राहुल गुप्ता की दो ग़ज़लें

राहुल गुप्ता

1 – ग़ज़ल 

कब सुबह होगी, कब निजाम बदलेगा ?
इंतहा बदलेगी या अवाम बदलेगा ?

भूख, मुफलिसी, ज़ुल्म और बेरोज़गारी,
बता ! कैसे ये चहरे तमाम बदलेगा ?

सुना है तेरे यार तेरी तरह ही नंगे हैं,
खुद को बदलेगा या हमाम बदलेगा ?

ये सियासत है सिर्फ चहरे बदलदेगी,
न हुजूम बदलेगा न तामझाम बदलेगा ।

खुद को बदल ले अभी समय है बाकी,
मेरे भाई कब तक सिर्फ नाम बदलेगा ?

वो कौन है ? कहाँ है ? कब आएगा ?
जो इन गर्दिशों का पयाम बदलेगा ।

ज़ुल्मो सितम की रिवायत का मैं विरोधी हू,
न मैं बदलूँगा ना मेरा काम बदलेगा |

पेंटिंग- के0 रवींद्र

2 – ग़ज़ल 

जो बोलूँगा सच बोलूँगा मान भी ले ।
जंग लगे ताले खोलूंगा मान भी ले ।

मुझसे जो आगे निकलेगा, रोकूंगा,
हद दर्जे की चाल चलूँगा मान भी ले ।

तुझमें मुझमें फर्क पता चल जाएगा,
एक तराजू पर तोलूँगा मान भी ले |

अगर सिंहासन मुझे नहीं मिल पाया तो.
ज़हर फजाओं में घोलूँगा मान भी ले |

रोटी, कपड़ा और मकाँ की बात तेरी है,
मैं तो इससे ज्यादा लूँगा मान भी ले |

मेरी ज़ात मेरी औकात तू क्या समझे,
रोज़ नया मैं दल बदलूँगा मान भी ले |

तुम जाड़े सी धूप अगर बन जाओ तो,
बर्फ की मानिंद मैं पिघलूँगा मान भी ले |

 

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