उतसव धर्मिता के समय में कवि की चेतन अभिव्यक्ति, आत्ममुग्ध वक़्त को झकझोर कर अपने दौर के यथार्थ पर लाने की हमेशा रचनात्मक कोशिश करती रही है | हालांकि कवि और उसकी अभिव्यक्ति को देश, काल या विचार की परिधि में बाँधने, समेटने या चिन्हित करने का काम भी सामान रूप से हमेशा ही होता रहा बावजूद इसके लेखकीय दृष्टि से  देश-दुनिया के सुख-संत्रास ओझल नहीं हुए हैं | ऐसा ही एहसास करातीं यह कवितायें …..| – संपादक 

यह सभ्यता की कौनसी जंग है !

नित्यानंद गायेन

दुनियाभर के तमाम संघर्षों में
मारे गये बच्चों को
मैं ‘शहीद’ कहता हूँ
जबकि वे थे
बेकसूर हर बार
फिर भी हर युद्ध में सबसे ज्यादा वे ही मार दिए गये

युद्ध का लक्ष्य होता है जीत
और जीत की लड़ाई में दुश्मन सिर्फ दुश्मन होता है
वहां न कोई बच्चा होता है
न कोई बूढ़ा या असहाय
वहां सब दुश्मन होते हैं
और औरतें बन जाती हैं केवल सम्पत्ति
जिन्हें लूटा जाता है दुश्मनों द्वारा
न माँ रह जाती हैं कोई स्त्री
न बेटी !
जबकि इन लड़ाइयों के पीछे उनका कोई हाथ नहीं होता
फिर भी सबसे अधिक यातनाएं रह जाती हैं इनके ही हिस्से में

मैं रह –रह कर सोचता हूँ उन मासूमों के चेहरे
जो मारे गये थे दोनों विश्व युद्धों के दौरान
या फिर जिनका किया जा रहा है कत्ल
हिरोशिमा-नागाशाकी में,
वियतनाम में,
फिलिस्तीन में ,
इराक में या फिर
भूखा मारा जा रहा है जिन्हें
एशियाई और,
अफ़्रीकी देशों में..

यह सभ्यता की कौनसी जंग है !

कितना आज़ाद था मैं 

लिंगमपल्ली के उस छोटे से रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर
राम प्रसाद दुबे कालोनी में
एक दस बाई दस के कमरे में
कितना आज़ाद था मैं
मखदूम मोहिउद्दीन के शहर हैदराबाद में
खुश था मेरे भीतर का कवि
ग़ालिब तुम्हारी तलाश में
ये कहाँ आ गया मैं !
हर तरफ घुटन है
नफ़रत है
प्रेम नहीं तेरे शरह में अब
इर्ष्या फ़ैल चुकी है हवाओं में
घुट रही हैं मेरी सांसे
जबकि मैं आया था जिन्दगी की तलाश में यहाँ
ओ शहर ..
याद करो तुमने आखरी बार
कब किया था किसी का स्वागत
बाहें फैलाकर !
तुम्हारे फुटपाथों पर
जो अनगिनत क़दमों के निशान हैं
वहां खोज रहा हूँ
मैं लौट जाने का रास्ता …..
-तुम्हारा कवि

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