रहिमन पानी राखिये… 

मैं पीछे क्यों रहूँ

अनीता चौधरी

मनुष्य को जीवन जीने के लिए मुख्य रूप से तीन चीजों की जरुरत होती है हवा, पानी और भोजन | जिस तरह से हवा और भोजन के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार पानी के बिना भी जीवन निष्प्राण हैं | देश में जमीन के भीतर के पानी का स्तर जिस तरीके से नीचे की ओर जा रहा है | तमाम पर्यावरणविदों के साथ साथ अन्य छोटे बड़े वर्गों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है |

भारत विश्व की सतह के 2.4% भाग पर स्थित है जिसकी आबादी दुनिया की लगभग 17% हैं | और हमारे देश में जल का प्राकृतिक संसाधन के रूप में संसार का 4% हिस्सा मौजूद हैं लेकिन देश में विभिन्न जलवायु होने के कारण इसकी उपलब्धता हर स्थान पर समान न होने की वजह से पेयजल की कमी हो जाती है | जिन स्थानों पर पर पेयजल प्रचुर मात्रा में मौजूद है वहां  प्रकृति की इस बहुमूल्य संपदा का जमकर दोहन किया जा रहा है |  पिछले दस सालों में देश में लगातार बढ़ते भूजल के दोहन के कारण जल स्तर काफी नीचे चला गया है | केंद्रीय भूमि जल प्राधिकरण के मुताबिक़ पूरे देश में करीब-करीब 18 राज्यों के लगभग 286 जिलों में पिछले पन्द्रह सालों के दौरान चार मीटर (13 फुट) भूजल का स्तर गिर चुका है | देश के कुछ राज्यों में जैसे – पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, बिहार, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश के पूर्वी इलाके, राजस्थान और उत्तरप्रदेश आदि में भारी गिरावट देखी गई है |
कहीं-कहीं सूखा पड़ने की वजह से भी भूमि से अत्याधिक जल का उपयोग करना भी खतरनाक स्थिति पैदा कर देता है और वहां की सारी कृषि भूजल पर ही निर्भर होती है | जो फसल बरसात के पानी से हो सकती थी | वर्षा समय पर न आने की वजह से फसलों की सिचाई भूजल से ही करनी पड़ती है | जिसके के कारण जल स्तर में गिरावट आ रही है | पंजाब व हरियाणा जैसे क्षेत्रों में धान की खेती के लिए पानी की बहुत बड़ी समस्या खडी हो गयी है | पंजाब में 80% क्षेत्रों का पानी सूख चुका है कमोवेश यही स्थिति हरियाणा की भी है क्योंकि धान की फसल को पैदा करने के लिए दूसरी फसलों की अपेक्षा दस गुना ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है
गौर करने वाली बात यह है कि जमीन में पानी के रिचार्ज के मुकाबले फसल की सिचाई के लिए टयूबवेल 40 से 50 फीसदी भूजल का दोहन कर रहे है | हरियाणा स्टेट माइनर इरिगेशन ट्यूबवेल कॉरपोरेशन और सेन्ट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1996 में 27,957 ट्यूबवेल थे लेकिन 2000 में इसकी तादाद बढ़कर 83,705 हो गई और इस समय करीब 611603 ट्यूबवेल है यही स्थिति लगभग हर राज्य की है |
जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहां वर्षा का सारा पानी बाढ़ की स्थिति पैदा करके इधर- उधर बहकर खराब हो जाता है | आज थोड़ी सी भी बारिश होने पर नदियों में बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है क्योंकि समय समय पर नहरों व नदियों की खुदाई नहीं हो पाती | जिससे इनमें अधिक से अधिक पानी को एकत्रित किया जा सके और किसानों को कृषि के लिए समय पर पानी उपलब्ध हो सके और वातावरण में संतुलन की स्थिति पैदा हो सके | कई जगहों पर सरकारों की उदासीनता के चलते कुछ नदी व नहरे लुप्त हो चुके है या होने की कगार पर आ चुके है |
भूजल सभी जीवों के लिए पानी उपलब्ध कराने का सबसे सुरक्षित, स्थायी और बड़ा श्रोत है | नदी, नहरों तथा अन्य बहते हुए पानी के श्रोतों का उपयोग सभी स्थानों पर रहने वाले लोग नहीं कर सकते हैं ऐसी स्थिति में उनके लिए जमीन के अन्दर का पानी बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है | यह मौसम के प्रभाव को भी कम करने में सक्षम होता है | हमने अक्सर देखा है कि सर्दियों के दिनों में जमीन के अन्दर का पानी गर्म और गर्मियों में ठंडा होता है | सतह पर मिलने वाले जल की अपेक्षा भूजल के प्रदूषित होने के खतरे भी कम होते है यह जल बहुत ही सस्ता और सुविधाजनक होता है | इसीलिए यह आम तौर पर सार्वजानिक पानी की आपूर्ति के लिए उपयोग किया जाता है |
हमारे देश में बांधों की संख्या भी कम है जो कि देश की कृषि व्यवस्था को विकसित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते है | पंजाब का भाखड़ा नागल बाँध इसका उदाहरण है जिसकी वजह से पिछड़े क्षेत्र भी अब खेती के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो चुके है शहरों में बढ़ता औद्योगीकरण भी भूजल के गिरते स्तर के लिए जिम्मेदार है | प्रदेशों में ऊँची इमारतों तथा अन्य कारणों के लिए अत्याधिक जल को सींचा जा रहा है इसमें सबसे ज्यादा पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रभावित हुआ है | भूजल संचयन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए अनियंत्रित विकास की वजह से मुजफ्फरनगर के आठ ब्लाकों और सहारनपुर के अनेक क्षेत्रों की जमीन सूखकर चटक गयी है | आजकल गाँव से लेकर कस्बों तथा नगरों तक में हर घर में सबमर्सेबिल लगे हुए हैं जहाँ एक बाल्टी की जरुरत होने पर, एक बटन दबाकर दसों बाल्टी पानी फैला दिया जाता है और कई बार तो बिना काम के भी पानी नालियों में चलता ही रहता है इसका कारण बाजार में विकसित होती नई तकनीकी उपकरणों की सस्ती उपलब्धता और भूजल के प्रति लोगों में जानकारी का अभाव भी है |

नगर, कस्बों और शहरों में लगने वाले आरो प्लांट भी जल स्तर को नीचे पहुंचाने में अच्छी खासी भूमिका निभाते हैं जिन जगहों पर यह आरो प्लांट लगे हैं वहां आसपास के सारे कूओं और हैण्डपम्पों का पानी सूख चुका है या जल स्तर में भारी गिरावट देखी गई है | क्योंकि आरो प्लांट से जितना पानी हम पीने योग्य बनाते है उसका कई गुना पानी हम खराब समझकर उसे नालियों में बहा देते है | उधर सरकार भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को स्वच्छ जल बॉटलिंग व पेय पदार्थो के नाम पर आसान
तरीके से लाइसेंस उपलब्ध करा देती है | जिनमें कि कोकाकोला के 52 प्लांट देश भर में लगे हुए है इस सम्बन्ध में केरल के प्लाचीमाड़ा का उदाहरण दिया जा सकता है कि वहां पर इस सयंत्र की वजह से कई किलोमीटर के दायरे में ज़मीन का पानी लगभग पूरी तरह ख़त्म हो रहा है और स्थानीय कूएं सूख चुके हैं | जल स्तर नीचे गिरने की वजह से पानी में खारेपन की समस्या पैदा होना आम बात है |

खारे पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड अधिक होने की वजह से देश में लाखों लोगों को ख़तरा पैदा हो गया है फ्लोराइड की उच्च सांद्रता में सेवन करने से गर्दन और पीठ को भारी नुक्सान होता है और दांतों की बीमारियों की एक लंबी श्रंखला बन जाती हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है | स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार पेयजल में 50 टोटल सॉलिड से ज्यादा नहीं होना चाहिए जबकि कुछ इलाकों में इसकी मात्रा १२०० तक पहुँच गयी है इससे पेट और किडनी संबंधी बीमारियों की आशंका बढ़ रही है |
भूजल को बचाने के लिए ग्राउंड वाटर कंजर्वेशन, प्रोटेक्शन एंड डेवलपमेंट बिल २०१० कई सालों से ठन्डे बस्ते में पडा है | सरकार को इस तरह के बिलों को जल्द से जल्द कठोरता से लागू कराने कि जरुरत है और साथ ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को मिलने वाले लाइसेंसों को रद्द करने जैसी कार्यवाहियों को अमल में लाये जाने चाहिए जिससे हम अपने भूजल को बचा सके | जरूरत इस बात की भी है कि सरकार को समय समय पर लोगों के बीच वाटर अवेयरनेस कैम्प और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिये गाँव- गाँव जाकर लोगों को पानी के महत्व को समझाने की आवश्यकता पर बल दिया जाना चाहिए | साथ ही अपनी इस भावी पीढ़ी को पानी के सम्बन्ध में शिक्षा देने की जरुरत है जिससे वे पानी के प्रति जागरूक हो सकै और इस पानी की बर्बादी की मुहिम में बड चढ़ कर हिस्सा लें | इसके लिए हमें विद्यालय और कोलेजों को भी जागरूक करना होगा वहाँ पर कार्यशालाओं और सेमीनार के माध्यम से जागरूकता लाने की भी जरुरत है |
बरहाल, गिरते भूजल स्तर को रोकने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया जाना चाहिए | सरकार के अलावा हम सब को इस मुहिम को आगे बढाते हुए वाटर गार्जियन बनने की जरुरत है | शायद तभी हम इस बढ़ते जल संकट से उबर सकते है | यह वर्तमान को सुलझाने का समय भी है और भविष्य के लिए बड़े खतरे की घंटी इस समस्या से सचेत होने की है , क्योंकि पृथ्वी पर जीवों के जीवन का बड़ा आधार पानी ही है |

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