सर्गेई मिसनोविज किरोव का हत्यारा निकोलायेव एक अकेला इंसान था। किरोव की हत्या के पीछे साजिश न थी, कोई गुप्त आतंकवादी नेटवर्क सक्रिय नहीं था, जैसा कि तीस के दशक समझा जा रहा था। तीनों इस राय से एकमत हैं कि स्टालिन ने किरोव की हत्या का इस्तेमाल अपने राजनैतिक विरोधियों को समाप्त करने के लिए किया था। किरोव की हत्या के बहाने स्टालिन ने बोल्शेविक नेताओं जिनोवियेव, कामानेव, बुखारिन और जेनरल तुखाचेव्स्की को झूठे मुकदमें में फॅंसाया, उनपर दबाव डालकर , यातना देकर, जबरन अपना गुनाह कबूल करने पर मजबूर किया। अंततः उन सबों को सजा-ए-मौत  दी गयी।……

वो हत्या जिसने सोवियत संघ को हिला दिया

अनीश अंकुर

सर्गेई मिसनोविच किरोव की हत्या सोवियत संघ के इतिहास की सबसे सनसनीखेज घटना थी। इस हत्या ने तीस के दशक में सोवियत संघ की दिशा ही बदल दी। हत्या निकोलायेव नामक व्यक्ति ने की थी। स्टालिन विरोधी, निकोलायेव द्वारा हत्या के पीछे किसी बड़े षडयंत्र से इंकार करते हैं। जबकि कई प्रमुख इतिहासकार व शोधकर्ता मानते हैं कि निकोलायेव अकेले नहीं बल्कि एक बड़ी साजिश के तहत काम कर रहा था। निकोलायेव क्या इकलौता हत्यारा था या वो किसी साजिश का हिस्सा था? स्टाालिन काल का इतिहास लिखने वालों के मध्य सबसे अधिक विवाद इसी पहलू पर है। ग्लोबल फर्र की नयी किताब ‘‘ द मर्डर आॅफ सर्गेई किरोव’’ इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करती है।
रूसी भाषा और साहित्य के अध्येता ग्रोवर फर्र की सोवियत संघ के इतिहास और विशेषकर स्टालिन युग में खासी दिलचस्पी रही है। मोंटक्लेयर स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ग्लोबल फर्र की 2011 में आई पुस्तक ‘ ख्रुष्चेव लाइड’ ;ख्रुष्चेव ने झूठ बोलाद्ध काफी चर्चित रही है। ‘द मर्डर आॅफ सर्गेई किरोव’ ‘हिस्ट्री, स्कॉलरशिप एंड द एंटी स्टालिन पाराडइम’ सोवियत संघ के इतिहास में परिवर्तनकारी मोड़ लाने वाली इसी हत्या को केंद्रित कर लिखी गयी है।
सर्गेई किरोव कम्युनिस्ट पार्टी ;बोल्शेविक लेनिनग्राड के पहले सचिव थे, प्रखर वक्ता व संगठक थे। स्टालिन के बेहद करीबी किरोव को स्टाालिन के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा था। 1 दिसंबर 1934 को जब वे लेनिनग्राड स्थित बोल्शेविक पार्टी के मुख्यालय स्मोलनी इंस्टीट्यूट’ की सीढ़ियां चढ़ रहे थे निकोलायेव, जो खुद पार्टी का सदस्य था, ने पीछे से गोली मार कर हत्या कर दी।
उनकी हत्या तब हुई जब जर्मनी में फासिस्ट हिटलर सत्तासीन हो चुका था। पूरे यूरोप पर फासीवादी खतरा मॅंडराने लगा था। दुनिया भर में हिटलर के कुख्यात पांचवे दस्ते की चर्चा होने लगी थी। सर्गेई मिसनोविच किरोव की हत्या वो प्रस्थान बिंदु है जो 1936, 1937 और 1938 के मास्को ट््रायल का जनक बना। इन मुकदमों ने समूची दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। शीत युद्ध की शब्दावली में इस दौर को कम्युनिस्ट विरोधियों द्वारा ‘ग्रेट टेरर’ की संज्ञा दी गयी।

ग्रोवर फर्र की यह किताब सोवियत जमाने के दुर्लभ व गुप्त ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित है। सेर्गेई किरोव की हत्या से संबंधित तीन पुस्तकें पिछले एक-डेढ़ दशक के दौरान खासी चर्चित रही है। ग्रोवर फर्र ने किताब की शुरूआत इन अध्ययनों को केंद्र कर की है। सबसे पहले 2001 में अल्ला किरीलिना की किताब ‘नीज्वेत्सन्यी किरोव’ ;अज्ञात किरोव की पुस्तक प्रकाशित हुई। अल्ला किरीलिना लेनिनग्राड स्थित ‘किरोव म्युजियम’ की प्रभारी भी रह चुकी थी। इस पुस्तक को लिखने के दौरान उन्होंने कई प्राथमिक श्रोतों को आधार बनाया था। किरीलिना वो पहली लेखिका रही जिसे सर्गेई किरोव की हत्या से संबंधित प्राथमिक श्रोतों तक पहॅंुच भी हासिल था। सोवियत संघ के विघटन यानी 1991 के पूर्व उन प्राथमिक दस्तावेजों का उपलब्ध होना आसान न था। 2010 में अमेरिकी इतिहासकार मैथ्यु लिनोई की किताब ‘द किरोव मर्डर एंड सोवियत हिस्ट्री’ छप कर आयी। मैथ्यु लिनोई की इस पुस्तक में किरीलिना से भी अधिक दस्तावेजों व प्राथमिक श्रोतों को शामिल किया गया है। ग्रोवर फर्र ने इसके अलावा नार्वे के इतिहासकार डेसमंड एग की ‘बोरिस येल्तसिन फाउंडेशन’ से ‘हिस्ट्री आॅफ स्टालिनिज्म’ श्रृंखला के तहत 2009 प्रकाशित हुई किताब को भी अपनीे अध्ययन के दायरे में रखा है।
ये तीनों अध्ययन एक ही नतीजे पर सहमत होते हैं कि सर्गेई मिसनोविज किरोव का हत्यारा निकोलायेव एक अकेला इंसान था। किरोव की हत्या के पीछे साजिश न थी, कोई गुप्त आतंकवादी नेटवर्क सक्रिय नहीं था, जैसा कि तीस के दशक समझा जा रहा था। तीनों इस राय से एकमत हैं कि स्टालिन ने किरोव की हत्या का इस्तेमाल अपने राजनैतिक विरोधियों को समाप्त करने के लिए किया था। किरोव की हत्या के बहाने स्टालिन ने बोल्शेविक नेताओं जिनोवियेव, कामानेव, बुखारिन और जेनरल तुखाचेव्स्की को झूठे मुकदमें में फॅंसाया, उनपर दबाव डालकर , यातना देकर, जबरन अपना गुनाह कबूल करने पर मजबूर किया। अंततः उन सबों को सजा-ए-मौत दी गयी।
ग्रोवर फर्र की किताब सोवियत संघ के बरक्स इस प्रचलित पाठ को तथ्यों व दस्तावेजों के माध्यम से चुनौती देते हैं। इस तथ्य को मजबूती से स्थापित करते हैं कि सर्गेई किरोव की हत्या करने वाला निकोलाएव कोई इकलौता शख्स नहीं बल्कि एक व्यापक षडयंत्र का हिस्सा था। मुख्य साजिशकर्ता थे जिनोवियेव एवं उनकी सरपरस्ती में चलने वाला गुप्त संगठन जिसे ‘लेनिनग्राड सेंटर’ एवं ‘मास्को सेंटर’ कहा जाता था। जिनोवियेव को हटाकर कम्युनिस्ट पार्टी की लेनिनगार्ड ईकाई का सचिव सर्गेई किरोव बनाया गया था। उनके हटने के पश्चात जिनोवियेव के इर्द-गिर्द असंतुष्टों का जमावड़ा जमने लगा था जिसे लियोन ट््राटस्की का भी सहयोग व दिशानिर्देश प्राप्त हो रहा था। लियोन ट््राटस्की स्टालिन से नेतृत्व के संघर्ष में पिछड़ने के बाद रूस से बाहर निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे। जिनोवियेव कामानेव, कोतोलिनोव, बुखारिन के साथ ट््राटस्की को सहजतापूर्व जोड़ने वाली समान कड़ी थी स्टालिन विरोध। एक व्यापक, सुचिंतित विराट योजना के तहत निकालायेव को तैयार किया गया था।
निकालायेव वारदात स्थल पर ही पकड़ा गया। प्रारंभिक जांच में उसने ये आभास देने का प्रयत्न किया कि हत्या के लिए सिर्फ वही, यानी अकेले जिम्मेवार है। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती गयी साजिश की परतें खुलती चली गयी। इस साजिश में खुद पार्टी के बड़े नेताओं सहित कई बड़े पुलिस व सैन्य पदाधिकारियों की संलिप्तता भी सामने आयी। इन सबों लोगों के विरूद्ध मुकदमा चलाया गया। ये तथ्य सामने आने लगे कि एक व्यापक तख्तापलट की योजना थी जिसका पहला निशाना खुद स्टाालिन की हत्या करना था पर बाद में स्टाालिन के बजाए किरोव की हत्या का निर्णय लिया गया। साजिशकर्ता स्टालिन जैसे बड़े लक्ष्य के बजाए किरोव की हत्या कर दरअसल माहौल को भांपना भी चाहते थे।
इस योजना को जर्मन व जापानी एजेंसियों की भागीदारी भी सामने आयी। स्टाालिन काल के जेनरिख ल्युशिकोव तो बाजाप्ता भागकर जापानी सेना के साथ मिल गया था। जापानी सेना की प्रचार पत्रिका ‘ काइजो’ में ल्युशिकोव ने आलेख लिखकर पूरी जांच प्रक्रिया को सदंहास्पद बनाया। तीनों लेखकों ने जापान सेना की प्रचारात्मक सामग्री को आधार बनाकर सोवियत जांच एजेंसियों का कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया।
निकोलायेव के इकलौता हत्यारा होने की बात बेहद महत्वपूर्ण व निर्णायक है। ऐसा इस कारण कि यदि ये साबित हो जाता है कि निकोलायेव के पीछे यदि एक सुचिंतित योजना काम कर रही थी तो फिर उसके अन्य योजनाकारों की खोज की जाएगी। फिर इन सबको सजा देने वाली ‘मास्को ट््रायल’ की वैधता स्थापित हो जाएगा।
ग्रोवर फर्र ने एक-एक दस्तावेज का बारीकी से विष्लेषण कर मैथ्यु लिनोई एवं किरीलिना पर तथ्यों के चयनात्मक ;सेलेक्टिवद्ध इस्तेमाल को उजागर किया है। स्टालिन विरोधी इन लेखकों ने जान-बूझ कर उन तथ्यों की उपेक्षा की है जो उनके पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों से मेल नहीं खाती। स्टालिन काल विशेषकर किरोव की हत्या से संबंधित ट््रायल के पहले, ट््रायल के दौरान सभी आयामों पर दृष्टि डाली गयी है।
1956 में बीसवीं कांग्रेस में ख्रुष्चेव ने जो ‘सेक्रेट स्पीच’ दिया पहली बार किरोव हत्या के आरोपियों के निर्दोष होने की बात उठायी। दरअसल खु्रष्चेव का प्रयास था कि किरोव की हत्या के लिए भी स्टालिन को ही दोषी ठहराया जाए। स्टाालिन काल की कथित ज्यादतियों के लिए एक ‘श्वेरनिक आयोग’ का भी गठन किया गया। ख्रुष्चेव इस योजना पर काम कर रहे थे कि स्टाालिन ने खुद किरोव की हत्या करवाई तथा इसका बहाना लेकर अपने विरोधियों को ठिकाने लगा दिया। लेकिन काफी प्रयास के बाद भी ख्रुष्चेव इस बात को साबित नहीं कर पाए। अंततः इस योजना पर जांच आगे बढ़ायी गयी कि किरोव की हत्या करने वाला निकोलायेव किसी ग्रुप का हिस्सा नहीं बल्कि इकलौता हत्यारा था। यहाँ तक कि किरोव की हत्या के पीछे एक निजी कारण को भी ढ़ूंढ़ा गया। किरोव का निकोलायेव की पत्नी के नाजायज संबंध होना। ख्रुष्चेव ने किरोव की हत्या से संबंधित कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों को भी नष्ट कर दिया। बाद में गोर्बाचेव के जमाने में भी फिर से किरोव की हत्या के मामले को फिर से खोला गया।
लेखक ने उन प्राथमिक श्रोतों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है जिसकी पहले के लेखकों ने जान-बूझ कर उपेक्षा की। इसके अलावा साक्ष्यों के तर्क, टार्चर आदि कई पहलुओं पर विश्वसनीय रौशनी डाली है।
‘द मर्डर आॅफ सर्गेई किरोव’ इस लिहाज से एक बेहद महत्वपूर्ण रचना है। किरोव हत्या के बहाने स्टालिन विरोध की राजनीति को, विषेषकर अकादमिक जगत में, ग्लोबल फर्र ने उजागर कर दिया है। सोवियत संध के दुष्प्रचार की असलियत को समझना हो तो ये किताब अवश्य पढ़नी चाहिए।

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