प्रस्तुत पुस्तक ‘नामवर के नोट्स’ संपूर्ण व्याख्यान नहीं बल्कि सिर्फ नोट्स हैं जो कि स्मृति के ज्ञानात्मक आधार का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कुल दस अध्यायों में संकलित व्याख्यान ‘संस्कृत काव्यशास्त्र के स्वरुप निर्धारण’ से लेकर ‘सृजनशीलता में स्वतंत्रता की स्थापना’ यानी भरतमुनि से अभिनव गुप्त तक का सफ़र है। ……

“शास्त्र से संवाद”

 

पहले ही स्पष्ट कर देना उचित है कि इस पुस्तक का महत्त्व आलोचना के रूप में नहीं बल्कि नामवर सिंह के अध्यापकीय स्वरुप में ज्यादा है। आलोचक के रूप में नामवर जी को किनारे रखकर शिक्षक के किरदार में उनकी आवाज़ को ‘नामवर के नोट्स’ में सुना जा सकता है, जिसके लिए नामवर जी की ख्याति हमेशा से रही है। गुरु के रूप में नामवर जी के आख़िरी साल में दिए गए कक्षा व्याख्यानों की प्रस्तुति है ‘नामवर के नोट्स’। इसमें प्रस्तुत व्याख्यान आज के विमर्शवादी दौर में शास्त्र-निर्माण की भारतीय परंपरा के चिह्न की तरह है, जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता। चूँकि इसमें संकलित व्याख्यान संस्कृत काव्यशास्त्र की समूची परंपरा पर आधारित है, जो कि भारतीय काव्यशास्त्र का आधार है। भरतमुनि से लेकर अभिनव गुप्त तक रस की विकास यात्रा बोधगम्यता के साथ है, जिसका अध्ययन किसी भी पुस्तकीय संदर्भ से ज्यादा महत्व का है, क्योंकि इस पुस्तक में संस्कृत काव्यशास्त्र के निर्माण के परिदृश्य को सामने रखते हुए आचार्यों की साधना को काव्य की अश्ववाद-प्रक्रिया और रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में रखकर देखने का प्रयास किया गया है। इस वज़ह से काव्यशास्त्र जैसा नीरस विषय भी बेहद सहज और आस्वादपरक बन पड़ा है। यह सहजता अनायास नहीं है बल्कि मधुप जी ने भूमिका में जो लिखा है, वो इस संदर्भ में सटीक है कि ‘नामवर जी की सहज मुस्कान भी अर्थपूर्ण होती है और अर्थपूर्ण मुस्कान सहजता की नई व्याख्या।’

जैसा कि पुस्तक में ही विदित है कि प्रस्तुत पुस्तक ‘नामवर के नोट्स’ संपूर्ण व्याख्यान नहीं बल्कि सिर्फ नोट्स हैं जो कि स्मृति के ज्ञानात्मक आधार का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कुल दस अध्यायों में संकलित व्याख्यान ‘संस्कृत काव्यशास्त्र के स्वरुप निर्धारण’ से लेकर ‘सृजनशीलता में स्वतंत्रता की स्थापना’ यानी भरतमुनि से अभिनव गुप्त तक का सफ़र है। इसके पहले अध्याय ‘संस्कृत काव्यशास्त्र का स्वरुप एवं अध्ययन की समस्याएँ’ में काव्यशास्त्र के स्वरुप का निर्धारण संस्कृत से लेकर अंग्रेजी तक किस प्रकार होता रहा है, इसकी विस्तृत चर्चा है। शास्त्र के प्रयोजन पर संस्कृत में भरतमुनि, वामन, आनंदवर्धन, अभिनव गुप्त और विश्वनाथ के मत तो पाश्चात्य में सास्यूर, रोलांड बार्थस, टी.एस. इलियट और चॉमस्की के अध्ययन से परिचित होते हैं तो दूसरी ओर काव्यशास्त्र के विकास के ऐतिहासिक पहलुओं से भी रूबरू होते हैं। और अंततः पाते है कि संस्कृत काव्यशास्त्र का विकास क्रमिक-विकास था -होरिजेंटल था- जिसका समापन रस एवं ध्वनि की पूर्णता में होता है।

दूसरे अध्याय ‘काव्य की विशिष्ट संकल्पना का विकास’ में काव्य या साहित्य कि संकल्पना के विस्तार में काव्य की व्याख्या को सैद्धांतिक रूप देने वाले पहले आचार्य भामह, शब्द और अर्थ के विशिष्ट संबंध की पहचान, इसकी स्पष्ट और सूक्ष्म व्याख्या का श्रेय पाने वाले आचार्य कुंतक और विवेचनात्मक दृष्टि और सौंदर्य विशेष की ओर संकेत करने वाले वामन का संदर्भ कथानक की तरह एक अविरल प्रवाह के साथ जुड़ता है।
अगला अध्याय कुंतक द्वारा वक्रता का सौंदर्य और काव्य के अखंड स्वरुप की खोज पर आधारित है, जिसमें कुंतक को एक सिद्धान्तकार के रूप में वक्रोक्ति तक सीमित न रखकर उनकी मूल चिंता यानी ‘किस प्रकार प्रबंध, नाटक, मुक्तक, खंडकाव्य सुंदर रचा जा सके’ पर भी विस्तार से विचार किया गया है। इसी क्रम में कुंतक के दूसरे रूप यानी व्यावहारिक समीक्षक के रूप में अध्ययन उल्लेखनीय है। जिसके अंतर्गत मेघदूत की समीक्षा, कुमारसंभवम की समीक्षा और अभिज्ञानशाकुंतलम की समीक्षा के साथ-साथ कालिदास जैसे समर्थ कवि के दोषों की ओर संकेत कुंतक की दृष्टि की सूक्ष्मता एवं आलोचना के सामर्थ्य को प्रकट करते हैं।

पुस्तक: अभिनव संस्कृत काव्यशास्त्र
‘नामवर के नोट्स’
प्रस्तुति- शैलेष कुमार
मधुप कुमार
नीलम सिंह
राजकमल प्रकाशन
मूल्य- ₹ 350

अगले अध्याय ‘आनन्दवर्धन : मौलिकता एवं सहृदयता का मणिकांचन योग’ में विशेष रूप से दो बिंदुओं – “पहला सौंदर्य क्या है? इसकी व्याख्या के लिए ‘प्रतीयमान’ शब्द का प्रयोग और दूसरा ‘ध्वनि का अंतर्भाव संभव नहीं’ अर्थात ध्वनि का अंतर्भाव अभिधा, लक्षणा, तातपर्य, अनुमान आदि में नहीं हो सकता।” पर विशेष दृष्टि है। आनंदवर्धन ने अपनी इस मौलिकता के बल पर सबका खंडन किया और कहा कि ‘अस्ति ध्वनिः’। इसप्रकार निष्कर्ष निकला कि व्यंजना एवं ध्वनि पर्याय नहीं है। यह समझना भ्रम है कि जिस काव्य में व्यंग्य है वहाँ ध्वनि भी होगी। और फिर इसी क्रम में उत्तम काव्य का प्रश्न, ध्वनि सिद्धान्त और गुणीभूत व्यंग्य की समीक्षा का प्रश्न सामने आता है, जिसकी मुकम्मल व्याख्या मिलती है। इस तरह ध्वनि संबंधी चर्चा इस बात पर समाप्त होती है कि ध्वनि के माध्यम से ही व्यंजना संभव है।

आख़िरी के अध्यायों में नाट्योत्पत्ति का प्रसंग और रस का आरंभिक स्वरुप, रस का स्वरुप : द्वंद्व और वस्तुनिष्ठता का प्रश्न और फिर रस चर्चा का दूसरा चरण नाट्यरस से काव्यरस तक का सफ़र है। जिसमें रस को ठेठ भारतीय अवधारणा बताते हुए इसकी उत्पत्ति की परंपरा बताई गई है। फिर अभिनय का जिक्र जो कि आर्येत्तर देन है, और जिसकी परंपरा भी पहले से थी। ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से संगीत एवं अथर्ववेद से रस आदि लेकर ही जो पाँचवा वेद बना। इस प्रकार नाट्योत्पत्ति के क्रम में भरतमुनि ने अनुकरण सिद्धान्त द्वारा नाटक की व्युत्पत्ति की चर्चा की है। भरतमुनि ने इसे अनुकरण नहीं ‘अनुकीर्तन’ कहा है, जिसे अभिनव गुप्त ने न्याय के अध्यवसाय से परिभाषित किया। इससे आगे के विकास में भरतमुनि का ‘नाट्यरस’ आनंदवर्धन के यहाँ ‘काव्यरस’ बना एवं इसके लिए ध्वनि की उत्पत्ति हुई।

‘अभिनव गुप्त : सृजनशक्ति में स्वतंत्रता की स्थापना’ शीर्षक वाले अध्याय में नामवर जी अभिनव गुप्त को काव्यशास्त्र के सुमेरु मानते हैं। वे कहते हैं कि सहृदयता की जो परंपरा कुंतक से प्रारंभ हुई थी उसे चर्मोत्कर्ष तक पहुँचाने का श्रेय इन्हें ही है। इस अध्याय में अभिनव गुप्त द्वारा भावानुकीर्तन की व्याख्या करके रस की अलौकिक बनाने एवं तमाम विवादों का अंत करके रस की सर्वोच्चता स्थापित करने का अभूतपूर्व योगदान शामिल है। इस प्रकार ‘नामवर के नोट्स’ पुस्तक में भरतमुनि से लेकर अभिनव गुप्त रस की विकास यात्रा के साथ हम संस्कृत काव्यशास्त्र का सरलता से अध्ययन कर पाते हैं, जो इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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    By: अभिषेक कुमार उपाध्याय

    एम.ए (हिंदी) फाइनल ईयर
    हिन्दू कॉलेज
    दिल्ली विश्वविद्यालय
    मो. +91-8285884446

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