यह कविता किसी कवि की कलम से नहीं निकली और न ही रचनाकार की कवि के रूप में कोई पहचान ही है तब निश्चित ही यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो खुद शब्द ग्रहण करके बाहर आई है | मजकूर आलम की यह कविता ….|

यह चुप्पी 

मज्कूर आलम

यह चुप्पी तटस्थता में नहीं आती

अब तक हमने यही सुना है

चुप्पी हामी है
चुप्पी समर्थन है
चुप्पी सोना है

एक और चुप्पी है
आंखों की भाषा में है
दिलों की धड़कन में है
प्रेम के स्रोत में है

पर यह चुप्पी वह चुप्पी तो नहीं
न ही सहमी-सी चुप्पी में जकड़े जाना है
तो फिर कैसी है यह चुप्पी
जिसने सी दिए हैं औरों के लब

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यह चुप्पी पाश का वह चांद है
जो अपनी नर्म रोशनी में पिघला देता है हर सख्ती को

कि ‘सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं गड़ता’
क्योंकि वह चुप रहता है
नजरें फेर लेता है
और उसकी चुप्पी पैदा करती हैं हिंसक खामोशी की प्रतिध्वनियां
गली-गली, शहर-शहर
फिर वीरान पड़ जाती हैं बस्तियां
हमेशा के लिए सन्नाटे में तब्दील होकर
तमाम किंतु-परन्तु, अगर-मगर के बाद भी
यह चुप्पी इतिहास में दर्ज नहीं होती
नहीं, कभी नहीं
क्योंकि यह चुप्पी तटस्थता में नहीं आती

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