विचलन भी है जरूरी 

हनीफ मदार

कल चाय की एक गुमटी पर दो युवाओं से मुलाक़ात हुई दोनों ही किन्ही मल्टीनेशनल कम्पनियों में कार्यरत हैं | इत्तेफाक से दोनों ही कभी मेरे स्टूडेंट रहे हैं | उन्होंने मुझे पहचान लिया और बातें शुरू गई | रोजगार होने के बावजूद भी वे दोनों मुझे खुश नहीं दिख रहे थे | बात-चीतों में पता चला कि दोनों ही इस महंगे समय और प्राइवेट कम्पनियों की न्यूनतम तनख्वाह में पारिवारिक जीविकोपार्जन की समस्या से ग्रसित थे | इन नौकरियों को पाने की योग्यता लेने के लिए उनमे से एक के पिता को जहाँ एक बीघा खेत बेचना पडा वहीँ दूसरे पर पढ़ाई के लिए लिया गया कर्जा था, जिसे चुका पाने की नाउम्मीदी से निराशा भी थी | मैंने कहा तुमने सरकारी नौकरी क्यों नहीं तलाशी | वे बोले कैसी बात करते सर ? अभी आपने नहीं देखा अकेले उत्तर प्रदेश में ही ३६५ चपरासियों की नौकरी के लिए २३ लाख फार्म पहुंचे | जिसकी आहर्ता पांचवीं पास थी उसके लिए बड़ी संख्या में पी. एच. डी., एम्. बी. ए., और अन्य स्नातकों के फार्म थे |

दरअसल यह घटना एक बानगी भर है इससे देश भर में बेरोजगारी का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है | और यह निराशाजनक स्थिति इन दो युवाओं की ही नहीं है लगभग ८० प्रतिशत रोजगार युक्त युवाओं की कमोबेश यही हालात है | मल्टीनेशनल कम्पनियों में १२ से १६ घंटे काम करने के बाद 2 से 3 घंटे बसों और ट्रेनों में धक्के खाने के बाद घर पहुंचे इन युवाओं के सामने बच्चे की मंहंगी फीस, मकान का किराया, दूध वाले, राशन वाले का हिसाब और पत्नी या माँ की बीमारी जैसी आर्थिक परिवारिक समस्याएं दरवाजे पर ही मुंह बाए खड़ी मिलती हैं | तब इनके पास अपना ब्लड प्रेसर बढ़ने और मानसिक कुंठा में पत्नी से झगड़ने के अलावा कोई चारा नहीं होता | यह हालात अल्पायु में ही सुगर और हार्ट डिजीज के मुख्य कारण भी बन रहे हैं | इन युवाओं से बात-चीतों में उनकी सैलरी की चर्चा आते ही उनकी आँखें नम होने लगतीं हैं | इससे यह तो साफ़ तौर पर नज़र आता है कि हम विकास के नाम पर किस तरफ बढ़ रहे हैं |

एक तरफ विशाल भारतीय संस्कृति, परम्परा और राष्ट्रवाद के उत्थान, बचाव और ज़िंदा रखने की चिल्ल-पों है तो दूसरी तरफ मूल भारतीयता की सांस्कृतिक धरोहर हमारे तीज-त्यौहार की गरिमा और खुशियों का हनन करता, इन कम्पनियों का कुचक्र युवा पीढी को और अवसाद ग्रस्त कर रहा है, जब होली, ईद, दशहरा और दिवाली जैसे त्यौहारों पर अवकाश के बावजूद रात के १२ बजे तक कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करते युवा की शारीरिक और मानसिक स्थिति का आंकलन सहज ही लगाया जा सकता है | यहाँ सारे नियम कायदे क़ानून ताक में धरे बिराजते हैं, इनके खिलाफ प्रतिरोध को विकास अवरोधक तक की संज्ञा से नाबाज़ा जाता है |

दुनिया में सबसे ज्यादा युवा शक्ति वाले मुल्क की युवा ताकत आधुनिकता की अंधी दौड़ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तर्ज़ पर वर्तमान कम्पनी कानूनों के जाल में फंसकर कथित बौद्धिकता के साथ पुनः ग़ुलामी में जीने को विवश है | यह एक वर्ग विशेष “युवा वर्ग” की ही एक चुनौती एक समस्या है बाकी अलग-अलग वर्ग समूहों किसान, मजद्दूर, व्यापारी, स्त्रियाँ आदि की भिन्न-भिन्न अपनी समस्याएं हैं चुनौतियां हैं, सपनों के साथ धुंधली सी आशा है और निराशा के बीज भी | यह तमाम सामूहिक समस्याएं मूलतः जिस बिंदु पर जाकर एक होती हैं दरअसल वहीँ राष्ट्रीयता और भारतीय विकास की तस्वीर स्पष्ट होती है |

इसी समय में हमारे साहित्यिक, पत्रकार मित्रों के द्वारा कि ‘इन कविता या कहानियों के लिखने और छपने से क्या बदल जाएगा….. ? क्या सामाजिक और राजनैतिक बदलाव आ जायेंगे…. क्या समय की विभीषिका या मानवीय विकृतियाँ कम हो जायेंगी …?’ जैसे सवाल हैं वहीँ ‘बन्दूक मुक़ाबिल हो तो कलम उठाओ’ जैसे सूत्र वाक्य भी फरेब नहीं हैं | इसके आलावा हमारे सामने साहित्य में जनवादी चिंतनधारा की एक विशाल परिपाटी है जो न केवल हमें हमारे समय को गहराई से समझने की ताकत देती है बल्कि उससे हम ऐतिहासिक संदर्भों के साथ अपने समय से मुठभेड़ करने की एक चेतना भी ग्रहण कर पाते हैं |

बीसवीं सदी की शुरूआत ‘राष्ट्रीय पूँजीवाद के विकास का युग’ में राष्ट्रीयता की भावना के आधार पर चले “स्वदेशी आन्दोलन” के समय खुद प्रेमचंद भी राष्ट्रीय आन्दोलन में मजबूती के लिए विदेशी माल के बहिष्कार और स्वदेशी चीज़ों के अधिक इस्तेमाल के लिए चिंतित थे किन्तु बहुत जल्द उनकी यह समझ भी बनने लगी थी कि स्वदेशी आन्दोलन से मूल लाभ केवल तात्कालिक राष्ट्रीय पूंजीपति को ही हो रहा है और वे उसके खिलाफ हो गये | जबकि भारतीय पूंजीपति वर्ग के महान बौद्धिक राजनैतिक नेता भारतीय समाज की भुखमरी, गरीबी, बेकारी जैसी अनेक समस्याओं पर बात तो कर रहे थे किन्तु वे पूंजीपतियों से तमाम सम्पतियों पर काबिज़ होने के अधिकार को छीनने के हामी नहीं थे |

प्रेमचंद, यशपाल जैसे रचनाशील लोग उस समय में भी अपने अन्दर के साहित्यकार के विचलन को आम जन तक ले जा रहे थे | १९ अक्टूबर १९३२ को प्रेमचंद अपने लेख में स्पष्ट लिख रहे थे कि “इस बेकारी के ज़माने में आदमी को एक-एक पैसे की तंगी है | मजूरी सस्ती हो गई है कच्चा माल भी सस्ता हुआ है लेकिन कपडे के दाम जस के तस हैं | हम पेट काटकर जरूरत का महंगा सामन खरीदते हैं और मालिक शान से सुख भोग रहे हैं |” यह साहित्यिक आलाप सामाजिक आमजन को विचलित कर मुक्ति की मानवीय राह खोजने को विवश करता है |

अब सवाल यह उठता है कि क्या आधुनिक साहित्य की ऐतिहासिक दृष्टि की धार इतनी कुंद हुई है जो इन विभिन्न भारतीय जन समूह अपने भीतर पनपती निराशा की बजाय विचलन को जगह दे सकें….? या कि भारतीय जनवादी चिंतनधारा इतनी सुषुप्त हुई है कि आत्म विश्लेष्ण को ही नकार दिया फलस्वरूप जनवादी प्रतिवद्धता पर बुर्जुआ आत्म स्वरूप प्रभावी होने लगा | स्थितियां जो भी हों लेकिन निराशा की जगह विचलन के लिए हमें साहित्यिक और जनवादी आत्म चिंतन के वर्तमान विश्लेषण की जरूरत है |

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