पत्रकारिता से साहित्य में आई गीताश्री की कहानियाँ सताई गयी स्त्रियों की कहानियां नहीं हैं, न ही वे स्त्री मुक्ति का घोषणापत्र बनाती हैं बल्कि स्त्री जीवन की विडम्बनाओं को पूरी शिद्दत से सामने लाती हैं. वर्ष के अंत में आज ‘गीताश्री’ के जन्मदिन पर हमरंग द्वारा बधाई स्वरूप….गीताश्री से उनकी रचनाशीलता को लेकर ‘सुशील कुमार भारद्वाज’ की बातचीत का एक अंश….. | – संपादक 

मैं जीवन की भावुकता को कहानी की संवेदना बनाती हूं… 

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गीताश्री के साथ सुशील भारद्वाज

-: अपने साहित्यिक सफर को किस रूप में देखती हैं ?

-साहित्य का बीज तो बचपन में ही पड़ा लेकिन पत्रकारिता जब मेरा पहला प्यार बन गया तो सबकुछ पीछे छूट गया.पत्रकारिता की रुखड़ी जमीन ने मेरे अंदर की रचनात्मकता को सोख लिया. लेकिन पत्रकारिता की सीमा ने मुझे फिर से साहित्य की ओर मोड़ दिया. रचनात्मकता मेरे अंदर की भूख है “प्रार्थना के बाहर” मेरी पहली कहानी हंस में 2009 में छपी थी. फिर राजेंद्र यादव जी के मार्गदर्शन में आगे बढ़ती रही. और “स्वप्न, साजिश और स्त्री” के रूप में दूसरे कथा संग्रह को आपलोगों को भेंट कर रही हूँ. राजेंद्र यादव जैसे गुरू ने आपको कितना प्रभावित किया?

-: कई पीढ़ियों के कथा-गुरु हैं, कोई माने या न मानें. वे सबसे मित्रवत व्यवहार करते थे, वे कहानी की पाठशाला थे सबको प्रेरित करते थे उकसाते थे, उन्होंने साहित्य से विमर्शो को जोड़ा, यथार्थ को कहानी बनाने की कला उनसे सीखी.पत्रकारिता ने आपके साहित्यिक जीवन को किस रूप में प्रभावित किया?

– पत्रकारिता, रचनात्मक लेखन के लिए ऊर्वर भूमि है. पत्रकारिता ही वह जरिया है जिसने मुझे लेखन तक पहुंचाया नहीं तो मैं भटकती रहती रचनात्मकता की खोज में. मेरे लिए रास्ता तैयार किया. अभिव्यक्ति की जो सीमाएं पत्रकारिता में हैं, वह साहित्य में आकर टूट जाती है वहां अधैर्य है, हड़बड़ी है, साहित्य में धीरज है. मार्खेज ने कहा था- “पत्रकारिता ने उन्हें भाषा का एक अधिक प्रभावशाली इस्तेमाल करना सीखाया साथ ही मुझे अपनी कहानियों को प्रामाणित बनाने के रास्ते बताए.” अपने अनुभवो से मैंने भी इस सत्य को जाना.

-: महिला साहित्यकारों की स्थिति कैसी है ? 

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सुशील कुमार भारद्वाज
जन्म – 1 मार्च १९८६ , गाँव देवधा , जिला – समस्तीपुर विभिन्न कहानियाँ तथा लेख पटना से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सम्प्रति – मुस्लिम हाईस्कूल , बिहटा , पटना में कार्यरत पटना
फोन – 08809719400

इन दिनों महिलाओं की आमद साहित्य में काफी तेज हो गई है. साहित्य में स्त्री विमर्श की धमक ने भी स्त्रियों को जिस तरह से लिखने के लिए उकसाया, प्रेरित किया उसी का फल है कि आज इतनी लड़कियां घर के चौखट लांघ बेबाक और बेलौस हो अपनी बातों को कविता, कहानी और उपन्यास आदि के माध्यम से कह रही हैं. काफी चर्चा भी हो रही है. स्त्री लेखन के लिए हम आरक्षण नहीं मांगते हैं लेकिन हमारी पहचान तो हो, स्त्री लेखन को अलग से रेखांकित किया जाए. बड़ी मुश्किल से स्त्रियों ने खुद को अभिव्यक्त करना सीखा है, साहस जुटाया है और समानांतर रास्ता बनाया है. उसे क्रेडिट तो मिलना ही चाहिए.

-: बदलते माहौल में स्त्री –विमर्श को किस रूप में देखतीं हैं ?

– शोर वहीं होता है जहाँ खोखलापन होता है. यह चुप्पी का शोर है. इस समय महिलाएं अच्छा लिख रही हैं , कुछ लोग उसके पीछे बेजा शोर मचा रहें हैं. लचर तर्को से स्त्रीलेखन को खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं. कौन समझाए कि सभी कहानियां स्त्री-विमर्श की नहीं है. वे समकालीन दौर की समाज की सच्चाइयों को ईमानदारी से बयान कर रही हैं. लोग स्त्री विमर्श को मजाक बना कर उपेक्षित करना चाह रहे हैं. हमें उनकी मंशा समझ में आ चुकी है। उनके हाय तौब्बा से हम रास्ता नहीं बदलने वाले।

-: जब लोगों के पास समयाभाव है वैसी स्थिति में लंबी कहानियों के बारे में क्या सोचती हैं?

–बदलते दौर में जब लोगों के पास समय का अभाव है जल्दबाजी में सारा काम निपटाना चाहते हैं वैसी स्थिति में कहानी को बेबजह अधिक नहीं खींचना चाहिए. कहानियां छोटी और कसी होनी चाहिए. पाठकों से संवाद करना चाहिए. वैसे कहानी में कला प्रदर्शन का कोई मतलब नहीं जिसको देखकर ही पाठक का सिर भारी हो जाए. कम शब्दों में भी बातों को कहा जा सकता है. लेकिन छोटी कहानी लिखने की कला हर किसी को नहीं आती है.

-: आपकी कहानी के कला पक्ष पर कुछ आलोचक टिप्पणी करते हैं ?

-कला क्या है? जीवन के कठोर सच की अभिव्यक्ति कला से नहीं होगी. यथार्थ से बड़ा सौंदर्य कुछ भी नहीं. मेरी कहानियों में कला की बाजीगरी नहीं. सच को सच कहने का साहस है. भावुकता जीवन में है. जीवन की भावुकता आपस में जोड़ती है. मैं जीवन की भावुकता को कहानी की संवेदना बनाती हूं.

-: आपके अनुसार कहानी क्या है ?

कहानी मेरे लिए मनुष्यता के पक्ष में खड़े होने का उपक्रम है. जिनके हक छीन लिए गए हैं या जिनके सपने बहिष्कृत कर दिए गए हैं, मेरी कहानी उनके पक्ष में खड़ी है. कहानी आंतरिक खोज है जिसके जरिए पीड़ा से मुक्ति का विराट स्वप्न देखती हूं और गैरबराबरी के विरुद्ध प्रतिरोध के औजार में बदल देती हूं.

-: बिहार के मुजफ्फरपुर जैसे पारंपरिक सामन्तवादी परिवेश में पली गीताश्री की जब तस्लीमा नसरीन जैसी लेखिकाओं से तुलना होने लगती है तो क्या सोचती हैं ?

-कुछ लोग इस्मत चुगताई से मुझे जोड़ रहे हैं. इतनी महान हस्तियों से तुलना तो मेरे लिए कंपलीमेंट है. ऐसा बोलने वालों पर मुझे हंसी आती है. आरोप लगाने से पहले परंपरा का ज्ञान बहुत जरुरी होता है. अपढ़ लोग ऐसी बात करते हैं. ऐसे लेखन की लंबी परम्परा रही है. लेकिन मैंने तो ऐसा कुछ नही लिखा जो हमसे पहले की लेखिकाओं ने नही लिखा है. कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग और मैत्रेयी पुष्पा से अधिक बोल्ड नहीं लिखा. मेरे समकालीनों में मुझसे ज्यादा बोल्ड लिख चुकी हैं. नई पीढ़ी तो बहुत आगे निकल रही है. फिर ये बातें मेरे लिए ही क्यों? क्योंकि मुझे पत्रकारिता से साहित्य में प्रवेश की वजह से घुसपैठिया मानते हैं.

-: बिहार के रचनात्मक परिवेश को किस रूप में देखती हैं ?

-बिहार साहित्य के लिए बहुत ही उर्वर भूमि है जिसने एक से बढ़कर साहित्यकार देश को दिए और आज भी कई रचनाकार राज्य या राज्य के बाहर रहते हुए परचम फहरा रहे हैं. क्या सुखद संयोग है कि इस समय देश की दो बड़ी साहित्यिक पत्रिकाएं, हंस में संजय सहाय और पाखी में प्रेम भारद्वाज संपादक हैं. दोनों बिहार के हैं. कितने नाम गिनाऊं. जगह कम पड़ जाएगी. हृषिकेश सुलभ, अवधेश प्रीत जैसे दिग्गज कथाकारों से संपन्न बिहार की कई कथा-पीढ़ियां राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं. वंदना राग, प्रभात रंजन, कविता, संजय कुंदन, अनुज समेत और भी कई रचनाकार इतने सशक्त रूप में हैं कि दूसरे प्रदेश के लोग हतप्रभ हैं.

-: आज कल कई कथाकार बिहार की पृष्ठभूमि में रचना कर रहे हैं. कोई खास वजह ?

-दरअसल यहाँ की संस्कृति, मिट्टी और लोग बड़े ही दिलचस्प हैं. यहाँ का लोकरंग बहुरंगी है. किस्से इसकी लोकचेतना का हिस्सा हैं. उसे उठाने के लिए अपने लोक लौटना पड़ता है बार बार. प्रचुर भंडार है. कमी नहीं पड़ने वाली. विस्मृत लोक बहुत मोहता है. नोस्टालजिया भी एक वजह कि हम बार बार अतीत की ओर लौटते हैं. हमारी रचना को प्रामाणिक और जीवंत बनाने के लिए इस लोक की यात्रा बहुत जरुरी है.

-: सामाजिक व्यवस्था में स्त्री-स्वतंत्रता का क्या मतलब है ?

-स्त्री को स्वतंत्र ईकाई के रुप में स्वीकारने की बात हम करते हैं. पितृसत्ता उसे अपनी इज्जत-प्रतिष्ठा से जोड़ कर वस्तु में बदल देती है. स्त्री हूं तो रह रह कर टीस उठती है अपने समुदाय के बारे में. मेरा रास्ता बहुत आक्रामक नहीं है. हम अपना हक ही तो मांगते हैं, बराबरी ही तो मांगते हैं, और क्या पूरा आसमान थोड़े न मांगते हैं. हमें पुरुषविहीन दुनिया नहीं चाहिए. हमें साथी चाहिए, मालिक नहीं. अपने हको की बात करना कहां गलत है? बंधु, नई पीढ़ी बहुत आक्रोशित और आक्रामक है. हमारी पीढ़ी मांग रही है, आने वाली पीढ़ी मांगने की भाषा में बात नहीं करेगी, झपट लेगी अपना हक और हकूक.

-: इन दिनों क्या लिख रहीं हैं ?

मीडिया केंद्रित एक उपन्यास लिख रही हूँ .

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