स्त्री जीवन के क्षणिक, स्थाई, सामाजिक, राजनैतिक, पारिवारिक विभिन्न रूप स्वरूप, कुंठा अवसाद प्रेम आलाप के आरोह अवरोह से गुजरते हुए उसके अनेक पहलुओं का रचनात्मक विश्लेष्ण करती अशोक तिवारी की एक लम्बी कविता….| – संपादक

वो औरत

अशोक कुमार तिवारी

विस्मृत नहीं हो पाती
घूंघट काढे़ वो औरत
जो पशुओं की लीद
अपने सिर पर ढोकर
गांव बाहर घूरे तक जाती है
जिसके क़दम फिर
घर की दहलीज के अंदर नहीं आते
मुड़ जाती है
रेलगाड़ी की आवाज़ की तरफ़

खिंचकर चली आती है
मेरी स्मृतियों में वो औरत
जिसकी चिंदी-चिंदी
पटरियों के इर्द-गिर्द बिखरी हैं

खुद को खत्म करने की
उसकी जिद
उस दिन पूरी हुई
पूरा हुआ उसका
अपना वायदा
जो किया था उसने अपने मन में
खत्म करने का सब कुछ
क्षणिक आवेग में
हावी हुई थी कमज़ोरी उसके ऊपर

हो सकता है यह
बहस का मुद्दा कि
पहले उसके सपनों की गठरी को
कुचला था रेलगाड़ी के पहियों ने
या उसे खुद!

क्या था जो
खींच ले गया था उसे
पटरियों पर
चुंबक के आकर्षण की तरह
क्या था कि दुर्गा के हाथों से
गिर गई कटार
शादी से पहले
नाजों में पली वो लड़की
जो लाड़ली थी सबकी
संभालती थी पूरा घर
मां की मौत के बाद
पढ़ा था उसने हरफ़े-मानवता
क्यों बन गई कामचोर
कमज़ोर
आलसी और बेहया,
कुछ न करने की तोहमत
क्यों लगाई गई उस पर
सब काम करने और
एक के बाद एक कई
बच्चे जनने के बाद भी

निरीह और अबला
कैसे हो गई वो
भरपूर ताक़त और
विश्वास के बावजूद

वो औरत जो
करती थी पूरे घर का काम
नहीं करती थी आराम
सुबह जगने से
रात सोने तक बनी रहती थी
उसकी घिरनी

काम का
पुरातन बोझ
मूल्यों का
पुरातन भार
रूढ़ियों की
पुरातन साजिश में
वो शरीक थी
जो चाहती थी करना सब कुछ
वो अपनी ज़मीन में
ज़ुल्म के ख़िलाफ़
विद्रोह का एक बीज
अंकुरित करना चाहती थी
समेट लेना चाहती थी अपने
आंचल में दुनिया की
तमाम हसरतें
छूना चाहती थी
उच्चतम शिखर की चोटी
वो खपना चाहती थी दिन रात
कुछ न कुछ करते हुए
अपने गंजेड़ी पति की मार
और घर की दुत्कार के बाद भी

स्मृति की खोह में
मुझे अक्सर
एक दरकी हुई ज़मीन
नज़र आती है
जहां से गुज़री थी वो
अपनी अंतिम
बड़बड़ाहट और ग़ुस्से के साथ
और दिखाई देते हैं
उसी ज़मीन से
उपजते हुए अनगिनत हाथ
न्याय की मांग करते हुए !!

2 . बुरक़ा

लाखों-करोड़ों निगाहों से बचती
बुरक़े में लिपटी वो औरत
मोटर साइकिल पर पीछे बैठकर
रोज़ काम पर जाती है
सीधे जाती है
सीधे आती है
उसकी पहचान उसके नाम से नहीं
बुरक़े से है
उसका धर्म-उसकी जाति
उसके काम
से नहीं
बुरक़े से है
वो औरत
जो लिपटी है बुरक़े में
बंद कर दी गई हैं उसके लिए
सभी खिड़कियां
पहुंच नहीं पाती
रोशनी की कोई किरण उस तक
पीलिया से ग्रस्त है वो
चाहिए उसे विटामिन-डी
खुद को बनाए रखने के लिए

बुरक़े में लिपटी वो औरत
नहीं जानती
बुरक़े में लिपटने का
असली मंतव्य
नहीं जानती
किन-किन हाथों ने स्पर्श किया है
बुरक़े को बुनते वक़्त
वो जानना भी नहीं चाहती
रेशम के तागों का इतिहास
स्वीकार कर लिया है उसने
उन तागों से बंधना,
लिपटना
स्वीकार ही स्वीकार है
उसका धर्म
सहमति ही सहमति है
उसका कर्त्तव्य
‘ना’ शब्द उसकी शब्दावली का
हिस्सा नहीं है

बुरक़े का परदा और
परदे की अपारदर्शिता के चलते
वंचिता ठहराए जाने की
कोशिश के ख़िलाफ़
वो चुप है
और चुप रहकर करती है
समर्थन समर्पण का
परंपरा के नाम पर
अर्पण का
वो मां है
बहन है
बीवी है किसी की
जुड़ा है उसके साथ जो भी
उसे पहचान देने के लिए ही
उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है
कोई मान नहीं है

पुरुष के हाथों वह
कंप्यूटर के स्क्रीन की आइकॉन है
समूची की समूची वह
पुरुष के लिए है
पुरुष है तो उसका मान है
सम्मान है
पुरुष है तो उसकी परिभाषा है
नहीं अगर पुरुष
उसकी पहचान भर के लिए
नहीं है हक़ उसे ज़िंदा रहने का भी
पुरुष है तो वो हँस सकती है
इतरा सकती है
कुलांचें भर सकती है
पुरुष के इशारे पर

पुरुष ही है जिसका दंभ
तोड़ता है स्वामित्व के अभिमान की
असीमित हदें
बुनता है बुरक़े की अपारदर्शिता
पुरुष ही है जो
डाल देता है उसकी नाक मेें नकेल
अपनी नाक ऊंची रखने के लिए
डाल देता है बढ़ते क़दमों में
बजती हुई पायजेब
गोद देता है तमाम निशानियां
औरत की कोमल त्वचा में
ख़ूबसूरती के नाम पर

औरत के लिए ये
तमाम बंधन पुरुष के
स्वयं न बढ़ पाने की
विवशता का प्रतीक हैं
ऐसा नहीं है कि
ख़ूबसूरत चीज़ों को देखकर
वाह! न करता हो उसका मन
सही बात के समर्थन के लिए
न छटपटाता हो
न करता हो चीख़-चीख़कर
तकाजा संघर्ष का उसका ज़मीर
पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के ख़िलाफ़

यक़ीन है मुझे
मांगेंगी दुनिया की औरतें
अपने काम का हिसाब
जब एक दिन
ये धरती एक तरफ झुक जाएगी
और कहेंगी तनी मुट्ठी के साथ
वे औरतें
हमें बुरक़ा नहीं-रोशनी चाहिए।

3 .मज़दूर औरत

एक औरत
जिसने  नहीं पढ़ी है कोई कविता
नहीं जाना है कविता का महत्त्व
नहीं समझा है कविता का
अनुपम संसार
उसका समूचा जीवन
खुद एक कविता है मगर
उस औरत के घूंघट के अंदर का चेहरा
यक़ीनन बहुत कुछ कहता है
जो बहुमंजिली इमारत को बनाने के लिए
अपने सास ससुर और जेठ के साथ
काम पर आई है
सुबह-मुंह-धुंधलके में
रोटी बनाई है
खाई है-खिलाई है
दो रोटी मैले कपड़े में
बांधकर लाई है
बच्चे को संभाला है
पति को एक और काम पर निकाला है
निकल आई काम पर –
वह खुदाई करती है
मिट्टी ढोती है
गारा बनाती है
ईंटें उठाती है
मगर उसकी निगाह
रहती है बच्चे पर बराबर
वह लेटा है बालू के ढेर पर

रेत में कुलेलें करता
बालक ईंट-उठा-उठाकर
घर बनाता है
कभी रोता है तो
कभी खिलखिलाता है
राल बह रही है उसकी
वह दूर से देख-देखकर खुश होती है
मगर ठेकेदार के डर से
अपने हाथों की तेज़ी को बरकरार रखती है
उसका अंतर्मन कहीं
गहरे में उसके दिमाग़ पर चोट करता है
जो कहता है कि इस बालक को
मालूम नहीं है
ईंटें जमाने का मतलब
घर खड़ा करने का अर्थ
बरसात में चूती झोंपड़ी का घर
मन में कौंध जाता है उसके
वह सर झटक देती है झट से
मालिक आ गया है
वह ठेकेदार पर बरस रहा है
ठेकेदार-मिस्त्री पर
मिस्त्री-मज़दूरों पर
वह तसले में और ज़्यादा बोझ लादती है
अपनी ईमानदारी का
कोई सबूत दे पाए शायद
तेज़ चाल से चलकर
भरा तसला पकड़ाती है अपने जेठ को

मगर खाली तसला लेते हुए
सोचती है वो इस बार
लड़का होगा या लड़की
लड़का हो-उसका अंतर्मन कहता है
मगर लड़की वो वाकई चाहती है
उसका सातवां महीना है यह
काम से लौटते हुए
कल शाम भूख में
बालक ने दीवारों को खरोंचा था
उसने महसूस किया था
कोई भी हो
मगर उसका मन करता है
ऐसे बालक को जन्म देने का
जो उसका अपना साथ दे
उसका मन
घूंघट से निकलकर
बाहर ठेकेदार से टक्कर लेने को करता है
कि क्यों पिस-पिसकर
घिस-घिसकर काम करने के बावजूद
मज़दूरी नहीं मिल पाती
भरपेट रोटी के लिए
बराबर और ज़्यादा काम करने के बाद भी
उसे कम मज़दूरी क्यों मिलती है आदमियों से।
उसका मन चाहता है
इन सवालों के जवाब
कि क्यों करते हैं
उसके जेठ और ससुर
उसकी मज़दूरी का सौदा
उसे पसंद नहीं है –
उसके काम का मोल कोई और करे-

अपनी इस असमर्थता पर
वह लज्जित नहीं, कुंठित है

ईंटों को ऊपर की मंज़िल पर
उछालते हुए
वह अपनी सीमा को
आंकना चाहती है कई बार
वह आसमान में
कितना ऊपर फैंक सकती है पत्थर
उसकी ललक है
आसमान के अंतिम छोर को
अपने पत्थर से छूने की
उसे वाजिब मज़दूरी की तलाश है
वह थकान से चूर-चूर होकर रखती है
अपने घर की देहरी पर जब क़दम
उसके शरीर की थकान
मन की थकान पर भारी होती है
वो थककर चूर-चूर हो जाना चाहती है
मन से भी
मगर कोई नहीं
जिसे उसके काम की तलाश हो
वो खोना नहीं चाहती भीड़ में
मगर खो जाती है।

रात की गरमाहट में
पति के साथ बतियाते हुए
कई बार लगता है उसे
बेकार हो रही ऊर्जा पर
बात करना
बेमानी है
बेमतलब है
वो पसरी आंखों से निहारती है
झौंपड़पट्टी के फूंस को
सहलाती है एक हाथ से
पास सो रहे बच्चे को
और दूसरे से
अपने भविष्य के सपने को
जिस पर छोड़ दिया उसने सब कुछ!

4 . स्त्री के बारे में

मुझे लिखनी है एक कविता
स्त्री के काम करते हाथों के बारे में
दया नहीं, दान नहीं
अहसान नहीं
मुझे करनी है एक टिप्पणी
उसकी ऊर्जा के बारे में
जिसे उसने अपने अंदर समेटा है

जिस तरह उसकी ताक़त (ऊर्जा)
संचित होकर बन जाती है संघर्ष
जिस तरह ठंडी बूंदों का अहसास
भर देता है
व्याकुल मन में गरमाहट
जिस तरह उसके रात-दिन
बुनते है
जीवन की मुश्किल मगर खूबसूरत चटाई
मुझे उसका अहसास भरना है
अपने अंदर-उसी तरह
और लिखनी है एक कविता
जो स्त्री के घूंघट के अंदर
उसकी मुस्कान दर्ज कर सके
दर्ज कर सके उसकी सोच की मुद्रा
समझ सके उसके आह्वान को
पनीली आंखों के सपनों को समेट सके
ग़ुस्सा और आग उगलती आंखों की भंगिमा को पढ़ सके
और व्यक्त कर सके
उसकी उधेड़बुन और उसकी सोच को
जो मेहनताना पाने की ख़्वाहिश में
बैठी है- भूखी,प्यासी
व्यवसायी के पायताने,
बहुमंज़िली इमारत के नीचे
गारा बनाते वक़्त,
एक अदद ‘छत’ और एक अदद ‘रोटी’ का सपना पाले
जुटे हैं उसके हाथ
मुझे लिखनी है एक कविता उस स्त्री के बारे में
जो अपने बच्चों को
झुग्गी में या सड़क की पटरी पर
लावारिस छोड़कर काम पर आई है।

उस सपने की तासीर
महसूस करनी है मुझे अपने अंदर और
लिखनी है एक कविता
उस स्त्री के बारे में
जो वहां नहीं है
जहां उसे होना चाहिए।

5 . विज्ञापन की औरत

दुनिया के सारे साबुन
औरतों के लिए हैं
सारी की सारी जींसें और पतलून
सारे के सारे क़लम
और सारे के सारे जूते
वैसे ही जैसे-
सभी सिगरेट
सारे टूथपेस्ट
सारे ब्लेड
और दुनिया की सारी की सारी घड़ियां
उनके लिए बनी हों जैसे
सिर्फ़ उनके लिए-
अजीब है ये कितना
खिलते हुए फूल के
असली रंग और महक तक
कितने हैं जो पहुंच पाते हैं
नहीं देखना चाहता है कोई असली चेहरा
विज्ञापन में दिखती हुई औरत का

उसके चेहरे पर ओढ़ी गई
मुस्कान के पीछे के असली मक़सद से
किसी को कोई मतलब नहीं
उसके हर झूठ को
उसके चहरे की मुस्कान से नाप लिए जाने का भ्रम
पाल लेता है हर कोई
उसी को मान लिया जाता है सच
पर सच …?
सच दूर दूर तक कहीं नहीं होता
न तो उस प्रोडक्ट में
जिसके लिए वो हो जाती है
ज़रूरत से ज़्यादा परोसी हुई
और नहीं उस ख़ूबसूरत दिखती
औरत की मुस्कान में

सच उसके तन में नहीं
मन की खोह में बसा होता है कहीं
जिसे उसने ख़ुद कर दिया है दफ़न
अपनी ज़रूरतों के चलते

पैसे के बल पर
उसे लगता है
बंद सींखचों से हो रही है वो बाहर
ये उतना ही बड़ा झूठ है
जितना बड़ा ये सच कि
घटाटोप मौसम उसे भा गया है
विज्ञापन में दिखती औरत को
अब झूठ को
पैसे में तब्दील करना आ गया है!

6 . एक औरत ये भी

दूसरों की धुनों पर
दूसरों के इशारों पर
दूसरों के बोलों पर
रंगे हुए होठों को हिलाती हुई
किसी फ़िल्मी गाने पर
धुन को बसाती हुई अपनी थिरकन में
कटीली आंखों से देखती हुई सबको
सबको मतलब सबको
क्योंकि सारे हिसाब
सारी गणनाएं
गड़बड़ा गईं हैं उसकी
आंखों ही आंखों में
आह्वान करती हुई
हौले-हौले उतरती है स्टेज पर
मर्दों की नुमाइश में
नाचती हुई आर्केस्ट्रा की औरत
शरमाती है
लजाती है
सकुचाती है
थिरकती है
मटकती है
इठलाती है
सर से पांव तक
पांव से घुंघरू तक
घुंघरू से धरती के छुवन का अहसास
वो भरती है अपने भीतर
करती है हाथों का भरपूर एक्शन
स्टेज के चप्पे-चप्पे पर
बिखेरती है अपनी महक
जीवन की हर सीख को
उतार देती है अपने अभिनय में
आर्केस्ट्रा की औरत
मानो बनी हो सिर्फ़ इसी के लिए वो

हर शाम एक नए दिन की शुरूआत के लिए
सजाती है
स्टेज पर उतरने से पहले
वो सोचती है अक्सर
अपने पेशे और
पेशे से जुड़ी तमाम चीज़ों के बारे में
एक औरत के खोए हुए औरतपन के बारे में
पनीली आंखों के सपनों के बारे में
परिवार की टूटती रीढ़ के बारे में
जोड़ने की कोशिश में
बिखरती कड़ियों के बारे में
विदा हुई खुशियों के बारे में
पति के ग़ुस्से और
बच्चों के सिसकते चेहरों के बारे में
वो सोचती है अक्सर
उस खुशी के बारे में
जो घर पहुंचते-पहुंचते
पाउडर और क्रीम की परत की तरह उतर जाती है
हो जाती है ग़ायब चेहरे से

जी लेना चाहती है वो
रंग बिरंगे उज़ाले की चकाचौंध के कुछ पल
स्टेज पर
हो जाना चाहती है
कुछ पल के लिए वो
करिश्मा, माधुरी या जीनत अमान
या कोई और
दूसरों के सपनों को
अपने सपनों के साथ
जोड़कर देखती है वो

स्टेज पर उसका नाम
अदाकारा है सिर्फ़
फ़नकारा है
कला के नाम पर
कसी जाती हैं उसे फ़ब्तियां
मिलती हैं उसे गालियां
दैहिक और
मानसिक शोषण की शिकार वह
खुशी की तलाश में
घर में खटती है
नाचती है घर में
और दिनभर के बाद
जुटती है एक नए दिन की तलाश में

औरत को नचाने की
तमाम साजिशों के ख़िलाफ़
वो अभी चुप है
ये चुप्पी किसी तूफ़ान से पहले का
आभासभर तो नहीं
या पतन की पराकाष्ठा के
कुछ और पहलू
दर्ज़ होते हैं इतिहास में कहीं

चुप्पी पर
चुप रहने का तर्क
कब वाजिब़ नहीं होगा
वो जानना भी नहीं चाहती!!

7 . एक लड़की

एक वो जो
पैदा होने के साथ ही
कर दी गई बहिष्कृत
मन्नतें मांगी गईं
पैदा न होने के लिए जिसके
उसने पाया अपने को
बंदिशों से घिरा हुआ
थमा दी गई झाड़ू
उसके हाथों में
क़लम की जगह
स्कूल के अहातों और
बाग़ बगीचों की जगह
उसके हिस्से आई
घर की चारदीवारी
घिसे गिट्टुओं-चिकने कंचों से
पूरी की गई खेलने की लालसा
मैदान की खुली हवा
समझी गई उसके लिए त्याज्य
माना गया उसके बाजुओं की ताक़त को
ज़रूरत से ज़्यादा कमजोर
ज़रूरत से ज़्यादा बुद्धिहीन और नासमझ
माना गया उसे
अपने दस साल छोटे भाई से भी ज़्यादा…

जहां भी जाती है वो
उसी के पहरे में,
उसी के निर्देशन में करती है काम
स्वतंत्रता के कोई मानी नहीं जानती है वो
वंचित रहने के हर अध्याय से
वाक़िफ़ करा दिया जाता है उसे
समझा दी जाती हैं
सीखचों की बंदिशें
पैरों में टांक दी जाती हैं वैशाखियां
अभ्यस्त कराया जाता है उसे
झुककर पीछे चलने
नीचे देखने
सबको सुनने
सब कुछ सहने
मगर
सदा चुप रहने का
जीते जी मरने का अहसास कराया जाता है उसे!!

* * * * * * * * *
बनी लाड़ली सबकी
अपने कर्मों से वो
गलाते काम की भट्टी में बचपन को
वो, जिसका हो सकता है कुछ भी नाम
रीना, मीना, गीता
शकुन्तला या सीता
फरहीन, शाहिदा
सावित्री, द्रोपदी या कोई और
जान जाती है नाम की थोथी सार्थकता
जान जाती है गुर
ज़िंदा रहने के
संघर्ष की राह चलकर
मेहनत पूजा सीखा उसने

हुई बड़ी वह
कजरारी आंखों में उसने
सपने पाले
झूमर झुमके
हार गले का
आंचल में सपनों की गठरी
रेशम रेशम मन के तंतु
मेंहदी का खिलना हाथों में उसको भाया
बहुत लुभाया सबने उसको

सपनों में फिर मोड़ आ गया
विषय बनी चिंता का सबको
जवानी की उसकी दहलीज
ब्याह की फ़िकर सभी को खाए
बाप के जूते घिसते जाएं
सूखता जाए
देह का मांस
कि कैसे होगा बंदोबस्त
कहां से आएगा सब कुछ
मांगते हैं इतना जितना
न देखा उसने अब तक
कहां से लाए
कहां वो जाए
कैसे रखले अपना मान
कि कैसे कर दे कन्यादान

सूखता जाए प्यार का स्रोत
अभावों की कुंठा में
बदलता जाए निरंतर प्यार
झुंझलाहट, गुस्से में
और रोज़ फिर कोसा जाए
क्यों की हरी
उसने मां की कोख
एक बाप जो
अरमानों को लाद रहा अपनी गठरी में
हाथों की मेहनत को बेचा
सस्ते दामों
जुटा रहा पैसे कैसे भी
कन्यादान को

मांग जांचकर एक बाप ने
क़र्ज़ लिया
उधार का खाया
फिर बेटी का ब्याह रचाया
हाथ जोड़कर माफी मांगी
कमीवेशी को पूरा करने
का अपना संकल्प बनाया

सुलट गया वो ब्याह
हो गई विदा एक लड़की
लिए अरमान बहुत से चली ससुर के घर
छोड़ती पीछे
शरारतें सहेलियों की
उदास चेहरे
दौड़ना घर के अंदर
हिचकी भरकर भाई का

रेंगती सड़क गली पगडंडी
सिसकते पेड़ों का छूटना पीछे
बिलखता घर
क़र्ज़ में डूबा हुआ मगर
हुई ये कैसी शादी आह!
सुलगती उसके मन में आंच
सोचकर करती पश्चाताप
हुआ सब उसकी ख़ातिर

* * * * * * * * *
बीते दिन और बीती रात
शादी की भूली सौगात
काम करे घर में डटकर
पर कोई नहीं जो करे बात
उससे सीधे सट्टे
मारें फट्टे
ब्याह के बाद हुआ घर तंग
तेरा घर नंग
नहीं लाई तू रुपया धेला
बाप ने नंगा तुझे धकेला
नीच है तेरा घर तू नीच
चाहती अगर अभी तू खैर
खींच सकती तू जितना खींच
बाप का रोना मत रो
भाड़ में जाए तू और वो
किया है अरमानों का ख़ून
पढ़ाती है हमको क़ानून…

हुई प्रताड़ित सबके हाथों
सास के तानों
ससुर की गाली
भौजाई की बजती ताली
उसे सताती
बार बार वो याद दिलाती
मिला बहुत था माल
उन्हें अपनी शादी में
फूटे करम जो देवरजी के
मिली ये काले बालों वाली
बजाएगी ये फूटी थाली…

अरमानों के साए काले
पति की चुप्पी
मौन समर्थन
मन ही मन उसको साले
लगाम को गया कसा फिर और
खींच डाले सब मन के तंतु
परंतु
कुछ थाह न पाई
हल कोई भी निकल न पाया
भेजा गया कई बार उसे
उन गलियों में
जिनमें बिखरा उसका बचपन
रचाया गुड़ियों का था ब्याह
लगाए खूब ठहाके सहेलियों के साथ
गुज़रकर जिनसे देखे
ख़्वाब पिया के
सुने मिलन के फ़िल्मी गाने
विरह में सावन का संगीत
आम के पेड़ों की फिर महक
दुनियाभर में सबसे सुंदर
लगती थीं जो
आज उन्हीं गलियों में जाकर
बिखर गई क्यों वो
रुदन क्यों रोक न पाई
देखकर बाबुल का कंधा
छिले हाथों का वो स्पर्श
कलाई सूनी मां की
कान नाक तिनकों की सलाई
भाई की सूनी आंखों के सपनों को
वो थाम न पाई

मुंह से कुछ भी कह ना पाई
नहीं दिखाया
अंदर बाहर के घावों को
ढकी कलाई कुहनी अपनी
नहीं बताया
गया है उसे जलाया
गर्म तवे से
और गढ़ी हैं अपनी चूड़ी मारपीट में
रही चुपचाप
दाबकर मुट्ठी
बंद था जिसमें लालच
मांग की लंबी थी एक लिस्ट

लौटकर आई वो ससुराल
भुगतना उसको है अब
किया फ़ैसला
जैसे जो हो
नहीं ढूढ़ेगी अपने बल का
कोई और सहारा
आंच ढूढ़ने अपने मन की
नहीं ढूढ़ेगी और किनारा

कैसे होगा
कब तक होगा
नहीं जानती
इतना सच है नहीं मरेगी
और लड़ेगी दरिंदगी से
मरते दम तक
और करेगी बेनकाब
उन चेहरों को
जो ठीक वैसे नहीं होते
जैसे दिखाई देते हैं!

8 .  हमीदन

मैं हमीदन
आज़ाद हिंदुस्तान की एक लड़की
एक बहू
एक मां
एक दादी
और अगर मानें तो
उन सबसे बढ़कर एक औरत

औरत जो
मान मर्यादा के नाम पर
घर की चार दीवारी के
नहीं जा पाई पार
चाहते हुए भी
कठमुल्लापन की रही जो शिकार
बार-बार
करती रही इंतज़ार
मर्दाने फ़रमानों का
झांकते हुए घर के दरवाज़ों में से

झेलती रही भयंकर से भयंकर भूचाल
अपनी क़ीमत पर
दांव पर लगाती रही वो ख़ुद को
पिसते हुए घर और बाहर के बीच

एक औरत जो
बनी रही सालों साल
वितृष्णा की शिकार
ज़माने की नफ़रत भरी जाती रही
उसके भीतर

सुर्ख लाल अंगारों से
मेरी कोख को राख करने के वास्ते
बनाए जाते रहे मंसूबे
और मैं करती रही उन्हें बेअसर
अपने रक्त स्राव से

मैं जो अब
धकेल दी गई हूं
मुज़फ्फ़रनगर दंगों के बाद
पुलिस संरक्षण में बने राहत कैंप में
और अपने घर की
दीवारों को छूने से भी
रखी जा रही हूं वंचित
जो समूचा का समूचा खड़ा है
मेरी बंद आखों के सामने
मगर खुली आंखों में
दीवारों के जले हुए मंज़र के सिवा
कुछ भी नहीं जो दिखता हो

मैं हमीदन
पैदा हुई जो
मुल्क के बँटवारे की आग को पाले हुए
अपने सीने में
जिसकी भेंट चढ़े मेरे वालिद
मारे गए जो सरेआम
कुछ लोगों की नफ़रतों के ज्वार से
नोंच ली गई उनकी दाढ़ी
बिखरा हुआ घर
तिनके-तिनके जोड़कर
बनाया जाता रहा फिर से

मेरे जन्म पर
वक़्त के सिपहसालारों ने
दी थी मुझे जीने की जो गारंटी
जब खोया था मैंने
अपने ही कई क़रीबी जनों को
मैं बढ़ती रही उसी विश्वास में
वक़्त पगडंडियों पर दौड़ता रहा
घर-परिवार, गलियों और
गांव को थामे हुए
अपने कंधों पर
और मैं फुदकती रही
मासूम चिड़िया की मानिंद
भविष्य के मौसम से बेख़बर
जहां गांव की साझी संस्कृति के पैमाने
किए जाते रहे तय
आतताइयों के ख़िलाफ़
जहां परिवार की बेटी से बढ़कर
रही हमेशा अपने गांव की बेटी
जहां इज़्ज़त और आबरू रही
रोटी से ऊपर
यही इज़्ज़त
एक बार फिर लुटी
जब कर दिया गया
मेरेे शौहर को दिन-दहाड़े क़त्ल
लौट रहा था जो अपने काम से
मस्जिद के रास्ते
अयोध्या मेरी सांसों में बिंध गया ऐसा
कि काबा का नाम तक भूल गई

ख़ून में नहाई जवान बेटे की लाश
जब लौटी थी अहमदाबाद से
गोधरा के रास्ते
जहां वो बेचा करता था अपने हाथ का हुनर
झूठ बेपर्दा होने के इंतज़ार में
सच के आगे तना रहा
और खत्म होता रहा मेरा परिवार
एक-एककर
फ़ैसले के इंतज़ार में

हवा के रुख़ और बदलावोेें को
करती रही मैं नोट
ज़िंदगी की डायरी में
सभी के पते छपे थे मेरे अंदर
गवाह रहे जो
मेरे अपने अंदर के बदलावों के साथ
उम्र के हर पड़ाव पर
होती रही मैं और भी चौकन्ना
हमीदन से लेकर हमीदन काकी तक के
संबोधनों को
टांकते रही अपने अंदर
उसी जोश और जज्बे के साथ

सात दशक
हवा में बह जाने और परिवार को
पूरी तरह खो देने के बाद
अपने घर की चौखट से इतर
राहत कैंप में बेमियाद रहना
महज़ राहत के लिए नहीं है
कटना है
सदियों पुरानी अपनी जड़ों से
खदेड़ना है
हिंदुस्तानी संस्कृति के पन्नों से
गांव से तिरोहित होता भाई चारा
और बहनापा
कहां खो गया
अँधेरा बिखेरते हाथों
की कालिमा
मुझे मंजू़र नहीं है
क़तई नहीं
अपनी जान की क़ीमत पर भी नहीं!!

 

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