नाइजीरिया में फैशन डिजाईनर के रूप कार्यरतश्वेता मिश्रकी कवितायें निच्छलता के साथ मुक्त रूप से स्त्री मन की उस अभिव्यंजना के तरह नज़र आती हैं जो केवल लेखकीय अभिव्यक्ति है बल्कि कहा जाय कि वर्तमान सामाजिक मानसिकता को स्वतंत्र रूप से स्त्री दृष्टि से देखने या रचनात्मक पड़ताल करने का प्रयास हैं …. | हमरंग पर आपकी रचनाओं के साथ स्वागत है ….| संपादक 

नारी 

श्वेता मिश्र

श्वेता मिश्र

रिश्तों के घने साए में पली

बेटी थी बहु बन किसी आंगन में जली
धागों में पिरोया था रिश्ता
बहन थी प्रिया बन हर गली गई छली
नए रिश्तों के वृक्ष संसार में
माँ थी पत्नी का अस्तित्व खाक में मिली
पवित्रता का सूत्र था तुम में हम में
मित्र थी कृष्ण बन साथ थे लेकिन
चौसर पर बिसात में मैं ही गयी चली
नारी थी तुमने ढाल बन कर कमज़ोर कर दिया हमें
शक्ति बन तुम्हारी ……… तुम्हारे ही पीछे चली
हाथ बढ़ा मांगती है नारी साथ तुम्हारा
रिश्तों की अब तुम भी पहचान बनो
मेरे देश की शान बनो …….
हर माँ का अभिमान बनो ………
हर बहन की नाज़ बनो …….
हर सुन्दर रिश्ते की तुम भी पहचान बनो
खुले आसमान में हमें भी जीने दो
…….हर आँगन में हमें मुस्कुराने दो ……
..हर रिश्ते में अब हमें भी खिलखिलाने दो ..

पत्ता 

के 0 रवीन्द्र

के 0 रवीन्द्र

एक पत्ता ही तो हूँ मैं
जाने किस शाख से
टूट के गिरी हुई
थोड़ी मुरझाई
थोड़ी झुलसी हुई
सबा ले जाती
कभी आँधियों के
झोंको संग उड़ी
कभी सावन ने भिगोया
कभी तेज़ धूप ने तपाया
एक रोज़ तेज़ झोंकें ने
पेड़ के उस शाख तक पहुँचाया
एक लम्हे को छू लिया उसे
फिर उसे गले लगाया
कम्बखत……………
फिर हवा जाने किधर ले उड़ी
एक पत्ता ही तो हूँ मैं !!!

ख़ामोशी

शईद मिर्ज़ा

ए ख़ामोशी
थाम ले मुझे
हवा का रुख़
फिर तेज़ हो रहा है
खुद को खो दूँ न मैं
आहटों में ये कौन
अब आहट दे रहा है
दफ़न कर आये थे
खुद को कब्र में
ये कौन आकर
मेरे मज़ार के
फूल चुरा रहा है

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