मोहनजोदाडो और हड्डप्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवषेश मिले थे। उनमें स्नानागार की पुष्टी तो होती है किंतु मनुष्यों के निवृत्त होने की क्या व्यवस्था रही होगी, इसके बारे में जानकारी अस्पष्ट ही है।  हाँ, बाद के समय में बडे लोगों के बाथरूम से बडी-बडी तिजोरियों में बडे-बडे नोटों की बडी- बडी गड्डियाँ मिलने के दस्तावेज खुफिया एजेंसियों और न्यायालयों की फाइलों में बडी मात्रा में अवश्य सहेजे मिल जाएँगें। कहना सिर्फ इतना है कि टॉयलटों के बारे में प्राचीनकाल से सन्दर्भ मिलते हैं, इनके बारे में प्रत्येक मनुष्य में सहज जिज्ञासा सदैव से बनी रही है।

शौचालय चिंतन 

ब्रजेश कानूनगो

ब्रजेश कानूनगो

जब से उन्होने शौचालयों का महत्व बताया है तब से मुझे रोज टॉयलट मे बैठे-बैठे न जाने क्यों कुछ पुरानी बातें याद आने लगीं हैं। मस्त रहने के लिए व्यस्त रहना आवश्यक है। मैं भी मस्त रहना चाहता हूं, इसलिए इस जुगाड मे लगा रहता हूँ कि तन मन कहीं न कहीं हिलगा रहे, टॉयलट मे और क्या किया जा सकता था इसीलिए स्मृतियों के कुएँ मे गोता लगा लगा लेता हूँ।

मुझे याद आया दादा कोंडके की एक फिल्म का वह दृश्य जिसमे एक विदेशी सैलानी ऊंट पर बैठकर भारत के एक गाँव का भ्रमण करता है , जब वह एक भवन के सामने से गुजरता है तब जिज्ञासा से पूछता है-‘ क्या यह गाँव का टॉयलट है?’ तब दादा उसे निर्विकार बताते हैं-‘ नही यह शौचालय नही,हमारे गाँव का प्राथमिक स्कूल है।’ विदेशी सैलानी की आँखें आश्चर्य से चुन्धिया जाती हैं।

एक और कहानी याद आती है, जिसमें उस समय की एक परम्परा का बहुत रोचक वर्णन करते हुए कथाकार ने एक गाँव मे आई बारात और उसके सत्कार का चित्रण किया था। उस काल में जितने दिन बाराती गाँव में रहते, लगता कोई उत्सव चल रहा हो । ढोल और बैंड-बाजों के शोर से वातावरण लगातार कई दिनों तक संगीतमय बना रहता था। सुबह – सुबह बारातियों को शौच के लिए दिशा मैदान और स्नान के लिए नदी किनारे ढोल नगाडों के साथ ले जाया जाता था।  धरती की गोद मे शीतल पवन के हिलोरों और विभिन्न वनस्पतियों की सुगन्ध के बीच लोगों के नित्यकर्म निपटते थे। यह भी तत्कालीन टॉयलट का एक प्राकृतिक स्वरूप होता था।

मोहनजोदाडो और हड्डप्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवषेश मिले थे। उनमें स्नानागार की पुष्टी तो होती है किंतु मनुष्यों के निवृत्त होने की क्या व्यवस्था रही होगी, इसके बारे में जानकारी अस्पष्ट ही है।  हाँ, बाद के समय में बडे लोगों के बाथरूम से बडी-बडी तिजोरियों में बडे-बडे नोटों की बडी- बडी गड्डियाँ मिलने के दस्तावेज खुफिया एजेंसियों और न्यायालयों की फाइलों में बडी मात्रा में अवश्य सहेजे मिल जाएँगें। कहना सिर्फ इतना है कि टॉयलटों के बारे में प्राचीनकाल से सन्दर्भ मिलते हैं, इनके बारे में प्रत्येक मनुष्य में सहज जिज्ञासा सदैव से बनी रही है।

हम अधिक से अधिक जानना चाहते हैं टॉयलटों के बारे में। हमारे ही नही हम दूसरों के टॉयलट का रहस्य जानने के लिए भी लालायित बने रहते हैं। उसका टॉयलट मेरे टॉयलट से बेहतर क्यों?  आपको याद होगा जानने-समझने के हमारे इसी अधिकार के तहत किसी ने पूछ लिया था योजना आयोग से कि दफ्तर के टॉयलटों की मरम्मत पर कितना खर्च आया। मात्र पैंतीस लाख रुपए ही खर्च की जानकारी से सबकी आँझें चुन्धिया गईं थी और बत्तीस रुपयों में जिन्दगी के मजे लेनेवाला आम भारतीय पर्यटक दिल्ली जाकर उस दिव्य टॉयलट के दर्शन का लाभ लेने का सपना देखने लगा था।

तब ही पता चला कि रेलपटरियों के किनारे तथा खेत की बागड के अलावा भी टॉयलटों की बहुमूल्य खूबसूरत दुनिया इस संसार में मौजूद तो होती ही है।  मुझे तो लगता है कि  टॉयलेट वह स्थान भी हो सकता है जहाँ आप अप्ने विचारों का शोधन करते हुए असीम  शांति को महसूस भी कर सकते हैं। देश दुनिया के बारे में यहाँ सार्थक चिंतन भी सम्भव है। लिहाजा मैं उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ, देवालयों से पहले शौचालयों का निर्माण बेहद जरूरी है।

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