पूंजीवादी सिद्धांतों के आधार पर विकास या सामाजिक बदलाव की प्रिक्रिया में हमेशा ही एक बड़े वर्ग की मूल आवश्यकताओं उसके सपने, आकांक्षा, बल्कि उसका सम्पूर्ण जीवन ही हाशिये का शिकार हुआ है | तकनीकी दृष्टि से सामाजिक बदलाव का क्षेत्र कोई भी रहा हो किन्तु मानवीय चेतना के संवाहक की भूमिका में सिनेमा के तकनीकी विकास क्रम का असर दो तरफा हुआ, जहाँ एक तरफ उस घोर उपेक्षित वर्ग से सहज रोजगार खत्म हुआ वहीँ मनोरंजन के साथ उत्तर आधुनिक होते समय के साथ प्रगतिशील मानसिक विकास क्रम की धारा भी अवरुद्ध हुई | ‘शेखर मल्लिक’ की कहानी सिनेमा के इसी विकास क्रम की लम्बी यात्रा से गुजरती है इस यात्रा में मानव जीवन की कुंठा अवसाद और आधुनिकता की सीढियां चढ़ते वक़्त को वेवशी से देखते हुए अन्दर की घुटन सहज महसूस होती है | बतकही के रोचक अंदाज़ में लिखी गई यह कहानी आज हमरंग पर आपके लिए ……| – संपादक 

“ट्रांजिस्टर पर बज रहा है, “मैं शायर तो नहीं… मगर ए हसीं, जब से देखा…” सायकिलों को ठेलते हुए पगडंडियों से गुजरते लड़कों में कोई एक लड़का शैलेन्द्र सिंह के गाये इस गीत को निहायत निजी और प्यारी आवाज़ में दोहराता है. छतों पर कपड़े सुखाती लड़कियाँ इस साफ़ आवाज़ को सुनकर हिरनी की तरह चिहुंकी हैं.

लड़कियाँ, जो कॉलेज नहीं जातीं, वे छतों पर, बरामदे में, गली के कोने में लगे हैंडपम्पों पर दिन के उस वक्त का इन्तजार करती हैं, जब लड़के कॉलेज जाने के लिये उस ‘शॉर्टकट’ से गुजरते हैं ! और लड़के हैं कि, वे गुजरते ही हैं… जैसे हवा पर गाने गुजरते हैं, मन पर बेबसी की गर्द इकठ्ठी करते हैं… जैसे उमर किसी शॉर्टकट की ढलान पर लगातार उतरती चली जाती है, और रास्ता अचानक खत्म होने को आ जाता है ! और एकाएक जहाँ खत्म होता है, उसके आगे कुछ नहीं होता…”

लाईट हाउस सिनेमा

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शेखर मल्लिक
युवा कथाकार, प्रलेसं से संबद्ध
द्वारा बी.डी.एस.एल. महिला महाविद्यालय,
घाटशिला 832303.
पूर्वी सिंहभूम, झारखण्ड.
मोबाइल – 09852715924

लाईट हॉउस सिनेमा ! साल 1999

कस्बे के बीचों बीच ! लेकिन सुस्त और खामोश, अलग-थलग और बोसीदा से इलाके की, एक चहल-पहल वाली धुंधलाई हुई लाल इमारत… एक तरफ ग्रिल के पार टिकट खिड़की, और उसके दाहिने होते हुए एक गलियारा जो पीछे जाकर थियेटर के मुख्य गेट पर खुलता है. टिकट लेकर गलियारे में जाने से पहले सामने की तरफ एक पान स्टाल है. वहाँ कुछ लड़के पान मसाले के पौउच फाड़कर अपनी गर्दन उठाके मुँह में उंडेल रहे हैं… एक छोटी लड़की अपनी बड़ी बहन के साथ खड़ी कोल्डड्रिंक की बोतल से पी रही है. पान की गुमटी पर छतनार बेल के पेड़ की छांह है. कुछ कुत्ते आड़े तिरछे बैठे-सोये हैं. लोग आसपास खड़े हैं… गप्पें मारते हुए, हॉल का इंट्रान्स खुलने के इंतज़ार में… पिछला शो अभी खत्म नहीं हुआ.

…गेट के पास एक टांग उठाकर सामने वाली दीवार पर अड़ाए, गेटकीपर हथेली फैलाकर टिकट माँगता है, और रास्ता छोड़ देता है. टिकट फाड़कर एक टुकड़ा दर्शक को वापस देता है. ग्रिल के संकरे खुले फाँक को पार कर दाखिल होने पर एक तंग ‘पेसैज़’… फिर अंदर सीढ़ीनुमा गैलेरी पर नीम अँधेरा होता है, घिसी हुई कुछ अच्छी और बाकि टूटी-फूटी कुर्सियाँ… पान, जर्दे, बीड़ी की महक… बतकहियों और गंदली रौशनी से भरा हॉल.

ये बहुत सारे दोपहरों में से किसी एक दोपहर यानि मैटिनी शो के वक्त का लघु ब्यौरा है…

साल 1999 ! उसी साल, जिसके आखिर में लाईट हॉउस बंद हुआ…

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बीसवीं सदी के सत्तरवें दशक का एक साल. जब लाईट हॉउस उठान पर था…

रोमांटिक हिंदी सिनेमा का सबसे शानदार दौर !

दूसरा शुक्रवार !

बिनाका गीतमाला के तीसरे पायदान पर जो गीत बजता है, वो ही फ़िल्म लगी है… क़स्बे में हलचल है. हलचल में कॉलेज जाने वाले लड़के हैं, फैक्ट्री मजदूर हैं, छिपकर ‘फ़िल्मी कलियाँ’ पढ़ने वाली लड़कियाँ हैं और… वे सब घर की बड़ी औरतें हैं, जिनसे वे अपना यह पढ़ना छिपाती हैं !

सिनेमा टॉकीज़ के पीछे खेत हैं. धान के पौधों की लहलहाती हरियाली है. खेतों में खड्डों से भरी पगडंडियाँ हैं. पगडंडियाँ खेतों के परली सिरे पर जाकर घरों के बीच की गली में मिलती हैं, और गली… कस्बे के नाम पर बने सरकारी कॉलेज के मुहाने से गुजरती पक्की सड़क पर खुलती है !

लड़कों की नयी ‘एटलस’ साइकिलों के हैंडिल के छोरों पर रिबन बंधें हैं, जो हवा में पीछे की ओर फर्र-फर्र लहराते हैं, जैसे उनके लंबे बाल. सिर पर उदार सूरज है, जो बादलों की छेड़खानी से तंग आकर कभी मद्धम, कभी तेज होता है. रेलवे की पटरियों से सीटी मारती हुई धड़-धड़-धड़ एक रेल गुजर रही है, जिसका शोर छँटने के बाद किसी तरफ दूर से एक आकर्षक संगीतबद्ध स्वर कानों तक पहुँच रहा है…

दरअसल टिकट खिड़की से निकल कर गलियारे की ओर जाते हुए सामने की तरफ वाली जो पान की गुमटी यानि, ‘शंभू बीटल शॉप’ है, जिसमें पान के अलावा सिगरेट, लेमनचूस, बिस्कुट, चना-मूँगफली, सोडा सबकुछ मिलता है, उसी दूकान के अंदर पता नहीं किस जगह एक ट्रांजिस्टर रखा हुआ है, जिसमें ‘खर्र – खर्र’ करता हुआ लगातार आकाशवाणी है… जिसके स्टेशन पर गाने, वार्ताएं और समाचार एक ही ढब पर बजते हुए सुनाई देते हैं. गाना अच्छा लगे तो पनवाड़ी वोल्युम की नॉब घुमा कर आवाज़ ऊँची कर देता है. फ़िल्मी संगीत को कस्बे की हवा दूर तक धकेलने लगती है…

ट्रांजिस्टर पर बज रहा है, “मैं शायर तो नहीं… मगर ए हसीं, जब से देखा…” सायकिलों को ठेलते हुए पगडंडियों से गुजरते लड़कों में कोई एक लड़का शैलेन्द्र सिंह के गाये इस गीत को निहायत निजी और प्यारी आवाज़ में दोहराता है. छतों पर कपड़े सुखाती लड़कियाँ इस साफ़ आवाज़ को सुनकर हिरनी की तरह चिहुंकी हैं.

लड़कियाँ, जो कॉलेज नहीं जातीं, वे छतों पर, बरामदे में, गली के कोने में लगे हैंडपम्पों पर दिन के उस वक्त का इन्तजार करती हैं, जब लड़के कॉलेज जाने के लिये उस ‘शॉर्टकट’ से गुजरते हैं ! और लड़के हैं कि, वे गुजरते ही हैं… जैसे हवा पर गाने गुजरते हैं, मन पर बेबसी की गर्द इकठ्ठी करते हैं… जैसे उमर किसी शॉर्टकट की ढलान पर लगातार उतरती चली जाती है, और रास्ता अचानक खत्म होने को आ जाता है ! और एकाएक जहाँ खत्म होता है, उसके आगे कुछ नहीं होता…

फिर… बिनाका गीतमाला पर अमीन सयानी की आवाज़ है, “बहनों और भाइयों ! दसवें पायदान पर है… लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म ‘दो रास्ते’ का ये गीत, जिसके बोल हैं, ‘बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी’. संगीतकार हैं, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गीतकार आनंद बक्षी”… शंभू बीटल शॉप की गुमटी से उठता संगीत बिला-नागा जारी है. जिंदगी की मौशिकी जारी है…खेतों के बीच की पगडंडियों पर, गलियों में, हैंडपंपों पर… किसी के ‘नोटिस’ लिये जाने तक तो जारी है…

दिन के बाद रात में भी छोटी जिंदगियाँ और उनकी जद्दोज़हद जारी है ! बिना कभी नोटिस में ली जाने वाली…  

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पोस्टर सांटने वाले रवि और नईमुद्दीन अगली लगने वाली वाली फिल्म के रोल किए हुए पोस्टर, ब्रश और गोंद की बाल्टी के साथ निकले हैं… रात के साढ़े ग्यारह-बारह बज रहे हैं. वैशाख की गर्म रात है. लोग छतों पर सो रहे हैं. छतों पर मच्छरदानियाँ तनी हुई हैं. गलियों में सन्नाटा है. हालांकि, कहीं कहीं कुछ लोग गर्मी से तंग होकर बैठे-अधबैठे-खड़े हैं, और बातें कर रहे हैं. हवा ठहरी हुई है… आसमान पर थोड़ा सा चाँद है. रवि जेब से एक बीड़ी निकलकर पीता है. नईमुद्दीन से पूछता है, ‘लेगा ?’ नईमुद्दीन इंकार करता है. उसे चाय की तलब लगी है. लेकिन इतनी रात में  चाय कहाँ मिलेगी?

“मिलेगी बे… अस्टेशन चल.” नईमुद्दीन बोलता है.

“तो उस तरफ से लगाते हुए आएँगे, चल.” रवि पुलिया पर से कूद कर उतरता है. कांख में पोस्टरों के रोल दाबता है. बीड़ी की जोर से खींची कश के साथ बोलता है, “साला अपना लाइफ में कुछ नहीं होगा.”

“फिर से शुरू हो गया ना बे !”

“क्या करें. साला ये भी कोई जिंदगी है. आधी रात पोस्टर सांटते घूम रहे हैं. दोपहर से साम टिकट काउंटर पर मशीन माफ़िक बैठे हैं. दिन रात मालिक का ‘उसमें’ घुसा के रख दो, लेकिन फायदा ? क्या कमाई है बे इसमें ?”

“और कोई काम है क्या तेरा पास ? साला, जो मिलता है, उसी में खुश रह. साला बोल कि मालिक ऐसा है बोलके. नहीं तो साला यहीं का कोई मारवाड़ी-फारवाड़ी होता ना, पेर देता. अबे, महीना में दो एक बार आता है. आता है तो हिसाब कौन भोंसड़ी के सच सच देता है हमलोग उसको ! दो पैसा तो साला ऐसे कमाने मिलता है…”

रवि गोंद की बाल्टी एक हाथ से दूसरे में बदलता है. खत्म होने को आई बीड़ी फेंक देता है.

नईमुद्दीन कंधे पर फिसल रहे अपने सामान को दुरुस्त करता है…

रात बढ़ रही है. रात के साथ जिंदगी बीत रही है, मगर बढ़ कहीं नहीं रही !

कस्बे के तीन चार जगहों पर टॉकीज़ में लगने वाली फिल्म के बड़े पोस्टर और कई खंभों पर छोटे पोस्टर लगते हैं. कस्बे के कमसीन लड़के सुबह देखते हैं कि रंगीन या एकरंगी पोस्टर लगाये जा चुके हैं. हर गुरुवार की रात वहाँ पुराने, फटे, नोंचे पिछली फ़िल्म के जो पोस्टर या पोस्टरों की निशानियाँ थे, शुक्रवार की सुबह ताजे पोस्टर से बदल दिए गए होते हैं ! वे प्रश्नाकुल रह जाते हैं, कि ये पोस्टर कब और कौन साटता है ! कौन बदलता है ?… कल्पनायें कौन दिखाता है ? कौन उन कल्पनाओं को छुपके बदल डालता है ? पोस्टरों में कहानी है. खिंचाव है. कल्पना है… जिंदगी भी पोस्टर है, मगर उसमें ये सब नहीं है. कस्बे की जिंदगी में भी फिल्मों की तरह प्रेम है, सेक्स है, संघर्ष है, उम्मीद है, बेकारी है, लड़ाई-झगड़े हैं, सच और आदर्श का घालमेल है. पोस्टरों और पर्दे पर जो है, वह कमोबेश जिंदगी में भी है. लेकिन सब कुछ नहीं जो सिर्फ़ जिंदगी में है ! पोस्टरों का आकर्षण जिंदगी के विकर्षण के साथ लगातार कर्षण करता रहता है…

‘विराट प्रदर्शन… अब आपके शहर में… मारधाड़ और एक्शन से भरपूर…’

पोस्टर से आने वाली फ़िल्म का पता चलता है, और रेडियो व अन्य स्रोतों जैसे ‘फ़िल्मी कलियाँ’, ‘फिल्म फेयर’ या ‘सिने ब्लिट्ज़’, ‘मायापुरी’ आदि पत्रिकाओं से प्राप्त सूचना के आधार पर उसके अच्छे, औसत या हिट – फ्लाप की चर्चा चलती है. चर्चों  के कारण दोपहर है. दोपहरें हैं तो लाईट हॉउस के चर्चे हैं… चर्चों में जो फिल्म है, उस पर कोई टिकट नहीं लगता !

लड़कियाँ और बकायदा शादी-शुदा औरतें ढलती दोपहर बर्तन मांजती हुईं एक दूसरे से पूछती हैं, “लायट हौस में क्या लगा है ?”

“ऐ रे,  ‘दीवार’ लगी थी, हट गई क्या ?”

“तुमलोग कब गए रे सलीमा देखने ?”

“हम तो एकै बार गए थे, ‘नागीन’ देखने !”

“नागीनवा देखने काहे इत्ती दूर गई, तोरी बगलवाली को नै देखती दिन रात !”

ठहाका !

लेकिन लड़कों-मर्दों वाला नहीं, दबा-दबा ! जैसे खदबदाती हांड़ी पर थाली उलट के रख दी हो…

गैर फ़िल्मी जिंदगियों में सिनेमा बराय ‘लाईट हॉउस’ आता है. मगर फ़र्क नहीं डालता !

लाईट हॉउस के पहले रेलवे फाटक के पास ‘पासी’ (ताड़ी चुआने वाले) का कुनबा डेरा लगाये हुए है. भरापूरा परिवार… कुटुंब के सारे सदस्य, जिसमें चार साल की बच्ची, सात आठ साल के दो बच्चे, चौदह के आसपास की दो लड़कियाँ और एक सत्रह साल की सयानी लड़की, एक आदमी और औरत के साथ रहते हैं. आदमी सारी रात में इकट्ठा हुई ताड़ी को भोर मुँह अँधेरे उतारता है, और दिन भर कस्बे में घूम घूम कर ताड़ी बेचता है. हालांकि यह काम मौसमी रोजगार ही है. बाकि वक्त वह सब्जियाँ उगाता है. परिवार के लोग साथ लगे हुए नाले की अनुकंपा से उपजाऊ भूमि पर सब्जियाँ उगाकर कस्बे के हाट में बेचते हैं. दो बड़ी बच्चियाँ हाट के दिन सब्जियाँ लेकर बैठती हैं. आदमी और औरत गर्मी के दिनों में ताल बेचते हैं. रिहाईश और जीविका उपार्जन की जगह इनके बाप या दादा की हरगिज़ नहीं है. जहाँ वे ढीठाई और बेशर्म निडरता से बसे हुए हैं. रेलवे और अख़बारों की भाषा में रेलवे की ज़मीन पर अतिक्रमण करके अवैध रूप से. औरत बेहाट वाले दिनों में डेरे पर ही रहती और कई तरह के काम करती है. वह फिल्म देखने लाईट हॉउस नहीं जाती… लेकिन फिल्मों की स्त्रियों की तरह कुछ असली नकली गहने पहनती है, जो उसकी शादी के वक्त नैहर से मिले थे. ताड़ के पत्तों से बनी झोंपड़ी में रहते हुए बागवानी कर जिंदा रहने वाले परिवार का मुखिया कभी कभी टिकटें ब्लैक भी करता है… नंगे बच्चे चल चुकी फिल्मों के नेगेटीव्स बटोर कर लाते हैं, और खेलते हैं. उनको भी फिल्मों के डायलोग याद हो जाते हैं. लाईट हॉउस में फिल्म चलती है, तो उसकी आवाज़ हॉल के बाहर तक आती है. जो अंदर नहीं जा सकता, बाहर से थोड़ा एकाग्र होकर सुन सकता है. और कहानी बुन सकता है ! जैसे इर्द गिर्द खेलते इन बच्चों ने सुना और याद कर लिया… एक चीकट काला, भूरे बालों वाला बच्चा दूसरे बच्चे से बोलता है, “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर !”

उससे उम्र में छोटा और मोटा बच्चा जबाव में कहता है, “नहीं ! महतारी तुमको कोई चीज देवे से मना किहिस है !”

किशोर की आवाज़ में रेडियो प्रसारित कर रहा है – ‘रोते हुए आते हैं सब, हँसता हुआ जो जायेगा…’

लाइट हॉउस में मैटिनी शो के लिये बेतरह भीड़ है. ‘मुकद्दर का सिंकंदर’ लगी है. कस्बे वाले इन्तजार कर रहे थे. रेडियो और फ़िल्मी पत्रिकाओं ने फिल्म के हिट होने की सूचना देकर लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी थी. जवान लड़कियाँ घरवालों से, उनमें से जो थोड़े उनके पक्ष में बोलते थे, मनुहार कर रही थीं, “चलियेगा ना ? बोलिए ना ले चलियेगा ?”

दीदियाँ मन मसोसकर बैठी हैं, और भैया लोग यार – दोस्तों के साथ चुपके से देख आये हैं. अब पुलिया या किसी चाहरदीवारी पर कौआ – मण्डली जमाए पूरी कहानी और डायलॉग बांच-बांच के चिढ़ा रहे हैं.

इज्जत वह दौलत है जो एक बार चली गई तो फिर कभी हासिल नहीं की जा सकती

घर के अंदर से रसोई से अचार के मर्तबान निकाल कर बरामदे में पड़ती धूप में रखती हुई लड़की याद करती है, ‘जय संतोसी माँ’ के टाइम तो बिन हील हुज्जत के ‘लायट हौस’ ले गए थे, और अब वही जिद कि फालतू फिलिम के लिये काहे माथा खा रही है ? कोई ढंग की लगने दो, जाना. ‘बोबी’ के टाइम भी एही बोलके नहीं ले गए.’

लड़कियाँ किसी गार्ड के बगैर ‘लायट हौस’ नहीं जा सकतीं. इस दौर में, यों भी वे अकेले कहीं जाने के लिये मुक्त नहीं हैं. उनके साथ घर की ‘बड़ी’ स्त्री का होना अनिवार्य प्रोटोकॉल है !

वे लड़कों के द्वारा उवाचित फिल्म के इस डायलॉग से प्रेरित होती हैं, “जिंदगी का अगर सही लुत्फ़ उठाना है ना, तो मौत से खेलो…” मगर वे यूँ भी कई तरह से मर रही हैं… पैदा होने से पहले, पैदा होने के बाद… शादी से पहले, शादी के बाद… मरने से पहले और मरने के बाद !

अब क्या सिनेमा जाने के लिये भी मरें !

कस्बे में ‘लाईट हॉउस सिनेमा’ बदनाम भी है.

कभी कभी ‘ऐसी-वैसी’ यानि ‘सी’ ग्रेड कामुक फ़िल्में दिखाने के लिये बदनाम सिनेमा हॉल शरीफ लोगों के बच्चों के लिये वर्जित है. और उन सब शरीफ कर्मकांडी लोगों के घरों की मादाओं के लिये ‘लायट हौस’ का नाम सूतक समान ! केवल एक बार यह सूतक किसी तरह हटा था, जब “जै संतोसी माँ” ने उसका गंदा पर्दा सुद्ध किया था !

वो पुरानी बात हो गयी थी. और काफी साल बाद, लड़कियों और औरतों ने एक बार सामूहिक ‘अगस्त क्रांति- 1997’ की, जब 19 साल की रानी मुखर्जी अभिनीत फ़िल्म ‘राजा की आयेगी बारात’ 1997 के अगस्त माह में लगी थी. घर की खासकर, अल्पायु, युवा ‘मादाओं’ ने फ़िल्म के विषय को अपने अस्तित्व, गुस्से और हालात के अनुकूल पाया और गोलबंद होकर कस्बे की सड़क, फिर रेलवे फाटक लाँघकर उस बार ‘लाईट हॉउस’ के कई शो देख डाले…

इसके बाद हालांकि इतिहास अपने को दोहरा नहीं पाया और आगे ऐसा सैलाब लाईट हाउस के गेट तक नहीं पहुँचा. बहरहाल, इस एक मौके ने काफी हद तक कुछ बर्फ़ तोड़ दी थी और इसके बाद फ़िल्में देखने लड़कियाँ भी गयीं… बगैर ‘अंगरक्षक’ के !

1999… सदी और सहस्त्राब्दी का अंतिम साल… लाईट हॉउस टाकीज बंद हो रहा है!

अब यह लगने लगा है कि जल्द ही लाईट हॉउस सिनेमा बंद हो जायेगा. और अंदर अंदर की बात बाहर हर तरफ होने लगी है. कस्बे की जनता और टॉकीज़ के आम कर्मचारी भी कई तरह से इस आसन्न दुर्घटना की चर्चा कर रहे हैं. और ये चर्चाएँ सिर्फ़ दोपहर को ही नहीं होतीं, बल्कि इन चर्चाओं का कोई वक्त और स्थान तय नहीं है. शाम, देर रात, दोपहर… चर्चे किसी पान की दूकान, मुख्य चौक, फुटबाल मैदान, घर के अंदर… कहीं भी होने लगते हैं और लोग इस आशय की बात कहते हैं कि, ये सिनेमाघर बंद नहीं होना चाहिए दादा. बहुत दिक्कत हो जायेगी…

ऐसा नहीं कि क़स्बा अपनी रोजी रोटी, धंधा-पानी छोड़कर सिनेमा देखता है, या सिनेमा कस्बे के जीवन में सबसे अहले दर्जे की जरूरत है. या सिनेमा हॉल के नहीं रहने से सिनेमा देखना बंद हो जाना है. मगर…

टॉकीज़ रहता तो ठीकै था… कम से कम इस कस्बे में एक सिनेमाघर तो रहता…!

चर्चा में अगुआ आदमी बताता, भैया ! ये रोजगार चक्र जैसी कोई चीज मालूम है आपको ? नहीं ! मतलब, जैसे उर्जा चक्र ! उच्चतम स्त्रोत से अंतिम स्तर तक एक श्रृंखला… फिल्म उद्योग के बनिये, ठेकेदारों से लेकर लेमनचूस, पान, शरबत बेचने वाले रेहड़ी वाले तक… छप्पर फाड़ मुनाफ़ा से लेकर दिहाड़ी – कमाई तक ! टॉकीज़ बंद कर इसका मालिक तो कुछ ना कुछ कर लेगा. लेकिन बाकि छोटका मोटका लोग क्या करेगा जो इस पर डिपेंड करते हैं ? टॉकीज़ का स्टाफ लोग किधर जायेगा ?

हाँ-हाँ, ठीक कह रहे हैं दादा !

हालांकि, कोई कुछ नहीं कर सकता है भाई ! बड़का मालिक लोग का मिजाज़ है…

सिनेमा का ‘थियेट्रिकल प्रदर्शन’ होना जरूरी है. कस्बे की औरतों और लड़कियों ने इस विचार पर अलग अलग मत प्रकट किए हैं. उन मतों का रिकॉर्ड रखा जाना जरूरी था… लेकिन फीडबैक प्रणाली का कोई अस्तित्व नहीं रहने के कारण ऐसा हो नहीं सका…! इन टिप्पणियों में एक ही रेखांकित किए जाने लायक बात है, कि ये सब पुन: सिर्फ़ दोपहर को ही व्यक्त की जा रही थीं ! दोपहरें कस्बे की औरतों का निजी क्षेत्र होती हैं…

हाँ बहन, हाल बंद हो जायेगा. बहुत खराब लग रहा है…

सच !

नहीं झूठ ! अरे इसको खराब काहे लगेगा रे ? इसका भतार नाईट सो देखकर आता था और इसको कूटता था ! नहीं जानती काहे ? ई खसम-खाई की नींद इतनी खराब है. मुँह फाड़के सो जाती और मर्द घंटा दो घंटा दरवाजा पीटता रहता… आधी आधी रात तक पिटी है ई कमीनी. इसको तो हाल बंद होने का खबर से शांति मिल रही है… देख देख इसकी मुस्की ! साली…

ठीक ! हम खुश हैं. लेकिन तुमको तो बहुत कष्ट हो रहा है…! फूलछाप साड़ी पहनके, लिपस्टिक पोतके, स्नो-पाउडर घसके ना चल देती थी सिलेमा ! अब इसका तो ना खसम ना खार… ना ई रांड ना इसका भतार !

हट रे… तुमलोग तो एही सब बतौला करते रहेगी ! लायट हौस बंद हो गया तो जानती है, सबसे जादा दुःख किसको हो रहा है ? सुधीरवा की महतारी को. काहे ना कि उ विधवा का लड़का उन्हा चाय न बेचता है. उ लड़का केतना कमजोर है, नहीं देखा है ? देह से भी और दिमाग से भी. पढ़ा लिखा भी नै है… उ लोग तो चाय बेचके चल रहा है. अब हालवा नै रहेगा तो धंधा खत्म ! इसी से परेशान है बिचारी… कल्हे तो आई थी. जितना देर बैठी… यही बात बोलके रोती रही कि अब क्या खायेगा, क्या करेगा ? कोई गुमटी उमटी थोड़ी है…

‘शंभू बीटल शॉप’ का रेडियो धीमी आवाज़ में बजता रहता है. रेडियो का चलना एक गति है. इसे चलने दिया जाता है. शायद पानवाले को उसका बंद होना जिंदगी के थम जाने जैसा डरावना लगता हो. गेटमैन हथेली पर खैनी मलते हुए देर से खड़ा है… गुमटी के अंदर लगे आईने में अपनी शक्ल देखता हुआ चिढ़ता है, साला दाढ़ी इतनी जल्दी काहे बढ़ जाता है ! शकल भूतहा हो गयी है. काला माथा, सामने और कनपट्टी के सफ़ेद बाल… पान लगाते हुए दो हाथ ठहरकर आवाज़ में बदलते हैं, “बुढ़ा गए ठाकुर जी. हाल बंदी के बाद आगे किधर ? कुछ सोच के रखे हो का ?”

“आगे तो सब अन्हार है. और ई अन्हार के बाद कौनो रंगीन रोशनी पर्दा पर नहीं पड़ेगी बड़े भाई. एगो बात कहते हैं, तुमरी भी वोही हालातै नै है का ?””

“है. बहुत परेशान हैं भैया… आगे का सोच कर बहुतै परेशान हैं.”

“बात हईये है परेशानी का.”

“अच्छा, कोई जगे कुछ बात ठीक हुआ ? सुन रहे हैं, सब लोग इहाँ, उहाँ देख रहे हैं.”

“हाँ… देखेगा ही. लेकिन थिर होके ऐसा काम कहाँ मिलेगा. इहाँ पर्मामेंट काम था. और ई उमर में नयका नौकरी कौन देगा ? ऐसे हम भी बोलके रखे हैं, एक जगह. गेटकीपरी का काम उहाँ भी है. साला वहाँ से लात मार दिया तो सीटिया मार के रात में चौकीदारी करेंगे.”

“किन्तु हम गुमटी कहाँ ले जाएँगे ? जमाया बिजिनेस है. बाल-बच्चा के दाना-पानी इहे से है. यहाँ से उठा तो खत्म !… बड़ा बजर गिर रहा है माथा पर !”

टॉकीज का दूसरा गेट-कीपर और नेपाली चौकीदार एक छोटा सा डंडा घुमाता हुआ आके सामने पटरे की बैंच पर बैठ गया, और आवाज़ मारता है, “कमला बीड़ी एक पैकेट दे ! माचिस है ?” आखरी बात साथी  गेटकीपर से पूछी गई है. वह भी साथ आकर बैठता है.

“देस जायेगा कि यहीं रहेगा, हो ?” बिहारी चौकीदार ने पूछा.

नाटा नेपाली चौकीदार हाथ में पान दूकान वाले के दिए हुए बीड़ी के पैकेट से एक बीड़ी निकालकर अपने मुँह में दबाता है, और एक साथी की ओर बढाता है. साथी ने पाकिट से माचिस निकाल कर जला ली है, और उसकी तीली उसके होंठों में दबी बीड़ी के पास ले जाता है, नेपाली चौकीदार कश लेकर बीड़ी को अच्छे से सुलगा लेता है. धुआं मुँह – नाक से निकालते हुए बोलता है, “नहीं जायेगा वतन. यहीं रहेगा.” टॉकीज़ के बगल में ईंट-बालू, चिप्स-रोड़े की छोटी सी दूकान में काम मिल जायेगा उसे. मालिक ने भरोसा दिया है. टापू जल-प्लावित होने से पहले वाशिंदों ने पलायन के लिये छोटी छोटी नावें  तैयार करनी शुरू कर दी हैं.

‘शंभू बीटल शॉप’ के रेडियो पर एक पुराना गाना बजता है – ‘कौन दिसा में लेके चला रे बटोहिया…

दोनों गेटकीपर मुड़कर उस आदमी को देखते हैं, जिसकी पीठ उनकी तरफ है, और वह अपने सामने की चाहरदीवारी के पास बैठकर पेशाब कर रहा था, अचानक यह गीत गाने लगा है.

पान वाला रेडियो का वोल्यूम बढ़ाता है. मगर खर्र-खर्र का शोर भी उतना ही बढ़ जाता है !

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किस्से बहुत हैं, लाइट हॉउस थियेटर के भी किस्से हैं… हॉल बंद होने की पृष्ठभूमि के किस्से…

किस्से जो लोगों की जुबान पर होते हैं, वे फिल्मों से ज्यादा रोचक और प्रामाणिक लगते हैं !

कस्बे में पच्चीस-तीस साल तक नंगे पैर, धोती कुर्ता पहने, सिर पर टोकरी रखकर चिनिया-बदाम घूम घूमकर बेचने वाले बुजुर्ग ‘बादाम वाला’ चाचा के पास सिनेमाघर और सिनेमाघर वालों का ‘प्रामाणिक इतिहास’ मौजूद है, और वे पूछने पर देर तक बता सकते हैं कि, सिनेमा हॉल का मालिक, जो पटना का रहने वाला था और बहुत मस्त आदमी था, एकदम इसी कस्बे का दिखता था. बाल-बच्चे वाला. उसको यहीं की एक पंजाबन से प्यार हो गया. वह पंजाबन कुछ नेपालन जैसी दिखती थी और वैसी ही गोरी, चंचल और खुली-खुली सी थी. उत्तर बिहार के रहने वाले को इसलिए पसंद भी आई होगी. हो सकता है, और भी वजहें हों, मगर ‘बादाम वाला’ चाचा को जैसा लगता है, वही बताते हैं…

टॉकीज़ का मालिक और वह स्त्री एक सफ़ेद एम्बेस्डर में अक्सर कस्बे की सड़कों पर गुजरते हुए कभी नदी की ओर, कभी कस्बे के बाहर हाइवे की ओर जाते हुए दिखाई देते. लेकिन क़स्बा उन दोनों को बहुत कम पहचानता था और उससे भी कम जानता था. सो कभी किसी ने गौर नहीं किया. पटना वाला आदमी महीने के कुछ ही दिन कस्बे में रहता था और बहुत कम लोग जानते थे कि वही ‘लाईट हॉउस सिनेमा’ का मालिक है. पंजाबन स्त्री (जिसका नाम बिल्लो उर्फ़ बिरजीत कौर था, ‘बादाम वाला’ चाचा किस्से के बीच में कहीं पात्रों के नाम बताते हैं) सत्ताईस – अट्ठाईस की थी और उन दिनों घर से कम ही बाहर निकलती थी. और जब वो निकलती थी और निकल कर काले शीशे वाली सफ़ेद एम्बेस्डर की अगली सीट पर जा बैठती थी, कोई नहीं देख पाता था. उसका घर भी तो कस्बे के उसी हिस्से में  था, ‘लालबाड़ी’ में… जिधर लाईट हॉउस था !

‘बादाम वाला’ चाचा धड़ल्ले से जो किस्सा बताते हैं, और किस्से को टॉकीज़ के बर्बाद होने से जोड़ते हैं, वह उन्हीं दोनों के मुहब्बत का यही किस्सा है…

बीरजीत कौर चुप लेकिन महत्वाकांक्षी स्त्री थी. वह समझदार भी थी. उसने अपने साथ शाम और सुबह बिताने वाले आदमी से कहा, “आप यहाँ घर क्यों नहीं ले लेते. बार-बार पटना आना-जाना समय और पैसे की बर्बादी है. और हाल का बिजनेस सिर्फ़ मैनेजर के भरोसे छोड़े रहना सही लगता है क्या ?”

मालिक ने सिगरेट का कश लेकर बीरजीत को एकटक देखा. गोरी बीरजीत कौर की भूरी बड़ी बड़ी आँखें, चौड़ा उजला माथा… मोटे, भरपूर  होंठ. सिनेमा नायिका अमृता सिंह जैसी…

हँसी के साथ उसने कहा, “पटना तो जाना ही पड़ेगा बिल्लो. वहाँ हमारा घर है, औरत है, दू गो लड़की है.”

“यहाँ हम हैं. और हम कौन हैं ?”

“आप हमारी गर्म लिट्टी हैं, तीखा चोखा हैं ! हमारी…”

“आप मज़ाक छोड़िये. चले जायेंगे पटना, आरा… हम खाली खेलने-खाने की चीज हैं ? देखिये, कुछ सीरियस सोचिये.”

“सीरियसली तो कह रहे हैं. आप मज़ाक समझती हैं. अरे पटना वटना का चिंता काहे करती हैं. आप के लिये हम हैं. हमारा सबकुछ है.”

“अच्छा ! बीबी-बच्चे के होते हुए ?”

“अरे बिल्लो, हम कह रहे हैं कि बीबी और बच्चियां हमारी जिम्मेदारी हैं. परिवार है. तो इसका क्या मतलब कि आपके लिये नहीं सोचते ?”

“क्या सोचते हैं ?”

थोड़ी देर चुप रहने के बाद “आज बहुत बात कर रही हैं बिल्लो !” कहकर हँसता हुआ लाईट हॉउस का मालिक उसके गले पर बाजू डालता है, “क्या चाहिए कहिये? कहिये कैसे आपको यकीन दिलाएं कि…”

“लाइफ पाटनर तो नहीं बना सकेंगे. बिजनेस पाटनर बना लीजिए.” बीरजीत कौर ने इतना साफ़ कहा था कि वह आदमी हँस ना सका. वह अपने इस ‘एक्स्ट्रा मैरिटल अफैयर’ में पहली बार वाकई में सीरियस हुआ और कुछ चुप्पियों और कुछ बतकहियों के छोटे से अंतराल के बाद बीरजीत ने उससे कबूला लिया कि लाईट हॉउस सिनेमा में चालीस फीसदी की हिस्सेदारी उसके नाम चुपके से लिख दी जायेगी.

कुछ दिन बाद तमाम कागजी कारवाईयों के पूरे होते ही बीरजीत कौर सिनेमा हॉल की लगभग आधी मालकिन हो गयी.

‘बादाम वाला’ चाचा के किस्से में तमाम गैर-यकीन लायक तथ्य होने के बावजूद सुनने में मज़ा आता है, और वे भी इसे समझते हैं ! इसलिए वे श्रोता के हुं-कार के बिना भी अपने किस्से को ज़ारी रखते चले जाते हैं…

बीरजीत कौर ने आधी मालकिन बनने के बाद अपनी अय्याश तबियत का पूरा खुलासा किया. जितने दिन साठ फीसदी का मालिक पटना रहता, वो यहाँ हॉल की सौ फीसदी मालिकन होती. बिजनेस की आमदनी का हिसाब किताब रखती हुई चालाक बिल्लो ने हॉल के स्टाफ़ पर अपने औरताना जादू, झांसा, दबाव, धमकी आदि देके हेरा फेरी कर बे-हिसाब माल उड़ाया. घर से तो अब भी ना निकली, मगर शराब घर पर ही आने लगी… बढ़िया खाने की चीजें, घर सजाने के शो-पीस, तश्तरियां, नई पलंग, चादरें, पर्दे, इलेक्ट्रानिक उत्पाद… सब घर आ गए. शौकीन मिजाज़ की बीरजीत ने वह सब खरीदना शुरू किया, जो उसके दिल में था. पटना से आने पर आदमी की ऐसी दिलकश खातिरदारी होती कि, वो कई सवाल पूछना ही भूल जाता… और सबकुछ ज्यों का त्यों चलता रहता.

‘बादाम वाला’ चाचा किस्से के इस बिंदु पर जैसे बहुत बड़ा खुलासा कर रहे हों, इस ढंग से कहते, सिनेमा टाकीज़ के मालिक को कभी मालूम नहीं हुआ. और हॉल का बिजनेस खराब होता रहा. लोग टीवी देखने लगे. टीवी पर रंगोली पर रंगीन गाने देखने जिसके पास अपना टीवी नहीं होता, पड़ोस के उस घर में जाता, जहाँ टीवी होता. ‘कक्का जी कहीन’, ‘नुक्कड़’, ‘हमलोग’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘हम पंछी एक डाल के’, ‘रामायण’, ‘महाभारत’, लोहित किनारे’, ‘जासूस करमचंद’ ऐसे सीरियल आने लगे. सप्ताह के एक दिन सुबह ‘रँगोली’ और दो दिन शाम को ‘चित्रहार’ ! रविवार को परिवार के साथ बैठकर फिल्म देखने का मज़ा था कि नहीं ? तो सिनेमा हाल जाने का, खर्च करके फिलिम देखने जाने का उतना मन रहा नहीं. इससे पहिले से वीडियो पर फिलिम चलने लगीं थी. पिचासी (1985) में मिठुनवा का फिलिम ‘प्यार झुकता नहीं’ देखने वीडियो में ही न गए थे, हमको याद है. घर में वीसीआर भाड़े पर जाने लगे थे… अपना मन-माफ़िक टाइम में सबके साथ बैठकर फिलिम देखो. जनाना लोग सब को रात भर घर में आराम से बैठकर मनपसंद फिलिम देखना ‘सेफ’ लगेगा कि सिनेमा हॉल का नाईट सो जाने का रिस्क लेना ? ज्यादा आसान और सहूलियत वाला क्या था ? वीडियो का लुभाव तो ऐसा था कि कस्बे के कुछ लड़के तो होली के बाद फ़ोकट में वीडियो पर फ़िल्म दिखाना शुरू किए थे. दो तीन साल चला था. भीड़े-भीड़ ! बुतरू, मतारी सब बोरा… पीढ़ा लेके शाम के चारहे बजे से अपना ‘जगह’ रख लेते थे. लोग बाउंड्री, गाछ, क्वार्टर का बालकोनी पर चढ़ कर देखते… ‘लोहा’, ‘लव एटी सिक्स’, ‘मर्द’…

तो लाईट हॉउस चल तो रहा था, मगर  खत्म हो रहा था…

कुछ साल बाद, बीरजीत कौर भी खत्म हो रही थी. अड़तीस से ऊपर की ओर बढ़ती औरत से आदमी का मोहभंग होने लगा था. बिजनेस भी खराब चल रहा था. सिनेमा हाल बीच में कुछ साल तो बंद रहा, फिर खुला. बीरजीत कौर लंबी रेस दौड़ने के बाद थकी हुई घोड़ी की तरह एक तरफ बैठी सुस्ता रही थी. हॉल मालिक का पटना से फेरा कम होता गया… ‘बादाम चाचा’ से इतना सुनने के बाद कुछ विश्वास, कुछ अविश्वास मिश्रित मन:स्थिति में कुछ बॉटम-लाइनें लोग अपने जेहन में खींचते… जैसे,

चाचा खाली गप्पियाते हैं, कहानी जोड़-गाँठ कर खाली टाइमे पास करते हैं.

हो सकता है. हम भी ऐसा कुछ सुने थे उस टाइम. ये बिरजीत हरामजादी खा गई लायट हौस ! बाप रे बाप…

सिनेमा हॉल को बचाने के लिये कुछ जबरदस्त हिट फिल्मों का लगना जरूरी था.

‘राजा की आएगी बारात’ और ‘बॉर्डर’ लगी.

लगाने के लिये सब कुछ दाँव पर लगाना पड़ा. बाजार से कर्ज़ा उठाना पड़ा. फिल्मों ने बढ़िया बिजनेस किया. दोनों ही फ़िल्में कस्बे की बड़ी आबादी को लाईट हॉउस तक खींच लायी. ‘लाईट हॉउस की रौशनी वापस आ गयी थी.

लेकिन इन दो फिल्मों के बाद हालात फिर ढलान पर आने लगे. केबल टीवी ने आने के बाद लोगों के स्वाद और मनोरंजन की वृति में बदलाव किया था. भारी पूंजी लगाकर हिट फ़िल्में लाईट हॉउस फिर ना लगा सका. बाज़ार से उठाये पैसे चुकाना ही भारी पड़ रहा था. कुछ औसत फ़िल्में लगीं. नहीं चलीं. फ्लॉप फिल्मों ने सिनेमा हॉल की हालात बदतर कर दी.

किस्सों के बावज़ूद कई वजहें थीं, कि… 

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नब्बे का दशक लगते ही क़स्बे में कई जगह विडियो पार्लर खुल गए थे, जहाँ रंगीले, झिलमिलाते रैपर के अंदर वीसीडीयाँ झूलती थीं… एकदम नई फिल्मों की चोरी से रिकॉर्ड की गई वीसीडीयाँ भी ! कस्बे में ‘ईगल विडियो’, जो पहले वीसीआर किराए पर देने वाली दूकान थी, अब सीडीयाँ भाड़े पर देने वाली कस्बे की फेमस दुकान बन चुकी थी. जिसके दरवाजे और शीशे की शो-केस सह फ्रंट-फेस दीवारें रंगीन रौशनी की लड़ियों से जग-मग करती थीं. अंदर डेक बजता रहता था. अहर्निश… लगातार ! कुमार शानू और अलका याज्ञनिक का गाना डेक पर बजता था, “आँखों से तुने ये क्या कह दिया… दिल ये दीवाना धड़कने लगा !

लड़के जेब में सीडीयाँ ठूंसे सड़क पर जाते थे. घंटों दूकान पर खड़े वीसीडियों के कवर घूरते. हॉलीवुड की डब फिल्मों का क्रेज था… बेबी’ज् डे आउट… स्पीड… जुमांजी… टूमॉरो नेवर डाईज… टाइटैनिक… एयरफ़ोर्स वन… मेन इन ब्लैक…

टॉकीज़ में ये फ़िल्में नहीं लगती थीं, लेकिन सीडियों पर उपलब्ध थीं… सीडियाँ दस रूपये के भाड़े पर चौबीस घंटे तक के लिये उपलब्ध होतीं…

फिल्म दिखाना कस्बे को देश के भूगोल के मानचित्र पर एक बिन्दु बनाने वाली तांबा कम्पनी के सामुदायिक मनोरंजन (रिक्रिएशन) दायित्व के अंतर्गत भी हुआ करता था मगर, वह भी काफ़ी पहले बंद हो चुका था. लोगों ने एक दूसरे को बताया था कि, ऐसा इसलिए हुआ कि शो के दौरान जब लगभग समूचा क़स्बा मैदान में फिलिम देख रहा होता था, कस्बे के अँधेरे-सुनसान हिस्सों में, मसलन पुलिया के नीचे, बैंक के पीछे, कम्पनी के लिये बिछी रेलवे लाइन पर लोगों का कत्ल, और अकेले घरों में चोरियाँ वगैरह होने लगीं थीं. गोविंदा की सुपरहिट फिल्म ‘हत्या’  की नाईट सो वाले दिन बैंक के पास वाली पुलिया के पास कम्पनी से बी-शिफ्ट की ड्यूटी कर घर जा रहे एक मजदूर की गर्दन काटकर लाश फेंक दी गयी थी.

लेकिन, इस वजह से फिल्म का प्रदर्शन नहीं, सिर्फ़ नाईट शो दिखाना बंद हुआ था ! दरसल खस्ताहाल होती जा रही कंपनी अपने खर्च में कटौती करने के लिये एक एक कर सारे सामुदायिक हित के कार्यक्रम बंद ही करती जा रही थी… कम्पनी स्कूल, अनाज भण्डार, कर्मचारी अस्पताल में अच्छी दवाइयों की आवक… इत्यादि और बाद में तो अतिरिक्त बताकर कर्मचारियों की ही कटौती. तो फ़ोकट में कस्बे के कर्मचारियों और गैर- कर्मचारियों को फिल्म दिखाने का खर्चा क्यों मोलती रहती !

इस जंगली – पहाड़ी देहात को क़स्बा बनाने वाली अर्ध-सरकारी कम्पनी की खानें बंद हो चुकी थीं और स्थानीय लोगों की आमदनी मंदी होती जा रही थी. कम्पनी पर ही कस्बे और आसपास के क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मजबूती से टिकी थी, भरभराने लगी. मजदूर और बाकि कर्मचारी लोग भाग रहे थे… बाजार पस्त हो रहे थे…दुकानदार सकते में आ गए थे ! पास वाले दो कस्बों में चलने वाले दो सिनेमा हॉलों के एक मालिक ने एक हॉल बंद कर दूसरे में आटा मिल डाल लिया था और वहाँ से ‘शिव भोग आटा’ पाँच और दस किलो के पैकों में निकल कर कस्बे ही नहीं आसपास के गाँव-देहातों में किराने की दुकानों में मौजूद हो जाता था. उसकी बिक्री थी. पेट भरने के लिये कस्बे के लोग अनाज मांगते थे. ये आवश्यकताओं में प्राथमिक था और अनिवार्य माँगों की चार्ट पर सिनेमा के टिकट का क्रम पता नहीं कितने नीचे और कहाँ था…! कस्बे के लोग सस्ती चीजों की टोह में थे, और थियेटर वाला सिनेमावलोकन महँगा होता जा रहा था. टिकटों के दर तुरंत, बगैर पूर्व सूचना के बढ़ जाते और ड्रेस रिहर्सल यानि बालकिनी का टिकट पिछली बार की तरह पन्द्रह रूपये होगा, सोचकर पन्द्रह रूपये की दर से चार टिकट के साठ रूपये लेकर आया हुआ आदमी बॉक्स-ऑफिस की जालीदार खिड़की के ऊपर काली पट्टी पर मोटे सफ़ेद अक्षरों में लिखे पच्चीस रूपये पढ़कर लाइन से बाहर निकल आता ! फिर भी फिल्म देखने की आंतरिक इच्छा कस्बे के हर छोटे बड़े को थी. इसलिए फिल्म देखने का कोई ना कोई रास्ता वे निकाल ही लेते… हॉल बंद होने की स्थिति में, बल्कि उससे पहले ही दूसरे विकल्प बाजार में उपस्थित हो गए थे.

अब इन विकल्पों के कारण हॉल बंद होने के कगार पर पहुँचा या हॉल बंद होने से ये विकल्प मुख्यधारा में आये, इसपर कस्बे के कुछ लोग उकसाने पर जोरदार बहस पर अमादा हो जायेंगे !

बहरहाल, बंद होने के कारणों की फेरहिस्त का सिरा पकड़ के कोई आगे खींचता जा सकता है, अपने प्रामाणिक अनुभव की अभिव्यक्ति करके, तात्कालिक इतिहास पर कुछ मय ऑथोरिटी के बोलकर या फिर बातें और कहानियाँ सुनाकर. इसमें से आखिरी वाला तरीका बहुतायत में बरता जाता है क्योंकि, कुछ कस्बाई लोग खासे गप्पोड़ होते हैं ! वे इतिहास को जहाँ, जितना नहीं जानते, उतने हिस्से को गप्प बना डालते हैं. गप्प और किस्से कस्बे के चरित्र में अनिवार्य गुणधर्म हैं…

तो कारण कोई भी हो, हुआ तो यही है कि…

लाइट हॉउस बंद हो गया है. हमेशा के लिये… लेकिन कस्बे में आने वाले किसी अखबार ने इसका ज़िक्र नहीं किया !…

बंद होने वाली हर हलचल वाली जगहें आतंकित कर देने लायक सन्नाटों में बदल जाती है. सन्नाटे जब अपने चरित्र के विपरीत, वाचाल हो जाते हैं, तो सचमुच डर लगता है. इस डर को महसूस करने वाले कम लोग होते हैं… समझ कर उसकी व्याख्या कर सकने वाले और भी कम !…

दोपहर को उधर से गुजरते हुए कोई अधेड़ उम्र से कुछ ज्यादा का आदमी नज़र उठाकर उस सुनसान को देखता है. लाईट हॉउस जिधर बतौर एक आकर्षक इमारत था. जो आज उस आदमी की स्मृति में अवशेषित है. उसकी नज़र देखती है, चौहद्दी की दीवार में उस जगह को जहाँ पोस्टर लगा करता था… वह बदरंग चाहरदीवारी अभी तक है… इर्द-गिर्द बनैली झाड़ियों की अराजकता… रह रहकर उड़ती हुई आवारा धूल… टूटी फूटी ईंटों का डूह… आसपास कितने घर… सुनसान बंगलेनुमा दुमंजिले-तिमंजिले…

जैसे उसे कुछ हो जाता है… लगता है जैसे अभी एक लाल इमारत ज़मीन से निकल आएगी. सिनेमा चलने लगेगा उसके भीतर, और उसके भावुक या साहसी संवादों और पार्श्व-संगीत की जोशीली, करुण आवाजें दीवारों को सेंध कर बाहर दौड़ने लगेंगी… औरतें और बच्चे गेट पर अंदर घुसने के लिये हो रही धक्कम-धक्की से डर कर एक तरफ हों जाएँगी और कुछ औरतें गेट पर गालियाँ बकने लगेगीं… किसी सुपर-हिट फिल्म देखने के लिये बहुत दिनों से प्रतीक्षारत, क्योंकि उस नई फिल्म को कस्बे के इस छोटे सिनेमाघर में लगाने की लागत अब तक सिनेमागर के बूते से बाहर थी, लंबी कतार अर्ध-वृताकार में पान की गुमटी को घेरे हुए पीछे की ओर चली गई होगी…

लोग चौंसठ-बत्तीस पान की फर्माइश करते हुए बीटल-शॉप पर खड़े होने लगेंगे… रेडियो पर बजने लगेगा…‘तेरे मेरे होंठों पे मीठे मीठे गीत मितवा…’

वह डर जाता है. यह उसका बेहद निजी और भीतरी डर है… फिर एक खूंखार अनमनापन उसके जेहन को ऐड़ लगाने लगता है, और वह तेजी से पाँव उठाता निकल जाता है.

कस्बे में कोई सिनेमा हॉल नहीं.  मगर सिनेमा की बातें हैं… जवान बदल गए हैं मगर, जवानी है.

पास के शहर में, हाइवे पर एक मल्टी-प्लैक्स सिनेमा हॉल चलता है. कस्बे के कुछ लोग कभी कभार वहाँ फ़िल्म देख आये हैं, मगर टिकटों का इतना ऊँचा दर वाहियात लगता है. क़स्बा अक्सर अफ़सोस करता है कि कस्बे में कोई थियेटर नहीं रहा. जब था तो ‘है’ का एहसास नहीं था, अब नहीं है तो ‘था’ को ‘मिस्’ करते हैं !

कस्बे का वह सिनेमाघर, जहाँ लगने वाली फ़िल्में आज की प्रौढ़ पीढ़ी की ज़वानी के दौर की कहानियाँ हैं. और वह टॉकिज उस जवानी की सिर्फ़ याद… कॉलेज बोलकर टॉकीज़ में मैटिनी शो की याद… बाप के पॉकेट से चुराए या झूठ बोलकर लिये पैसों से टिकट खरीदना… हॉल के अंदर पर्दे की ओर सिक्के फेंकना… सीटियाँ और गन्दी गालियाँ… हाफ़-टाइम (इंटरवल) के बाद धोखा देकर हॉल के ‘एक्जिट-गेट’ से अंदर घुसना और बिना टिकट आधी फिल्म देखना… और यदि टिकट देखने वाला लामा चुस्त ना हुआ तो अगले शो की पुरी फिल्म भी ! चटकीले कपड़ों में पूरा बनाव-श्रृंगार करके आई कस्बाई लड़कियों के कपड़ों से उठती सेंट और गर्दन से उठती पाउडर की महक सूँघना… गेट में घुसते हुए, टिकट की लाइन में और अँधेरे में हॉल के भीतर सीट तलाशती हुई लड़की या औरत के शरीर की अपने घुटने या पीछे सिर पर नरम टकराहट का मज़ा लेना… सिगरेट या बीड़ी फूंकते हुए पान की दूकान को दुनिया जहान की फालतू की बहस का केन्द्र बनाकर टाईमपास करना…

बीत चुका वक्त हमेशा भला लगता है ! लाईट हॉउस अब नहीं है, शंभू बीटल शॉप नहीं है… वे लोग नहीं हैं ! कहाँ गए, किधर उजड़े या बसे कोई नहीं जानता. इधर का सारा इलाका अब उतना सुनसान भी नहीं रहा. कम्पनी से रिटायर्ड या वी आर एस ले चुके लोगों ने जमीन खरीदी और मकान बनाकर बस गए. पुराने लोग कभी कभार बात करते हैं. सिनेमाघर के नहीं होने के संबंध में बहुत सारी चीजों, मसलन महंगाई, सरकारी नीतियाँ, प्रशासन और व्यवस्था, सामुदायिक रिक्रिएशन शून्यता आदि को कोसते हैं. पुराने दिनों की बात करते हुए वे खुश और उत्साही दिखाई देते हैं. किस्से कहते हुए, सिनेमाघर का अतीत बताते हुए, स्वानुभूति से संपन्न किस्सागो हो जाते हैं !

लेकिन, हालिया पैदा हुई पीढ़ी को मालूम ही नहीं कि इस सपाट जगह, जो मालूम है कि सालों पहले बिक गयी है, क्योंकि कस्बे की कोई भी खाली जमीन अनबिकी और लावारिस है ही नहीं, पर कभी एक मंजिला रंगीन इमारत थी… सिनेमा हॉल, जिसका नाम ‘लाईट हॉउस’ था. जिस जगह पर टॉकिज था, वहाँ अब लगभग सपाट जगह है. वो इमारत बंद होने के कुछ साल बाद, नए भू-स्वामी द्वारा डहा दी गई थी. चारों तरफ लोगों के मकानों की हदें हैं. डह जाना…ध्वस्त हो जाना… दीवारों का, स्थापनाओं का, उम्मीदों का… आदमियत का,  किसी भी चीज़ का… एक डरा देने वाला एहसास है. इस डर को महसूस करने वाले लोग अब कम बचे हैं, क्योंकि ऐसे डर को महसूसने की फुर्सत उनके पास नहीं बची है. यह बात भी है कि, अब सबके अपने अपने डर हैं, बनिस्पत किसी सामूहिक डर के, जो कभी कभी अपवाद या प्राकृतिक आपदा जैसा उत्पन्न हो जाता है ! और इसलिए दूसरों के डर की पहचान उनके लिये निरर्थक और अनावश्यक हो गयी है.

इतिहास की भाषा में दर्ज़ किया जा सकता है – ‘लाईट हॉउस’ का अवसान हुए एक दौर बीत चुका है.  निशानी के तौर पर एक तरफ आज भी ध्वस्त इमारत की टूटी-फूटी ईंटों का मलबा पड़ा है… लेकिन उसकी निशानदेही नए लोग नहीं कर सकते. इसलिए वे बिना किसी अतीतबोध और भावना के वहाँ से गुजरते हैं, स्कूली बच्चे ट्यूशन जाते हुए सायकिल और बड़े लड़के बाइक खड़ी कर गप्प मारते हैं, बैठते हैं. अमूमन सब के पास मोबाइल होता है. मोबाइल में उनकी एक दुनिया होती है. मनोरंजन, सूचना और सुख-दुःख उसी में बाँटते हैं… हँसते हुए लड़के-लड़कियाँ… टीनेजर्स ! दिन भर सुनसान रही जगह को शाम को उनकी मौजूद हो जाने से उग आई हँसी सब्ज़ – सब्ज़ बना देती है.

उस मलबे के आसपास एक दिन मॉडर्न ट्रांजिस्टर बज रहा है… साल 2014, सोलह वर्षों बाद. रेडियो-ट्रांजिस्टर की जगह अब एफ़.एम. आ गया है, जो चलती फिरती गाड़ियों और मोबाइलों जैसे उपकरणों में भी उपलब्ध है. वही एफ.एम. बज रहा है…

वक्त बदलने से भूमिका बदल गई है, पात्र स्थानापन्न हो गए हैं. लेकिन चरित्र वही हैं, जिन्हें पुन: पुन: निभाया जाना है ! सोलह साल पहले सोलह के रहे लोग अब बत्तीस के हो रहे हैं… अधेड़… ! उनका माज़ी किसी पुरानी फिल्म की तरह उनके लिये महत्वपूर्ण होते हुए भी अब अप्रासंगिक हो चुका है. और कई लड़के और लड़कियाँ सोलह साल की हुई हैं, कई होने वाले हैं. कॉलेज जाने वाले लड़के बदल गए हैं, वे अब सायकिल से नहीं जाते. उनके पिताओं ने दुलार या उनकी जिद से आधुनिक मोटर-सायकिलें खरीद दी हैं, और बहुत सारे नाबालिग कस्बे की सड़कों पर रॉकेट की गति को मात देने का अभ्यास करते हुए बाइक चलाते हैं. खेत वाला रास्ता कभी का खत्म हो चुका है, क्योंकि अब खेत ही नहीं बचे हैं ! खेत दो कट्ठे से छः कट्ठे के हिसाब से रिहायशी जमीन में बदल गए और वहाँ मकान उगे हैं. यों भी खेत की पगडंडी से सायकिल ही ठेल कर लिये जाया जा सकता है, बाइक तो सड़क पर ही चलेगी ! लड़के पीढ़ी बदलने के नियमानुसार बदल गए हैं, मगर वे लड़के हैं. मस्त, शरारती और जवान. गवैये और सीटी मारने वाले नहीं, मोबाइल पर फुसफुसाने वाले. और छत पर कपड़े पसारने वाली लड़कियाँ भी वैसी लड़कियाँ नहीं हैं… हालांकि वे भी लड़कियाँ ही हैं ! वे स्कूल-कॉलेज-ट्यूशन जाती हैं. पास के शहर में पढ़ाई के लिये रोज सुबह-शाम की लोकल से अप’एन डाउन करती हैं. वहाँ लव, फ्लर्ट, फ्रेंडशिप के साथ साथ शॉपिंग भी करती हैं. बिंदास रहती हैं… खुलकर हँसती हैं. कुल मिलाकर जिंदगी से भरपूर लड़कियाँ हैं. वे लड़कों द्वारा एक नज़र देख लिये जाने के लिये आतुर नहीं रहतीं… ज्यादातर खुद ही लड़कों को परख कर रेस्पांस देने, न देने का फैसला अपने पास सुरक्षित रखती हैं. उन्होंने ‘गुलाब गैंग’, ‘क्वीन’ और ‘मर्दानी’ जैसी फ़िल्में देख ली हैं…

…तो लाईट हॉउस के अवशेष पर यूँ ही ऊंकडू बैठ कप वाला आइसक्रीम खाते और सामने के नए मकान की छत पर दोपहर को सूखने डाले कपड़े समेटने आई, खुले बालों को संभालते हुए अपने काम में व्यस्त और बेफ़िक्र छरहरी लड़की को निहारते लड़के के मोबाइल के एफ़.एम. पर बज रहा है… ‘हमरी अटरिया पे आजा रे सांवरिया… देखा देखी तनिक हुई जाय…

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