जैसे रेगिस्तान की तपती दोपहरी में पानी का दिख भर जाना भी तृषाग्नि को असीम शांति से भरकर थके क़दमों में भी एक अजीब जोश का संचरण कर देता है ……ठीक ऐसे ही जीवन संघर्ष की आपाधापी, एवं वैचारिक द्वंद्ध की गंभीरता से ढके समय के बीच पारुल तोमर की कलम से निकलती कवितायें प्राकृतिक सौन्दर्य को उसी सुन्दरता के साथ वयां करतीहैं ….. जो  क्षण भर को ही सही मन में सुकून और होठों पर मुस्कान ला देने की क्षमता रखतीं हैं | –  संपादक 

रात बिखरने लगी है

नीलांबर के
शामियाने में चाँद ने
सितारे जड़ना शुरू ही किया था
कि पक्षियों के समूह
मेघों के झरने से  नहाकर…
सुन्दर  कल्पनाओं  की
उड़ान भरते
अतीत में हँसते
वर्तमान से जूझते
नीड़ों की तलाश में  लौटने लगे …
कच्ची दीवारों के
आहतें में खड़ा मौन
हरसिगांर किसी प्रिय की
स्मृति में और भी  महकने लगा है…
और शाँत सपनीली रात
रहस्यमयी चुनर ओढ़े
दालानों में  बिखर कर
निखरने लगी है…
पलकों में कुछ
अनकहे ख्वाब सँवरने लगें हैं
अनजाने से कुछ गीत
फिर से बुनने लगें हैं…….!

रात होने वाली है 

गूगल से साभार

गूगल से साभार

साँझ की दुल्हन
अपनी सिन्दूरी ओढ़नी
ओढकर फिर चली आ रही है
वो तमाम मायावी चीज़ें
बिखरी जो संसार में
सिमटती जा रही है
पलाश और सुर्ख
होकर दहक रहा है…..
गुलमोहरी हँसी की
बारिशें मन को भिगो रहीं है
तुम्हारीं नशीली बातों की
जादूगरी समय को
हठीला बना रही है
खुशी और उदासी का
अहसास
शायद कहीं कोई तारा
फिर टूट कर बिखर रहा है
साँझ की गहरी खामोशियाँ
धीरे -धीरे बढ़ चली है
तुम्हारी बातें और हँसी
की खुशबू अब पिघलने लगी है
शायद रात होने वाली है…

Leave a Reply

Your email address will not be published.