कम शब्दों में बहुत कुछ कहने और समझाने का प्रयास करती शिव प्रकाश त्रिपाठीकी कविताएँ ……. 

‘शिव प्रकाश त्रिपाठी’ की कविताएँ … 

शिवप्रकाश त्रिपाठी

शिवप्रकाश त्रिपाठी

1-

जब भी मै लिखता हूँ भिंची हुई मुट्ठी,
भौहें तन जाती है उसकी
वो चाहता है मुझे लिखना चाहिए प्रेमगीत
कुदाले कंधे से नही उतरतें
ओसारे पड़ा है जुवा कब से
पर चलता रहा हमेशा पैना और अरई
वो नही जानता शायद
कि आ गया है समय अब हथौड़े से चोट करने का

2 –

एक बेतरतीब शहर हूँ
संभावनाएं जहाँ लगा रही हैं आवाजें
कुछ चीन्ही अनचीन्ही
इन सब के बीच खुद को बनाये रखने की जद्दोजहद में
लगा हूँ कि सीख लूँ
कुछ सलीका अब

3 –

कुछ लहरे इतनी तेज उठती है
कि बह जाता हूँ
दूर
बहुत दूर तक
देखता रहता हूँ खुद को बहते हुए और
डूब जाना चाहता हूँ हरबार
पर बार बार फेक दिया जाता हूँ बाहर
अब
दरक रहा हूँ मै…….

4-  

google

साभार google से

अचानक से

मरते ही व्यक्ति महान हो जाता है
इस महादेश में
लिखी जाती है फिर गाथाएं
गाये जातें है प्रशंसापत्र
चल पड़ता है चलन हमदर्दी और सहानुभूति का
श्रद्धांजलि का महादान हो जाता है शुरू
सुनो कवि
आज तुम महामानव हो
कल तक भले ही लोगों ने कहा होगा पागल तुम्हे
आज वो स्तुतिवाचन कर रहे हैं
सुनो कवि
जिंदगी ने भले ही तुम्हे कुछ नही दिया
पर मौत नही करती किसी के साथ नाइंसाफी
मरना ही सार्थक है
इस महादेश में ……..हे कवि

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