ग़ज़ल : (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’

1-

कितनी होशियारी की होशियारों ने।

पहनली है खाल शेर की सियारों ने।

रोज़ ही चौराहे पर बिक जाता हूँ मैं,
तरह-तरह से लूटा मुझे ख़रीदारों ने।

बनाया था मंसूबा जहाँ पर फ़तेह का,
राज़ सारा खोल दिया उन दीवारों ने।

जिस्म बेचा, जाँ बेचीं अस्मतें सारी,
जाने क्या-क्या बेचा इन बाज़ारों ने।

‘तनहा’ तय किया सफ़र समंदर का,
कश्ती हमारी भी डुबा दी किनारों ने।

2- 

तिनका-तिनका जोड़ा तो ठिकाना हुआ।

आँधियों का भी इस ओर ही आना हुआ।

मुद्दतें हुईं, सदियाँ गुज़रीं और बरसों बीते,
पहले जैसा फिर कहाँ ये ज़माना हुआ।

बहोत ख़ुश होता है, तू जीत पे अपनी,
मैं फिर हारा, फिर तेरा हराना हुआ।

उतरनें भी मैंने नई समझ के ही पहनीं,
कभी मेरे लिए कहाँ कुछ पुराना हुआ।

रोक न पाई माँ आँसू, देती रही दुआएँ,
‘तनहा’ जब अपने घर से रवाना हुआ।

3-

जो सदा ऊँची निगाह करके चलता है।

वो ठोकर खाकर भी कहाँ संभलता है।

ढाल लेता है ख़ुद को हरेक माहौल में,
वो शख़्स गिरगिट सा रंग बदलता है।

मोहल्ला जैसा भी हो, यहाँ सब अपने हैं।
कॉलोनी में कोई दरवाज़ा कहाँ खुलता है।

उड़ते हैं आसमान में, चलते हैं कालीन पे,
उनको क्या पता पाँव ज़मीं पे जलता है।

ढँक ली शख़्सियत रंगीन लिबासों से,
पर परछाहीं का रंग कहाँ बदलता है।

लौट आने का वादा कभी नहीं करता,
जब भी घर से ‘तनहा’ निकलता है।

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