(दंगे इंसानियत के माथे पर कलंक की तरह होते हैं और जिनोसाइड जैसी अमानवीय कृत्य से इंसानियत शर्मसार होती है. दंगो में मारे गए लोग चाहे किसी धर्म/जाति/नस्ल/लिंग  के हों बेबात मारे जाते हैं और न्यायतंत्र सबूतों के अभाव में कुछ नही कर पाता. वरिष्ठ कवि विमल कुमार की कविताएँ इन्ही सवालों से जूझ रही हैंसंपादक)

एक  vimal-kumar

एक दिन मैं भी मार दिया जाऊंगा किसी दंगे में

फिर बीस साल बाद ये कहा जायेगा
कि मैं मारा नहीं गया हूँ दंगे में
जैसे भूख से मरने पर
कभी नहीं कहता है जिलाधीश
कि एक आदमी की मृत्यु हुई है
क्योंकि वह भूखा था कई दिनों से

इसलिए जब आयेंगे दंगाई मुझे मारने मेरे घर
तो मैं सबसे पहले उनसे यही करूँगा विनती
कि मेरी जान ले लो
पर इसका सबूत जरूर देकर जाना तुम
कि मैं दंगे में तुम्हारे हाथो ही मारा गया हूँ
क्योंकि अदालत को दरकार होती है इन चीज़ों की
मेरे मरने की तुम सबूत के एवज़ में
मेरे बच्चे की भी तुम जान ले सकते हो

अब मैं मारे जाने के बाद
इकठा कर रहा हूँ खुद ही सबूत
सबूतों को इकठ्ठा करने में भी
मैं मर गया था

जज साहब
अगर मैं दे सका कोई सबूत
आप यकीन तो करोगे मुझ पर
कि मैं मारा गया हूँ दंगे में ही

अगर आपको फिर भी लगता है
कि मैं मारा नहीं गया हूँ
तो मेरा चेहरा देखिये
क्या किसी जिन्दा आदमी का चेहरा ऐसा ही दीखता है आपको

दो  

साभार google से

साभार google से

कातिलों के कई घर हैं यहाँ
पर यहाँ कोई कातिल नहीं है .

कातिलों की बस्ती मेंभी अब कितनी रौशनी है
रौनक भी है उनकी महफ़िल मेंआजकल

पर तुम देख नहीं सकते किसी कातिल को
कातिलों को कभी पकड़ भी नहीं सकते हो

कातिल अब कातिल नहीं रहे
उन्हें तुम कातिल भी नहीं कह सकते हो ,

 तीन 

मेरे पास अब किसी चीज़ का कोई सबूत नहीं ब चा है
बाढ़ में डूबा था मैं एक बार
तो उसका भी कोई सबूत नहीं है मेरे पास
आग जब लगाई गयी थीमे रे घर में
तो उसका सबूत भी कहाँ जुटा पाया था मैं
बिना सबूत के मैं नहीं कह सकता
कि मेरी बहन के साथ बलात्कार हुआ ही था
तुम्हारे सामने ही हुए थे ये सारे हादसे मेरी ज़िन्दगी के
फिर भी तुम मांगते हो मुझसे सबूत
मैं भले ही हार जाऊं हर बार अपना मुकदमा
पर कम से कम इस बात का सबूत है
कि तुम्हारी तरह मैं कभी बिका नहीं था
पर तुम्हारे पास ढेर सारे सबूत होने के बाद भी
इस बात का सबूत नहीं है
कि तुम्हारे भीतर बचा है अभी भी एक आदमी

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    By: विमल कुमार

    जन्म 09 दिसम्बर 1960
    जन्म स्थान गंगाढ़ी, रोहतास, सासाराम, बिहार, भारत
    कुछ प्रमुख कृतियाँ
    सपने में एक औरत से बातचीत (1992); यह मुखौटा किसका है (2002), पानी का दुखड़ा (कविता-संग्रह)। चाँद@आसमान.कॉम (उपन्यास)
    चोर-पुराण (नाटक) कॉलगर्ल (कहानी-संग्रह)
    विविध
    रूसी भाषा में कविताएँ अनूदित। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (1986), प्रकाश जैन स्मृति पुरस्कार (1990) दिल्ली हिन्दी अकादमी का पुरस्कार ठुकराया (2010) बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, शरद बिल्लौरे सम्मान।

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    आयेंगे अमरीका से अच्छे दिन एवं अन्य कवितायें, विमल कुमार

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