यहां घूमते घामते मैं सोच रहा था, क्या जरूरत थी टेगौर जैसे संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति को जंगल में रहने की और शांतिनिकेतन की स्थापना की। इसका जवाब उनके लिखे लेखों में मिलता है। वे भारत में बाबू बनाने वाली शिक्षा से अलग अच्छा इंसान बनाने की शिक्षा चाहते थे। वे कहते थे, बच्चों का स्वाभाविक विकास हो, न कि उन्हें शुरू ही उन्हें किताबी कीड़ा बना दिया जाए। पुस्तकीय ज्ञान के अलावा कई और रास्ते हैं, ज्ञान की खोज के। वे एक जगह लिखते हैं कि “वास्तव में पुस्तकों द्वारा ज्ञान प्राप्त करना हमारे मन का प्राकृतिक धर्म नहीं है। वस्तु को सामने देख-सुनकर उसे हिला-घुमाकर, अपनी आंखों से देखभाल तथा जांच करके ही आविष्कृत ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।”……….

शांतिनिकेतन की यात्रा

बाबा मायाराम

हाल ही में शांतिनिकेतन जाना हुआ। यह दूसरी बार था जब मैं  शांतिनिकेतन गया था। दो साल पहले भी जाना हुआ था। इसके बाद पिछले साल हम रवीन्द्रनाथ टेगौर के कोलकाता स्थित ठाकुरबाड़ी जोड़ासांको भी गए थे।

इस बार जाने की वजह मेरा बेटा बना, जो वडोदरा में चित्रकला की पढ़ाई कर रहा है। कोलकाता से बोलपुर की दूरी करीब 170 किलोमीटर है। बोलपुर वही जगह है जहां शांतिनिकेतन स्थित है। यह पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में है।

निकेतन का अर्थ होता है घर और शांति, जहां शांति का वातावरण हो, शांति का अहसास हो। आज चारों ओर अशांति, बेचैनी के इस माहौल में हम बार बार सोचते हैं कि जहां शांति हो वहां चला जाए। शांतिनिकेतन से अच्छी जगह क्या हो सकती है। इसी खोज में है शांतिनिकेतन की यात्रा।

सात नवंबर की दोपहर कोलकाता के प्रसिद्ध हावड़ा बृज से शहर का विहंगम दृश्य देखते हुए हावड़ा रेलवे स्टेशन के लिए निकले। रास्ते में सजे धजे मानव समूह, सड़क पर चलता ट्राम (रेल की तरह जो सड़कों पर बिछी पटरियों पर दौड़ता है), पोटलियां लेकर रेंगते स्त्री-पुरूष, दौड़ते भागते लोगों को देखते हुए और भीड़ से बचते बचाते रेलवे स्टेशन पहुंचे और ट्रेन पकड़ी।

शांति निकेतन

ट्रेन की खिड़की से दोनों ओर धान के पके खेत थे। केला, बांस और छोटे-बड़े तालाबों में सिंगाड़े की खेती थी। दोई मिष्टी, झालमुड़ी का आनंद लेते हुए हम कुछ घंटों में बोलपुर पहुंच गए। रात्रि विश्राम हमने हमारे पारिवारिक मित्र व प्राध्यापक के घर किया।

दूसरे दिन 8 नवंबर की सुबह जल्द ही हम शांतिनिकेतन पहुंच गए।  लम्बा-चौड़ा हरे पेड़ों से भरा परिसर मोह रहा था। अमराई की छांव में बच्चे पढ़ रहे हैं। कभी टेगौर ने अपनी कविताएं इन्हीं पेड़ों के नीचे पक्षियों के गान के साथ लिखी हैं। वे अपनी कविताओं में प्राकृतिक हवा और पक्षियों के गान का आभास लेकर आते थे। रवीन्द्र संगीत, जो बंगाल में आज भी काफी लोकप्रिय है, कई लोगों की जिंदगी इसके बिना सूनी हो जाती हैं, भी यही रचा गया था।

खादी का कुर्ता, बगल में टंगा रंगीन झोला और बेतरतीब दाढ़ी वाले लोग यहां घूमते हुए दिखे। आकर्षक पीली गणवेश में विद्यार्थी यहां पेड़ों के नीचे पढ़ रहे हैं। शिक्षक सीमेंट के ऊंचे चबूतरे पर बैठकर पढ़ा रहे हैं। हमने परिसर का एक चक्कर लगाया। साइकिल रिक्शा वाले और गाइड बता रहे थे टेगौर का घर यहां हैं। तारीखों के साथ उनका जीवनवृत्त बता रहे थे।

कंकरीट, बालू और खुरदरी सीमेंट से बनी रामकिंकर बैज की मूर्तियां के सामने हम रुके। मैंने बेटे को फोटो लेने के लिए कहा। उसने कहा नहीं, आज मैं नहीं आप फोटो लो, मैं कुछ स्कैच बनाऊंगा। मैंने कुछ फोटो लिए। रामकिंकर बैज मशहूर मूर्तिकार और चित्रकार थे। मशहूर चित्रकार नंदलाल बोस शांतिनिकेतन के पहले शिक्षकों में से एक रहे हैं।

यहां घूमते घामते मैं सोच रहा था क्या जरूरत थी टेगौर जैसे संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति को जंगल में रहने की और शांतिनिकेतन की स्थापना की। इसका जवाब उनके लिखे लेखों में मिलता है। वे भारत में बाबू बनाने वाली शिक्षा से अलग अच्छा इंसान बनाने की शिक्षा चाहते थे।

वे कहते थे बच्चों का स्वाभाविक विकास हो, न कि उन्हें शुरू ही उन्हें किताबी कीड़ा बना दिया जाए। पुस्तकीय ज्ञान के अलावा कई और रास्ते हैं, ज्ञान की खोज के। वे एक जगह लिखते हैं कि “वास्तव में पुस्तकों द्वारा ज्ञान प्राप्त करना हमारे मन का प्राकृतिक धर्म नहीं है। वस्तु को सामने देख-सुनकर उसे हिला-घुमाकर, अपनी आंखों से देखभाल तथा जांच करके ही आविष्कृत ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।”

टेगौर ने शिक्षा को कंकरीट की चारदीवारी से निकालकर प्रकृति, कला और लोक जन से जोड़ा। वहां से सीखने का नजरिया दिया। यहां कई तरह के तीज त्यौहार मनाए जाने की परंपरा डाली। शांतिनिकेतन में बहुत से उत्सव होते रहते हैं। जिसमें से दोल ( झूला) उत्सव, होली और संथाल आदिवासियों के तीज-त्यौहार भी मनाए जाते हैं।

शांति निकेतन

अब हम संग्रहालय आ गए थे। यहां टेगौर जी की हस्तलिखित कविताएं, पत्र और कहानियां फ्रेम की हुई लगी हैं। उनके ऐनक और रोजाना इस्तेमाल किए जाने वाले सामान रखे हैं। उन्होंने कई विधाओं में हाथ आजमाया। कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता और चित्रकला।

उन्होंने अपने उत्तरार्ध में चित्रकला सीखी थी।  60 वर्ष की उम्र के बाद चित्रकारी का काम शुरू किया। अक्षरों की सजावट और अपने लिखे हुए को कभी काटते और उससे जो आकृति बनती, उससे प्रेरणा लेकर चित्रकारी की।

उनकी सोच विश्वव्यापी थी, शायद इसीलिए उन्होंने इसका नाम विश्व भारती रखा। वे कोलकाता छोड़कर शांतिनिकेतन आ गए थे। 1901 में उन्होंने एक आवासीय स्कूल शुरू किया था जिसने बाद में एक विश्वविद्यालय का रूप ले लिया। प्राइमरी शिक्षा से लेकर उच्चतर शोध और अकादमिक कार्य होने लगा।

विश्व भारती में शोध और अध्ययन को प्रमुखता दी गई। संगीत और कला की शिक्षा के लिए कला भवन और संगीत भवन बने। नृत्य की शिक्षा भी दी जाने लगी। श्री निकेतन में ग्रामीण विकास को आधार बनाया गया। और खुद कवि गुरू साहित्य सृजन में लगे रहे।

कवि गुरू, यह नाम टेगौर के लिए महात्मा गांधी ने दिया था। और टेगौर ने गांधी जी के लिए महात्मा का संबोधन दिया था। दोनों कुछ मतभेदों के बावजूद एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। गांधी जी के कहने पर छात्रावासों में स्वयं के काम स्वयं काम करने की परंपरा डाली गई थी।

जब टेगौर शांतिनिकेतन में होते थे तब विद्यार्थियों का उनसे मिलने तांता लगा रहता था। विद्यार्थी उनसे अपनी उत्तरकापियों में उनके हस्ताक्षर करवाते थे। उनसे कविताएं सुनते थे।

यहां पढ़ने वालों में बहुत जाने-माने लोग हैं जिनमें अमत्य सेन, इंदिरा गांधी, सत्यजीत रे, शिवानी और यहां सूची लम्बी है। अब टेगौर नहीं हैं। आजादी मिलने के पहले (1941) में चले गए। लेकिन हमने शिक्षा के बारे में उनके विचारों को तरजीह नहीं दी। अब शांतिनिकेतन वह नहीं है, जो पहले था। पर्यटन की शक्ल ले चुका है। परिसर, पेड़, पत्ते और फूल और जीव-जगत और लोक जीवन वही है, पर देखने वालों की नजर बदल गई है।

अब हम टेगौर के घर के सामने थे। वहां पेड़ के नीचे एक लोक गायक मधुर बाउल गीत गा रहा था। हम रुक गए। मैं सोच रहा था एक अनपढ़ लोक गायक भी विश्वविद्यालय का हिस्सा है। क्या उससे सीखने की तमीज हमें आएगी। कुछ लोग उसकी छवि ले रहे थे। अब हमारे लौटने का समय हो गया था। पर मन वहीं अटक गया।

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