रसप्रिया, एकल नाटक 

राजेश कुमार

राजेश कुमार

(कहानी- फणीश्वरनाथ रेणु )

(दूर कहीं से रसप्रिया की दिल छू लेने वाली मद्धिम-मद्धिम सुरीली तान आ रही है … धीरे-धीरे प्रकाश भी … जब प्रकाश की तीव्रता महत्तम पर आती है तो एक स्पॉट में खेत के एक पेड़ के नीचे मिरदंगिया बैठा हुआ दिखता है। मृदंग बजाते हुए रसप्रिया गाने में लीन है। बग़ल में उसकी झोली पड़ी है। झोली में ही उसका सारा घर-द्वार सिमटा है। यही उसकी कुल सम्पत्ति है। पुरानी सी धोती पहन रखी हैं बदन पर ढीला-ढाला सा घूसर कुरता। उमर चालीस के लगभग। गले में लाल रंग का पुराना सा अँगोछा हैं हफ़्ते भर की बढ़ी हुई खूँटी जैसी खिचड़ीनुमा दाढ़ी। नंगे पाँव।)

(विद्यापति की पदावली
पिया मोर बालक हम तरुणी गे
कौन तप चुकलौ भेल उ जननी गे।।
पिया ले ला गोद में चलली बजारे
हटिया के लगो पूछे के लगहे तोहारे।।
कहत विद्यापति, सुन बिरज नारी।
धरहुँ धिरज त, मिलहिं मुरारी।।
पिया मोर बालक, हम तरुणी गे।
कौन तप चुकलौ, भेल उ जननी गे।…)

गाना चल ही रहा है कि बग़ल में भैंस चरा रहे चरवाहे व मज़दूरों के बीच बज रहे ट्रांजिस्टर के चालू फ़िल्मी गाने का वॉल्यूम अचानक तेज़ हो जाता है। ट्रांजिस्टर के फ़िल्मी गाने में मिरदंगिया के गाने की आवाज़ दब जाती है। मृदंग बजाते-बजाते रुक जाता है। गाना बंद कर देता है। काफ़ी उलझन महसूस करता है। चेहरे पर तनाव आने लगता है कि अचानक अपना आपा खो बैठता है – ,
(लगभग चीख़कर) ‘बंद करो, बंद करो … बंद करो ये गाने ! मैं कहता हूँ, तुम बंद करोगे या नहीं ? … जब देख रहे हो कि मैं गा रहा हूँ तो मुझे चिढ़ाने के लिए ये शहरी गाना बजा रहे हो ? मेरे गँवई गाने का मज़ाक उड़ा रहे हो … हाँ मज़ाक तो उड़ाओगे ही ही, भला इन चटपटिया गानों के सामने विदापत का गाना क्यों पसंद आयेगा ? रसपिरिया में वो रस कहाँ जो इन मसालेदार गानों में है।
(पौज़ । एक लम्बी साँस भरते हुए ,)
अरे सबका ज़माना होता है। कभी इस पंचकौड़ी मिरदंगिया का भी ज़माना था। दस-दस, बीस-बीस कोसों दूर से मिरदंगिया का रसपिरिया सुनने आते थे। घंटों ख़ुशामद करते थे, फिर घंटों सुना करते थे। भला रसपिरिया के रस का तुम्हें क्या पता ? बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद ! अरे डूबना पड़ता है, उतरना पड़ता है रसपिरिया गाने के लिए। बाजा ना है मिरदंगिया का गाना कि जब मन चाहा पुट्ट से चालू कर दिया और सुनने का मन न किया तो बंद कर दिया। आदमी है मिरदंगिया, आदमी। मशीन ना है। आदमी के दिल से गाना तभी निकलता है जब उसका दिल कहता है, जब उसका दिल गाता है … क्या कहा रमभजना, मेरे गाने से सिर में दर्द होता है ? … तू क्या कह रहा है गोपी, मेरे गाने में वो मज़ा नहीं है ? (पॉज़) ठीक कह रहा है, वो मज़ा कहाँ है विदापत के गीत में जो सनिमा के गाने में है। अब भला चोली-खटिया-अंडर वियर वाले गानों के सामने रसप्रिया तो दर्द देगा ही। अब तो भजन कीर्तन में भी सनिमा का गाना घुस गया है। का करे, उनकी भी मजबूरी है। न गाये तो कौन सुनेगा उनका गाना। फेंक देंगे घूरे पे, जैसे हम पड़े हैं … हाँ तू ठीकै कह रहा है बलदेवा, चुक गया हूँ। हमें तो गाने का सउरै नहीं है … न सुर, न ताल और न आवाज़ …
(बैठ जाता है) ज़माना बदल गया है गनेशी ! बल्कि कुछ ज़्यादा ही तेज़ी से बदल गया है। दो साल बाद इस इलाक़े में आया हूँ। पता ही नहीं था, इतनी जल्दी बदल जायेगा। शोभा मिसिर के छोटके लड़के ने ठीक ही कहा था, ‘तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया ?’
दर्द में गाने लगता है।,
सुनु, सुनु रसिया,
अब न बजाऊँ विपिन बंसिया …
(गाते-गाते हँसने लगता है) ठीक कहते हैं गाँव वाले, पगला गया है मिरदंगिया। जहाँ जी चाहा, बैठकर बजाने लगता है … बहुत दिनां बाद गाँव लौटा हूँ, लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा है कि अभी भी ज़िन्दा हूँ। वे तो सोचते होंगे, मर-खप गया होगा मिरदंगिया। (आवेश में खड़ा हो जाता है) तो ज़िन्दा कहाँ हूँ? … इसे भला जीना कहते हैं ? निर्लज्जता है ? और थेथरई की भी सीमा होती है … भीख माँग रहा हूँ … दाहिने हाथ की टेढ़ी उँगली मृदंग पर बैठती ही नहीं, मृदंग क्या बजाऊँगा ? अब तो ‘धा-तिंग … धा-तिंग’ भी बड़ी मुश्किल से बजा पाता हूँ। गाँजा-भाँग से आवाज़ भी ख़राब हो गयी है। मृदंग बजाते समय विद्यापति की पदावली गाने की चेष्टा करता हूँ … फूटी भाथी जैसी आवाज़ निकलती है, सोंय-सोंय !
…पन्द्रह-बीस साल पहले तक विद्यापति नाच की थोड़ी पूछ हो जाती थी। शादी-ब्याह, यज्ञ-उपनैन, मुण्डन-छेदन में विदपतिया मंडली की बुलाहट होती थी। … अब तुम्हें क्या मालूम ढाकन … जा-जा के अपने बाप-दादा से पूछ … पूछ कि मिरदंगिया की मंडली का कितना नाम था। पूरे सहरसा और पूर्णिया ज़िले में धाक थी, धाक! कौन नहीं जानता था पंचकौड़ी मिरदंगिया को। सब जानते थे …! अरे इस पंचकौड़ी मिरदंगिया का भी एक ज़माना था !
(कहने के साथ मृदंग पर थाप देता है और गा पड़ता है।,)

जोगिया एक हम देखलौं गे माई। अनहद रूप कहलो नहिं जाई ।।
पंच बदन, तिन नयन बिसाल, वसन-विहुन ओढ़त बघछाल।।
सिर बहे गंग, तिलक सोहे चंदा। देखि सरूप मेटल दुःख दंदा।।
जाति जोगिया लै रहील भवानी। मन आनति वर कौन गुन जानी।।
जोगिया एक हम देखलौं गे माई …

गाते-गाते अचानक रुक जाता है। चरवाहों में से एक चरवाहे को देखकर मिरदंगिया की आँखों में एक नई झलक झिलमिला जाती है।,
अपरूप-रूप !
खेतों, मैदानों, बाग-बगीचों और गाय-बैलों के बीच चरवाहा मोहना की सुन्दरता को देखकर मिरदंगिया की क्षीण ज्योति ,आँखें सजल हो जाती हैं ! उसे पास बुलाते हुए-
ऐ इधर सुन …! हाँ, तुझे बुला रहा हूँ … तुम्हीं को … इधर आ। क्या नाम है तेरा … मोहना … चरवाहा है ? क्या कह रहा है, मेरी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हुई है। ऐ! (चौंककर) रसपिरिया ? हाँ … नहीं … तुमने कैसे जाना, तुमने कहाँ सुना, बे ?
कहते-कहते रुक जाता है। एक तरफ़ बढ़ते हुए ,
नहीं, नहीं बेटा नहीं कहूँगा … परमानपुर में उस बार बाम्हन के लड़के को प्यार से ‘बेटा’ कह दिया था। सारे गाँव के लड़के घेरकर मारने-पीटने को तैयार हो गये थे … शूदर होकर बाम्हन के बच्चे को बेटा कहेगा ? मारो साले बुढ्ढे को घेरकर। मृदंग फोड़ दो। (हँसने लगता है) मैंने कहा, अच्छा इस बार माफ़ कर दो सरकार। अब से आप लोगों को बाप ही कहूँगा।
पॉज़,
बच्चे ख़ुश हो गये थे। एक दो-ढाई साल के नंगे बालक की ठुड्डी पकड़ कर बोला था – क्यों ठीक है न बाप जी ? बच्चे ठठाकर हँस पड़े थे। लेकिन उसके बाद फिर कभी किसी बच्चे को बेटा कहने की हिम्मत नहीं होती है। (चरवाहों की तरफ़ पलटकर) पर पता नहीं क्यों, मोहना को देख-देखकर बार-बार बेटा कहने की इच्छा होती है …
मोहना के पास आकर,
रसप्रिया की बात किसने बताई तुझसे मोहना ? बोलो बेटा ! (स्वगत) इस ज़माने में मोहना जैसा लड़का भी है सुन्दर, सलोना और सुरीला। (प्रकट) क्या कहा रे मोहना, रसपिरिया सुनोगे …? हाँ-हाँ, क्यों नहीं, ज़रूर सुनाऊँगा। पहले बताओ, किसने …
तभी नेपथ्य से चरवाहा पुकारता हैः
चरवाहा : हे ऐ – ए हे – ए मोहना, बैल भागा रे … रे  मोहना , पीठ की चमड़ी उधेड़ेगा करमू।
मोहना :अरे बाप !
मोहना भागता है, पंचकौड़ी पुकार कर-,
मैं यहीं पेड़ की छाया में बैठा हूँ मोहना … बैल, हाँककर ज़रूर लौटना।
खेत के ‘आल’ पर झरजामुन की छाया में पंचकौड़ी मिरदंगिया बैठ जाता है और आलाप भरता है।,

जोगि भंगवा खाइत भेला रंगिया भोला बौड़लवा।
सबके ओढ़ावे ओला साल दुसलवा आप ओढ़य मृगछलवा।
सबके खिलावे भोला पाँच पकवनवा आप खाये भाँग धतुरवा।
कोई चढ़ावे भोला अच्छत चानन कोई चढ़ावे बेलपतवा।
जोगि भँगवा खाइत भेला …

सहसा गाना रोककर खेत की तरफ़ देखने लगता है।,
बड़ी देर लगा दी मोहना ने … कहाँ रह गया ? आया नहीं अभी तक। (अँगोछे से मुँह पर आये पसीने को पोंछकर) अत गरमी है आज तो। … जेठ की चढ़ती दोपहरी में खेतों में काम करने वाले भी अब गीत नहीं गाते हैं। … कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जायेगी क्या ? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है? पांच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलास थी।…पहली वर्षा में भीगी हुई धरती के हरे-हरे पौधों से एक ख़ास क़िस्म की गंध निकलती है। तपती दोपहर में मोम की तरह गल उठती थी-रस की डली।वे गाने लगते थे, बिरहा, चांचर, लगनी। … खेत में काम करते हुए गाने वाले गीत भी समय-असमय का ख़्याल करके गाये जाते हैं। रिमझिम वर्षा में बारहमासा, चिलचिलाती धूप में बिरहा, चांचर और लगनी …
गाता है।,

हाँ … रे हल जोते हलवाहा भैया रे …
खुरपी रे चलावे … मज़दूर !
एहि पंथे, धनी मोरा है रूसली …
ख्गाना रोककर ,

अब तो दोपहरी नीरस ही कटती है, मानों किसी के पास एक शब्द भी नहीं रह गया है।
आसमान में चक्कर काटता हुआ चील टिंहकारी भरता है -टिं … ई… हिं … क ! …,
(गाली देता है) शैतान ! (खड़ा होकर सामने देखते हुए) लगता है, बैलों के पीछे भागते हुए मोहना काफ़ी दूर निकल गया है … जी तो करता है, दौड़कर उसके पास चला जाऊँ। (दूर जाते हुए मवेशियों के झुण्डों की ओर बार-बार देखने की चेष्टा करता है।) हूँ अ अ अ … दूर ही चला गया होगा। दूर तक कुछ भी नहीं दिख रहा है। सब धुँधलका …
(निराश होकर बैठ जाता है) अब तो भूख भी ज़ोरों की लग गई है। (झोली टटोलकर) आम है, मूढ़ी है! … लेकिन मोहना भी तो भूखा होगा! … भूख के मारे मुँह सूख गया होगा। … नहीं, आने दो उसे भी …
जेब से बीड़ी निकालकर पीने लगता है।,
मोहना जैसे सुन्दर, सुशील लड़कों की खोज में ही ज़िन्दगी के अधिकांश दिन बीते हैं ।… विदापत नाच में नाचने वाले ‘नटुआ’ को ढूँढ़ना खेल नहीं … बड़ जात के घर में नहीं, छोटी जात के लोगों के यहाँ मोहना जैसे लड़की मुँहा लड़के हमेशा पैदा नहीं होते। ये अवतार लेते हैं समय-समय पर। जदा-जदा हि …
मैथिल ब्राह्मण, कायस्थों और राजपूतों के यहाँ विदापतवालों की बड़ी इज़्ज़त होती थी … अपनी बोली मैथिलाम में नटुआ के मुँह से ‘जन्म अवधि हम रूप निहारल’ सुनकर वे निहाल हो जाते थे। इसलिए हर मंडली का मूलगैन नटुआ की खोज में गाँव-गाँव भटकता फिरता था … ऐसा लड़का, जिसे सजा-धजाकर नाच में उतारते ही दर्शकों में एक फुसफुसाहट फैल जाए … ठीक ब्राह्मणी की तरह लगता है। है न ? … मधुकर ठाकुर की बेटी की तरह … न ! छोटी चम्पा जैसी सूरत है न ! …न जाने कितने लड़कों को नाच और गाना सिखाया है। नाच और गाना सिखाने में कोई कठिनाई नहीं हुई … मृदंग के बोल पर लड़कों के पाँव ख़ुद ही थिरकने लगते थे। लड़कों के ज़िद्दी माँ-बाप से निबटना मुश्किल व्यापार होता था। विशुद्ध मैथिली में और वो शायद शहद लपेटकर फुसलाना पड़ता था … (एक स्पॉट पर जाकर) ऐ काका ऽ ऽ ऽ … किसन-कन्हैया भी नाचते थे। नाच तो एक गुण है … अरे काका, अब तुम जातक कहो या दसदुआरी … चोरी, डकैती और आवारागर्दी से तो अच्छा है अपना-अपना ‘गुन’ दिखाकर लोगों को रिझाकर गुज़ारा करना ’… एक बार तो लड़के की चोरी भी करनी पड़ी थी … बहुत पुरानी बात है। इतनी मार लगी थी कि … बहुत पुरानी बात है।
तभी नेपथ्य से मोहना की आवाज़ः
मोहना ःपुरानी ही सही, बात तो ठीक है। रसपिरिया  बजाते समय तुम्हारी उँगली टेढ़ी हुई थी। ठीक है न?,
(मिरदंगिया चौंक पड़ता है। अचानक मोहना को सामने खड़ा देखकर उसके चेहरे पर चमक लौट आती है।) अरे मोहना तू ! कब आया ? (मिरदंगिया मोहना की ओर टकटकी लगाकर देखने लगता है) अरे … ये गुणवान तो मर रहा है। धीरे-धीरे तिल-तिलकर खो रहा है। लाल-लाल ओठों पर बीड़ी की कालिख … पेट में तिल्ली है ज़रूर … (पोटली से मूढ़ी और आम निकालते हुए) हाँ गरम पानी ! तेरी तिल्ली बढ़ गयी है। गरम पानी ख़ूब पिओ … क्या कहा, फारबिसगंज के डॉक्टर बाबू कह रहे थे, तिल्ली बढ़ गयी है। दवा … (ज़रा बग़ल हटकर) आगे कहने की हिम्मत नहीं। जानता हूँ मोहना जैसा लड़कों के पेट की तिल्ली चिता पर ही गलती है। क्या होगा पूछकर कि दवा क्यां नहीं करवाते ! (पास आकर) क्या कहती है तेरी माँ, हल्दी की बुकनी के साथ रोज़ गरम पानी पी। तिल्ली गल जायेगी। (मुस्कराकर) बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ।
(केले के पत्तल पर मूढ़ी और आम रखकर बड़े प्यार से) आओ-आओ … एक मुठ्ठी खा लो। … क्या कहा, तुझे भूख नहीं ? नहीं बेटा थोड़ा सा खा लो। एक मुठ्ठी … लो बेटा। रसपिरिया नहीं सुनोगे ? (मोहना को देखकर) तू इस तरह क्या देख रहा है ? सोच क्या रहा है ? (मिरदंगिया अप्रतिम हो जाता है। उसकी आँखें सजल हो जाती हैं।) मोहना ! रे मोहना, कहाँ खो गया ? कुछ खाता क्यों नहीं ? तुझे भूख नहीं ?… क्या कह रहा है, दूसरे चरवाहे देख लेंगे तो माँ से कह देंगे। … क्या कह देंगे ? (पॉज़) भीख का अन्न ! मैं भीख माँगता हूँ … (मिरदंगिया के आत्मसम्मान को ठेस लगती है। उसके मन की झाँपी में कुण्डलाकर सोया साँप फन फैलाकर फुँफकार उठता है) भीख ! कौन भीख माँगता है ? कौन कहता है ये भीख का अन्न है। (चीख़कर) ए स्साला ! मारेंगे वो तमाचा कि … क्या कहा, गाली क्यां दे रहा हूँ …
आसमान में उड़ती हुई चील टिंहकारी भरती है … टिं हीं … टीं … टिंग …,
(मिरदंगिया चिल्ला पड़ता है) चोप्प ! शैतान ! … (मिरदंगिया की आवाज़ गम्भीर हो जाती है) मोहना!… (मोहना की तरफ़ धीरे-धीरे बढ़ते हुए) किसने कहा तुमसे कि मैं भीख माँगता हूँ ? अरे मैं तो मिरदंग बजाकर, पदावली गा कर, लोगों को रिझाकर पेट पालता हूँ … तुम ठीक कहते हो, भीख का ही अन्न है, ये। भीख का फल है ये … मैं नहीं दूँगा … तुम बैठो, मैं रसपिरिया सुना दूँ। आ … इधर आ के बैठ …
कहने के साथ मिरदंगिया का चेहरा धीरे-धीरे विकृत होने लगता है। आसमान में उड़ने वाली चील ज़ोरों की टिंहकारी भरती है- टिं-टिं-हिं … टिं टिं क !
मिरदंगिया गाता है।,

जौ हम जानित हु भोला भेल ढकना होइत हुँ राम गुलाम, गे माई।
भाई विभीखन बड़ तप कैलन्हि जलपन्हि रामक नाम, गे माई।।

डरकर भाग रहे मोहना को देखकर ,
अरे रे रे … भाग काहे रहा है ? मोहना … सुन … सुन मोहना ! मोहना !
एक बीघा दूर जाकर मोहना चिल्लाता है।
मोहना ःडायन ने बान मारकर तुम्हारी उँगली टेढ़ी कर  दी है। झूठ क्यों कहते हो रसपिरिया बजाते समय …, ऐ ! कौन है ये लड़का ? कौन है ये मोहना ? रमपतिया भी कहती थी डायन ने बान मार दिया ! (ज़ोर से चिल्लाकर आवाज़ देता है) मोहना !
मोहना जाते-जाते कहता है : करैला …! करैला …! ,
अच्छा तो मोहना ये भी जानता है कि मैं करेला कहने से चिढ़ता हूँ । कौन है ये मोहना ?
मिरदंगिया आतंकित हो उठता है। एक अज्ञात भय मन में समा जाता है। वह थर-थर काँपने लगता है।,
सुबह शोभा मिसिर के लड़के ने ठीक ही कहा था … तू जी रहा है या थेथरई कर रहा है मिरदंगिया …
मिरदंगिया के आँखों में आँसू झरने लगते हैं।,
जाते-जाते मोहना ने भी डंक मार दिया। न जाने कितने लड़कों ने मेरे साथ व्यवहार किया है। नाच सीखकर फुर्र से उड़ जाने का बहाना खोजने वाले एक-एक लड़के की बातें याद हैं … सोनमा ने तो गाली ही दी थी- ‘गुरुगीरी करता है, चोट्टा !’ (पॉज़) हाँ, यही कहा था- ‘चोट्टा’ !
टूटकर धम्म से ज़मीन पर बैठ जाता हैं।,
रमपतिया आकाश की ओर हाथ उठाकर बोली थी …
नेपथ्य से रमपतिया की आवाज़ :
रमपतियाः हे दिनकर, साच्छी रहना। मिरदंगिया ने फुसलाकर मेरा सर्वनाश किया है। मेरे मन में कभी चोर  नहीं था। हे सुरज भगवान् इस दस-दुआरी कुत्ते का  अंग-अंग फूटकर …
मिरदंगिया अपनी टेढ़ी उँगली को हिलाते हुए एक लम्बी साँस लेता है।,
(कोई पुराना ज़ख़्म उभर गया हो) रमपतिया ! … (जैसे कुछ याद आने लगा हो।) रमपतिया ! … जोधन गुरुजी की बेटी रमपतिया ! जिस दिन वो पहले-पहल जोधन गुरुजी की मंडली में शामिल हुआ था- रमपतिया बारहवें में पाँव रख रही थी ! … बाल विधवा रमपतिया पदों का अर्थ समझने लगी थी। काम करते-करते वो गुनगुनाती, ‘नव अनुराधिनी राधा, किछु नहिं मानय बाधा।’ आठ वर्ष तक तालीम पाने के बाद जब गुरुजी ने रमपतिया से ब्याह की बात चलाई तो सभी ताल-मात्रा भूल गया। जोधन गुरुजी से अपनी जात छिपा रखी थी। नहीं बताया था कि मैं शूदर हूँ। झूठा परेम किया था रमपतिया से। गुरुजी की मंडली छोड़कर रातों-रात भाग गया। गाँव आकर अपनी मण्डली बनाई। लड़कों को सिखाया-पढ़ाया और कमाने-खाने लगा … लेकिन मैं मूलगैन नहीं हो सका। कभी नहीं। मिरदंगिया ही रहा सब दिन।
पॉज़ 
जोधन गुरुजी के मरने के बाद … एक बार गुलाब बाग़ मेले में रमपतिया से भेंट हुई थी। रमपतिया मुझसे मिलने आयी थी … मैंने साफ़ जवाब दे दिया था – क्या झूठ-फ़रेब जोड़ने आई है रे ? कमलपूर के नन्द बाबू के पास क्यों नहीं जाती, मुझे उल्लू बनाने आई है। नन्दू बाबू का घोड़ा बारह बजे रात को …
पॉज़
चीख़ उठी थी रमपतिया …
रमपतिया ः पाँचू, चुप रहो !
रमपतिया की बात सुनकर मिरदंगिया तेज़ क़दमों से अभिनय स्थल के एक कोने की तरफ़ जाता है। इधर से उधर चहलक़दमी करता है। काफ़ी तनाव में है। पसीना-पसीना हो रहा है। अचानक मुड़कर मृदंग के पास आता है और बैठकर तेज़ गति से बजाने लगता है। मृदंग पर जमनिका देकर परबेस का ताल बजाने लगता है। नटुआ डेढ़ मात्रा बेताला होकर प्रवेश करता है। तो मिरदंगिया का माथा ठनकता है। चीख़ पड़ता है।,
कलिया ! का कर रहा है, का कर रहा है ? बेताला क्यों हो रहा है ? ठीक से नाच। ताल क्यों नहीं पकड़ता ? ए स्साला, ऐसा थप्पड़ मारूँगा कि गाल लाल कर दूँगा … (खड़ा हो जाता है। ग़्ास्से से तमतमाते हुए) चुप स्साले ! मुझसे ज़ुबान लड़ाता है ? कल का लौंडा मिरदंगिया को सिखायेगा ? तू ताल पर नाच रहा है ? हमको सिखाता है, जवाब देता है। मुझे सिखायेगा ताल और मात्रा … देख, सुन ताल…
कहने के साथ मिरदंगिया बैठकर फिर से मृदंग बजाने लगता है। लेकिन रसपिरिया की पहली कड़ी ही टूट जाती है। ताल को सम्हालने की बहुत चेष्टा करता है। मृदंग की सूखी चमड़ी जी उठती है, दाहिने पूरे पर लावा-फरही फूटने लगता है और ताल कटते-कटते उसकी उँगली टेढ़ी हो जाती है।,
अरे ये … ये क्या हो गया मुझे ? … मेरी उँगली को क्या हुआ ?… सीधी क्यां नहीं हो रही … कालिया देख, मेरी उँगली तो टेढ़ी हो गयी … कालिया अब मैं मृदंग कैसे बजाऊँगा रे … थाप कैसे दूँगा … कालिया मैं तो बरबाद हो गया … लुट गया … मर गया रे, मर गया …
ज़मीन पर हाथ पटक-पटक कर विलाप करने लगता है। दुःख से उबर जाने के पश्चात-,
(ज़रा सामान्य होकर) फिर हमेशा के लिए उँगली टूट गयी … धीरे-धीरे इलाक़े से विद्यापति का नाच ही उठ गया। अब तो कोई विद्यापति की चर्चा भी नहीं करता है। बेकार ज़िन्दगी में मृदंग ने बड़ा काम किया। बेकारी का एकमात्र सहारा मृदंग ! एक युग से गले में मृदंग को लटकाकर भीख माँग रहा हूँ – धा तिंग, धा तिंग …
(एक आम उठाकर चूसने लगता है) लेकिन … लेकिन … मोहना को डायन की बात कैसे मालूम हुई ? (पॉज़) याद है मुझे, उँगली टेढ़ी होने की ख़बर सुनकर रमपतिया दौड़ी आई थी, घंटों उँगली को पकड़कर रोती रही …
नेपथ्य से आवाज़,
रमपतिया ः हे दिनकर, किसने इतनी बड़ी दुश्मनी की ?  उसका बुरा हो … मेरी बात लौटा दो भगवान् ! गुस्से  में  कहीं हुई बातें। नहीं, नहीं पाँचू, मैंने कुछ नहीं किया है।  ज़रूर किसी डायन ने बान मार दिया है।
(मिरदंगिया आँखें पूछते ढलने हुए सूरज की ओर देखता है।) इस मृदंग को कलेजे से सटाकर रमपतिया ने न जाने कितनी रातें काटी हैं …
मृदंग को वो छाती से लगा लेता है। पेड़ की डाली पर बैठी हुई चील की आवाज़ : टिं-टिं-हिंक !… ,
(गाली देते हुए) ए-स्साला ! चोप्प …! जब देखो तब टिं-टिं-हिंक किये रहता है … तम्बाकू चुनिया कर मुँह में डालता है और मृदंग के पूरे पर उँगलियाँ नचाने लगता है।, धिरि नागि, धिरि नागि, धिरि नागि-धिनना …!
पूरी जमनिका बजा नहीं पाता है, बीच में ही ताल टूट जाता है। अ-कि-हे-ए-ए-ए हा आ आ ह-हा ! …
समने झरबेरी के जंगल के उस पार से कोई सुरीली आवाज़ में बड़े समारोह के साथ रसपिरिया की पदावली उठाता है।,
(पदावली :

नव वृन्दावन नव-नव तरु गन, नव-नव विकसित फूल।
नवल बसन्त नवल मलयानिल मातल नव अलि फूल।।…)

मिरदंगिया के सारे शरीर में लहर दौड़ जाती है। उसकी उँगली स्वयं ही मृदंग के पूरे पर थिरकने लगती है …
रसप्रिया की सुरीली रागिनी ताल पर सहसा कट जाती है। मिरदंगिया का पागलपन बढ़ जाती है। उठकर आवाज़ की तलाश में अभिनय स्थल में इधर-उधर दौड़ने लगता है।,
कौन है ? कौन है ? कौन है ? (एक कोने की तरफ़ मुड़कर) कौन है झबेरी गाड़ी के उस पार ? कौन है शुद्ध रसप्रिया गाने वाला …? इस ज़माने में रसप्रिया का रसिक …?
मिरदंगिया दबे क़दमों से झाड़ी के उस पार जाती है। छिपकर देखता है।,
अरे … ये तो मोहना है!… लगता है दूसरे पद की तैयारी कर रहा है … वाह ! अति सुन्दर …! मनभावन …! लगता है जैसे मोहना के गले में राधा आकर बैठ गई है। क्या बन्दिश है …?
मोहन गाता है।
(पदावली :
नदी बह नयनक नी … र।
आ हो … पललि बहए ताहि ती … र …!)
मिरदंगिया एकटक मोहन को निहारता रहता है। फिर स्वतः उसकी उँगलियाँ फिरकी की तरह नाचने को व्याकुल होने लगती हैं। चालीस वर्ष का अधपागल युगों के बाद भावावेश में नाचने लगता है। रह-रहकर वो अपनी विकृत आवाज़ में पदों की कड़ी गाता है।
(पदावली :
छुहू रस-मय तनू गुने नहीं ओर।
लगल दुहुक न भाँगय जोर।।..).
गाते-गाते अचानक मिरदंगिया मोहना को सामने देखकर चुप हो जाता हैं।,
वाह मोहना वाह ! (मिरदंगिया धम्म से ज़मीन पर बैठ जाता है) कमाल कर दिया …! कमाल …! किससे सीखा रे ? कहाँ से सीखी तुमने ये पदावली …? कौन है तुम्हारा गुरु …? कहीं नहीं सीखा …! तुम्हारी माँ रोज़ गाती है ! प्रातकी तुम्हें बहुत याद है, लेकिन अभी उसका समय नहीं … हाँ बेटा ! बेताले के साथ कभी मत गाना-बजाना। जो कुछ भी है, सब चला जायेगा। समय-कुसम य का भी ख़्याल करना। लो, अब आम खा लो … एक और लो … लो मूढ़ी भी फाँक लो … (ज़रा क़रीब आकर) अच्छा एक बात बताओगे मोहना, तुम्हारे माँ-बाप क्या करते हैं …? क्या बाप नहीं हैं, अकेली माँ हैं। बाबू लोगों के घर कुटाई-पिसाई करती हैं … और तुम नौकरी करते हो ? किसके यहाँ ? कमलपुर के नन्दू बाबा के यहाँ … नन्दू बाबू के यहाँ … तुम्हारा घर सहरसा में है ? अच्छा, तीसरे साल सारा गाँव कोसी मैया के पेट में चला गया इसलिए माँ तुम्हें लेकर ममहर आ गयी … कमलपुर … कमलपुर में तुम्हारी माँ के मामू रहते हैं ?
मिरदंगिया कुछ क्षण तक चुपचाप सूर्य की ओर देखता रहता हैं।,
नन्दू बाबू .. मोहना … मोहना की माँ … (मोहना की तरफ़ तेज़ी से मुड़कर) डायन वाली बात तुम्हारी माँ कह रही थीं … ? और क्या कह रही थीं … सोमदेव झा के यहाँ जनेऊ में मैंने गिरधर पट्टी वालों का मिरदंगिया छीन लिया था … बेताला बजा रहा था … हाँ ठीक रही थी तुम्हारी माँ … ठीक …
मिरदंगिया की खिचड़ी दाढ़ी मानो अचानक सफ़ेद हो जाती है। अपने को सम्भाल कर पूछता है।,
मोहना, तुम्हारे बाप का क्या नाम है?… अजोधा दास ।… (स्वगत) बूढ़ा अजोधा दास, जिसके मुँह में न बोल, न आँख में लोर … मण्डली में गठरी ढोता था। बिना पैसे का नौकर बेचारा अजोधा दास। (प्रकट) बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ …
लम्बी साँस लेकर मिरदंगिया अपनी झोली से एक छोटा बटुआ निकालता है। लाल-पीले कपड़ों के टुकड़ों को खोलकर काग़ज़ की पुड़िया निकालता है।,
हाँ नोट है … पंचटकिया … या दसटकिया … छूना चाहते हो, हाँ हाँ इसे छुओ इसे ! … हाँ, सब मिलकर चालीस रुपये हैं।
मिरदंगिया एक बार फिर इधर-उधर निगाहें दौड़ाता है, फिर फुसफुसाकर बोलता है।,
मोहना बेटा ! फारबिसगंज के डागदर बाबू को देकर दवा लिखवा लेना। खट्ट-मिट्ठ का परहेज़ करना … गरम पानी ज़रूर पीना … ले जल्दी रख ले, कोई देख लेगा … (पॉज़) बीड़ी-तम्बाकू भी पीते हो, ख़बरदार …! ले रख ले रुपये। अच्छी तरह गाँठ में बाँध ले। हाँ, माँ से कुछ मत कहना … और हाँ, ये भीख का पैसा नहीं है। बेटा, ये कमाई के पैसे हैं। अपनी कमाई के … (बोलते-बोलते थोड़ा भावुक हो जाता है) अच्छा, मोहना चलता हूँ … क्या कहा, तेरी माँ खेत में घास काट रही है … मैं भी चलूँ ? (मिरदंगिया का जाने का मन करता है, कुछ क़दम बढ़ भी जाते हैं कि बढ़ते-बढ़ते रुक जाते हैं) नहीं मोहना, अभी मुझे कहीं और जाना है … तुम्हारे जैसा गुणवान बेटा पाकर तुम्हारी माँ ‘महारानी’ है, मैं महाभिखारी, दसदुआरी हूँ। जाचक, फ़कीर … हाँ सुन, दवा से जो पैसे बचें, उसका दूध पीना … (स्वगत) मोहना की बड़ी-बड़ी आँखें कमलपुर के नन्दू बाबू की आँखों जैसी हैं …
नेपथ्य से आवाज़ : रे मोहना, मो-ह-ना रे ! बैल कहाँ हैं रे ? ,
(मोहना की तरफ़ मुड़कर) तुम्हारी माँ पुकार रही है शायद … क्या कहा, मैंने कैसे जान लिया ?
फिर आवाज़ : रे मोहना रे हे …,
जाओ मोहना … माँ बुला रही है। जाओ … अब से मैं पदावली नहीं, रसपिरिया नहीं, निरगुन गाऊँगा। देखो, मेरी उँगली शायद सीधी हो रही है। शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल ?
निरगुन,
अरे, चलू मन, चलू मन-ससुरार जइबे हो रामा, कि आ हो रामा,
नैहर में अगिया लगायब रे … की
निरगुन गाता हुआ झरबेरी की झाड़ियों में छिप जाता है। पीछे हो रही बातों को सुनने लगता है।
माँ ः ले। यहाँ अकेला खड़ा होकर क्या करता है ? कौन  बजा रहा था मृदंग रे ?
मोहनाः पंचकोड़ी मिरदंगिया।
माँ ः एें! वो आया है ? आया है वो ?
मोहना ः मैंने उसके ताल पर रसपिरिया गाया है  कहता था, इतना शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है  आजकल ? … उसकी उँगली अब ठीक हो जायेगी।
माँ ः (आह्लाद से मोहना को छाती से सटा लेती है) सच  मोहना, सच।
मोहनाः लेकिन तू तो हमेशा उसकी टोकरी भर  शिकायत करती थी, बेईमान है, गरू-दरोही है, झूठा है।
माँ ः है तो ! वैसे लोगों की संगत ठीक नहीं। ख़बरदार,  जो उसके साथ फिर गया। इस दुआरी जाचकों से  हेल-मेल करके अपना ही नुक़सान होता है … चल,  उठा बोझ।
मोहना ः(बोझ उठाते हुए) जो भी हो, गुनी आदमी के  साथ रसपिरिया …
माँ ः चोप्प ! रसपिरिया का नाम मत ले।
मोहना ः तू भी अजीब है माँ ! जब गुस्सायेगी तो  बाघिन की तरह और जब ख़ुश होती है तो गाय की तरह  हुंकारती आवेगी और छाती से लगा लेगी। तुरत ख़ुश,  तुरत नाराज़ …)
(मिरदंगिया मृदंग बजाने लगता है – ध तिंग धा-तिंग, धा तिंग..) 
(नेपथ्य से आवाज़ :
मोहना ः(उबड़-खाबड़ मेड़ पर चलते-चलते माँ के  अचानक लड़खड़ा जाने पर) क्या हुआ, माँ ?
माँ ः कुछ नहीं।
(मिरदंगिया मृदंग बजाये जा रहा है।)
माँ ः मिरदंगिया और कुछ नहीं बोलता था, बेटा ?
मोहनाः कहता था, तुम्हारे जैसा गुणवान बेटा  पाकर तुम्हारी माँ ‘महारानी’ है, मैं तो दसदुआरी हूँ …
माँ ः झूठा बेईमान ! (आँसू पोछते हुए) ऐसे लोगों की संगत कभी मत करना।(बिल्कुल टूटते हुए रमपतिया के कहे हुए शब्दों के साथ दोहराते हुए ,) झूठा ! बेईमान !
मिरदंगिया के मृदंग बजाने की थाप और तेज़। द्वन्द्वपूर्ण गति से मृदंग बजाने लगता है। होशो-हवास खोने लगता है। उस पर पागलपन सवार हो जाता है। बजाते-बजाते आँखों से आँसू निकलने लगते हैं। झर-झर बहने लगते हैं। लेकिन बेसुध बजाये जा रहा है … बजाये जा रहा है … निठाल होकर ज़मीन पर गिर पड़ता है … धीरे-धीरे उठता है … गहरे निषाद में आलाप भरता है और गाने लगता है …,
(गीत)

कहे के त सब कोई आपन
आपन कहावे वाला के बा …
सुखवा के सब कोई बाटे …
दुखवा बटावे वाला के बा …
हे भोले नाथ …

शाम ढलने लगती है। धीरे-धीरे चारों तरफ़ अँधेरा फैलने लगता है।,

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    By: राजेश कुमार

    (जन्म 11 जनवरी 1958, पटना) रंगमंच की तीसरी धारा का रंगकर्मी । नाटक के माध्यम से चेतना प्रसार का प्रबल समर्थक । सन् 1976 से अब तक अनवरत् रंगकर्म करने वाले होलटाइमर। शिक्षा ः प्रारंभिक शिक्षा आरा से । भागलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से बी0 एस0 सी0 (इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग)।
    नौकरी ः उ0 प्र0 पावर कारपोरेशन में अधीक्षण अभियंता ।
    थियेटर ः भोजपुर की चर्चित नाट्य संस्था ‘युवा नीति ‘, भागलपुर की ‘दिशा‘ , अलीगढ़ की ‘दृष्टि ‘, शाहजहांपुर की ‘ अभिव्यक्ति‘ और लखनऊ की ‘धार‘ के संस्थापक सदस्यों में से । शुरुआत मंच नाटक से लेकिन शीघ्र एक जरुरत के तहत नुक्कड़ नाटक की तरफ टर्न ।
    डेढ़ दशक तक लगातार कार्य करने के बाद पुनः प्रोसिनयम की तरफ । फिलहाल एकल नाट्य विद्या पर गंभीरता से कार्यरत्।
    लेखन ः देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में एक दर्जन कहानियां एवं दो दर्जन से अधिक नुक्कड़ नाटकों का प्रकाशन । दो नुक्कड़ नाटक पुस्तिकाओं (‘नाटक से नुक्कड़ नाटक तक‘ और मोरचा लगाता नाटक‘) का संयुक्त संपादन ।
    पूर्णकालिक नाटक ः झोपड़पट्टी, आखिरी सलाम, अंतिम युद्व, गांधी ने कहा था, घर वापसी, मार पराजय, हवनकुंड सत भाषै रैदास, गांधी और अम्बेडकर, द लास्ट सैल्यूट ,सुखिया मर गया भूख से और असमाप्त संवाद ।
    प्रकाषित नुक्कड़ नाट्य संग्रह ः हमें बोलने दो, जनतंत्र के मुर्गे‘ ,‘ कोरस का संवाद ‘ नुक्कड़ नाटक संग्रह का संपादन। एकल संग्रह प्रकाशित ः पांच एकल (शताब्दी की परछाइयां) ।
    सम्पर्क ः बी- 206, रोहिणी अपार्टमेन्ट, सेक्टर-4, गोमती नगर विस्तार,
    लखनऊ 226010 मो. ः 09453737307
    ई मेल ः rajeshkr1101@gmail.com

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