आज़ादी के बाद अपने देश के सुयोग्य वैज्ञानिकों और नयी खोजों में लगी प्रतिभाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में नयी तकनीकों का निर्माण कर अपने बलबूते रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में दुनिया के आगे अपने कारनामे प्रस्तुत किये। आज इन सभी में विदेशी निवेश के जरिये उन्हें दुनिया के बड़े कारपोरेट घरानों के हाथों में सौंपा जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी अब यहां विदेशी विश्वविद्यालय अपने पैर जमा रहे हैं। उन्हें अपने शिक्षा संस्थान स्थापित करने की छूट दी जा रही है जहाँ शिक्षा और व्यापार का सीधा संबंध स्थापित होगा। अभी तक विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू. टी. ओ.) के माध्यम से अमरीका तथा पूरा पश्चिमी वर्चस्ववादी समूह दुनिया के देशों की व्यापार नीतियों को नियंत्रित करता रहा है। अब उसके स्थान पर जनरल एग्रीमेंट आॅन ट्रेड सर्विसेज़ लागू हुआ तो इसका इस्तेमाल सेवा क्षेत्रों में भी होगा। शिक्षा क्षेत्र में भी यह व्यापार का नया रूप होगा।

वरिष्ठ लेखिका और वर्तमान साहित्य की पूर्व संपादक डा० नमिता सिंहका तेरी मेरी उसकी बातस्तम्भ में, शिक्षा क्षेत्र में  (डब्ल्यू. टी. ओ.) के प्रभाव पर चर्चा करता आलेख …| संपादक 

विदेशी पूंजी निवेश की अनियंत्रित बाढ़ (डब्ल्यू. टी. ओ.)  Namita Singh

अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर दो अलग-अलग किस्म के युद्धों की शुरूआत हो रही है। तीसरे विश्वयुद्ध की घोषणा संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंच से की जा चुकी है। संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने हरी झंडी दे दी है। इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एंड सीरिया के आतंकियों द्वारा पेरिस पर जिस तरह हमला किया गया वह आतंक की चरमसीमा है। अमरीका, रूस, तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों के बीच मौजूद आपसी हितसाधन और अंतर्राष्ट्रीय अंतर्विरोधों के बीच विश्व युद्ध की घोषणा हो गई है। इन सबके बीच संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने सभी पश्चिमी देशों से अपील की है कि इस अशांति के दौर में युद्ध से जर्जर हो रहे सीरिया और आसपास के अन्य अरब देशों से जान बचाकर भाग रहे शरणार्थियों के लिये अपने दरवाजे बंद न करें और शरणार्थियों को पनाह देने के अपने वायदों से पीछे न हरें। लेकिन युद्ध के इस वातावरण में उनकी मानवता को बचाये रखने की यह अपील नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गयी है।
अरब भूमि में काला सोना मिलने के बाद पिछली सदी के पांचवे-छठे दशक से विश्व राजनीति का नया परिदृश्य बनने के दौरान किसी ने कहा था कि भविष्य में कभी विश्वयुद्ध की संभावना हुई तो वह पश्चिमी देशों की धरती पर नहीं बल्कि मध्य एशिया की ज़मीन पर लड़ा जायेगा लेकिन जो रक्त रंजित वैश्विक माहौल आज बना है उसकी संभवतः कल्पना भी नहीं की गयी थी।
पिछले दो तीन सालों में नये आतंकी संगठनों ने जो खूनी खेल खेलना शुरू किया है निश्चित रूप से वह पूरी मानवता के चेहरे पर कलंक है। पेरिस पर हुए हमले के बाद जहाँ डेढ़ सौ लोग मारे गये हैं और बड़ी संख्या घायलों की है, उसके बाद पहली बार व्यापक स्तर पर घटनाओं का वस्तुगत रूप से आकलन किया जा रहा है और वैश्विक स्तर पर बढ़ते आतंकवाद और उनकी हिंसा के आधारभूत कारणों पर बहस हो रही है। पहली बार पश्चिम के शक्तिशाली वर्चस्ववादी देशों की मध्य ऐशिया और अरब देशों के प्रति उनकी नीतियों की खुलकर आलोचना हो रही है। इराक, लीबिया, मिस्र, सीरिया, यमन जैसे देशों में पश्चिमी देशों द्वारा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सरकार विरोधी विद्रोही समूहों को पूरी सहायता प्रदान की गयी। वे समूह आज पूरी दुनिया के लिये आतंक की नयी परिभाषा गढ़ रहे हैं। सर से पानी के गुजरने के बाद और जब स्वयं के खड़े किये गये भस्मासुर स्वयं को नष्ट करने के लिये तत्पर हों तब संकट का हल उसी हिंसा के द्वारा खोजा जा रहा है।
भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ते आतंकवाद पर जब जब चर्चा हुई विशेष रूप से अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के तालिबानी संगठनों के संदर्भ में, हमेशा अमरीका और पश्चिमी देशों की भूमिका पर सवाल खड़े गये। लेकिन यह चर्चा अप्रभावी रही है क्योंकि आज लगभग सभी विकासशील देश पश्चिम की आर्थिक वर्चस्ववादी नीतियों की गिरफ़्त में हैं। भारत भी इस आर्थिक वैश्वीकरण के आगे नतमस्तक हुआ और 1990 से नयी आर्थिक नीतियों के फलस्वरूप धीरे-धीरे सार्वजनिक क्षेत्रों के उद्योग और उपक्रम निजी क्षेत्रों के हाथों बेचे जाते रहे हैं। उदारीकरण की नीति जिस गति से नयी सरकार ने अब लागू की है और पूंजी निवेश की नीतियों को बढ़ावा दिया है उसने अनेक सेवा क्षेत्रों के अलावा रक्षा जैसे क्षेत्रा में भी विदेशी पूंजी निवेश आपूर्ति को तेजी से बढ़ाया है।
आज़ादी के बाद अपने देश के सुयोग्य वैज्ञानिकों और नयी खोजों में लगी प्रतिभाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में नयी तकनीकों का निर्माण कर अपने बलबूते रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में दुनिया के आगे अपने कारनामे प्रस्तुत किये। आज इन सभी में विदेशी निवेश के जरिये उन्हें दुनिया के बड़े कारपोरेट घरानों के हाथों में सौंपा जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी अब यहां विदेशी विश्वविद्यालय अपने पैर जमा रहे हैं। उन्हें अपने शिक्षा संस्थान स्थापित करने की छूट दी जा रही है जहाँ शिक्षा और व्यापार का सीधा संबंध स्थापित होगा। अभी तक विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू. टी. ओ.) के माध्यम से अमरीका तथा पूरा पश्चिमी वर्चस्ववादी समूह दुनिया के देशों की व्यापार नीतियों को नियंत्रित करता रहा है। अब उसके स्थान पर जनरल एग्रीमेंट आॅन ट्रेड सर्विसेज़ लागू हुआ तो इसका इस्तेमाल सेवा क्षेत्रों में भी होगा। शिक्षा क्षेत्र में भी यह व्यापार का नया रूप होगा।
नयी आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद से अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों के साथ ही शिक्षा (और स्वास्थ्य) जैसे क्षेत्रा लगातार निजी क्षेत्र में धकेले जाते रहे हैं। पिछले दशकों में गली कूचों में एक-एक, दो-दो कमरों में भी चलने वाले उच्च शिक्षा संस्थान और यूनिवर्सिटी कही जाने वाली संस्थाएँ अस्तित्व में आई हैं। शिक्षा का ऐसा व्यापारीकरण हुआ है कि अगर आपके पास पैसा हो तो मनचाही डिग्री खरीद लो। एक दिन चाहे क्लास का मुंह न देखा हो, उच्च शिक्षा की कोई डिग्री, डाक्टरेट से लेकर मेडिकल, इंजीनियरिंग-कुछ भी मिल जायेगी। मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाले का खुलासा कितनों की जान ले चुका है और आगे भी लेगा-कहा नहीं जा सकता। आगरा विश्वविद्यालय में पिछले दिनों से जो जांच चल रही है उसमें चार हजार से ऊपर बी.एड. की फर्जी डिग्री बांटने की बात सामने आयी है। कहा जा रहा है कि पिछले लंबे समय से ये रैकेट चल रहा था जिसमें अब तक चार भूतपूर्व उपकुलपतियों को कुलसचिवों की संलिप्तता भी बताई जा रही है। बड़ी संख्या में ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहां पचास-साठ हज़ार से लेकर एक लाख तक की रकम खर्च करने पर घर बैठे पी.एच.-डी. की डिग्री मिल जायेगी।
शिक्षा को व्यापार से जोड़ने का सिलसिला शिक्षा को व्यावसायिक रूप देकर निजी क्षेत्र में देने की नीति से जो शुरू हुआ, उसकी अंतिम परिणति अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा विश्वविद्यालयों तथा शोध संस्थानों को दिये जाने वाले अनुदानों में बड़ी कटौती के रूप में है। शिक्षा (और स्वास्थ्य) के क्षेत्र में 30 प्रतिशत की कटौती की गयी है। नयी नीतियों के अंतर्गत अब भविष्य में संभवतः शोध संस्थानों को अपने लिये वित्तीय सहायता स्वयम् के बलबूते पर जुटानी होगी और बड़े व्यापारिक एवम् औद्योगिक घरानों के द्वारा फंडिंग का इंतज़ाम करना होगा। अमरीका आदि पश्चिमी देशों में भी ऐसा ही चलन है जिसका अनुसरण किया जा रहा है।
1990 से उदारीकरण की अर्थ व्यवस्था आज इतनी उदार हो गयी है कि विदेशी पूंजी निवेश की अनियंत्रित बाढ़ में ‘स्वदेशी’ का कितना कुछ बच पायेगा यह भविष्य ही बतायेगा। आज देश ऐसे मोड़ पर है जहां विश्व व्यापार संगठन की गैट संधि जिस पर केंद्र में कांग्रेस सरकार के शासन के दौरान हस्ताक्षर किये गये, वह उद्योग परक वस्तु व्यापार से संबंधित थी। 1995 में ही सेवा क्षेत्र में गैट्स संधि प्रभाव में आई। इसके अंतर्गत सभी सेवा क्षेत्रों में जनता को उसके उपयोग की सेवाएँ ‘सेवा देने वाले व्यापारिक संगठन’ द्वारा मुहैया कराई जायेगी। जाहिर है व्यापारिक संगठन अगर सर्विस प्रोवाइडर हैं तो यह सेवा वे अपने मुनाफे के आधार पर ही देंगे। विश्व व्यापार संगठन से सेवा क्षेत्रा में संधि का अर्थ विदेशी व्यापारिक संस्थाओं से इन सेवाओं की प्राप्ति होगी।
इन सेवा क्षेत्रों में पानी और बिजली जैसे ज़रूरी क्षेत्र भी हैं। यानि बिना दाम दिये न केवल बिजली बल्कि पानी भी नहीं मिलेगा। इसी तरह शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी जीवन की आधारभूत आवश्यकता वाले क्षेत्रों में भी बाकायदा एक उद्योग के रूप में इन सेवाओं का आयात किया जा सकता है। इतना ही नहीं, ये आयातित सेवाएं पुलिस, सेना, जेल, न्याय व्यवस्था, लोक-प्रशासन के अतिरिक्त सामान्य प्रशासन व्यवस्था के स्तर पर भी विदेशों से प्राप्त की जा सकती हैं। ये सभी प्रकार के सेवा क्षेत्र ‘जनरल एग्रीमेंट आन ट्रेड इन सर्विसेज’ संधि के अंतर्गत आते हैं।
कहने को तो ये भी प्रावधान है कि सभी राष्ट्र स्वतंत्र हैं कि वह अपनी आवश्यकतानुसार आयातित सेवा क्षेत्र और उसकी अवधि चुन सकते हैं। विश्व व्यापार संगठन के सदस्य राष्ट्र इस संधि से अपने को अलग भी कर सकते हैं। अब तक संयुक्त राष्ट्र अमरीका और योरोपीय यूनियन इस गेट्स संधि से अलग हो चुके हैं। विश्व व्यापार संगठन का विशेष रूप से विकासशील देशों पर पूरा दबाव है कि वे इन संधियों का हिस्सा बनें। इसके साथ ही अगर एक बार कोई देश इस संधि का हिस्सा बन जाता है तो फिर वापिस नहीं हो सकता। यह संधि के स्वरूप को स्थाई बनाने के लिये है। अतः एक बार इस संधि पत्र का हिस्सा बनने के बाद पीछे हटना संभव नहीं।
अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं और संगठनों का विचार है कि सेवा क्षेत्र को आयातित व्यापारिक संस्थाओं के हाथों में देने से अपने ही देश की सरकारों का इन की गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं रह पायेगा। मुनाफ़े के आधार पर दी जाने वाली सेवाओं का सीधा असर आम जनता के जीवन पर पड़ना स्वाभाविक है। भारत जैसे देश में जहाँ आज 30 प्रतिशत जनता गरीबी की रेखा से नीचे हो, दुनिया का हर तीसरा कुपोषित बच्चा हिन्दुस्तान में हो, बड़ी संख्या में ऐसे गांव हैं जहां साफ पीने लायक पानी उपलब्ध न हो, वहां सेवा क्षेत्र में गेट्स जैसी संधि की कल्पना भयावह लगती है।
26 नवंबर को दिल्ली में शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों और ट्रेड यूनियनों का बड़ा प्रदर्शन हुआ। यह अलग बात है कि समाचार पत्रों को यह प्रदर्शन दिखाई नहीं दिया। जाहिर है कि यह सरकार की शिक्षा नीति के विरोध में था। समाचार है कि शिक्षा नीति निर्माण को ‘विश्व स्तरीय’ बनाने के लिये अडानी और अंबानी जैसे उद्योगपतियों की कमेटी बनाई गयी है। कमेटी शिक्षा को उद्योग के रूप में स्थापित कर शिक्षा क्षेत्र को विश्व व्यापार संस्था (डब्लू.टी.ओ.) की गेट्स संधि के अंतर्गत लाना चाहती है। 15-16 दिसंबर को नैरोबी में शिक्षा पर होने वाली गेट्स की मीटिंग में भारत की भी सहभागिता होगी। दिल्ली का यह प्रदर्शन इसी सहभागिता के और शिक्षा को व्यवसाय के रूप में चलाने हेतु कार्पोरेट घरानों को सौंपने के विरोध में था। उद्योगों के संचालन में मुनाफा कमाना सर्वोपरि उद्देश्य होता है और मानव संसाधन का दर्जा संचालनकर्ता के साथ मालिक और श्रमिक के रूप में होता है। वैसे अन्य क्षेत्रों की तरह शिक्षा का व्यवसायी करण कांग्रेसी शासन के दौरान बहुत पहले ही शुरू हो चुका है जिसने अब इस नयी शासन व्यवस्था में हवा की मानिंद गति पकड़ी है। यूं भी पिछले कई वर्षों से बड़ी संख्या में कॉलेजों और शिक्षा संस्थाओं में शिक्षक और गैर शिक्षक वर्ग के स्थान रिक्त पड़े हैं और नयी नियुक्तियां नहीं हुई हैं। पूरी व्यवस्था संविदा पर चल रही है।
कॉर्पोरेट समूहों के हाथों में शिक्षा ज्ञान और संवेदना आधारित नहीं बल्कि उद्योगों में श्रमिकों की नयी खेप तैयार करने के लिये होगी। अमेरीका में भी साधारण स्तर की पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा सभी के लिये संभव नहीं होती। नयी शिक्षा का स्वरूप यहां भी संभवतः ऐसा ही होगा।
युद्ध हथियारों से लड़ा जाता है और बहुत बार हथियारों के पीछे से भी लड़ा जाता है। एक ओर फिदायीन आतंकी हमले और दूसरी ओर उस आतंकी साम्राज्य के विरुद्ध दुनिया की ताकतें। लेकिन एक बार फिर वही सवाल? आखिर यह आतंक उपजा कहां से ? किस अन्याय से ? किन दमन की चीखों से? किन बाहुबलियों की दबंगई के नीचे दब गये आक्रोश से?
युद्ध का एक दूसरा रूप भी है जो आदमी की आत्मा को बहुत खामोशी से, कूटनीति से गुलाम बना लेता है। बाहुबली की व्यूह रचना उसकी संवेदना का क्षरण कर सकती है, उसकी बौद्धिकता को कुंद कर, ठोकपीटकर अपने मंतव्यों के अनुकूल बना सकती है। अपने-अपने रणक्षेत्र हैं। अपनी अस्मिता की रक्षा के लिये, अपनी बौद्धिक परंपरा को बचाये रखने के लिये और शिक्षा जैसे अपने जनतांत्रिक अधिकार के लिये जिस पर हर नागरिक का हक है, अपनी लड़ाई भी अनवरत चलेगी।

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