शो मस्ट गो ऑन, ‘सुखिया मर गया भूख से’

मैं पीछे क्यों रहूँ

अनीता चौधरी

शौकिया रंगमंच का विस्तार हो रहा है! पर वो अपने आप को संकटग्रस्त पाता है। वजह।?…उसे कम खर्च और सशक्त कथ्य के ताज़े नाटक चाहिए होते हैं नाटककार, रंगकर्मी जन पक्षता के  साथ , ‘’आम’’जनता से जुडना, उनकी समस्याओं जैसे अभाव, मंहगाई, बढती हुई जनसंख्या, प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार, प्रदूषण आदि… जन जीवन से जुडी समस्याओं से  रु-ब-रु कराना होता है | अव्यवसायिक रंगमंच की इन सारी परेशानियों को मैंने बहुत करीब से देखा और जाना है | क्योंकि मैं ऐसे कई संगठनों के बहुत से नाटक देख चुकी हूँ और खुद भी  जुडी रही हूँ | यह सब तब भी है जब नाटक के मंचन में प्रेक्षाग्रह से लेकर लाइट, साउंड, साज-सज्जा, वेश-भूषा तथा अन्य खर्चों के लिए कलाकारों व निर्देशकों को टिकटों पर जन सहयोग पर  ही निर्भर रहना पड़ता है | कई दफा जन सहयोग से खर्चे पूरे नहीं हो पाते हैं तो संगठनों से जुड़े लोगों को अपनी जेबों से इसकी भरपाई करनी पड़ती है | ऐसी स्थिति की वजह से नाटक के  निर्देशक साल में मुश्किल से एक या दो ही प्रस्तुति दे पाते हैं
हाल ही में 13 व् 14 जून को संकेत रंग टोली, कोवैलेंट ग्रुप, हमरंग डॉट कॉम और जन सिनेमा के साझा प्रयासों से आयोजित दो दिवसीय नाट्य मंचन से प्रत्यक्ष रूप से सीधे जुड़े रहने का  अवसर मिला | जहाँ सनीफ मदार द्वारा निर्देशित व राजेश कुमार द्वारा लिखित नाटक ‘सुखिया मर गया भूख से’ के सफल मंचन के मथुरा के किसान मजदूरों के अलावा सैकड़ों लोग साक्षी  बने |
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहाँ चारों तरफ लह्लाह्ती फसलों और पूरे देश में अन्न और दूध के भंडार भरे होने की बात कही जाती हो | सरकार द्वारा किसानों और गरीबों के लिए ढेर सारी  योजनायें हों जिनमें किसानों के लिए उचित समर्थन मूल्य…., पुराने बकाये का सीधा भुगतान….., खाद बीज की सब्सिडी….., कर्जों की मांफी…., बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा….., और गरीबों के  लिए मुफ्त इंदिरा आवास की सुविधा हो, नरेगा में रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा हो तो ऐसे में कोई भूख से कैसे मर सकता है | ऐसी ही सरकारी योजनाओं की पोल खोलता है यह नाटक |  क्योंकि सरकार तो यह मानकर बैठी हुई हैं की इतनी सारी योजनाओं के होने पर भी कोई भूख से कैसे मर सकता है
यह वर्तमान सरकारी व्यवस्था पर एक करारा व्यंग्य है कि किस तरह प्रशासन भूख से मरने के सच को अपनी जद्दो-जहद से झूठा साबित करने का रातों रात षड्यंत्र रच डालता है जिसमें मृतक  किसान सुखिया का बी पी एल कार्ड भी बन जाता है , बैंक में न केवल उसका खाता खुल जाता है बल्कि उसमे बीस हजार रुपये भी जमा करवाकर और चुपके से उसके घर में गेहूं आटा चावल  चना दाल तेल आदि रखवाकर तथा पत्रकारों को बुलाकर अखवारों में समाचार लगवा देते हैं कि सुखिया भूख से नहीं किसी बीमारी से मरा है |

आजादी से पहले और बाद की स्थितियों पर नजर डालें तो किसानों की स्थितियों में कोई ख़ास बदलाव नजर नहीं आता है | समय के साथ चीजों में परिवर्तन अवश्य आया है लेकिन महंगाई के  प्रतिशत में देखे तो स्थिति और भी भयानक नजर आती है | यह नाटक किसान के अन्दर बाहर के द्वन्द और उसकी दशा को भलीभांति चित्रित करता है | यह एक गरीब किसान के तिल-तिल  कर मरने की व्यथा को वर्णित करता है |एक व्यक्ति के कर्ज के बोझ तले, समाज में अपमान के भय से आत्महत्या करने की उसकी जो मजबूरी है वह स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है | क्योंकि भूख  से मरना भी आत्महत्या ही है | नाटक के द्वारा समाज के उस तंत्र को खोखला करना है जो किसानों के भूख से मरने और आत्म हत्या करने की स्थितियों को पैदा करने के लिए सीधे तौर पर  जिम्मेदार हैं | जो तंत्र बाहर से लोकलुभावन होने का ढोंग करता है वह अन्दर से कितना असम्वेदनशील, क्रूर और साजिशखोर है इन स्थितियों को समझने कि ललक ही थी जो दर्शकों में  बारिश के बावजूद भी धैर्य बनाए रख कर नाटक देखने को विवश कर रही थी | साथ ही यह नाटक कार राजेश कुमार व् निर्देशक सनिफ मदार की भी सफलता की वायस थी |
– मार्क्स का अत्यंत प्रसिद्ध कथन है कि अभी तक दार्शनिकों ने दुनिया की व्याख्या की थी, लेकिन सवाल दुनिया को बदलने का है। बदलने का अर्थ तकनीकी विकास (विचारगत/विकास गत  और आधुनिकीकरण के सन्दर्भ) से लिया जाये या सामाजिक क्रांति से? जहाँ तक सामाजिक (बदलाव) क्रांति का प्रश्न है इस दौर में या कहें परिवर्तन की प्रक्रिया के तहत अन्यान्य  वैचारिक/प्रायोगिक पहलों के साथ साहित्य व कलाओं की सार्थक भागीदारी भी गौरतलब है, इसे नकारा नहीं जा सकता, क्यूँकि कमोबेश सभी कलाओं में तत्कालीन समय से संवाद करने की  अद्भुत क्षमता देखी जा सकती है!
हालांकि किसी भी कला माध्यम फिर चाहे वह चित्रकारी हो साहित्य लेखन रंगमच या फिर सिनेमा ही क्यों न हो के सामाजिक रूप से मूलतः दो प्रयोजन सामने आते हैं जिसमे पहला महज़ मनोरंजन और दूसरा जनपक्षीय वैचारिक जागरूकता जहाँ रंगमंच और सिनेमा आम जन के वर्ग संघर्ष कि आवाज़ बनता है वहीँ लोक क्रांति कि संवेदना के लिए कलम और कूची हथियार बनते हैं |

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