ये समझा जाता रहा है कि पत्रकार जनता की धड़कन पहचानते हैं और उसे शब्द देते हैं। वे एक प्रकार से जनता के प्रतिनिधि बन कर सत्ता और समाज के बीच सेतु होते हैं और इसीलिये लोकतंत्र के तीन अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका के साथ चैथे अंग के रूप में काम करते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देश और समाज का परिदृश्य बदल गया है। ज्ञान और अध्ययन का क्षरण हुआ है, वैचारिक और राजनीतिक असहमति को सहन न करने आदि की बढती प्रवृति देश के लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा है।

लोकतंत्र बचेगा तभी हम बचेंगे

डॉ० नमिता सिंह

जनवादी लेखक संघ उ॰प्र॰ की अध्यक्ष नमिता सिंह ने हाल में बंगलूरू की वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के विरोध को देश में लोकतंत्र को बचाये रखने की मुहिम के रूप में देखने की बात कही है। गौरी लंकेश की दिन दहाड़े घर में घुसकर की जाने वाली हत्या को कुछ लोग समाज में होने वाली लूटपाट-हत्या जैसे अपराध की श्रेणी में रखने की कोशिश कर रहे हैं। ये वही लोग हैं जो असहमति और प्रतिरोध की आवाज़ को बलपूर्वक दबा देने के हिमायती हैं। राजनैतिक रूप से अगर आप सत्ता-व्यवस्था की नीतियों के आलोचक हैं और विरोधी विचारधारा के हैं तो सत्ता-समर्थकों द्वारा आपकी हत्या होना आज मामूली बात हो गयी है। गौरी लंगेश लंबे समय से अपने पत्र में तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रहीं। देश के पहले प्रधानमंत्री से लेकर इंदिरा गांधी तक और फिर अब वर्तमान मोदी सरकार की अनेक रीति-नीतियों की वे प्रखर आलोचक रहीं। कुछ दशक पहले तक आलोचना के बावजूद उसका दृष्टिकोण ध्यान से सुना जाता था। ये समझा जाता रहा है कि पत्रकार जनता की धड़कन पहचानते हैं और उसे शब्द देते हैं। वे एक प्रकार से जनता के प्रतिनिधि बन कर सत्ता और समाज के बीच सेतु होते हैं और इसीलिये लोकतंत्र के तीन अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका के साथ चैथे अंग के रूप में काम करते हैं।

    लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देश और समाज का परिदृश्य बदल गया है। ज्ञान और अध्ययन का क्षरण हुआ है इसीलिये किसी से असहमत होने पर संभ्रांत दिखाई देने वाले लोग भी अब बहस नहीं करते बल्कि सीधे गाली-गलौज करते हैं जिसके नमूने हमें फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर दिखाई देते हैं। विचारधारा की असहमति सत्ता के समर्थकों को इतना डराती है कि लिखे गये लेखों या किताब के कारण फौरन ऐसे लेखक-पत्रकारों की हत्या हो जाती है। कानून-व्यवस्था इतनी लचर हो जाती है कि तमाम सूत्रों से जानकारी के बाद भी अपराधी नहीं पकड़े जाते हैं। पिछले चार सालों में डाॅ0 नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पानसारे और साहित्य अकादमी से सम्मानित कलबुर्गी ऐसे ही लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता थे।

वैचारिक और राजनीतिक असहमति को सहन न करने और विरोधी आवाज को हिंसा द्वारा दबा दिये जाने की यह दबंगई देश के लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा है। जहां असहमति हो या सच्चाई के लिये आवाज उठे उसे बलपूर्वक दबा दिया जाना तानाशाही को, हिंसा और अन्याय की राजनीति को जन्म देता है। हिंसा आधारित राजनीति में कोई भी सुरक्षित नहीं। जीने का अधिकार और सम्मान की सुरक्षा केवल लोकतंत्र में ही संभव है। इस लोकतंत्र के लिये, अन्याय के प्रतिरोध के लिये पत्रकार और लेखक दबंगई की बलि चढ़ते रहे हैं। बिहार के पत्रकार को शाहबुद्दीन जैसे नेता के लोगों ने मौत के घाट उतार दिया तो 2002 में गुरमीत रामरहीम के भक्तों ने यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की बात अपने पत्र में छापने वाले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को गोली से उड़ा दिया। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं लेकिन जब वैचारिक असहमति के कारण हत्यायें हों तो यह लोकतंत्र को कमजोर करता है और क्षीण होता लोकतंत्र तानाशाही में बदलने लगता है जिसका सबक हमें हिटलर द्वारा शासित जर्मनी के इतिहास से लेना चाहिये।

 इस मौके पर जर्मनी के ही कवि पास्तर निमोलर की एक विश्व प्रसिद्ध कविता को हिन्दुस्तान के संदर्भों में बदल कर कहना समीचीन होगा-

पहले वे आये मुसलमानों के लिये
मैं चुप रहा
क्योंकि मैं मुसलमान नहीं था।
फिर वे आये ईसाईयों के लिये
मैं चुप रहा
क्योंकि मैं ईसाई नहीं था।
फिर वे आये कम्युनिस्टों के लिये
मैं चुप रहा
क्योंकि मैं कम्युन्स्टि नहीं था
फिर वे आये
मानव-अधिकार कार्यकर्ताओं के लिये
मैं चुप रहा
क्योकि मैं मानव अधिकार कार्यकर्ता नहीं था।
और फिर, वे आये मेरे लिये
वहां सन्नाटा था
मेरे लिये बोलने वाला
वहां कोई नहीं था।

(पास्तर निमोलर से क्षमा याचना सहित)

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