यही रीत है, जीवन का संगीत है॰॰॰?

वर्ष २०१८ की शुभकामनाओं के साथ 

हनीफ मदार

बीता साल गुज़रने के अंतिम क्षण तक सोचता रहा हूँ । यक़ीन मानें बहुत माथा-पच्ची की, यह याद करने में कि जब आज ही की तरह १६ विदा हो रहा था और १६ ही क्यों जब से यह नई साल का स्वागत करना देखा, जाना और सीखा है तभी से, हर साल के विदा लेने और नई साल के आगमन पर पूर्वजों की इस आशावादी लाइन  “बीती ताही विसार दे आगे की सुधि लेहि॰॰॰॰” को याद करता हूँ और आने वाले साल में इंसान बनने और इंसानियत सीखने का संकल्प लेता हूँ । हर साल मैं भी ‘दशहरे’ पर अपने अंदर के असत्य के पुतले को जलाने का संकल्प लेता हूँ , और॰॰॰॰ और  फिर से कुछ उम्मीदें नई आशाओं के साथ आप सब को नए साल की शुभकामना देता हूँ । किंतु सच कह रहा हूँ यार मैं इंसान बनने के यत्न में अपने भीतर के शैतान को भी जलाता हूँ लेकिन उस अमानव को न जाने कहाँ से अमृत मिलता है कि वह मेरे भीतर बहुत जल्द फिर से जी उठता है तब फिर मेरे भीतर का इंसान और इंसानियत घुटने टेक देती है  । ठहर कर फिर सोचता हूँ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्य और इंसानियत  का बाण वर्तमान समय की उस नाभि को नहीं भेद पा रहा है जहाँ उसे फिर से जी उठने की ताक़त मिलती है । मैं यह भी नहीं मान पाता कि सत्य का निशाना चूक जाता हो लेकिन कुछ तो है जो हमारी आँखों में धूल झौंक उस नाभि और बाण के बीच में आ जाता है ।

ख़ैर॰॰॰, तो रात तक मैंने सुख, समृद्धि, भाईचारा, प्रेम, सद्भावना और संवेदना की उम्मीदों से भरी वे तमाम गुल्लकें फोड़ी जो १६ की विदाई के वक़्त इस १७ के लिए मैंने भरी थीं  । यह देखने के लिए कि शायद इनमें हुए कुछ बदलावों को मैं देख और दर्ज कर सकूँ । लेकिन उनमें काम तलाशते वे लाखों हाथ जस के तस निकले जैसे १६ में थे हाँ॰॰॰॰ उनकी संख्या में कुछ इज़ाफ़ा ज़रूर मिला  ।  अपने शरीर पर लगे पैबंदों को शर्म से छुपाती हमारी बीमार सड़कें, ख़ुद गम्भीर रोग से जूझते अस्पताल, बैंक और विज्ञान की चंद बातें सीख लेने को तरसते स्कूल, ख़ुद को ठगा सा महसूसता, आँसू बहाता दम तोड़ता धरती पुत्र अन्नदाता  । अपनी ही सुरक्षा के लिए मौजूद कई क़ानूनों का बोझा सिर पर उठाए डरी सहमी सी स्त्री और बच्चियाँ । सुंदर चमकीले आवरण में लपेट कर पैकेज के रूप में युवाओं को सपने बेचता बाज़ार  और उत्सव की तैयारी में गूगल से २०१८ लिखे ज़िंदगी के रंगों से सजी इमेज डाउनलोड करते हम सब । इन सब के अलावा बहुत कुछ ऐसा भी जो हमेशा ही होठों तक आते-आते अनकहा ही रह जाता है  ।

मैं कुछ सोचता कि मेरे भीतर, नाभि के उसी अमृत से जी उठे ने मुझे डरा देने वाली नज़र से घूरा और बोला “दुनिया जश्न मना रही है तो यह बाबली तो है नहीं, कुछ तो बदला ही होगा जिसेके लिए सब नाच और गा रहे हैं  । और तुझे क्या लगता है, तू इस तेज़ धमकते संगीत पर नहीं थिरकेगा तो लोग तुझे बड़ा विद्वान मान लेंगें॰॰॰॰॰?  तू देख ले, आउटडेटेड, मूर्ख, और पिछड़ा हुआ जैसे सम्बोधन होंगे तेरे लिए  । तू भी खोज छोटा-बड़ा कोई कारण ख़ुश होकर नाचने का, न मिले तो यह देखकर ही ख़ुश हो कि सब मस्त हैं  ।” मैं कुछ सवाल कर पाता कि आवाज़ नदारद हो गई  ।

मैंने फिर से तलाश की तो पाया हाँ बदला है व्यवस्था के झंडे का रंग । वाट्सएप यूनिवर्सिटी से निकलते भ्रामक ज्ञान के श्रोत । असमंजश की स्थिति में अपनी जगह तलाशते, चक्कर काटते, टकराते कई छोटे बड़े क़ानून । बेहतर जीवन और ख़ूबसूरत दिनों की चासनी में लिपटे वादे और दावे । मने एक नहीं कई-कई कारण मिल ही गए, मुझे नाचने-गाने और जश्न मनाने के ।

२०१८ शायद गलियों में आ चुका था । संगीत तेज़ और तेज़ होने लगा था । आतिशबाज़ी, मैसेज, फ़ेसबुक, ट्विटर पर शुभकामनाओं की जाज़म बिछाई जाने लगी थी  । आख़िर कब तक सोचता कि  खान-पान, रहन-सहन, जाति-धर्म, शक-ओ-सुबहा और अव्यवस्था, जाम, हुजूम, भीड़ के कारण जो इस दुनिया में नहीं रहे उन्हें भूल और भुलाकर फिर से इंसान और इंसानियत के पक्ष में नई आशाओं, सपनों और उम्मीदों की गुल्लकें सजाकर सबको बधाई और शुभकामना दूँ  । वैसे भी जीवन में छोटा बड़ा कुछ भी नया आने पर, बदलने पर ख़ुशी तो होती है, यही रीत है, सूने जीवन का संगीत है । तो अभी कुछ और नहीं तो नया कलैंडर आकर बदल ही गया॰॰॰॰ तो चलिए इसी बात पर ख़ुश होकर आप सब को इस नए साल २०१८ की हृदय से बधाइयाँ और मंगलकामनाएँ  ।

वर्ष २०१८ की शुभकामनाओं के साथ 

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