं  ‘नक्सलाईट बेल्ट में’तथा ’न्याय’ के लिए मुझे कई महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएँ मिली थीं, जिसमें सबसे उल्लेखनीय था श्री रघु ठाकुर का कार्ड पर लिखा पत्र जो मैंने आज भी बचाकर सुरक्षित रखा है।

         लब्बोलुआब यह कि इस कालखण्ड में हम कविता को जी रहे थे। दीवानगी इस कदर तारी थी कि ऊलज़लूल हरकतें करने से भी बाज़ नहीं आते । जब दूसरे गुट के छल-कपट के कारण अथवा कविता कर्म से उबकर कभी-कभी हमारे खेमे के कविगण हमसे किनारा कर लेते, ऐसी आपात-स्थिति से निबटने के लिए हम खुद ही कुछ ‘रेडीमेड’ कविताएँ लिखकर रखते तथा स्कूली लड़कों को ये तैयार कविताएँ पकड़ाकर गोष्ठियों में बिठा देते। लड़के इसके एवज में अखबार में छपा नाम पढ़कर ही झूम जाते। अखबारों में विज्ञप्ति को लुभावना बनाने के लिए उनके उपनाम भी बड़े आकर्षक रखे जाते जैसे ‘सजल’, ‘वीरान’ इत्यादि। एक अवसर पर रामानुज हाईस्कूल के हिंदी अध्यापक आदित्य नारायण मिश्र जी (मुन्नू चाचा) हमारी काव्य-गोष्ठी में आमंत्रित किए गए। अब हमारे डुप्लीकेट कवि अनुराग ’सजल’ जो कि उनके छात्र भी हुआ करते थे, ऐन वक्त पर सर जी को सामने देख कर गोष्ठी से भाग खड़े हुए। बड़ी फज़ीहत हुई। किसी तरह समझा-बुझा कर उन्हें पकड़कर लाया गया। बाद में मुन्नू चाचा ने मुझसे पूछा कि, ‘बेटा सब तो ठीक है, पर ये लड़के तो कक्षा में ठीक से हिंदी भी नहीं पढ़ पाते, ये कविता कब से करने लगे’। ताहिर भाई ने किसी तरह से गोल-मोल कर बात बनाई, पर मुन्नू चाचा हलके-हलके मुस्कुराते ही रहे। यह बात खर तथा दूषण अर्थात् मुझे व ताहिर भाई के अतिरिक्त अन्य किसी को कभी पता नहीं चली; न सोढ़ी जी को, न चाचा नोमानी को और न ही दीपक राज़दान जी को । हाँ, हमारे अभिन्न मित्र ‘दरोगा जी’ हमारा यह रहस्य अवश्य जानते थे, क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर वे स्वयं भी गोष्ठियों में गणपूर्ति के लिए बैठ जाते थे।

गीतकार दीपक राजदान

गीतकार दीपक राजदान

     जो कुछ भी हो, इन सारी बातों के बीच कविता ज़रूर हो रही थी, अन्यथा यहाँ तक का लिखा सारा व्यर्थ हो जाएगा। इस मंच के कवि कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे जिसमें प्रादेशिक समाचार-पत्र व पत्रिकाओं के अतिरिक्त कृतिओर, काव्यम्, उद्भावना, आकंठ, सर्वनाम, अक्षरपर्व, लफ्ज इत्यादि प्रमुख थीं। जयपुर से प्रकाशित कृति ‘ओर’ के एक अंक में वरिष्ठ कवि विजेन्द्रजी ने मेरी आठ कविताएँ एक साथ छापी थीं। शायद वह मेरे अब तक के साहित्यिक जीवन का सबसे सुखद क्षण रहा है। इसके बाद यदा-कदा समीक्षकों ने भी लेखन पर दृष्टिपात करना प्रारंभ कर दिया था। कोलकाता से डॅा. प्रभात पांडेय के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली कविता पत्रिका ’काव्यम्’ में छपी मेरी दो कविताओं ’बेटियाँ’ व ’कस्बे की दुनिया’ के लिए प्रतिष्ठित साहित्यकारों की ढेरों सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ आईं। ऐसा लगने लगा कि अब लेखन को दिशा मिलने लगी है।

           संयोग से इसी समय मेरी नौकरी लग गई । माँ की हार्दिक इच्छा थी कि इतना पढ़ने के बाद मैं व्यापार न करूँ। वस्तुतः, पिता की अकाल-मृत्यु के पश्चात् विषम आर्थिक परिस्थितियों के बीच मुझे पढ़ाने के कारण यह सदा ही उनकी महत्वाकाँक्षा रही आई कि मैं कोई अच्छी नौकरी करके पिता की इच्छा पूर्ण करूं। मेरी पढ़ाई को देख कर कमोबेश यही राय काव्यम् के संपादक डा. प्रभात पांडेयजी की भी थी। हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस पी.एन.एस. चैाहान जी तो लगभग निरंतर ही मुझे प्रेरित करते रहे कि मैं इस नगर से बाहर चला जाऊँ। उनका यह कथन – ‘’व्हाट इज़ योर एज जेंटिलमैन, यू कैन स्टिल हैव मेनी फ्रेश स्टार्ट्स’’, आज मेरे जीवन का गुरुमंत्र बन चुका है। अंततोगत्वा इन बुजुर्गो के प्रभाव में आकर मैंने नौकरी करने का मन बना लिया। एक दिन इसी जुगत में कश्मीर के जिला रामबन-डोडा पहुँच गया, बगलिहार जलविद्युत परियोजना में भूगर्भशास्त्री बनकर। जाते-जाते काव्यम् को बेच गया था, इस लिए कि साथ ले जाना सम्भव नहीं था और फिर घर पर उस महंगे सौदे को चलाता भी कौन । नई नौकरी, नौकरी कम, गुलामी अधिक थी। सुबह साढ़े सात बजे कार्यस्थल पर खड़े होना व शाम को आठ बजे पाली बदलना, बारह घण्टे की चाकरी । घर आने-जाने का समय अलग। परिन्दे के पर कटने शुरू हो गए थे। पाठक ही बताए कि कविता होती तो होती कहां पर। हाँ, वह मन में जरूर होती थी, बुलबुले की तरह उठती तथा मन में ही घुल जाती। अब यहाँ कोई भी मुझे साहित्यिक उपनाम ‘गौतम’ से नहीं पुकारता था। कविताओं के स्थान पर मेरा भविष्य अपने हाथों में लेने वाली अंकसूचियों ने मुझे एक बार फिर से ’मिश्राजी’ बना दिया था।

कवि निसार नाज़

कवि निसार नाज़

   लगभग लगभग एक वर्ष पश्चात् जब जब अवकाश पर घर आया तो पता चला कि इस पूरे अरसे में नगर में एक भी गोष्ठी नहीं हुई थी। ताहिर भाई अकेले पड़ गए थे। सोढ़ी जी भी संगठन के कार्यों में ज्यादा व्यस्त हो गए। इस बीच उनकी कुछ कविताएँ ‘कृति ओर’ में प्रकाशित हुईं। चचा नोमानी बीमार रहने लगे थे। जब कभी मुलाकात होती तो बस यह ही कहते कि ‘बाबू लौटोगे नहीं, पइसवे सब कुछ नहीं होता। तोरा जाना का हुआ कि इ सबे लोग ठण्ढा गया हो’। दीपक राजदान जी के छत्तीसगढ़ी गीतों का एक कैसेट आया था, गायक रवि सुर्वे की आवाज में। फैज़ी बेटे की पढ़ाई के पीछे परेशान थे। शुजात रोजी कमाने के फेरे में लग चुका था। अन्य मित्र भी किसी न किसी बहाने कविता से किनारा काट चुके थे। दूसरा दल भी संभवतः अपनी पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों के आगे घुटने टेक चुका था। एक-दो बार सबसे मिलकर प्रेम बहाल करने की कोशिश भी की, पर महसूस हुआ कि चोट गहरे पैठी है, समय लगेगा।

            नौकरी पर वापस लौटने के बाद बहुत दिनों तक अम्मा मुझे साहित्यिक पत्रिकाओं की प्रतियाँ और मित्रों के पत्र आने की सूचना देती रहीं। आदरणीय हरिशंकर अग्रवाल जी ने पोस्टकार्ड के माध्यम से ‘आकंठ’ के छत्तीसगढ़ के चुनिंदा कवियों पर आधारित अंक के लिए रचनाएँ मंगाईं थी, उस अंक में शामिल न हो पाने की पीड़ा आज तक है। सन् 2006 में स्वर्गीय कमला प्रसाद जी की ‘प्रगतिशील वसुधा’ में प्रकाशित कविता ‘पोखरी खदान में कोयला बीनते मारे गए बच्चे के लिए’, किसी पत्रिका में मेरी कविता का अंतिम प्रकाशन था। एक समय ऐसा आया कि इधर-उधर छपी रचनाओं की लेखकीय प्रतियाँ भी आनी बन्द हो गईं। एक दिन पोस्टकार्डों का आना बंद हुआ, आखिरकार मित्रगण कब तक एक-तरफा पत्र-व्यवहार करते। कुछ खाली बचे रह गए पोस्टकार्ड जरूर साल-दर-साल आले पर मौज़ूद रहे आए, एक दिन अपने उपयोग किए जाने की प्रतीक्षा में। उसके बाद एक दिन अम्मा ने सारी पत्रिकाएँ, चिट्ठियां वगैरह उठाकर ट्रंक में बंद कर दिए। उसी ट्रंक में, जिसके तले में जुगाड़ू सम्मान-पत्र बंद पड़ा था। उस दिन गौतम पूरी तरह कैद हो गया। पर मिश्रा भी कहाँ आज़ाद था।

           निकष यह कि इस लम्बे सफर का साक्षी ककउआ होटल फिर से साहित्यिक बैठकों से महरूम हो गया। समय बीतता गया। चचा नोमानी गुज़र चुके हैं। पता चला कि उनके जनाजे में शामिल होने के लिए जितने लोग एकत्र हुए, उतनी भीड़ नगर के मुस्लिम समुदाय के किसी व्यक्ति के जनाजे में पहले कभी नहीं जुटी थी। बकौल ताहिर भाई, उन्होंने वहाँ भी नगर के एक बड़े धन-देवता को इन शब्दों में जतला ही दिया कि ‘जनाब भले ही आप कितने बड़े क्यों न हों, आप के जनाजे में इतने लोग इकट्ठे नहीं होंगे, आप लिख लें’। ताहिर भाई ने प्रयास किया कि चचा के जाने के बाद कम से कम एक श्रद्धांजलि सभा हो जाती, पर किसी को भी तैयार नहीं कर पाए। उन तथाकथित साहित्यवीरों ने भी ऐसा कुछ करने की ज़हमत मोल नहीं ली, जो नोमानीजी को मतलब साधने के लिए अपनी साहित्यिक गोष्ठियों में बुलाने को बेताब रहा करते थे। नोमानी जी के साथ जुड़ी बहुत सी यादें है जो फिर कभी लिखूँगा। बस इतना ही कि अब उनके बड़े साहबजादे मस्जिद के हाफिज़ हैं तथा दुकान अब उनके ही जिम्मे है। ऐसा लगता है कि अभी दुकान में बिछी खटिया से उठकर एक बुजुर्ग चश्मे के मोटे मोटे कांचों के पीछे से झांकेगा और कहेगा ‘का खिलाएं बाबू तुमको, लो चाकलेटे खा लो’। ईमानदारी से कहूं तो चचा के गुजरने के बाद मैंने फिर कभी उस दुकान की सीढि़यों पर कदम नहीं रखा। वह दुकान मुझे अब जीवन विहीन लगती है। इस बीच ताहिर भाई ने कुछ गज़लें लिखी जो पत्रिकाओं में छपीं भी, कुछ कार्यक्रमों में बतौर शायर व मंच-संचालक भागीदारी भी की, पर अब वे ज़्यादा समय परिवार की जि़म्मेदारी में लगा रहे हैं। हाँ, कभी-कभी दूरभाष पर कोई न कोई नई सूचना ज़रूर देते हैं। बीते दिनों उन्होंने फोन कर के सगर्व बताया कि रामायण आजमगढ़ के पास किसी नदी के तीर पर बैठकर लिखी गई थी। घर जाने पर उनके साथ बैठक ज़रूर होती है व कभी रामलीला जैसा कोई विशिष्ट कार्यक्रम हो तो हम उसे जरूर साथ देखने जाते हैं। रामलीला में ताहिर भाई को लक्ष्मण-परशुराम संवाद अत्यंत प्रिय है और उसके पहले चतुराई के साथ पेश कर भुना लिए जाने वाले सखी के नृत्य से उतनी ही नाराज़गी। काफी दिनों से साथ बैठकर रामलीला देखने का अवसर भी नहीं आया। सोढ़ी जी चूंकि चरचा कालरी में रहते हैं अतः उनसे मुलाकात का संयोग नहीं हो पाता। बस कविवर भोला प्रसाद मिश्र जी अपनी गति से निरंतर कविताएं लिख रहे हैं।
समय कौन सा है बताने की आवश्यकता नहीं, फिर भी बताता चलूं। बैकुण्ठपुर नगर पंचायत अब नगर पालिका है। नई पीढ़ी के लिए अब यह तथ्य अब इतिहास का विषय हो गया कि कभी हम अविभाजित मध्य-प्रदेश के सरगुजा जिले के निवासी थे। यह समय बैकुण्ठपुर, जिला-कोरिया, छत्तीसगढ़ का समय है। वह जमीन जो हमें सदा उंघती हुई सी लगती थी, उसे जमीन के व्यापारियों ने अब पूरी तरह से जगा दिया है।  नगर के आस-पास की अधिकांश मूल्यवान भूसंपदा भू-भक्षकों ने उदरस्थ कर ली है। यहां मकान बनाने हेतु धरती का छोटा सा टुकड़ा खरीदने पर भी व्यावसायिक भूखण्ड के नाम पर लाखों रुपयों की स्टांप ड्यूटी लगती है, परंतु कृषि भूमि के नाम पर एकड़ों जमीन खरीदने पर शुल्क केवल हजारों में लगता है। यह वह समय है जब कि इस बात की सुध लेने वाला कोई नहीं कि कृषि भूमि के नाम पर स्टांप ड्यूटी में मिलने वाली लाखों की छूट किसान को मिल रही है अथवा भू-माफियाओं को । बैकुण्ठपुर का किसान तो बस जमीन बेच रहा है। वह समय जब किसी को यह तय करने की फुरसत नहीं कि काले धन का वृक्ष उगाने वाले धनदेवता किसानों को लालच देकर खरीदी इन जमीनों पर उगाएंगे क्या। निश्चित रूप से धान तो नहीं, क्यों कि वह तो हमारे किसान ही बेहतर उगा सकते हैं। अब यह वह समय नहीं रहा जब यहां से महज तीन डब्बों की बीबीएम और चार डब्बों की विश्रामपुर-अनूपपुर यात्री  रेलगाडि़यां गुजरा करता थीं, बैकुण्ठपुर रोड स्टेशन से अब दनदनाती हुई एक्सप्रेस रेलगाडि़यां भी गुजरती हैं। यात्री-बस जैसे जन-यातायात का प्रयोग अब केवल निजी वाहनों से वंचित लोग ही करते हैं। यह आज का समय है भाई।

         इन सबके बीच ककउआ होटल अब भी आबाद है, परंतु बीसवीं से इक्कीसवीं सदी में कदम रख कर भी अपने मूल स्वरूप को नहीं बदल पाया है। दुकान की दीवारें जरा उंची कर दी गई हैं तथा उन पर मिट्टी की छपाई के स्थान पर सीमेंट का पलस्तर हो गया है, किंतु पान का वह जड़ ‘ठेला’ अब भी दुकान का अभिन्न भाग है। उसका तब का मेन्यू भी आज तक नहीं बदला- चाय, भजिया और पेड़ा। लाज़वाब स्वाद। ईमानदारी से बरकरार रखा गया स्वाद। शायद यही ईमानदारी रोड़ा बन गयी इसके कायाकल्प में। नए के नाम पर कोका-कोला कम्पनी का एक बड़ा सा बोर्ड जरूर लग गया है दुकान के ऊपर। तीन भाइयों के बीच साझा विरासत है यह होटल । बड़ा कमल , मझला रमेश और छोटा पप्पू। रमेश सबसे होशियार तथा संयुक्त परिवार का मुखिया है । बड़ा भाई कमल मानसिक रूप से विकलांग है। बीच में उसे मानसिक विकलांगता का प्रमाणपत्र दिलाने की कोशिश की गई, परंतु असफलता हाथ लगी। दरअसल उसने डॅाक्टर के दिखाए बीस रूपए के नोट को सही-सही पहचान लिया था। उसे इस बात का दुख है कि विकलांगता प्रमाणपत्र मिलने पर उसका रेल और बस में किराया आधा हो जाता। यह दीगर बात कि रेल-बस में बैठकर कमल जाता तो जाता कहां। अंतिम बार देखा तो उसके एक पैर में हाथी पांव जैसा कोई रोग लग चुका था। पर कमल के लिए बस वह इन्फेक्शन था। वह आज भी अविवाहित, बिना वेतन का मज़दूर है, अपनी ही दुकान में खोराकी मज़दूर। एक बार मिलने पर उसने सगर्व बताया कि विधानसभा चुनाव में उसने कम्युनिष्ट पार्टी के मंच से दिया गया सोढ़ी जी का भाषण विशेष रूप से जाकर सुना था। वह आज भी हमारी बड़ी इज्ज़त करता है, क्योंकि उसे भी तो ध्यान से सुनने वाले तीन ही लोग थे –‘ सरदारजी, मियाँ और महराज’। यह और बात कि उसने मुझे एक-दो बार ताहिर भाई के साथ घूमने पर अकेले में फुसफसाते हुए चेताया था – ”महराज, ताहिर के साथ काहे घूमते हो, ओ मियां है।” परंतु मेरी रहस्यमयी मुस्कान देख कर फिर कभी उसने मुझे यह मुफ्त सलाह नहीं दी। आज भी, जब कभी वह मुझसे मिलता है, नेसार नाज की सिफारिश लगवा कर कुछ रूपए जरूर ऐंठ लेता है।

          एक बात और बताता चलूँ- कमल का ही चिढ़ का नाम ककउआ है, किंतु उससे कहिएगा मत कि यह बात मैंने आपको बताई है, वर्ना मेरी खैर नहीं।

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