शम्भू मित्र ने रंगमंच में आधुनिक युग का प्रारंभ किया

अनीश अंकुर

“शम्भू मित्र ने आम लोगों के दुःख-दर्द को तो अभियक्त किया ही लेकिन उनके द्वारा निर्देशित ‘नवान्न’ ने नाटकों की दुनिया में नए युग का पदार्पण किया। उनके नाटक रक्तकरबी, चार अध्याय जैसे रवीन्द्र नाथ के रंगमंच के अनुकूल न माने जाने वालों नाटकों को मंचित करने का मुश्किल पर ऐतिहासिक काम किया। ऐसा नही कि एक कलाकार का जीवन आम नागरिक से अलग नही है। हमें भी शम्भू मित्र जैसा जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए।” ये बातें चर्चित बंग्ला कवि एवम् ‘बिहार हेराल्ड’ के संपादक बिद्युत्पाल ने शम्भू मित्र की जन्मशताब्दी वर्ष पर आधारित आयोजन में बोलते हुए कहा।रंगकर्मियों -कलाकारों के साझा मंच ‘ हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी’ द्वारा कालिदास रंगालय में आयोजित बातचीत का विषय था ” हमारे समय में शम्भू मित्र”। समारोह में बड़ी संख्या में रंगकर्मी, कलाकार, बुद्धिजीवी, साहित्यकार , सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे।

बातचीत का प्रारंभ करते हुए बुजुर्ग रंगकर्मी अमिय नाथ चटर्जी ने कहा ” शम्भू मित्र हिंदुस्तान के महान रंगकर्मी थे उन्होंने ऐसे नाटको की रचना की जिनको देखने के लिए लोग सैकड़ों लोग रात-रात भर जागकर टिकट के लिए लाइन में खड़ा होते थे।शम्भू मित्र उनकी पत्नी तृप्ति मित्र ने बंगाल के रंगमंच को उंचाई प्रदान किया।शम्भू मित्र फ़िल्म ‘जागते रहो’ के निर्देशन और इप्टा के नाटक ‘धरती के लाल’ के लिये भी याद किये जाते हैं ”
वरिष्ट रंगकर्मी कुणाल ने शम्भू मित्र के युगांतकारी योगदान को रेखांकित करते हुए कहा ” हम लोग एक ऐसी पीढी हैं जिन्होंने शम्भू मूत्र को अभिनय करते नही देखा सिर्फ उनके बारे में सूना है उनलोगो से जिन्होंने उनको मंच पर नाटक करते देखा। उन्होंने इप्टा के बाद ‘बहुरूपी’ संस्था बनाई।ग्रुप थियेटर की बुनियाद रखी।वैसे तो कई फिल्मो में भी काम किया पर मूलतः वे थियेटर के लिए ही समर्पित रहे।वे मैथिली के लोक नाटक कीर्तनिया से प्रभावित थे। वे काव्य आवृत्ति के लिए भी बेहद चर्चित रहे. बंगाल के कई मह्त्वपूर्ण कवियों की कविताओं का उन्होंने पाठ किया “
रंगकर्मी अनीश अंकुर ने अपने सम्बोधन में कहा ” रवींद्र नाथ ठाकुर के नाटकों की भंगिमा को पकड़ा और अभिनय की भारतीय पद्धति को खोज निकाला ताकि उसका मंचन किया हां सके।चार अध्याय को नक्सल आंदोलन के दौर में अपार लोकप्रियता मिली।शम्भू मित्र के अनुसार वैसे तो रंगमंच कई कलाओं का संगम है पर केंद्र में अभिनेता है।एक अभिनेता साहित्य या चित्रकला की तरह अपने चिन्ह छोड़कर नही जाता ।अभिनय में नश्वरता का बोध है। जिसका महत्व तभी तक है जब वो मंच पर घट रहा होता है। शम्भू मित्र कहा करते थे रंगमंच को वोकेशनल ट्रेनिंग की तरह नहीं देखना चाहिये . नाट्यकला का मूल तत्व में स्वर, आरोह-अवरोह, आवाज को साधने और उसपर नियंत्रण। ‘रक्तकर्बी’ में वो राजा की भुमिका करते हैं जो मंच पर नहीं दिख्ता लेकिन पर्दे के पीछे से अपनी आवाज की बदौलत वो मंच पर अपनी निरन्तर उपस्थिति बनाये रखता है. आम दर्शक मंच सज्जा नहीं नहीं देखने आते हैं वो अभिनेता- अभिनेत्रियों के बहाने मानवीय संपर्को को समझना चाह्ते है. दर्शक को कभी भी कम करके नहीं आंकना चाहिये कि वो ये बातें नही समझ सकता”
वरिष्ठ रंगकर्मी जावेद अख्तर ने शम्भू मित्र की बेटी सांवली मूत्र की पुस्तक से चुनिंदा अंशों का प्रभावशाली पाठ किया।
वरिष्ठ रंगकर्मी उषा वर्मा ने शम्भू मित्र के साथ के अपने संबंधो को साझा किया।
सभा को बिहार आर्ट थियेटर के सचिव कुमार अनुपम और साहित्यकार अरुण शाद्वल ने भी संबोधित किया।
हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी (रंगकर्मियों-कलाकारों के साझा मंच) के इस सभा में मौजूद लोगों में रंगकर्मी मोना झा, शिक्षाविद अनिल कुमार राय, मृत्युंजय शर्मा, सुमन्त, कवि शाहशाह आलम, प्रत्युष चंद्र मिश्र, नरेंद्र , अरविन्द श्रीवस्तव, कौशलेन्द्र, गौतम गुलाल, मनोज, रवीन्द्र नाथ राय, मृगांक, विष्णु, रघु, सुरेश कुमार हज्जू, शिव कुमार शर्मा, गोपाल शर्मा, बांके बिहारी, बी.एन विश्वकर्मा, पंकज प्रियम, बबलू गांधी, सुब्रो भट्टाचार्य, मणिकाण्त चौधरी, मृगांक आदि।
आगत अतिथियों का स्वागत वरिष्ठ रंगकर्मी रमेश सिंह जबकि समारोह का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन युवा रंगकर्मी जयप्रकाश ने किया।

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