जीवन के एकांत, भावुकताओं, टूटते बिखरते और फिर-फिर जुड़ते मानवीय दर्प के बीच से धड़कती संवेदनाओं के साथ गुज़रती हैं निवेदिताकी कवितायें | भावुक प्रेमिका, संवेदनशील माँ, अपने समय से संघर्ष करती आधुनिक स्त्री और पृकृति का उल्लास, जीवंत रूप में एक साथ उठ खड़े हो कर मानव जीवन की नई इबारत लिखता प्रतीत होता है जैसे कविता का हर शब्द ..संपादक  

यादें..तारीख के जंगलों से निकलतीं यादें: स्मृति कोलाज (निवेदिता)

परिंदे जंगलो को छोड़ कर कहीं चले गए
बच्चों की तोतली आवाज दूर होती गयी
पिता मेंज पर सर टिकाये
बैठे हैं अँधेरे में
उनकी आँखों में पुराने दिन उमड़ आयें हैं
बचपन बच्चों के साथ
छूट गया है पीछे
उनके बीच ख़ामोशी पसरी है
रसोई घर में माँ केतली में चाय का पानी उबाल रही है
कभी -कभी वे दोनों जैसे नीद से जग जाते हैं
दूर होते सितारों को देखते
बादल चांदी के गुच्छे सा लटकता झूल रहा है
हवा बादलों के बीच गुजर जाती है
दूर तक फजाओ में धुंद है ख्यालों की
आखरी शब्
और खामोसी बुनने लगे हैं ख्वाब
नक्स बे-ख्वाब पैरों के चलने लगे
बुझी हुयी सांसों में
कोई ख्वाब चुपके से आया
एक नर्म मुलायम हाथ
उनके सींने से जा लगा
कहानियों की डोर नींद के हाथ लगी
कहानियां जंगलो , दरियाओ से होती हुयी
तितलियों , फूल ,हवा , चांदनी
और पहाड़ वर्फ की उजली पोशाक पहने हुए उसकी नीद में जागते रहे
आज इतने बरस हुए
बस यादें रह गयी हैं
दिन ढलता है रात पड़ी रहती है आँखों में
कोई नहीं जो पूछे
माँ जाग क्यों रही हो
जाने कितनी रातें जग कर
कितने जतन से दोनों ने बच्चों का घरोंदा बनाया था
दक्षिण के तारों के बीच
नीले आकाश और बादामी रंग के फूलों के साथ
वे सब चले गए अपने घरोंदो के साथ
रह गए वे दोनों
उनकी यादों के साथ
निशब्द सितारों ने दबे पांव अपने घर का रुख किया
साँझ के उजले आसमान पर
सब्ज अश्जार पे चाँद की किरणें
पिघल रही हैं
पिघल रही है यादें
भीगे मन से दोनों ने कहा
सुखी रहो
सुखी रहो
आँखों से चंद कतरे बह गए
स्याह रात धीरे –धीरे ढल गयी

मेरे प्यार

प्यार की एक मोटी जंजीर मेरे गले में पड़ी है
मैं साँस नहीं ले पा रही हूँ
चमकते
चाकू के तेज धार पर
प्यार मेरा लहू-लुहान है
मैं उड़ना चाहती हूँ
मैं समुद्री तूफानों के साथ निकल पड़ना चाहती हूँ
में देखना चाहती हूँ
दुनिया के तमाम रंग
मेरे प्यार क्या मिलता है तुम्हें
एक लहूलुहान दिल
मुझे उड़ जाने दो
खुले झरोखे से बाहर
मैं मिट्टी में घुलकर,
आग में तपकर
जिन्दगी के रंगो

से लबरेज तुमसे मिलूंगी
झरने के शीतल शिला पर

लरजते सागर में
सितारों के दीप्त पैरों के साथ
मेरे प्यार मिलेंगे हम
धरती के अंतिम छोर तक फैलते हुए…

 स्त्रियाँ करेंगी प्रेम बार -बार

मत बताना सखी
भीतर-भीतर बहने की कला
मत बताना कि
हम प्रेम से लबालब भरी हैं
और आता है हमें अंधेरो से लड़ना
उन लम्हों का जिक्र मत करना
जो चाँद रातों में
हमारे भीतर उतरता रहा
सृष्टी के अनंत छोर तक फैलते हुए
प्रेम करती रहना
प्रेम
जिन्दगी के लिए
उनके लिए जिनका हिर्दय सूख गया है
प्रेम जो बचाता है देश को,
लोगों को
प्रेम जो तानाशाह को देता है चुनौति
प्रेम अगर पाप है तो कहना
स्त्रियाँ
करेंगी ये पाप
बार बार
करेंगी प्रेम बार- बार …

जहाँ –जहाँ बीते हम 

याद करती हूँ तुम्हें किसी पुराने शहर की तरह
जहां की हर गलियाँ बीते दिनों से भरी-भरी सी है
तारों के उझास में
चाँद उग आया है
बारिश घास की पत्तियों में ठहर गयी है
तमाम नींद चुरा ले गया है चाँद
लब्ज भींग रहे है
वक्त
उदास नदी तलों से बहती
पहुंची है
बेचैन मन लिए
ढूंड रही हूँ तुम्हें
वहाँ -वहां
जहाँ-जहाँ बीते हैं हम

 

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    By: निवेदिता

    4 अप्रैल 1965 में बिहार के गया में जन्मी निवेदिता ने अपने सफर की शुरुआत रंगमंच और छात्र आन्दोलन से की।
    पटना विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया। माँ इन्दु रानी झा, पिता नीतिरंजन झा की पहली सन्तान।
    पत्रकारिता का लम्बा अनुभव। विभिन्न अखबारों नवभारत टाइम्स, आज, राष्ट्रीय सहारा, नई दुनिया में कई वर्षों तक काम किया। अभी स्वतन्त्र पत्रकार के रूप में दिल्ली, पटना से प्रकाशित होने वाले दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का काम जारी। फिलहाल ग्रीन पीस इंडिया में मीडिया कंसलटेंट के रूप में कार्यरत। महिला मुद्दों पर बेहतरीन पत्रकारिता के लिए उन्हें 2010-11 का लाडली मीडिया अवार्ड एवं वन वर्ल्ड अक्षयपात्रा मीडिया अवार्ड 2012 मिला। नेशनल फाउंडेशन ने 1997 में बच्चों की स्थिति पर काम करने के लिए मीडिया फेलोशिप दिया। यूएनएफपीए के तहत विजनरी लीडरशिप फेलोशिप 2004 में मिला। बालिका शोषण की अनकही कहानी – 1999 में बुक फॉर चेन द्वारा प्रकाशित की गयी। केन्या, फिलीपींस, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान, अरब अमीरात में यात्रा करने के बाद पटना में रह रही हैं।

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