अपने दौर की चिंता चुनौतियां हमेशा ही साहित्य सर्जकों के चित्त में शामिल रहे हैं | अपने समय से मुठभेड़ करती के पी अनमोलकी कविता …..संपादक  

लिखो बसंत

के पी अनमोल

धर्म को ज़रूरत नहीं होती
गधों की
जिनकी पीठ पर बैठ
अपनी ध्वजा हाथ में लिए
निकल सके सबसे आगे
ज़रूरत होती है
गधों को धर्म की
जिसको कन्धों पर रख
वे चला सकें गोलियाँ
मन-माफ़िक
तुम मेरी बात सुन रहे हो ना!
यह कोई कविता नहीं है
बात है
बात है आज के डरे हुए समय की,
बंजर सपनों की,
ख़ूनी उम्मीदों की
देखना!
रोयेगा यह दौर,
रोयेंगी तलवारें,
रोयेगा लहू
देखना तुम!
वर्ना समय रहते
लिख दो बंदूकों के मुंह पर कविताएँ
और थमा दो उन्हें
पागल हवा के हाथों में
अंत लिखने को
अब लिखना ही होगा तुम्हें
बचाव का गीत
धर्म के लिए
मानवता के लिए
सुन रहे हो ना तुम!
लिखना ही होगा
धूमिल के शब्दों में
‘बसंत’
ठीक- ‘बस अंत’

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