प्रेम, स्पंदन के साथ बाल मनो-भावों का शिद्दत से विश्लेष्ण करती ‘अमृता ठाकुर’ की बेहद संवेदनशील कहानी ….| – संपादकीय

 लौट आओ वसीम !

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अमृता ठाकुर
जन्म – बिहार
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित |
दूरदर्शन में विषय विशेषज्ञ के तौर पर स्वतंत्र रूप से कार्यरत
विगत १३ वर्षों से पत्रकारिता में सक्रीय
सम्प्रति – स्वतंत्र पत्रिकारिता
318 मीडिया अपार्टमेन्ट, अभय खंड – 4
इन्द्रापुरम, गाज़ियाबाद
फोन – 09868878818

पंखुरी की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। ‘अभी तो पांच दिन बचे हैं !’ पंखुरी बुदबुदाई। फिर कुछ सोच कर जल्दी से चादर से सिर निकाला और बिस्तर से कूद पड़ी। स्टोर रूम की ओर भागी। पर वहां तो कहीं नहीं था। बक्सों के पीछे झांका। दुनिया भर की धूल थी। छींक पर छींक शुरू। छींक को रोकती कमरे से बाहर निकली। मौसी से टकराते टकराते बची।
‘तुम क्या कर रही हो यहां? मना किया था ना इस कमरे में आने से!’ मौसी ने गुस्से से कहा।
‘वो हम, मेरा गुड़िया वाला बक्सा नहीं मिल रहा।’ अचानक मौसी को सामने देख पंखुरी का दिल धक से रह गया। कहीं स्टेार रूम में धुसने पर डांट न पड़ जाए। सुनीता की दीदी की शादी में मौसी ने कितना हंगामा कर दिया था। उसकी गलती क्या थी ! मौसी के बक्से में से एक साड़ी ही तो निकाल कर सुनीता को दी थी,वो भी हमेशा के लिए नहीं बस शादी में पहनने के लिए। पहन कर लौटा देती। मौसी के पास इतनी तो साड़ियां हैं। बिना पूछे क्यों दी साड़ी बस इतनी सी बात पर छड़ी से कितनी पिटाई की थी। और वो खुद जो मेरा पुराना कपड़ा और गुड़िया पूछे बिना लच्मी को दे दीं। लच्मी मेरी गुड़िया को कित्ते खराब से टांग से पकडी हुई थी। पर मौसी को क्या उन्हें तो मेरी सारी चीजे कबाड़ ही लगती हैं।
‘कौन गुड़िया वाला बक्सा ? हमको नहीं पता।’
‘उ वाला जिसमें पैसा रखते थे। फिर गुड़िया का कपड़ा भी रखे थे।’
‘पता नहीं।’
कहा होगा? फिर याद आया बिस्तर के नीचे रखा था। भाग कर दूसरे कमरे में गई। हां! बिस्तर के नीचे ही रखा था। खोल कर देखा, सब कुछ ठीक था। कल जो तितली पेपर में बनाया था, उसका रंग दूसरे पेपर में लग गया था। ‘अरे! चिपक भी गया है। पंखुरी बुदबुदाती हुई दोनों पेपर अलग करने लगी। फिर भी थोड़ा हिस्सा फट ही गया। उसे हाथ से दबाती हुई अपने किताब के अंदर रख दी। फिर से एक बार सारा सामान निकाल कर बाहर रखा। एक एक चीज हाथ में उठाकर फिर से उलट पलट कर देखा। मिट्टी का आम जिसे उसने दो तीन महीने पहले ही स्कूल में हैंड वर्क की क्लास में बनाया था, बहुत सुन्दर लग रहा था। सूखने के बाद हरे और पीले रंग से रंगा था, थोड़़ा चिनक सा गया था। टूटी हुई चूड़ियों को जोड़कर बनाई हुई बत्तख की तस्वीर, कुछ हाथ से बनाए हुए बर्थडे कार्ड, जिसमें रिबन को चिपका कर उसने हैप्पी बर्थडे पापा लिख रखा था, कहीं कहीं से उखड़ रहे थे। उसने उसे फिर से दबा कर चिपकाने की कोशिश की। माचिस के डब्बों को जोड़कर बनाया हुआ घर आज भी अपनी रंग बिरंगी दीवारों के साथ खड़ा था। पंखुरी ने उसकी खिडकियों केा एक बार खोल कर बंद कर देखा। सब कुछ ठीक था। उसने सारा सामान फिर करीने से बक्से में रखा। ताले की जगह पर एक मोटी लकड़ी फंसा दी। बक्से को पलंग के नीचे खिसकाती हुई किचन की तरफ भागी। नानी ने नाश्ता तैयार कर लिया था।
‘मुंह धोई कि ऐसे ही आ गई जूठे मुंह?’ नानी ने उसे देखते ही कहा। पंखुरी बिना जवाब दिए बाथरूम की ओर भागी। आज सब कुछ उलटा पुलटा हो रहा था, उसके दिमाग में दिल्ली का घर, एम 38 बी, राजौरी गार्डन ही घूम रहा था। पता रट गया था उसे, कई बार चिट्ठी जो लिखी थी। पर मम्मी उसकी चिट्ठी का जवाब क्यों नहीं देती? एक शिकायत मन में फिर से हवाई चक्रवात की तरह घूम गया। फिर खुद ही जवाब दे दिया। पापा ने कहा था उन्हें चिट्ठी लिखना अच्छा नहीं लगता। ब्रश को दो बार मुंह में मारा फिर किचन की ओर भागी। कुरकुरा पराठा और चाय उसका फेवरेट।
पंखुरी जब छह महीने की थी तभी उसकी नानी उसे अपने साथ ले आई थी। मम्मी पापा के लिए मुश्किल भी था नौकरी पर जाते या बच्ची को देखते। बच्ची टायफायड में बुखार से तप रही थी। डाक्टर ने एक तरह से कह दिया था कि मामला हाथ से निकल गया है। बहुत मुश्किल है बच्ची कमजोर भी है। नानी ने उसे गोद में उठाया और उसी रात गाड़ी से डाल्टेनगंज आ गई। सबने कहा भी लोग बीमारी में दिल्ली जाते हैं आप उसे यहां ले आईं। पता नहीं नानी ने क्या सोचा । अच्छी देखभाल से बच्ची जल्दी ही टनमना गई। नानी पंखुरी के लिए मां बन गई और नाना पापा। और अपने मम्मी पापा दिल्ली वाले मम्मी पापा। नानी पास के मिशन स्कूल में अंग्रेजी की टीचर थी। पंखुरी का भी तीन साल होते होते उसी मिशन स्कूल में नाम लिख गया। दिल्ली वाले मम्मी पापा से मिलने का मौका उसे गरमी की छुट्टियों में ही मिलता था। पर वहां जाने की तैयारी पूरे साल होती थी।
‘मम्मा खाने को कुछ है?’ शाम का अपना पुराना नारा दोहराती हुई पंखुरी ने किचन में प्रवेश किया। वहां कोई नहीं था।
‘शायद सोने वाल कमरे में हैं सब’ मन में सोचते हुए सोने के कमरे की तरफ चली गई। दो सुटकेस खुला पड़े थे। मौसी कपड़ों को तहिया कर रख रहीं थीं । नानी पलंग पर अधलेटी उनसे बातें कर रहीं थीं। भूख का उसका पुराना नारा किचन में शहीद हो कर रह गया। पंखुरी के चेहरे पर चमक आ गई। उसका सूटकेस ठीक हो चुका था। पूरा उपर तक भर गया था। पर उसका गुड़ियों वाला बक्सा तो इसमें डाला ही नहीं गया! भाग कर गई और पलंग के नीचे से गुड़ियों वाला बक्सा खींच ले आई। धीरे से मौसी की तरफ सरका दिया।
‘ये क्या है? क्या करेगी इसे ले जा कर? हम नहीं ले जाएंगे ये सब। सब हमीं को उठाना पड़ता है।’ मौसी ने बक्सा फिर से उसकी तरफ खिसका दिया। पंखुरी रूंआसी हो गई।
‘पंखुरी! उसमें से कुछ समान निकाल कर दे दे मौसी को सुटकेस में रख देंगी। बाकी अगली बार ले जाना।’ नानी को शायद दया आ गई। पंखुरी मन मसोसती हुई बक्सा खोल कर सामना निकालने लगी। हर सामान को उलट पलट कर देखा। ‘सब तो सुंदर हैं किसे छोड़ू’ उसके लिए निर्णय लेना बहुत मुश्किल हो रहा था।
‘क्या मां आप भी इसको बढावा देती हैं। हर बार कूड़ा उठा कर ले जाती है। हम नहीं ले जाएंगे। अकेले कितनी मुश्किल होती है। इसका ध्यान रखूंगी की सामान का। मेरे बस का नहीं है।’
पंखुऱी की आंखें डबडबा गई। कितना संभाल कर रखा था उसने। मुंह नीचे करके चुपचाप बैठ गई। मन बहुत खराब सा हो रहा था कुछ वैसा ही जैसा दिल्ली से लौटते हुए होता है। पापा कहते बिल्कुल रोना नहीं है,मम्मी को फिर रात को नींद नहीं आती। ट्रेन रुकते ही झट से उपर वाले बर्थ पर जा कर लेट जाया करती थी ताकी मम्मी को उसके आंसू न दिखे उन्हें लगे वह सो रही है। कुछ वैसा सा ही मन होने लगा।
‘पंखुरी तुम ऐसा करो! अपने ये सामान स्कूल वाले बैग में रख लो। पर उसका ध्यान तुम्हे ही रखना होगा। छूटा तो तुम जानो!’ नानी तक उसके आंसू पहंुच रहे थे।
‘हा!ं हां! हम ही उठाएंगे उसको।’ पंखुऱी खुश हो गई।
‘अरे! तुम लोग जल्दी करो। ले जाने के लिए अभी खाना भी तैयार करना है।’ कहते हुए नानी उठ गई। पंखुऱी ने घड़ी की तरफ देखा अभी चार धंटे बचे थे ट्रेन के लिए।
मां! हम रश्मि के यहां जा रहे हैं। जवाब का इंतिजार किए बगैर वह रश्मि के घर की ओर दौड़ गई। उससे खुशी संभाले नहीं संभल रही थी।

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फोटो – ज़फर अंसारी

स्टेशन की भीड़ भाड में मौसी की उंगली थामें खड़ी पंखुऱी का ध्यान चाय वाले की तरफ गया। उनींदा सा बैठा हुआ था, बार बार सिर को संभालने की कोशिश कर रहा था जो नींद के भार से लुड़का जा रहा था। उसे हंसी आ गई। नींद तो उसे भी आ रही थी, पर जाने के उत्साह ने पलकों को थाम रखा था। उसने पीठ पर रखे अपने स्कूल बैग को हाथ पीछे कर छू कर देखा। सब ठीक ठाक था।
बैग अभी नीचे रख दो। अभी वक्त है गाड़ी आने में। मौसी ने सुटकेस को लिटा कर उसके बैठने के लिए जगह बनाई। पंखुड़ी ने स्कूल बैग को हाथ में कस कर पकड़ा और सूटकेस पर बैठ गई।
फट, फट, फट, ‘आइसक्रीम!’
आइसक्रीम वाला आइसक्रीम के बॉक्स के ढक्कन को जोर से पटकता हुआ सामने से गुजरा। पंखुड़ी ने मौसी की तरफ देखा। पर मौसी पर्स में से निकाल कर टिकट को देख रही थी। मन मसोस कर दूसरी तरफ देखने लगी। अचानक उसकी नजर सामने खड़े आदमी की तरफ गई। या शायद वह आदमी पंखुरी को इतनी गहरी निगाह से देख रहा था कि उसकी निगाह खुद ब खुद उस आदमी पर चली गई। अच्छे साफ सुथरे कपड़े पहना हुआ, लगभग तीसबत्तीस साल का वह आदमी था। दस कदम की दूरी पर खड़ा पंखुड़ी को एकटक देखे जा रहा था। कुछ बुदबुदा भी रहा था, पर स्पष्ट नहीं था, उसके होंठ बस हिलते हुए दिख रहे थे। उस आदमी ने दो चार कदम और बढाएं पंखुरी के और करीब आ गया। अभी भी उसकी नजर पंखुड़ी के चेहरे पर ही थी। अभी तक मौसी की नजर आदमी पर नहीं गई थी। वो बड़बड़ाता हुआ पंखुड़ी के और करीब आ गया। मौसी ने जैसे ही टिकट से अपनी आंखें हटाईं उनकी नजर सीधी उस आदमी पर पड़ी। एक बार तो घबरा ही गईं। पर जैसे आसपास की गतिविधियां और शोर उस आदमी के कान तक पहुंच ही नहीं रहे थी उसकी निगाहें लगातार पंखुरी पर ही टिकी हुई थीं ।
‘वसीम ! वसीम!’ वह बुदबुदाया। एक खोजती सी निगाहों से वह पंखुरी के चेहरे को टटोल रहा था। जैसे उस चेहरे पर उसे कुछ परिचित रेखाएं दिख रही हैं जिन्हें पूरी तरह से पहचान कर आश्वस्त होना चाहता हो।मौसी ने बच्चा चोर समझ पंखुरी को खुद से चिपका लिया ।
‘वसीम!’ वो हौले से बुदबुदाया।
“क्या बात है,क्या चाहिए आपको?” मौसी ने अपनी घबराहट को छिपाते हुए आवाज कड़ी करके पूछा। पर अभी भी उसकी निगाहें पंखुरी के चेहरे पर ही टिकी हुई थीं, जैसे मौसी की आवाज उसके कानों तक पहंुच ही नहीं रही हों ।
“वसीम बेटा कहाँ जा रही हो? घर चलो।’ कुछ रूंधी सी आवाज।
‘बेटू यहां से चलो, देखो कितनी भीड़ है ,ट्रेन भी आने वाली है, तुम्हे चोट लग जाएगी“ ये कहते हुए उसने पंखुऱी का हाथ पकड़ लिया। पंखुरी की सांस डर से उछाले मारने लगी। वह रो पड़ी। उसने मौसी की साड़ी को और कस कर पकड़ लिया ।
आदमी पंखुरी का हाथ लगातार खींच रहा था। मौसी घबराती हुई सहायता के लिए ईधर उधर देखने लगी।
‘चलो अक्रम! तुम यहां क्यों आ गए ? माफ कीजिएगा बहनजी! इसको कुछ गलतफहमी हो गई है।’ अचानक एक दूसरा आदमी आया और उस आदमी को खींचने लगा। वो आदमी जिसका नाम शायद अक्रम था पंखुड़ी का हाथ छोड़ने को तैयार ही नहीं था। एक अच्छी खासी भीड़ वहां जमा हो गई। चायवाला जो अभी तका बैठा उंघ रहा था भाग कर आ गया और मुस्तैदी से अक्रम के हाथ को छुड़ाने के तरीके बताने लगा। हर तरह की जोर अजमाइश हो गई पर अक्रम ने हाथ नहीं छोड़ा।
‘प्लीज! अंकल हाथ छोड़ दीजिए, दर्द हो रहा है।’ पंखुरी भर्राई आवाज में बोली। कुछ सेकेण्ड अक्रम उसके चेहरे की तरफ देखता रहा फिर पता नहीं क्या सोचा, उसके हाथ पर से अपनी पकड़ ढीली कर दी। इतना काफी था, पास खड़े उसके परिचित ने अक्रम की हाथ की पकड़ से पंखुऱी का हाथ छुड़ाया और खींचते हुए उसे ले गया। पर अक्रम की नजर अभी भी पंखुऱी पर थी। वह लगातार पीछे मुड़ उसे देखता हुआ, बोलता जा रहा था ‘वसीम लौट चलो।’
पंखुऱी सहमी सी अभी भी मौसी की साड़ी से लिपटी हुई थी। उसे अपना बैग याद आया। इस अफरा तफरी में भी उसके हाथ से बैग नहीं छूटा था। उसने और कस कर बैग को पकड़ लिया। अभी दोनों की सांसे नार्मल नहीं हुईं थीं। डर वहीँ मौजूद था। लोग उनकी तरफ देख कर बातें कर रहे थें। इतने में ट्रेन के आने का अनाउंसमेंट हुआ। लोग सब भूल अपने सामान को हाथेां व कंधों में लेकर अटेंशन की मुद्रा में आ गए। मौसी और पंखुड़ी का ध्यान भी अभी हुई घटना से थोड़़ा हटा।
‘कूली कहां गया। कहा था ट्रेन जब आएगी मैं आ जाउंगा। दोनेा बैग अकेले कैसे हम उठाएंगे।’ मौसी जैसे दूसरी दुनिया से वापिस वर्तमान में आ गई हों, चिंतित स्वर में बोली। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि दोनो सूटकेस के साथ वह कैसे ट्रेन में चढेंगी। अब तो पंखुऱी का हाथ पकड़ना और भी जरूरी हो गया था।
‘गाड़ी संख्या 5251, प्लेटफार्म नंबर दो पर शीध्र ही आने वाली है।’ फिर एक बार अनाउंसमेंट हुआ। ट्रेन की आवाज और करीब आ गई। आवाज से लग रहा था कि बस किसी भी समय वह स्टेशन पर आने वाली है। इतने में भगवान की तरह कूली कहीं से अवतरित हुआ। झट से सूटकेस सिर पर चढाया और चल पड़ा।
‘अरे! कहां जा रहे हो गाड़ी तो आने दो।’
‘ मैडम जी आपका डब्बा उस तरफ लगेगा। चलिए!’मौसी ने पंखुरी का हाथ पकड़ा और कूली के पीछ भागे। इतने में गाड़ी भड़भड़ाती हुई स्टेशन पर आ गई। कूली सामान लिए हुए भीड़ को चीरते हुए डब्बे में चढ गया। पंखुरी और मौसी भी कूली के बनाए रास्ते से लोगो से धक्का मुक्की करते हुए उपर चढ गएं। गेट से अगला बर्थ ही उन दोनों का था। पंखुरी उकडूं हो कर सीट पर बैठ गई। मौसी सामान को सीट के नीचे सेट करने में लग गई। इतने में फिर से बाहर से कुछ शोर सुनाई पड़ा। पंखुरी ने खिड़की से बाहर देखा। अक्रम तेजी से सभी डब्बेंा के अंदर झांकता हुआ बदहवास सा इसी तरफ आ रहा था। दो तीन लोग उसे रोकने के लिए उसके पीछे दौड़ रहे थे। पंखुरी की सांसे अटक गईे। वो भाग कर फिर मौसी के पीछ छिप गई। मौसी भी घबरा गईं उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि वो करें क्या। खिड़की भी इमरजेंसी डोर वाला हिस्सा था जिसमें लोहे की छड़े नहीं लगी हुईं थीं। मौसी ने खिडकी को उसके लोहे वाले पल्ले से बंद करने की कोशिश की। पर पल्ले में जंख़ लग गया था बीच में ही अटक गया।
‘अरे बिटिया धबराओ नहीं वो कुछ नहीं करेगा। अपना अक्रम है।’ पास की सीट पर बैठा एक बुजुर्ग जिसका शायद उस ट्रेन से रोज का आना जाना था, अक्रम को जानता था।
‘ये आपकी छोटी बिटिया हैं ना! उसकी शक्ल वसीम से मिलती है। अक्रम की बिटिया!’ बुजुर्ग ने पंखुरी की तरफ दिखाते हुए मौसी से कहा।
‘शायद इसीलिए वो आपकी बिटिया के पीछे पीछे आ रहा हैं। चिंता न करो वो कुछ नहीं करेगा। बहुत समझदार लड़का है। रेलवे में इंजिनियर था। बेचारे की बेटी ट्रेन से कटकर मर गई तब से इसका दिमाग गड़बड़ा गया है।’ बाहर शोर जारी था। पंखुरी ने हिम्मत करके खिड़की से बाहर झांका अक्रम को पकड़ लिया गया था। उसे मोटे से रस्से से बांधने की कोशिश की जा रही थी। वो लगातार छुड़ाने की कोशिश कर रहा था। अब उसे कस कर बांध दिया गया था। पर वह अभी भी रस्सी को छुड़ाने की कोशिश कर रहा था। ट्रेन चलने में कुछ ही सेकेंड रह गए थे। कई सवारी सामान लिए हुए भागते हुए अपने डब्बे खोज रहे थे। ट्रेन कुनमुनाती सी हिली। स्टेशन पर हड़बड़ाहट थोड़ी और फैल गई। शायद ये हड़बड़ाहट अक्रम के हिस्से भी आई। उसने जोर लगा कर उस मोटी रस्सी को भी तोड़ दिया और पंखुरी वाले डिब्बे की तरफ भागा। शायद उसने पंखुरी को देख लिया था। ट्रेन की स्पीड अब थोड़ी बढ गई थी । वह भाग रहा था।
‘वसीम लौट आओ। मत जाओ वसीम! लौट आओ! वह भागता हुआ चिल्लाया। पंखुरी की नजर अक्रम पर थी। पर अब उसे पता नहीं क्यों डर नहीं लग रहा था। ट्रेन का काफी हिस्सा प्लेटफार्म से निकल चुका था। वह भागता हुआ लगभग पंखुरी के डब्बे की खिड़की तक पहुंच चुका था।
‘वसीम घर चलो।’ उसकी आवाज में गिडगिड़ाहट थी। वह पंखुरी की तरफ हाथ बढा रहा था। पंखुरी की नजर भी उसके चेहरे पर थी। अचानक पंखुरी ने अपने स्कूल बैग को गोद में से उठाया और उसके हाथ में थमा दिया। वह बैग थामा और रुक गया। ट्रेन के उस डिब्बे ने प्लेटफार्म छोड़ दिया था। वहीँ खड़ा वह पंखुरी की तरफ देख रहा था और पंखुरी उसकी तरफ।
‘क्या दिया रे तूने उसको ?’
‘अपना बैग’ पंखुरी धीरे से बोली।
‘चल पीछा छूटा।’ मौसी के लिए पागल और कबाड़ से पीछा छूटना कम राहत की बात नहीं थी। गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ चुकी थी। अब वह कहीं नजर नहीं आ रहा था। पंखुरी का मन कुछ वैसा ही हो रहा था जैसा हर बार लैाटते हुए दिल्ली के स्टेशन पर होता है।

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