“अब मैं उस बच्चे के प्रोजेक्ट के पास खडी थी जिसका नाम था “जीवन में गणित की भूमिका” (role of  mathemathics in life ) मेरे बिना पूछे ही इन छात्रों ने अपना परिचय आठवी कक्षा के आकाश और अंजली के रूप में दिया | ये दोनों ही बारी- बारी से गणित की स्पेलिंग के प्रत्येक लैटर को एक्सप्लेन कर रहे थे | इन दोनों छात्रों में बहुत ही गजब का सामंजस्य था | एक अपनी बात को खत्म करता तो दूसरा तुरंत आगे के शब्दों को पकड़ कर अपनी बात पूरी करता | आकाश और अंजलि के अनुसार, “गणित के जितने भी कन्सेप्ट हैं, वह प्रकृति में मिले हुए है जिनमें अंकों का विशेष महत्त्व है | तथा ज्ञान के टूल्स ही हमें गणित को समझने में आसान बनाते है |” इंसानी जीवन में वैज्ञानिक रचनात्मकता और लय को दर्शाती विज्ञान प्रदर्शनी पर ‘अनिता’ की रिपोर्ट …

विज्ञान और कला का समागम, विज्ञान प्रदर्शनी: रिपोर्ट (अनिता)विज्ञान और कला का समागम, विज्ञान प्रदर्शनी 

आज सुबह, मेरी मित्र शालिनी के बार बार फोन करने पर कि एक बार मैं उसके विद्यालय हाइब्रिड पब्लिक स्कूल जहाँ वह पिछले कई वर्षों से पढ़ा रही है, की विज्ञान प्रदर्शनी को अवश्य देखू, क्योंकि मैंने बहुत से विद्यालयों की प्रदर्शनियों को देखा था | उसके कई बार आग्रह कहूँ या आदेश पर मेरा भी मन हुआ कि आखिर जाकर देखा तो जाए कि वहां ऐसा क्या ख़ास है जो अन्य विद्यालयों में नहीं हैं | शहर से बाहर धूल और कीचड से भरे रास्तों पर से धक्के खाती हुई आखिर मैं स्कूल के गेट पर पहुँची ही गई | बाहर से स्कूल की दीवारों पर बनी बड़ी बड़ी पेंसिलों को देखकर ही, स्कूल के कुछ ख़ास होने का एहसास हो गया | जब अन्दर घुसी तो मुख्य गेट से ही सटे वोटिंग रूम में ही सीधे जाना हुआ | घुसते ही बाएं तरफ रिसेप्शन पर एक हेंडसम नौजवान से मुलाक़ात हुई, जो बाहर से आने वाले सभी अभिभावकों से बहुत ही सौम्य भाषा में टेबिल पर रखे हुई रजिस्टर पर साइन करने का आग्रह कर उनकी उपस्थिति दर्ज कर रहा था | मैंने भी सभी औपचारिकताएं पूरी करके अपनी नजरें, उस वोटिंग रूम के चारों तरफ दौड़ाई | पूरा ही रूम बच्चों की कलाकृतियों और उनके अभिनय की तरह- तरह के शेड्स के फोटोग्राफ्स से भरा हुआ था | वहां थोड़ी देर ठहराने पर महसूस हुआ कि स्कूल का प्रत्येक सदस्य कला साहित्य से बहुत ही करीब से जुड़ा हुआ था | मैं जल्दी ही अन्दर पहुंचकर प्रदर्शनी को देखने के लिए रोमांचित हो रही थी लेकिन गेट पर बहुत भीड़ थी|

विद्यालय ही वह जगह है जो बच्चों की विभिन्न प्रतिभाओं को निखारने का मंच प्रदान करता है जिसमें कि अगर विद्यालय वैज्ञानिक सोच को एप्रोच कर रहे हों तो इससे बड़ा योगदान आधुनिक समाज के लिए कोई भी नहीं हो सकता है | अब मैं भी उस भीड़ के साथ ही अन्दर ग्राउंड की तरफ बढ़ रही थी, घुसते ही मुझे सामने लगी बड़ी सी स्क्रीन पर वाद्य यंत्रों की मद्दयम-मद्दयम धुनों के साथ बच्चों द्वारा बनाई गयी वस्तुओं और प्रोजेक्ट्स की मेकिंग की वीडियो फुटेज चल रही थी | दो चार मिनट तक मैं उस वीडियो को बिना पलक झपकाए यूँ ही देखती रही |जिसमें दिखाया जा रहा था की पूरे स्कूल परिसर में जगह जगह बच्चे अपने-अपने प्रोजेक्ट्स को बनाने में, कोई रंग भरने में, कोई कार्ड बोर्ड को काटने में तो कोई उन्हें जोड़ने में बहुत ही तल्लीन दिखाई दे रहे थे | छोटे हों चाहे बड़े इस तरह की रचनाशीलता में हम सभी को आनंद आता है | कुछ लोग इस रचनाशीलता को ही अपनी जिन्गदी का उद्देश्य बनाकर जीवन को आनंदमय तरीके से जीते है तो वहीँ कुछ लोग इसे फालतू की चीज कहकर नकारते हुए जीवन को उन्हीं परम्परावादी तरीकों से जीने को उचित ठहराते हैं |img_0901

मैं अभी पूरा वीडियो देख भी नहीं पाई थी कि प्रदर्शनी हॉल के बीचों-बीच अपने गणित के प्रोजेक्ट के पास खड़े दो छात्रों में से एक मेरे पास आया और उसने मुझे उसके प्रोजेक्ट के बारे जानने का आग्रह किया | अपने लिए इस तरह के आतिथ्य सत्कार को देखकर मैंने हॉल में चारों तरफ नजरें घुमाई कि यह सब मेरे लिए ही हो रहा है या यहाँ पर आने वाला हर व्यक्ति इन बच्चों व इनके अध्यापकों के लिए उतना ही ख़ास है जितनी कि मैं लेकिन मैंने देखा कि मुझे यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी तरह ही ख़ास लगा | सभी बच्चों में गजब का उत्साह देखकर मैं हैरान थी |

अब मैं उस बच्चे के प्रोजेक्ट के पास खडी थी जिसका नाम था “जीवन में गणित की भूमिका” (role of mathemathics in life ) मेरे बिना पूछे ही इन छात्रों ने अपना परिचय आठवी कक्षा के आकाश और अंजली के रूप में दिया | ये दोनों ही बारी- बारी से गणित की स्पेलिंग के प्रत्येक लैटर को एक्सप्लेन कर रहे थे | इन दोनों छात्रों में बहुत ही गजब का सामंजस्य था | एक अपनी बात को खत्म करता तो दूसरा तुरंत आगे के शब्दों को पकड़ कर अपनी बात पूरी करता | आकाश और अंजलि के अनुसार, “गणित के जितने भी कन्सेप्ट हैं, वह प्रकृति में मिले हुए है जिनमें अंकों का विशेष महत्त्व है | तथा ज्ञान के टूल्स ही हमें गणित को समझने में आसान बनाते है | वहीँ गणित को हल करने से हमारे दिमाग की कसरत भी अच्छी होती है जिससे दिमाग तेज होता है | साथ ही ऐतिहासिक सभ्याताओं ने लोगों के अपने महलों, बावली आदि को बनाने में किस तरह इस का प्रयोग किया, पता चलता है | गणित नंबर्स के जादू की तरह है जो गणनाओं को आसान बनाता है | गणित के नियमों की वजह से ही हम बड़ी से बड़ी इमारतें और पुलों आदि का निर्माण आसानी से के कर पाते है जिसके टूल्स के रूप में कम्पास, प्राकर आदि शामिल होते हैं | गणित के इस्तेमाल से हमारे दिमाग में नए- नए विचार आते हैं जो वैज्ञानिक सोच को जन्म देते हैं जिसके कारण लोगों में सीखने और समझने के प्रति जागरूकता पैदा होती है |” मैं लगातार उनके चेहरे पर बिना थके झलक रहे गजब के उत्साह को देख रही थी |

img_7509-2थोड़ा आगे हॉल में चली तो देखा चारों तरफ ऊँची-ऊँची मेजों पर विभिन्न प्रकार के मॉडल्स रंगीन लाइटों में बहुर ही आकर्षक लग रहे थे जिनमें ज्यदातर वर्किंग मॉडल्स थे और कुछ बिना वर्किंग वाले थे | मैंने पहली पंक्ति से ही मॉडल्स को देखने के शुरुआत गेम के रूप में रोलर कोस्टर से की | मेरे पूछने पर हर्षित और दिव्यम ने बताया, “ यह गेम हमने छोटे बच्चों के मनोरंजन के लिए बनाया है क्योंकि बड़े बच्चे यहाँ पर जो कुछ भी हो रहा है उसे समझते है लेकिन प्री प्राइमरी के बच्चों को यहाँ आकर बुरा न लगे, इसलिए हमने इस गेम को प्लान किया है |” मुझे उन दोनों बच्चों की अपने से छोटे बच्चों के बारे में इस तरह की सकारात्मक सोच देखकर बहुत ही ख़ुशी हुई | उससे आगे चलकर मेरी नजर एक सुन्दर सी वाशिंग मशीन पर पडी | उसने बड़ी प्यारी सी स्माइल से अभिवादन के साथ ही अपना नाम रेनू बताकर मुझे बताया, “ मेम, विज्ञान के अविष्कारों ने हम महिलाओं के ढेर सारे कामों को बहुत ही आसान बना दिया है | इस मशीन के द्वारा मैंने यह दिखाने की कोशिश की है | जो कामकाजी महिलायें हैं वह कम वक्त में अपने कपड़ों को इसी में धोने के साथ- साथ सुखा भी सकती हैं | इससे समय की बचत होती है |” इतनी छोटी सी बच्ची की अपने वर्ग के प्रति इतनी सचेत समझ को देखकर मैं शोक्ड थी | हर कतार में बेहद ही आकर्षक मॉडल्स और उनके साथ खड़े बच्चों से बिना बातचीत करे आगे बढ़ना बहुत ही मुश्किल हो रहा था परन्तु प्रत्येक बच्चे से बात करना मेरे लिए उस समय संभव नहीं था | वरना इन देश के नैनिहालों को छोड़कर जाने का किसका दिल करेगा जो इतनी सार्थक बातचीत कर रहे हों | तीन चार प्रोजेक्ट को छोड़कर जब मैं आगे बड़ी तो मुझे इफेक्ट ऑफ़ ग्लोबल वार्मिंग नाम से बने इस मॉडल ने अटरेक्ट किया और मैं वहीँ खडी हो गयी, वैसे भी इस समय ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया के लिए एक चिंता का विषय बना हुआ है इसे सातवी कक्षा के छात्र राकेश ने बनाया था | उसने पूरे तरह से प्रयोग करके लाइटों के माध्यम से समझाया, “ यह एक प्रभाव है जिसमें कुछ हमारी गेसें होती हैं जिन्हें मनुष्य ने ही निर्मित किया है इन्हीं को हम ग्रीन हाउस गेसें बोलते हैं | ये गैसें सूर्य की किरणों से आने वाली उष्मा, जो पृथ्वी की सतह से टकराकर वापस लौटती जाती हैं जिससे पृथ्वी का तापमान संतुलित रहता है | परन्तु इन ग्रीन हाउस गेसों की वजह से सूर्य से आने वाली उष्मीय किरणें पूरी तरह से वापस लौट नहीं पाती हैं जिससे लगातार हमारा वातावरण गर्म हो रहा है | अगर हमने स्वयं उत्सर्जित करने वाली गैसों की बंद नहीं किया तो एक दिन सब कुछ ख़त्म हो जाएगा |” इतने में पास खड़े एक नहुत ही बुजुर्ग आदमी ने फिर भी पूछ ही लिया, “बेटा यह बताओ ये ग्रीन हाउस गैसें कौन सी होती हैं |” उस बालक ने भी ज्यादा झंझट में न पड़ते हुए सीधे- सीधे तौर पर उनको बताया, “यह जो बड़े बड़े कारखानों, फैक्ट्रियों से कार मोटर कोयला चूल्हों से निकलने वाले धुंआ तथा बिजली के उपकरण से जो गैसे निकलती हैं वह सब ग्रीन हाउस गैसों में गिनी जाती हैं |” बाबा खुश होकर यह कहते हुए आगे बढ़ गए, “ नहुत बढ़िया बेटा, खूब तरक्की करो |” img_7520
मेरी नजर उससे आगे लाइन में लगे मॉडल्स रिंग रोड़ और हाइवे पर पडी | जो साक्षी के.. द्वारा बताया गया, “ अगर शहरों के बाहार हाई वे नहीं होंगे तो बड़े बड़े वाहनों की शहर के बीचों बीच से निकलने में बहुत परेशानियों का सामना करना पडेगा और वाहनों को निकलने में समय लगेगा तथा छोटे वाहनों के साथ ज्यादा दुर्घनाएं होने की संभानाएं बनी रहेंगी इसलिए वाहनों की सुविधाओं के लिए हाई वे का निर्माण किया जाता हैं | नंदिनी ने बताया कि “ रिंग रोड के माध्यम से हम कम जगह में ऊपर नीचे रोड बनाकर ट्रेफिक को कंट्रोल कर सकते हैं |” उससे आगे एक और छात्रा ज्योति वर्मा ने अपने प्रोजेक्ट को प्रस्तुत किया कि “ रिसाइक्लिंग ऑफ़ पेपर में हम खराब कागजों से दुबारा से नए कागज बना सकते है क्योंकि जिस तरह से बनों और पेड़ों को काटा जा रहा हैं | उसे देखकर ऐसा महसूस होने लगा है | आने वाले वक्त में हमें कागज नहीं मिलेगा क्योंकि कागज़ पेड़ों से ही बनाया जाता है |” उस बची की आँखों में अपने पर्यावरण के प्रति चिंता देखकर मैं भी बड़ी उदास और चिंतित सी हो गयी थी | मैंने उससे और भी प्रश्न पूछे तो वह बड़े ही आत्मविश्वास के साथ मेरे सारे प्रश्नों के उत्तर देती रही | मैंने अभी तक जितने भी बच्चों के मॉडल्स या प्रोजेक्ट देखे उन प्रोजेक्ट के अलावा उनकी मेंटल पवार और उनके ज्ञान को परखने के लिए कुछ अलग से भी प्रश्न पूछे तो सभी ने बहुत विस्तारपूर्वक मुझे संतुष्ट किया | उसी लाइन में मेरी नज़र एक हाउस पर पडी जो लाइटों से जगमगा रहा था | मेरे पूछने पर मयंक ने बताया, “सोलर हाउस एक अडवांस टैक्नोलोजी है जिसमें हम धूप से बिजली बनाकर अपने घरों को रोशन कर सकते है क्योंकि आज हम जिस इलेक्ट्रोनिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं वह अभी सब लोगों की पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पा रही है इस लाईट के लिए हम स्वयम भी अपने घरों पर सोलर पैनलों को लगाकर बिजली की समस्या से छुटकारा पा सकते है |”
img_7463यहीं दीवार के एक कोने में बड़ा सा रोकेट बना हुआ खडा था | राकेट तो कई प्रकार के थे लेकिन इस रोकेट ने बड़ा होने की वजह से ज्यदा ध्यान अपनी ओर खीचा | मेरे पूछने पर उस बालक दीपांशु कक्षा छः ने बड़े ही सहज तरीके से मुस्कराते हुए जवाब दिया, “ यह हमारा सबसे तेज चलने वाला साधन है जिसके माध्यम से हम एक जगह से दूसरी जगह बहुत ही कम समय में आसानी से पहुँच सकते हैं इसके द्वारा हम स्पेस तक में पहुँच चुके हैं| “ इन सबके बीच में ही मुझे एक छोटा सा बालक दिखाई दिया जो बहुत तेज तेज आवाज में अपने प्रोजेक्ट के बारे बता रहा बता रहा था | जब मैंने उससे उसका नाम और कक्षा पूछी तो वह चौथी कक्षा का कुशाग्र था जो हाद्रोलिक लेबल क्रासिंग के बारे में बता रहा था उसने बताया कि रेलवे फाटक पर जो बैरियर होते हैं वह मैकेनिकल होते हैं लेकिन हम पानी की प्रेशर के जरिये बैरियर को लिफ्ट कर सकते हैं यानि पानी के प्रेशर से फाटक को खोला और बंद किया जा सकता है |यह बहुत ही एडवांस तकनीकी है | वह इतने लोगों को वही सब बताने के बावजूद अब भी एनर्जेटिक ही लग रहा था यह बिलकुल अपने नाम के अनुरूप बहुत ही कुशाग्र बुद्धि का था |बहुत ही प्यारा ओर क्यूट सा | देखने को तो कई लम्बी लम्बी कतारें लगी हुई थी जिनमें एक से एक खूबसूरत प्रोजेक्ट लगे हुइ थे इस प्रदर्शनी में कई चीजें अत्याधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करके बनाई गई थी | सोनिया पांचवी कक्षा और गोपाल नागर ने सेंड क्लोक के बारे बतया कि “प्राचीन समय में लोग समय का पता लगाने के लिए इस घड़ी का उपयोग करते थे |” विज्ञान के लगातार अविष्कारों का ही नतीजा है कि आज हम img_7406समय की जानकारी के लिए अनेक माध्यमों की खोज कर चुके हैं |” इसे देखने बाद मैं पीछे मुडी ही थी कि एक बच्ची ने हाथ के इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और मुस्कराती हुए अपनी पहचान शिवानी और रिया कक्षा सात के रूप में देती हुई बोली, “मैंने यह एक आदर्श गाँव बनाया है | जिसमें विद्यालय से लेकर अस्पताल, डाकघर, बसस्टेंड, बिजली, पानी, सड़क आदि सार्वजनिक सुविधाओं के साथ साथ एक फेक्ट्री भी होनी चाहिए जिससे गाँव के प्रत्येक व्यक्ति को काम की तलाश में शहरों की तरफ न भागना पड़े और गाँव का विकास भी होता रहे, साथ ही साथ नगरों की जनसंख्या व् वहां के लोगों की सुविधाएं भी संतुलित स्थिति में बनी रहे |” मैंने उससे बहुत सी बातें की और अब हौल से बाहर निकलने की आखिर ठान ही ली |
img_7603-1बाहर निकलते ही हौल के गेट के एक तरफ सी वी रमण के पोस्टर्स और उनके प्रभाव को विस्तृत रूप में लिखा गया था | गेट के दूसरे तरफ अनेक वैज्ञानिकों के विचारों का कोलाज लगा था जिनमें जैकब ब्रोनोवस्की, थॉमस क्रोडर, कार्ल सगन, थॉमस गोल्ड, स्टेफेन जॉय गौल्ड, जे एस बी हेल्डन आदि के नाम सम्मिलित थे | इसी हाल से बाहर की तरफ चिपकी दीवार पर बहुत से चार्ट पेपर्स पर विज्ञान के सम्बन्धित चित्रों को बहुत खूबसूरत रंगों के माध्यम से सजाया गया था इसके अलावा उसमें बहुत से चित्र प्रकृति की सुन्दरता और सौम्यता को दर्शा रहे थे यह चार्ट गैलरी भी इस प्रदर्शनी में चार चाँद लगा रही थी | इन्हीं सब के बीच मेरी मुलाक़ात विद्यालय के निदेशन सनीफ मदार से हुई |.जिनका हमेशा मानना रहा है कि “विद्यालय एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ बच्चे रटने की बजाय चीजों को प्रयोग करके ही सीखे और जानें और अपनी जिज्ञासाओं के शांत करने के लिए लगातार रचनात्मक तरीके से खोज और अध्ययन करने में जुटे रहें यह प्रयास सभी विद्यालयों में होना चाहिए |” उसके बाद हाल से सटे आर्ट एंड क्राफ वाले कमरे में चली गई जो दिन में लाइटों की रोशनी में जगमगा रहा था | यहाँ बहुत सुन्दर सुन्दर चीजें हाथ से बनी हुई रखी थी | जिनमें फ्लोवर पॉट, फोटोफ्रेम, गले के हार, अंगूठी, वाल हैंगिंग, टोकरियाँ, पेन होल्डर, नाईट लेम्प आदि अनेक प्रकार की चीजें बनी हुई थी | वहां वोलियांटर के रूप में खडी आठवीं कक्षा दो छात्राएं विजय लक्ष्मी और पूनम ने बताया, ये सब चीजें हमने घर में पडी बेकार के कार्डबोर्ड, थर्माकोल, बोटल आदि फालतू के सामान से बनाई हैं | यह सब करना हमें बहुत अच्छा लगता है | हमारी मेम ने हमें बताया है की यह सब करने से दो फायदे होते हैं | एक तो इनसे घर को सजाया जा सकता है दूसरा इनसे हमारी कल्पनाशीलता बढ़ती है |” मेरे लिए यह भी आश्चर्यजनक था की प्रति सामान के आगे एक प्राइज लिस्ट लगी थी आप कोई भी चीज पसंद करके खरीद भी सकते थे तो मैंने भी लगे हाथों एक फ्लोवर पॉट और गले का हार खरीद ही लिया |
img_0886उसी रूम से चिपका हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य का कमरा था, देखा कमरे का आधा हिस्सा बच्चों के द्वारा बनाई गई मैगजीन्स, डायरियों और अखबारों से भरा पडा था | जिसमें हिन्दी और अंगरेजी साहित्य से लेकर फैशन, गीत, चुटकले, पाक, कला, क्षेत्रीय गीत, भाषा, संस्मरण, कुछ पढ़ाई से सम्बंधित जानकारी व हिन्दी अंगरेजी के शब्द कोष आदि भी शामिल थे | जब कुछ अखबारों और मैगजीन को खोलकर पढ़ा तो मैं हैरान हो गयी उनके कार्य को देखकर, उन्होंने अपनी डायरियों में लिखाई से लेकर रंगों तक का चुनाव और इनमें जो ख़ास था वह सबकी डिजाईनिंग थी जो किसी भी अपनी तरफ सम्मोहित कर सकती थी | इन सबके बीच बच्चों की सबसे मनपसंद कोमिक्स बुक थी जो आज भी बच्चों को लुभा रही थी | वहां बैठी विषय अध्यापिका ने बताया की, “इनको बनवाने का उद्देश्य है बच्चों में लेखन की क्षमता को विकसित करना और अपने मन के भावों और विचारों को इनके माध्यम से दूसरों तक पहुंचाना |” जब बचे हुए आधे हिस्से में नजर घुमाई तो यह विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों से भरा हुआ था | जिसमें कई प्रकार के गिटार, सितार, तबला, ढोलक, कोंगो, हारमोनियम, बांसुरी, ढोल, नगाड़े, शहनाई आदि बड़े ही करीने से सजे हुए थे | वर्तमान समय में बच्चों में संगीत के प्रति इस तरह का क्रेज मेरे लिए बहुत भी अद्भुत था |
संगीत की हमारे जीवन में अहम् भूमिका होती हैं जो व्यक्ति को हर परिस्थिति में लड़ने की क्षमता प्रदान करती है | एक छोटी सी मेज पर रखे कुछ मिट्टी के बर्तन भी अपनी कहानी को बयाँ कर रहे थे कि इंसान का जीवन आज भी इनके द्वारा बनी चीजों के बिना अधूरा सा लगता है जैसे सुराई हो या घडा |

इन कमरों से निकलकर में लोन के बांय हिस्से की तरफ चली गई जिसके कुछ हिस्से को प्लास्टिक के रस्सियों से चारों तरफ से बंद कर दिया था | जिसमें सबसे पहले एक पेड़ था उसके मध्य में एक गुफानुमा टेंट लगा था और उसके बाद एक झोपडी बनी हुई थी जिसके पास मिट्टी के कुछ बर्तन और चूल्हा भी था | उस लॉन के इतने हिस्से में दस बारह बच्चें आदिवासियों के वेश में इधर से उधर उछल-कूद कर रहे थे | नीचे हरी घास के गलीचे पर बहुत से फल बिखरे हुए थे, जिन्हें ये उठा- उठाकर खा रहे थे और कुछ गुफा में भी बैठे हुए थे तो कुछ आग पर चूल्हे के पास पकाकर खा रहे थे तो वहीं पास में उनके द्वारा बनाए गए कुछ मिट्टी, लकड़ी और पत्थर के हथियार थे, जिन्हें वह रोज उपयोग में लाते थे | यह आदि मानव की प्रारम्भिक अवस्था से लेकर गुफा में रहने के बाद भोजन को पकाकर खाने तक की कहानी को समझा रहे थे | जब बच्चों का कोई झुण्ड इनके पास जाता ये सब हो.. हो.. हो. करके अपने दूसरे साथियों को बुला रहे थे | मेरे पूछने पर एक्ट कर रहे छटवी कक्षा के बच्चे विवेक, अंशुल, पारस, अभिषेक शर्मा, अभिषेक ठेनुआ, हिमांशू, जीतेश, कार्तिकेय और साकेत ने बताया, “ इस एक्ट के माध्यम से हम मानव विकास के क्रम को दिखा रहे हैं | आदिमानव ने अपने विकास का बहुत लम्बा सफ़र तय किया हैं आज हम यहाँ से विकसित होकर वहाँ पहुँच गए हैं कि हमने पृथ्वी की हर चीज को अपनी मुठ्ठी में कर लिया है और यह सब विज्ञान की खोजों से ही संभव हो पाया है |” मैं इत्मीनान से बैठकर बहुत देर तक उनको देखती रही | जमीन से उठाकर फल खाना, गुफाओं में रहना सीखना और उसके बाद भोजन को पकाकर खाना आदि को बड़ी ही सहज भाव भंगिमाओं के जरिये समझाने में ये सभी बच्चे निपुण लग रहे थे | पूरी प्रदर्शनी में यह पार्ट सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बना हुआ था | बच्चों के झुण्ड उनके अभिनय को देखकर जोर जोर से हंसी के ठहाके लगा रहे थे |
img_7488लॉन के दाई तरफ कुछ हिस्से में खेती हो रही थी जिसमें गेंहू, प्याज, और गोभी की लहलहाती फसल खडी थी और साथ एक टयूबल की तरह का ही रहट भी लगा हुआ था | “रहट को प्राचीन समय में कुएं से खेतों की सिंचाई करने के लिए बैलों या मनुष्यों के द्वारा चलाया जाता था जिसमें बहुत ही श्रम की आवश्यकता पड़ती थी | परन्तु आज हम खेतों की सिंचाई बहुत आसान तरीकों से कर लेते है यह विज्ञान के अविष्कारों की ही देन है” यह सब आठवी कक्षा के छात्र आदर्श और लक्षमण उस रहट को हाथों से चलाकर पानी को लॉन में बनी क्यारियों में लगा रहे थे |
उसके पीछे की तरफ पेड़ों के बीच में बहुत बड़ा सफ़ेद रंग का डायनासोर का कंकाल तंत्र टंगा हुआ था | मैं खुद इतने बड़े डायनासोर के कंकाल को देखकर आश्चर्य में थी आखिर यह बनाया कैसे होगा | इसके पास खड़े आठवीं कक्षा के तीन छात्र अरविन्द, आदित्य और हर्षित गुप्ता ने बताया कि “ इसे हमने रद्दी में पड़े अखबार से बनाया हैं | इस मॉडल के जरिये हम पृथ्वी से विलुप्त हो चुके प्राणी को दर्शा रहे हैं | जो प्रकृति पर लगातार बदलते वातावरण की वजह से इस तरह की विशालकाय जानवरों की सभी प्रजातियाँ लुप्त होती जा रही हैं और कुछ लुप्त हो भी चुकी हैं |”img_7405-1
अब मेरा पूरा आकर्षण केंद्र सबसे पिछले हिस्से में बनी कवियों की चौपाल थी | जिसके चारों और बैठे व्यक्ति बड़े ध्यान से उनको सुन रहे थे अब मैं भी इन कवियों के पास खडी थी जिनमें भक्तिकाल के कबीर, रहीम , मीराबाई और सूरदास अपने पदों को जोर- जोर से गाने में तल्लीन थे | इन चारों कवियों में सबसे ख़ास इनका मेकअप था जो बिना बताये भी इनकी खासी पहिचान दिला रहा था | इन कवियों की भूमिका में साक्षी और आकाश कक्षा सात, तथा आर्यन, हिमांशू कक्षा पांचवी और लक्ष्मण आठवी कक्षा से थे |
img_0938इस सबके बाद मैंने लगभग मेरे ही नाम वाली विद्यालय की प्रधानाचार्या ‘अनीता चौधरी’ से मुलाकात की जो लगातार अभिभावकों से घिरी हुई थी | मैंने भी गर्मजोशी से हाथ मिलाकर उनका अभिवादन किया और इस सबके लिए, जो मैंने देखा तो पूछ ही लिया कि एक छोटे से स्कूल में इतनी वैचारिक और उद्देश्य से परिपूर्ण प्रदर्शनी कैसे संभव हो सकी तो उन्होंने बड़े सौम्यता से बताया कि “आज से करीब सात आठ साल पहले हमारी सहयोगी अध्यापिका शालिनी श्रीवास्तव और विद्यालय के अथक प्रयासों और बच्चों को विज्ञान की ओर अग्रसर व वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की वजह से इसकी शुरुआत एक छोटे से कमरे से, जिसमें मुश्किल से चार या पांच मोडल्स और पांच छः डायरियों के माध्यम से हुई थी | तब से आज तक साल दर साल इसके स्वरुप को विस्तृत ही किया जा रहा है और आज जो है वह आपके सामने है | यह सब हमारे इस कार्यक्रम के संयोजक हमारे साथी पुष्पेन्द्र और शालू वर्मा के संयोजन से संभव हो सका है |” और उन्होंने मेरी मुलाक़ात उन दोनों युवाओं से करवाई | मैंने दोनों को बधाई दी तो उन्होंने इसका पूरा श्रेय अपने स्टाफ के सभी साथियों को देते हुए कहा, “ मेघा वर्मा, कविता चौरसिया, सुमन श्रीवास्तव, शालिनी श्रीवास्तव, चांदनी यादव, आकांक्षा अग्रवाल, देवेन्द्र, सुधीर, आशीष आदि का सहयोग और विशेष सहयोग एम पी एस डी से पास आउट कलीम जफर का रहा, जिन्होंने आदिवासियों से लेकर कवियों तक का मेकअप करके उन चरित्रों को जीवंत कर दिया |”
इस विज्ञान प्रदर्शनी को देखने बाद मुझे भी लगा कि सभी विद्यालयों को इसी तरह की प्रदर्शनियों के माध्यम से बच्चों में विज्ञान के नए नए अविष्कारों के प्रति लालसा पैदा करने की जरुरत है जिससे समाज में लोगों के जीवन की जटिलताओं को सरल बनाया जाए | समाज में व्याप्त अंधविश्वासों को खत्म कर तार्किक और वैज्ञानिक सोच की दिशा में अधिक से अधिक लोगों को जागरूक बनाया जाए |

Leave a Reply

Your email address will not be published.