बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक रूप में सामने आना एक अवसर देता है अपने साहित्यिक, मानवीय अतीत को वर्तमान समय के साथ मूल्यांकन करने का | इस दिशा में ‘पद्मनाभ गौतम’ के लिखे संस्मरण बेहद रोचक और आत्मीय होते हैं | छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि में बैकुंठपुर को केंद्र में रखकर लिखा गया  “मैं, उस नगर की कविता”  संस्मरण का दूसरा भाग …..| सम्पादक 

मैं, उस नगर की कविता

मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक)

पद्मनाभ गौतम

 

दूसरा भाग –

ताहिर भाई ने मेरी मुलाकात करवाई चचा रशीद नोमानी से। उम्र तकरीबन साठ के आस-पास, दोहरा बदन और चेहरे पर बेतरतीब बिखरी हुई दाढ़ी। हमेशा सफेद-कुर्ता पाजामा पहने रहने वाले नोमानी जी बहुत ही नेक-दिल और खुशमिज़ाज इंसान थे। एक ऐसा शख़्स जो सारी उम्र अपनी परिस्थितियों से लड़ता रहा किंतु यह बात कभी किसी पर जाहिर नहीं होने दी। बिहार के किसी गाँव से आकरनोमानी जी कोरिया जिले में बस गए थे। पहले वे बैकुण्ठपुर के पास स्थित चरचा कॅालरी की एक मस्जिद के हाफिज़ थे, फिर बैकुण्ठपुर में लकड़ी की टाल चलाने वाले दिलदार व्यापारी नूरुल हुदा जी चचा नोमानी को बैकुण्ठपुर ले आए, अपने घर के पास बनी एक मस्जि़द में। उसी मस्जि़द के बाहर बनी दो दुकानों में एक चचा को दी गई थी। उसमें उनकी छोटी सी किराने की दुकान खुली, जो दिन में उनकी दुकान होती तथा रात में आशियाना। मैं व ताहिर भाई हर शाम बिलानागा पहुँच कर उनकी इकलौती खटिया पर डट जाते, टीन के डब्बे से लेकर चन्नवा चबाते हुए। चचा ने बैकुण्ठपुर में ही एक छोटा सा घर भी बना लिया था, जहाँ उनका परिवार रहा करता था। नगर के एक सिरे पर स्थित पेट्रोल-पंप के बगल में उनका घर था और दूसरे सिरे पर स्थित पेट्रोल-पंप के बगल में उनकी मस्जि़द, जिसके कि वे हाफिज़ थे। इन्हीं दो ठिकानों के बीच सीमित थी चचा नोमानी की दुनिया। कभी बीमार होते या कोई ज़रूरी काम होता तभी घर जाते अन्यथा मस्जिद वाली दुकान में ही रहते। नगर से बाहर तो बहुत कम ही जाते थे। नोमानीजी मालोजर से बहुत बड़े आदमी नहीं थे, लेकिन दिल के उतने ही बड़े थे। मस्जि़द में पाँच वक्त की नमाज़ पढ़ाते, थोड़ा समय निकाल कर बच्चों को उर्दू वगैरह सिखाते और उससे बचे समय में ग़ज़लें और हज़लें गढ़ते। चचा की सोच शानदार थी और सब कुछ मुँहज़बानी याद;कोई डायरी नहीं, कोई दीवान नहीं। अखबारों की कतरनों के अलावा शायद ही कहीं उनका लिखा कुछ मिल पाए। उनकी एक हज़ल के शेर कुछ ऐसे थे –

ताहिर आज़मी

ताहिर आज़मी

रसीद नोमानी

रसीद नोमानी

         मुझे तो अफ़्सरों की ये मुटाई ज़ह्र लगती है
ये उनकी शानो-शौकत औ बुराई ज़ह्र लगती है
जिसे दुनिया कहे अच्छा वही इन्सान है अच्छा
किसी के मुँह से खुद उसकी बड़ाई ज़ह्र लगती है।

इन पक्तियों से समझ आता है कि उनकी ग़ज़लें अथवा हज़लें सीधी-सादी जुबान में लिखी होतीं व उनमें अधिक लफ्फाज़ी नहीं होती थी। हाँ, यदि उन्होंने कोई बात ख़ालिस उर्दू में कह दी, तब फिर उसे ताहिर भाई के अलावा और कोई नहीं बूझ पाता था। नोमानीजी बहुत ज्यादा महात्वाकाँक्षी भी नहीं थे। वे बच्चों को हज़ल भी उतने ही मज़े से सुनाते, जिस तरह से शायरी की महफिल में ग़ज़लें। उनकी एक और खास बात थी, वे अपनी दुकान पर आने वाले हर मेहमान का स्वागत कुछ न कुछ खिलाकर ही करते थे, कभी बरनी से एक तिल का लडडू, तो कभी एक हाजमोला कैंडी। कभी-कभी हम पास की दुकान तक पैदल जा कर चाय भी पी आते।
इस तरह इन दो महानुभावों के करीब आकर मुझे भी ग़ज़लें लिखने का शौक लग गया। उत्साह इतना कि दुष्यंत जिस मुकाम पर उसे छोड़ कर गये थे, उससे आगे ले जाने की वसीयत जैसे मेरे ही नाम लिख गए हों। ये दीगर बात कि एक अरसे के बाद कहीं जाकर मुझे यह समझ आया कि ग़ज़ल में बह्र (मीटर) जैसी भी कोई चीज है। जाने कितने दिनों तक उबड़-खाबड़ रदीफ़-काफि़ये मिला कर खुद ही अपनी पीठ ठोंकता फिरता रहा। लेकिन इसी बीच कुछ लोग अब हाशिए की लाल रंग की लकीर के पीछे से झाँकने लगे थे। जैसे थाह लेने की कोशिश करते हों कि आखिर बछड़े में छलाँग है तो कितनी। ये नगर के निद्रालीन साहित्यकार थे जो अपनी कविताओं को सिरहाने दबाकर आराम की नींद सो रहे थे। इनमे से ज़्यादातर वह लोग थे, जो साहित्यिक-बिरादरी में इसलिए शामिल हो गए थे क्योंकि एक दिन उन पर भी एक खूबसूरत कविता नाजिल हुई थी, ठीक वैसे ही जैसे स्कूल में सामान्य-हिन्दी पढ़े हर व्यक्ति के ऊपर जीवन में कम से कम एक बार अवश्य होती है। उसी कविता या ग़ज़ल को लेकर वे साहित्य के मैदान में कूद पड़े थे। ये और बात कि उसके बाद शायद ही उन पर कुछ दूसरा उतरा हो कविता के नाम पर। अतः उसी एक नाजिल कविता को कलेजे से छपकाए तुकबन्दियाँ भिड़ाते रहते। कोई बाहर का आदमी आ गया तो अपनी ट्रेडमार्का कविता सुना देते। धीरे-धीरे यह सारे लोग साहित्यिक शीतनिद्रा में जा पहुँचे। जब कभी नींद खुलती तो एक-दो गोष्ठियाँ करके फिर सो रहते। पर अब हमारी हलचलों से इनकी नींद में खलल पडने़ लगा था। मुद्दे पर आएँ तो अब नगर में फिर से साहित्य का मौसम अंगड़ाई ले रहा था। इसी बीच मैंने जोश में लगभग थोक के भाव अपनी शुरूआती अधकचरा रचनाएँ, मसलन कविताएँ, ग़ज़लें और कहानियाँ वगैरह बैकुण्ठपुर के स्व. रूद्र प्रसाद रूप के स्क्रीन-प्रिंटिग पर नीले रंग की स्याही से छपने वाले पाक्षिक सम्यक-सम्पर्क, अम्बिकापुर से प्रकाशित दैनिक-अम्बिकावाणी तथा बिलासपुर से प्रकाशित दैनिक-हरिभूमि में छपवा डालीं। दैनिक-हरिभूमि में छपी कहानियों के लिए पारिश्रमिक के दो चेक भी मिले, जिन्हें मैंने इसलिए नहीं भुनाया क्योंकि बैंक ने उन्हें संग्रहण के लिए बिलासपुर भेजने का तमाम खर्च काटने के बाद प्रति चेक कोई नकारात्मक रकम हासिल होना बताया था। अतः मैंने वह दोनों चेक प्रमाणपत्र के रूप में ही सुरक्षित रख लिए। अलीगढ़ की एक पत्रिका ’जर्जर क़श्ती’ ने भी सौ रूपए की वार्षिक सदस्यता के एवज में मेरी गज़लों को नियमित रूप से छापना प्रारंभ कर दिया था। यह सब देख कर एक दिन स्थानीय साहित्य के नूरा-पहलवान फिर से अखाड़े में कूदने लगे। जिस स्थान को वे सुरक्षित रखकर सोए थे, उसे पक्की किलेबंदी कर के और अधिक सुरक्षित करने के लिए।
तो इस नगर में एक बार फिर से गोष्ठियों के दौर का आरंभ हो चुका था। । इस समय बैकुण्ठपुर में ग़ज़लगोई का चलन जोर पकड़ रहा था। हर दूसरा लिखने वाला एक ग़ज़लगो। जगदीश पाठक का समय हँसी-ठिठोली का था और अब चचा नोमानी का दौर, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति बस गज़ल पर ही ज़ोर आजमाना चाहता था। अम्बिकापुर के कवि-लेखक और पत्रिका ’परस्पर’ के सम्पादक प्रभुनारायण वर्मा सदैव मुझसे मज़ाक करते कि ‘यार बैकुण्ठपुर में इतने अधिक शायर क्यों होते हैं? वस्तुतः इसका भी एक कारण था। उन दिनों कवि गोष्ठियों में ‘तरह’ देने का चलन था, अर्थात् सब को चाचा नोमानी के द्वारा एक मिसरा दिया जाता जिस पर बकाया शायर अगली गोष्ठी में ग़ज़ल लिखकर लाते। इसका एक फायदा था कि सभी को एक बना-बनाया फर्मा मिल जाता जिसमें केवल कुछ तुकबंदियाँ भर टाँकनी पड़तीं। बाद में इन्हीं पंक्तियों को दैनिक-नवभारत व दैनिक-भास्कर में विज्ञप्ति के रूप में सबके नाम के साथ छपवा दिया जाता। कवि बारंबार समाचार-पत्र पढ़ते तथा मुग्ध होते जाते। बस इतनी ही छपास थी ज़्यादातर कवियों में। परंतु इस ‘तरह’ के चक्कर में ऐसे ‘बेतरह’ शेर लिखे जाते कि कहिए मत। मुझे एक ग़ज़ल का शेर आज भी याद है जिसे पढ़कर समझा जा सकता है कि उन गोष्ठियों में में क्या नहीं हुआ करता था –

शिवमंदिर, प्रेमबाग़

शिवमंदिर, प्रेमबाग़

                              पत्थर को तोड़ के शीशा बना दिया
लोगों ने उसको तोड़ के भाला बना दिया

शायर की सोच! शायरी में मानव-विज्ञान तक की पैठ। कवि पत्थर तोड़ कर भाला बनाने वाले आदिम युग को भी ग़ालिब की मुलायम ग़ज़ल के लिबास में पेश कर देते थे। इस शेर को चचा नोमानी, मैं और ताहिर मियां बरसों तक याद करते रहे। याद क्या करते थे, हँसते-हँसते दोहरे हो जाते थे।
इसी दौर में समाचार-पत्रों के चिट्ठी-पत्री स्तंभों में एक नए शायर पैदा हुए- ‘कज़ा बैकुण्ठपुरी’। कौन थे और कहाँ के थे, यह सदैव अज्ञात ही रहा आया। शायद कोई मछिंदर लड़का था जो थोड़ी-बहुत उर्दू भी जानता था। बिलासपुर के दैनिक-नवभारत में प्रकाशित होने वाले लोकवाणी स्तंभ में ‘महकता आँचल’ व ‘मशरिकी खातून’ पत्रिकाओं के स्तर की तुकबंदियाँ छपवाकर उसने काफी नाम कर लिया था। सोचा होगा कि जब नगर के साहित्याकाश को पूरी तरह कब्जिया लूँगा, तब सबके सामने असल पहचान लेकर प्रकट होऊँगा। चचा नोमानी हँसते हुए कहते- ‘कम्बख्त को नाम भी और कुछ नहीं सूझा- मौत (कज़ा)’। और तो और, एक रोज बिलासपुर के एक मित्र ने फोन पर बड़े सम्मान से ‘कज़ा’ साहब का नाम लेते हुए कहा- ‘आपके यहाँ तो ‘कज़ा’ बैकुण्ठपुरी जैसे शायर रहते हैं, उनसे क्यों नहीं मिलते इस्लाह के लिए’। वाह रे ब्रांडिंग की महिमा। पर अब ‘कज़ा’ मिलें तब तो कोई उनसे सलाह ले। हम काफी दिनों तक शक करते रहे कि ताहिर भाई के घर के पास सिंचाई- कॅालोनी में रहने वाला नौजवान शतरंज खिलाड़ी अब्दुल शमीम ही ‘कज़ा’ बैकुण्ठपुरी है। हालाँकि जब कभी हम उससे यह बात पूछते तब वह केवल एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेर कर चुप्पी साध लेता। ‘कज़ा’ को पकड़ने का हमारा एक ही लक्ष्य था, हमारी गोष्ठियों के लिए कम से कम एक सर और तैयार हो जाता, साहित्य तो बाद में जो होता सो होता। खैर, ‘कज़ा’ कभी नहीं मिले। मौत भी क्या भला रोज मिलने की शै है?
इधर इस अंतराल में नगर का इकलौता साहित्य मंच अब नवागंतुकों तथा पुराने सूरमाओं के बीच रस्सा-कशी का मैदान अधिक बनता जा रहा था। अधिकतर पुराने साहित्यकार न तो कुछ लिखना चाहते थे और न ही नवागंतुकों के लिए रास्ता ही छोड़ना। कुछ एक गोष्ठियाँ तो साथ हुईं, परंतु उसके बाद न जाने क्यों छिप-छिप कर गोष्ठियों के दौर शुरू हो गए। इधर ताहिर भाई के काव्य-शुद्धता के तकाज़ों व तीखे व्यंगबाणों ने भी लोगों को इस कदर घायल किया कि लोग इसी को ढाल बनाकर किनारा काटने लगे। एक कवि कुछ कम पढ़े-लिखे थे, इस कारण कहीं न कहीं से कोई न कोई शिकायत खोज कर बहानेबाज़ी करते कि फलाने नहीं आयेगा तब ही वह गोष्ठी में आयेंगे। फलाने को नहीं बुलाया जाता तो ढमाके के बहिष्कार की जिद कर बैठते। पता नहीं इनकी लोग इतनी मालिश क्यों किया करते थे, यह रहस्य आज तक समझ नहीं आया । इधर ताहिर भाई भी अपनी तरह के एक ही थे, एक दिन इनके सामने मिसरा ही बोल दिया कि ‘इल्म अव्वल है शाइरी के लिये’। बस उन्होंने तो कसम खा ली कि जहाँ ताहिर जाएगा वहाँ वे नहीं जाएँगे। अब तो ताहिर का निकाला तय ही था। इसी तरह एक कामपीडि़त कवि जो फि़राक गोरखपुरी के मुरीद थे, न जाने क्यों बस एकांत ही खोजा करते थे। मौका लगता तो बताने लग पड़ते कि फि़राक जी समलैंगिकता के पक्षधर थे। उन्हों ने कुछ मुझ से भी सटने की कोशिश की तो मैंने उन्हें दुत्कार दिया। फिर क्या, वे तो मेरे दुश्मन ही हो गए । एक षडयंत्री भाई धरे गए एक वरिष्ठ कवि की रचना बाँचते। किसी ऐसे-वैसे कवि की भी नहीं, उन्होंने एक राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात कवि की रचना बाँच दी। संयोगवश उसी समय ’आजकल’ के एक अंक में छपी कविवर रामदरश मिश्र जी की वह रचना हमारे हाथ लग गई। दिखलाने पर उन्होंने नितांत मधुर शब्दों में कहा कि वह उनके कमज़ोर क्षणों की गलती थी। ऐसे-ऐेसे तो काम। मगर आश्चर्य! यह बात बोलने पर सारा कुनबा हमारे ही उपर चढ़ बैठा! सभी समवेत स्वर में हमारे विपक्ष में आ गए, तथा उन षडयंत्री भाई को बचाने में जुट गए। अंत में बुजुर्गो के फैसले की बारी थी। फ़तवा तो जाना ही था उद्दंडई के खिलाफ जो कि हम निस्संदेह करते भी थे, और वह गया भी। मुझे याद है कि दशहरे के रोज रखी गई काव्यगोष्ठी में मुझे और ताहिर मियां को नहीं बुलाया गया। पीछे यह भी सुना गया कि एक बुजुर्ग ने कहा था – ‘आज दशहरे के रोज एक नहीं दो रावणों का दहन हो गया।’ जिस बुजुर्ग ने कहा था उनका नाम सुनकर दुःख अवश्य हुआ, परंतु मानव प्रकृति ही कुछ ऐसी है; तोप-तलवार के भी आगे न झुकने वाले शख्स कभी-कभी एक अतिरिक्त चम्मच शक्कर वाली चाय पी कर ही बहक जाते हैं। तो हमने उनकी निन्यानबे अच्छाइयों के पीछे की इस एक बुराई को ‘बेनिफिट आॅफ डाउट’ दे कर संतोष कर लिया। उस रोज हमें पहले कहीं पढ़ी हई बारह संतों की कहानी याद आई – ‘जब ग्यारह संत पाखाने जाने के गड़वे से पानी पिएँ, तो बारहवें को पवित्रता की दुहाई नहीं देनी चाहिये’। और फिर संख्या बल के आगे तो अटल बिहारी जैसे बली भी नतमस्तक हो गए, तब हम किस खेत के मूलियां थे। तो यह हमारा पहला गंभीर सबक था। हम अघोषित रूप से बहिष्कृत कर दिए गए तथा कई कविता-गोष्ठियों में हमें जानबूझ कर आमंत्रित ही नहीं किया गया। हद तो यह कि सामने पड़ने पर सभी ऐसा बर्ताव करते कि जैसे कुछ हुआ ही न हो।

जितेन्द्र सिंह सोढ़ी

जितेन्द्र सिंह सोढ़ी

        इस सबसे आजिज़ आकर हम दोनो ने अलग साहित्यिक समिति बनाने का विचार किया। इज्जत बचाने के लिए जुमला उछाला कि जब एक बस भर जाए तो दूसरी पकड़ लेना चाहिए। सच तो यह था कि पहली बस आधे से ज्यादा खाली थी परंतु हमारे लिए उस में प्रवेश ही वर्जित था। चचा नोमानी चूंकि सबके साथ थे, इस लिए वे हमारे भी साथ थे। साथ में दीपक राजदान, अली अहमद ‘फैज़ी’, हन्फी जी, शजात अली, गीता प्रसाद नेमा, वाजि़द पलामुवी वगैरह जुड़े। दीपक भइया भी काव्य शुद्धता के पक्षधर थे, परंतु वे ताहिर भाई की तरह हिटलरी सोच नहीं रखते थे। हालांकि वे बांगड़ुओं की हरकतों पर ठठाकर हंसने से भी बाज नहीं बाते। साथ ही उनका रोबदार व्यक्तित्व तथा इलीट अंदाज भी दूसरी समिति के लोगों में हीन भावना भर देता। इनके साथ काव्य-गीत-संगीत प्रेमी भाई घनश्याम जायसवाल जी, गायक साजी तिवारी व मेरे अभिन्न मित्र विनय प्रताप सिंह ’दरोगा’ जैसे प्रेमी बन्धुओं का भी साथ मिला। सबने मिलकर साहित्यिक समिति को नाम दिया ‘स्पंदन’। इस समिति के कुछ कवि ऐसे भी थे जो दोनों ही संस्थाओं में जाकर कविताएँ सुनाने का मज़ा भी लेते तथा दोनों ही पक्षों से चाय पीने के साथ-साथ गोष्ठियों में आने के लिए मक्खन भी लगवाते। मख्खन लगाने के क्रम में हम जनाब बशीर अश्कजी, शजात अली, शाकिर अली, अली अहमद फैजी पर अधिक ध्यान केन्द्रित करते। हमारा प्रयास रहता कि हमारी गोष्ठियों का संख्या बल दूसरी समिति के सदस्यों का मानसिक बल तोड़ने हेतु पर्याप्त हो। परंतु हमारे विरोधी भी अजब मिट्टी के बने थे अर्थात् जितना दम हम लगाते, वे उससे दोगुने बलशाली हो जाते। संख्या बल बढ़ाने हेतु दोनों पक्षों द्वारा कब्र खोद-खोद कर जमींदोज कवि तक निकाले जा रहे थे। जिस किसी ने हिन्दी का  ‘ह’ या उर्दू का ‘अलिफ’ भी पढ़ा हो, उसे कवि बनाने में पूरा जोर लगा दिया जाता। परंतु काव्य शुद्धता में अग्रणीजनों के होते हुए भी हम पराजित ही महसूस कर रहे थे। संभवतः हमारा विचार भी जनाब हिटलर की तरह ही गैर नाजियों के पूर्ण शमन-दमन का हो गया था। बहुत अरसे बाद मुझे यह समझ आया कि जीवन में तथाकथित सफलता के लिए किताबी ज्ञान का योगदान सौ टके में दस ही होता है, बकाया नब्बे टके आपकी धूर्तता है, जिसे आप व्यावहारिक ज्ञान अर्थात् विवेक-बुद्धि की संज्ञा देकर गरिमामय बना सकते हैं। अब जान पड़ता है कि धूर्तता के इस ‘नब्बे टके’ के वृहद अंश के अभाव तथा किताबी ज्ञान का ‘दस टके’ का खड्ग लेकर हम पूर्ण विजय का दिवा-स्वप्न ही देख रहे थे।

            बहरहाल, कारवाँ बनाने की इस कवायद में सोढ़ी जी भी हमारे साथ आए। जनवादी कवि तथा खांटी मार्क्सवादी । सोढ़ी जी कोयला श्रमिक संघर्ष से जुड़े थे व सी.आई.टी.यू. (सीटू) के प्रदेश महासचिव थे। दीगर यूनियनों के नेता जहाँ टाटा सफारी व अन्य महँगी गाडि़यों में घूमते थे, सोढ़ी जी के पास केवल एक वेस्पा कंपनी का स्कूटर था। अनुमान लगा सकते हैं, सीटू के प्रदेश महासचिव के पास केवल एक स्कूटर। काजल की कोठरी में रह कर भी बेदाग रहे आए मार्क्सवादी लीडर सोढ़ी जी ने कभी अधिकारी बनने के लिए पदोन्नति नहीं ली। चूंकि मैं व ताहिर भाई दोनो ही स्वभाव से विद्रोही प्रकृति के निम्न-मध्यमवर्गीय वंचित थे, अतः हमें सोढ़ी जी की सोच व साहित्य से विशेष लगाव था।  सोढ़ी जी ने स्पंदन साहित्यिक समिति को  नया बैनर दिया ‘जनवादी लेखक संघ ’ अर्थात् ‘जलेस’।

           सोढ़ी जी की प्रेरणा से ककउआ होटल एक बार फिर से साहित्यकारों का अड्डा बन गया। अब इसमें होने वाले जमावड़े की कमान थी ताहिर भाई तथा मेरे हाथों में। हम वहाँ नियमित बैठते । मौका मिलते ही सोढ़ी जी भी पहुँच जाते थे। नेसार भाई खाली वक्त में मिलते थे पर अब उन्होंने रचना कर्म त्याग ही दिया था। हमारे अनुरोध करने पर भी उन्होंने कुछ लिखना स्वीकार नहीं किया, कुछ इस जवाब के साथ कि –‘तुम लोग लिखो न बे, साले मैं घण्टा का लिखूंगा’ । हाँ, हम  उनकी फलानेवाले इत्यादि गालियाँ खाने का मज़ा ज़रूर चख लेते थे। उन्होंने पूरी तरह से बोहेमियन जीवन शैली अपना ली थी, बस बोहेमियन की परिभाषा में से साहित्य निकालकर। कभी-कभी मस्त होते तो गरियाते हुए कहते ‘ साले ये लोग का जानेंगे बे, मैं बैकुण्ठपुर का मण्टो हूँ’। अन्य मित्र भी आते तथा शाम को हम चचा नोमानी के पास पहुँच जाते। कुल मिला कर साहित्यिक गतिविधियाँ  जोर पकड़ने लगीं थीं।

            sansmaranइसी बीच हमने सोढ़ी जी प्रेरणा से साहित्यिक लघुपत्रिका ‘आलाप’ का प्रकाशन किया, ताहिर भाई और मेरे संयुक्त संपादन में। पर अफसोस कि स्तरीय रचनाकर्म के अभाव में यह पत्रिका अल्पजीवी ही रही। ‘आलाप’ के विमोचन का एक वृहद कार्यक्रम आयोजित हुआ । इस कार्यक्रम में कोरिया और सरगुजा जिले के कई नामी साहित्यकारों ने उपस्थिति दर्ज कराई जिसमें प्रभुनारायण वर्मा, आनंद बहादुर, श्याम कश्यप ‘बेचैन’, जगदीश पाठक आदि शामिल थे। सोढ़ी जी का महत्वपूर्ण कविता संग्रह ‘हाजिर है समन्दर’ भी इसी दौरान रामकृष्ण प्रकाशन, विदिशा से प्रकाशित हुआ, जिसका आमुख राजेश जोशी जी ने लिखा था। इसी बीच मेरा ग़ज़ल संग्रह “कुछ विषम सा”भी आया, जनवादी लेखक संघ, जिला- कोरिया के बैनर तले, ताहिर भाई ने जिसका बड़ी खूबसूरती से सम्पादन किया था। गज़लगो अशोक अंजुम  जी व कवि-संपादक अनवर सुहैल जी ने इसका आमुख कथन लिखा था। हेन-तेन करके मैंने आकाशवाणी का कांट्रैक्ट भी हथिया लिया था। हेन-तेन इस लिए कि येन-केन-प्रकारेण का प्रयोग कांट्रैक्ट पाने की प्रक्रिया को ज्यादा गरिमा प्रदान कर सकता है तथा इसके लिए किये गये उपायों को हेन-तेन ही बेहतर व्यक्त कर सकता है। तो अब मुझे भी आकाशवाणी से होने वाले काव्यपाठ की सूचना अखबारों में छपवाकर पूर्ण कवि होने का सम्मान तथा आत्मा को सहलाने वाला सुख प्राप्त हो चुका था। किंतु निश्चय ही इससे ज्यादा आनंद मुझे सीटू की जनसभाओं में काव्यपाठ कर के आया। यह आकाशवाणी के कुछ घोर असाहित्यिक कर्मचारियों के द्वारा अपनी रचनाओं को प्रसारण के लिए जाँचने के दौरान होने वाली शर्मिन्दगी से बेहतर महसूस हुआ। कुछेक बार ध्वन्यांकन के लिए आकाशवाणी जाने के बाद मैंने आखिरकार उन अनुबंधों को दरकिनार करना आरंभ कर दिया।

          अब तक पास के कस्बे के साहित्यिक मित्रों ने मुझे एक सम्मान भी दे दिया था। बाद में पता चला कि ऐसे सम्मान के बदले सम्मान देना पड़ता है। सलाह मिली कि एक प्रमाणपत्रनुमा रंगीन सम्मान-पत्रक छपवाओ, लुभावने नाम वाला जैसे ‘साहित्य वन-पुष्प सम्मान, ‘युगपरिवर्तक साहित्य-धुरंधर सम्मान’ इत्यादि। तत्पश्चात् जिससे सम्मान मिला हो (अथवा जिसके हाथों आगामी सम्मान प्राप्त करना है) उस व्यक्ति को बुलाकर  खाली लिफाफे में पाँच-दस हजार का चेक बतलाकर सम्मान पकड़ा दो या फिर सम्मान बटोरने वाले से ही रकम लेकर लिफाफे में डाल दो। फिर पाँच की उपस्थिति को अखबार में पाँच सौ लोगों का जमावड़ा बता कर खबर की प्रेस-विज्ञप्ति दे दो। बदले में वह सम्मानित व्यक्ति आपको पहली फुर्सत में आमंत्रित करके इसी ‘प्रोटोकाल’ के तहत सम्मानित करेगा। इस तरह से मेरे उन मित्र ने आज से दस साल पहले ही सौ से ज्यादा सम्मान जुगाड़ लिए थे। यह सब जानकर मैंने उस सम्मान को उठाकर बाबा से विरसे में मिले पुराने बक्स के पेंदे में डाल दिया तथा उन साहित्यिक मित्र से भी किनारा कर लिया।

          जो भी हो, कुल मिलाकर अब पुराने दिन फिर से लौट आए थे। ककउआ होटल के भी तथा नगर के बिसरा दिए गए साहित्य के भी। बाबा से विरासत में मिले कुछ रुपए व अपने अमेरिकावासी मामा दुर्गा प्रसाद मिश्राजी के आर्थिक सहयोग से मैंने अपना छोटा सा व्यापार भी आरम्भ कर दिया। कुछ काम चल पड़ा तो सस्ते में एक पुरानी फिएट कार खरीद ली। बस उसी  में बैठ कर सारे कविगण कहीं भी चल पड़ते रचनापाठ को। नगर में एक से बढ़कर एक नई गाडि़याँ प्रवेश कर रहीं थी, परंतु अपनी फिएट तो अपनी थी। हमने उसे नाम दे रखा था ’काव्यम्’। कहीं गोष्ठियों से बुलावा आए तो चल पड़ते थे  ‘काव्यम्’ में लदे-फंदे। हमने  ‘काव्यम्’ में साथ बैठ कर कई साहित्यिक यात्राएँ कीं ।

          इस दौरान कई खट्ठे-मीठे अनुभव भी हुए। एक बार ताहिर भाई और मैं चिरमिरी से लौट रहे थे,  कवि मित्र नरेंद्र मिश्र  ‘धड़कन’ के द्वारा होली के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कविता-पाठ करके। रास्ते में हमने देखा कि छोटा नागपुर रेलवे- क्रासिंग के पास कुछ लोग दर्रीटोला स्टेशन की ओर से घायल अवस्था में चले आ रहे हैं। पूछने पर पता चला कि रात वाली पैसेंजर दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। दुर्घटना की जगह पास ही थी, अतः हम गाड़ी वहीं पर खड़ी कर दुर्घटना स्थल की ओर चल पड़े। दोनो दुर्घटनास्थल पर पहुँचने वाले पहले बाहरी लोग थे। बड़ा भयावह दृश्य था। ट्रेन का आधा डिब्बा टूट कर पुलिया के उपर लटक रहा था तथा आधा नदी में गिरा हुआ था। एक डिब्बा पूरा का पूरा ही नदी में पड़ा था। पाँच-छः डिब्बे ऊपर पटरियों पर पलटे पड़े थे । गनीमत है कि ट्रेन की गति पहले ही बहुत धीमी होने और पुलिया ज्यादा गहरी नहीं होने के कारण अधिकांश यात्री घायल ही हुए थे, एक मौत को छोड़ कर । बाद में पीछे से कोयला कम्पनी का बचाव दल आ पहुँचा व उसके साथ ही पुलिस बल भी। पहले तो हमसे ही ठीक-ठाक पूछताछ हो गई कि हमने कुछ माल वगैरह तो नहीं उड़ाया अथवा कोई अन्य गड़बड़ तो नहीं की। पुलिस की पूछताछ जायज भी थी क्योंकि यह वही समय था जब हमारे कोरिया जिले में भी नक्सल वादियों की पदचाप सुनाई दे रही थी।  वहाँ से छूटे तो मनेंद्रगढ़ से आए बचाव दल में उपस्थित एक नवागत कवि ने पकड़ लिया। अविश्वसनीय लगेगा सुनकर कि उस भीषण समय में भी उसने हमें तारों के उपर एक तात्कालिक कविता सुनाकर वाह-वाही लूट ली। एक वृद्ध दंपति अभी तक हवा में झूल रहे डब्बे में फंसे हुए थे, उनके बचाव के लिए कहने पर उसने बड़ी सहजता से कहा कि उसके साथी यह कर लेंगे, हम इसकी फिक्र न करें। तब हमने मान ही लिया कि कविता सचमुच बहुत विचित्र नशा है, शायद धतूर के बीजों से भी बढ़कर।

            वापस चलते-चलते हमने एक और शरारत की। नगर के एक प्रेस-विज्ञप्ति ब्रांड बहुचर्चित समाज-सेवक भी उस गाड़ी में रायपुर जा रहे थे। समाज सेवा के माध्यम से उन्होंने मुख्यमंत्री तक अपनी पकड़ बना ली थी। हम ने उन्हें बता दिया कि नए नियम के अनुसार सामान्य घायलों को भी रेलवे आजकल मुआवजे में कम से कम बीस हजार रूपए तो देता ही है। हमारा इतना बताना था ही था कि पूर्ण स्वस्थ होने पर भी उन्होंने अपने पैर में एक खरोंच खोज निकाली व उसे पकड़ कर हाय-हाय चिल्लाने लगे। सभी घायलों के साथ उन्हें भी मनेंद्रगढ़ के आमाखेरवा हस्पताल ले जाया गया। लौट कर उन्होंने हमें गालियाँ देते हुए बताया कि रेलवे ने उन्हें हस्पताल से अगले दिन केवल पाँच सौ रूपए पकड़ाकर फारिग कर दिया। अजब दुनिया का रंग कि वे समाजसेवक हम पर नाराज़ तो बहुत हुए, परंतु इस बात पर कतई शर्मिन्दा नहीं कि उन्होंने मुआवजे के लिए झूठी कहानी गढ़ी।

            अपनी इस कविता यात्रा में साहित्यकारों के एक से बढ़ कर एक रंग देखने को मिले। एक बार मनेंद्रगढ़ के एक ‘वरिष्ठ युवा’साहित्यकार ने हमें एक कार्यक्रम में कविता पाठ के लिए बुलाया। हास्यास्पद रूप से स्वयं को ‘वरिष्ठ युवा साहित्यकार’ कहने वाले इन साहब की उम्र तब पैंतालिस-पचास के चपेटे में रही होगी। उसने हमें फोन पर बतलाया कि फलाँ तारीख को इतने बजे आप लोगों का कार्यक्रम है, आने-जाने का खर्च दिया जाएगा, वगैरह-वगैरह। फिर क्या था, चल पड़ी ’काव्यम्’ मुझे व ताहिर मियाँ को लाद कर। जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि बड़ा भव्य आयोजन है, भइया सतीश जायसवाल जी (तब बख्शी सृजनपीठ, छ.ग. के अध्यक्ष) मुख्य अतिथि हैं। बड़े-बड़े कविगण पधारे हैं- जाँजगीर से दादा नरेंद्र श्रीवास्तव, विजय राठौर वगैरह। कुछ कवि ऐसे भी थे जिन्हें देख कर लगा कि जैसे इन्हें कब्रों से निकाल कर खास इसी सम्मेलन के लिए मंगाया गया हो। हमें महसूस हुआ कि हम तो छले गए हैं व आयोजक ने हमें धोखा देकर कार्यक्रम में भीड़ बढ़ाने के लिए बुलाया है, नगीना बना कर। बड़ा क्रोध हुआ।  ताहिर भाई के लगातार कहने पर भी मैंने उन्हें वापस नहीं होने दिया तथा वहां रुक कर हमने कार्यक्रम की खूब धज्जियाँ उड़ायीं। जिस कवि को हिट करना था उसके कचरे पर भी वाह-वाह, जिनसे बैर था, उनके कुछ भी पेश करने पर मौन । बाकी जनता भी हमारा अनुसरण करने लगी अर्थात् हमारी तालियों पर ताली तथा हमारे मौन पर मौन। सोचा होगा कि शायद यही श्रोता कविता के पारखी हैं व इन समझदारों का साथ देने से ही उनका काव्यप्रेम काव्यप्रेम कहलावेगा। हमारे जैसे और भी कई साहित्यकार कलेजा भुनाए बैठे थे, वे भी साथ  हो लिए। फिर क्या था, अब तो कार्यक्रम नीचे से संचालित हो रहा था तथा वह आयोजक मफलर लपेटकर मुँह छिपा रहा था।

 दूसरे दिन विचार- गोष्ठी रखी गई थी। धृष्टतापूर्ण वाक्आडंबर से हमने गोष्ठी के मूल प्रश्न को ही निरर्थक साबित कर कार्यक्रम का समापन कराया। आयोजक महोदय का चेहरा देखते बनता था। किंतु सतीश जायसवाल जी से उस कार्यक्रम में जो परिचय हुआ, वह आज तक बड़े आत्मीय संबंध के रूप में कायम है। सम्भवतः इस संस्मरण के बाद वे उस शाम का सच समझ पाएँ, या कदाचित् अपनी अनुभव दृष्टि से उसे उसी दिन भाँप गए हो, कौन जाने? अंत में कार्यक्रम समापन के बाद घर चलते हुए शायर कासिम एलाहाबादी के साथ सड़क के किनारे टपरे पर चाय पी। कासिम शहडोल से हैं, कपड़े सिलने का काम करते हैं और एक उम्दा शायर हैं। उन्होंने सारा वाकया जानकर कहा- ‘गौतम जी, आपके अन्दर ज़र्फियत की कमी है’। अब मेरी उर्दू तो इतनी अच्छी है नहीं तथा सीधे-सीधे कमज़र्फ कहा होता तब संभवतः समझ भी लेता। कासिम के जाने के बाद जब ताहिर भाई से कमजर्फ शब्द का अर्थ पूछा तो वे भी टाल गए। आज कासिम भाई की कही बात समझ में आती है और साथ में लज्जा भी। फिर सोचता हूँ कि भला गदहपचीसी का भी कोई आत्मसम्मान होता है? यदि होता है, तब फिर वह मुझमें नहीं था।

Leave a Reply

Your email address will not be published.