स्त्री को अपनी परंपरा, अपना संघर्ष और अपनी भागीदारी का इतिहास खुद लिखना होगा । स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गों, वर्णों और जातियों के बीच नए-नए समीकरणों के साथ उसे अपने लिए लड़ना होगा । पूंजीवादी पितृसत्ता ऊपर से चाहे जितनी उदार और सरल लगे, पर भीतर-भीतर जटिल है। दोष उसकी संरचना में ही है । अगर ऐसा नहीं होता तो आजादी के आंदोलन से लेकर अभी तक के मुस्लिम स्त्री संघर्ष को इतिहास में कहीं तो जगह मिली होती । “जब हमें मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे को उठाने हों तो पहले इनकी स्थिति को जानना जरूरी हो जाता है । यूं भी यदि किसी समाज या धर्म के बारे में जानना है तो सबसे पहले वहाँ की स्त्रियों को देखना चाहिए ।”[1] इधर समाज का एक हिस्सा अपने आपको को उत्तरआधुनिक होने का दंभ भरता है वहीं एक ऐसा तबका है जो अभी तक ठीक से आधुनिक भी नहीं हो पाया है । जिसे हाशिये पर धकेल दिया गया है । हालांकि इतिहास में जाकर देखें तो महिलाएं हमेशा से हाशिये पर रही हैं । धार्मिक शोषण उनका बहुत पहले से होता रहा है, और आज भी जारी है । मसलन, मुस्लिम समाज में तलाक का जो वीभत्स रूप 100 वर्ष पहले था आज भी वैसा ही दिखाई देता है  । क्या ये किसी आश्चर्य से कम है कि तीन बार तलाक बोल दो और हो गया तलाक । 

सामाजिक राजनैतिक रूप से अक्सर ही पेश आते मुस्लिम महिलाओं के हक और अधिकार के मुद्दों पर साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे – ‘मंजू आर्या’ की किताब के संदर्भ में समीक्षात्मक चर्चा कर रहे हैं ‘शोध छात्र ‘अनीश कुमार’ …..

समकालीन साहित्य में मुस्लिम महिला साहित्यकार 

(संदर्भित किताब- साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे – मंजू आर्या)

अनीश कुमार

समाज की प्राथमिक इकाई, सिर सरकते गूंघट और रूढ़ियों के बीच परिवार की मुख्य धुरी, महिला को सशक्त बनाकर ही जागरूक समाज और प्रगतिशील राज्य की संकल्पना को साकार किया जा सकता है । यह बड़ी सीधी और सपाट बात है किन्तु अपने आप में संपूर्णता लिए हुए है । बिना महिलाओं को मुख्य धारा से जोड़े दुनिया के मानचित्र में किसी भी देश को एक उन्नत राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने की कल्पना दूर की कौड़ी साबित होगी  ।

         21वीं में हिंदी आलोचना अस्मिता के नए सवालों से टकराकर साहित्यिक विमर्श के स्थान पर सामाजिक विमर्श की भूमिका में सामने आयी । अब तक हिंदी आलोचना पर यथास्थिवादियों का ही कब्जा था । हिंदी में प्रगतिशील आलोचना 20वीं शताब्दी से ही मौजूद थी । सभी आलोचक बड़ी सिद्दत के साथ कहते हैं कि हमारा साहित्य या आलोचना तो शोषितों का आवाज बड़ी प्रमुखता उठाया है । हम महिलाओं व शोषण के पक्षधर हैं । हम सब एकसमान भाव से काम करते हैं । लेकिन सवाल यह है कि हमारे पास इतना बड़ा प्रगतिशील साहित्य मौजूद होने के कारण भी समस्याएँ जस की तस बनी हुई है ।

         स्त्री को अपनी परंपरा, अपना संघर्ष और अपनी भागीदारी का इतिहास खुद लिखना होगा । स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गों, वर्णों और जातियों के बीच नए-नए समीकरणों के साथ उसे अपने लिए लड़ना होगा । पूंजीवादी पितृसत्ता ऊपर से चाहे जितनी उदार और सरल लगे, पर भीतर-भीतर जटिल है। दोष उसकी संरचना में ही है । अगर ऐसा नहीं होता तो आजादी के आंदोलन से लेकर अभी तक के मुस्लिम स्त्री संघर्ष को इतिहास में कहीं तो जगह मिली होती । साहित्य के लेखन में हमेशा से एकपक्षीय होने का आरोप लगता आया है  । लेखिका प्रस्तावना में लिखती हैं कि “जब हमें मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे को उठाने हों तो पहले इनकी स्थिति को जानना जरूरी हो जाता है  । यदि किसी समाज या धर्म के बारे में जानना है तो सबसे पहले वहाँ की स्त्रियों को देखना चाहिए ।”[1] आजादी के पूर्व महिला लेखन भावना-प्रधान था । उसमें घुटन, पीडा से बाहर निकलने की छटपटाहट भी थी । उनका लेखन एक ओर जहां उनके त्रासद, पीड़ित जीवन का यथार्थ है, वहीं उससे आगे के जीवन के विविध रूपों और सत्यों को भी अभिव्यक्त करता है । लेकिन आजादी के लिए  किये गये राष्ट्रीय आंदोलन के साथ नारी बाहर आई ।

         आज के समय में विमर्शों का दौर चल पड़ा है । कुछ आलोचकों को विमर्शों का आगमन अच्छा लगता है कुछ को नहीं । लेकिन एक बात सत्य है कि इनके आगमन से साहित्य के माध्यम से पीछे छूट गए या जानबूझ कर छोड़ दिये जाने पक्षों पर बहस व लेखन होने लगा । साहित्य लेखन के इतिहास पर पहले ही पित्तृसत्तात्मक होने का आरोप लग चुका है । अकारण नहीं है कि द्विवेदी युग हो या प्रगतिवाद या इसके आगे के काल हों सभी जगह पुरुष रचनाकारों के ही साहित्य देखने को मिलते हैं । कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है । यदि इस परिभाषा पर गौर करें तो सवाल ये उठता है कि आखिर दर्पण में उसके सामने कि सारी चीजे दिखनी चाहिए फिर कुछ मुद्दे व समस्याएँ कैसे नहीं सामने आई ।

         विश्व स्तर पर देखे तो स्त्री मुक्ति आंदोलन भारत के बाहर कई वर्षों पहले शुरू हो गया था । लेकिन आश्चर्य कि बात यह है कि स्त्री मुक्ति आंदोलन के लगभग 200 वर्षों का सफर तय करने के बाद भी इसके सामने अनेक चुनौतियाँ मौजूद हैं । लेखिका की केंद्रीयता साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के लेखन व उसके योगदान तथा इस बहुरंगी आलोचना जगत में उसे कितना महत्व दिया गया है, इसे दिखाना है । आज मुस्लिम लेखिकाएं समाज की यथार्थता को पूरे सच्चाई के साथ लिख रही हैं  ।

लेखिका लिखती हैं कि “मुस्लिम महिलाएं आशिक्षित होने के कारण पुरुषों के जुल्मों को सहन करती हैं, अगर वह जागरूक होती या पित्तृसत्ता का विरोध करती तो आंदोलनों की जरूरत ही ना पड़ती । आज पूरी दुनिया में मुस्लिम स्त्रियों का रुझान स्त्री मुक्ति आंदोलन की तरफ बढ़ रहा है । वे धीरे-धीरे आंदोलन कि मुख्य धारा से जुड़कर अपने अधिकारों को प्राप्त करने एवं अपनी समस्याओं को स्वयं सुलझाने का प्रयास कर रही है । लेकिन अभी भी मुस्लिम तबके की महिलाओं को पर्दा प्रथा, शिक्षा का अभाव, परिवार नियोजन, बहुपत्नी विवाह, तलाक, संपत्ति में अधिकार न मिलना, बाल विवाह, आर्थिक स्थिति, राजनैतिक, सामाजिक इस तरह से कई मुद्दे है जिससे महिलाएं बेबस, सहमी, डरी-डरी सी अपनी बातों को समाज या अपने परिवार में उजागर नहीं कर पा रही हैं ।”[2]

         आज धर्म के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का जमकर शोषण हो रहा है । धर्म की सही तरीके से व्याख्या न करने तथा उनके नाम पर शोषण जारी है । इस्लाम धर्म को दुनिया का सबसे उदार धर्म माना जाता है  । आज अगर देखा जाये तो हिन्दू महिलाओं से ज्यादा मुस्लिम महिलाओं का शोषण हो रहा है । “यद्दपि मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम के द्वारा अनेक अधिकार मिले हैं, इसके बावजूद धर्म के नाम पर पुरुषों का उन पर आधिपत्य होता ही है । भारतीय मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे काफी विवादपूर्ण हैं । आज आम मुसलमान औरत शिक्षा से, अपने भारतीय संविधान से, अपने पर्सनल ला से, एक नागरिक के अधिकार से पूरी तरह वंचित है ।”[3]

         समाज के हिस्सा अपने आपको को उत्तरआधुनिक होने का दंभ भरता है वहीं एक ऐसा तबका है जो अभी तक ठीक से आधुनिक भी नहीं हो पाया है । जिसे हाशिये पर धकेल दिया गया है । इतिहास में जाकर देखें तो महिलाएं हमेशा से हाशिये पर रही हैं । धार्मिक शोषण उनका बहुत पहले से होता रहा है, और आज भी जारी है । मुस्लिम समाज में तलाक का जो वीभत्स रूप 50 वर्ष पहले था आज भी वैसा ही दिखाई देता है  । क्या ये किसी आश्चर्य से कम है कि तीन बार तलाक बोल दो और हो गया तलाक । आज मुस्लिम महिलाओं कि जो मौजूदा स्थिति है उसका जिम्मेदार धर्म ही है । इस्लाम की सही व्याख्या न होने के कारण वे तमाम अधिकार महिलाओं को नहीं मिल पा रहे हैं जो उन्हें मिलने चाहिए । मंजू लिखती हैं कि कुरान की सही व्याख्या ना होने के कारण महिलायेँ इन अधिकारों से वंचित हैं । उन्हें उनके अधिकार ना दिये जाते हैं, ना बताए जाते हैं । इस्लाम ने उन्हें जो मानवाधिकार दिये हैं वो इस प्रकार हैं –

  1. इस्लामी रियासत में प्रत्येक महिला की जानमाल और प्रतिष्ठा की हिफाजत की ज़िम्मेदारी है ।
  2. इस्लामी रियासत में महिला निजी संपत्ति रख सकती है और रियासत उसके इस अधिकार की जिम्मेदार है ।
  3. इस्लामी रियासत में किसी पेशे, परिवार और दौलत के आधार पर किसी महिला की प्रतिष्ठा को ठेस नहीं पहुंचा सकते ।
  4. इस्लामी रियासत महिलाओं की शिक्षा की जिम्मेदार है ।
  5. इस्लामी बैतुलमाल में महिला का अधिकार रखा गया है ।
  6. हर जरूरतमन्द महिला की सारी आवश्यकताओं को पूरा करने की ज़िम्मेदारी इस्लामी रियासतों की है ।
  7. शरीयत ने महिलाओं को जो अधिकार दिये हैं, इस्लामी रियासतें इस बात की जिम्मेदार हैं कि महिलाएं इन अधिकारों का लाभ उठाएँ ।
  8. इस्लामी रियासत में महिला को बोलने और लिखने की पूरी स्वतन्त्रता है । वह अपनी अंजुमन बना सकती है । शासन की आलोचना कर सकती है । हर मामले में अपने विचार प्रकट कर सकती है ।”[4]

साभार google से

आज भी हम देखे तो पाते हैं कि इस्लाम में ऐसे बहुत से प्रथाएँ व कानून है जो महिलाओं आगे बढ्ने से रोकते हैं । तलाक प्रथा, मेहर की प्रथा, हलाला निकाह, हदूद कानून, बुर्का प्रथा आदि इनमें प्रमुख हैं । इन सभी कारण मुस्लिम महिलाओं में शिक्षा व्यवस्था का ढीला रवैया है । आज समाज कि कुछ महिलाएं पढ़-लिखकर आगे आई हैं और इन सभी अंध परम्पराओं को नकारती हुई आगे बढ़ रही हैं । मुस्लिम समाज कि इस तरह की समस्याएँ बहुत पहले से ही हैं । पहले ये समस्याएँ कोई लिखता नहीं था । आज मुस्लिम महिलाएं इन सभी को नकार कर लिख रही है । जिससे दुनियाँ के सामने ये मुद्दे प्रमुख रूप से आने लगे ।

         साहित्य में भी पित्तृसत्ता इस कदर हावी था और आज भी है की महिला रचनाकारों को कभी मौका ही नहीं दिया । “मुस्लिम लेखिकाओं ने साहित्य अंगीकार भले ही किया किन्तु साहित्य ने उनकी कभी कद्र ना की । इस्मत चुगताई ने ‘लिहाफ’ जैसे कहानी लिखकर कट्टरपंथियों से दुश्मनी ले ली । हालांकि बाद में लोगों ने इसी लिहाफ को लोगों ने गरम दुशाले की तरह आराम से ओढ़ लिया । तसलीमा नसरीन ने कडवे यथार्थ बयान किए तो उन्हें देश निकाला हो गया । आशा आपराद ने तमाम त्रासदियों के बावजूद एक आत्मकथा लिखने की जुर्रत की ।”[5] मुस्लिम लेखिकाओं ने धारा के विपरीत दिशा में लेखन कार्य किया है । उनकी रचनाओं में तात्कालिक महिलाओं की दुर्दशा व उनकी समस्याओं को देखा जा सकता है । मंजु के अनुसार ‘इस्लाहुन्निसां’ किसी महिला द्वारा लिखा गया पहला उपन्यास है, इसकी लेखिका रसिदुन्निसां थीं । लेकिन विडम्बना यह है कि अपने मौत के 20 साल बाद उन्हे पहली उर्दू महिला उपन्यासकर के रूप में बमुश्किल पहचान मिलता है । इसी प्रकार रुकैया, तसलीमा नसरीन, जाहिदा हिना, तहमीना दुर्रानी, इस्मत चुगताई, रशीद जहाँ, रशीदा आपा, नासिरा शर्मा, मेहरुन्निशा परवेज़, आशा आपराद, सारा शगुफ्ता, हुस्न तबस्सुम ‘निंहां’ आदि हैं, जो अपनी रचनाओं के माध्यम से मुस्लिम समाज की महिलाओं की दशा व दिशा को एक नई दिशा प्रदान की । लेकिन साहित्य की इस मठाधीशी दुनिया में उन्हें पहचाना तक नहीं जाता । ‘रशीद जहां’ के बारे लेखिका लिखती हैं कि “1936 में प्रेमचंद की अध्यक्षता में प्रगतिशील लेखक संघ की पहली राष्ट्रीय कान्फ्रेंस लखनऊ में सम्पन्न हुई । लखनऊ की कान्फ्रेंस की बुनियाद में रशीद जहां की अहम भूमिका रही । 1943 में बंबई में भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) की पहली कान्फ्रेंस हुई जिसमें ‘रशीद जहां’ की विशेष भूमिका थी ।”[6]

         इसी कड़ी की महत्वपूर्ण रचनाकार हुस्न तबस्सुम ‘निंहां’ हैं । युवा पीढ़ी की मुस्लिम रचनाकारों में कम समय में इन्होने एक अमित पहचान बना ली है । लेखिका मंजु की कलाम इनके रचना व उनकी व्यक्तित्व पर भी चली है । वह एक ऐसे दौर में लेखन की शुरुआत करती हैं जिस समय इस्लाम में महिलाओं घर से बाहर निकालने की आजादी नहीं थी । पढ़ने व लिखने की सोच तो एक दिवा स्वप्न जैसे था । हुस्न तबस्सुम का लेखन युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनकर उभरा है । आज का समय और इनका लेखन साथ-साथ चलता है । इनका लेखन नारी अस्मिता व उसकी खोज की पहचान को सामने लाता है । आज की मुस्लिम लेखिकाओं ने अपनी रचना द्वारा मुस्लिम स्त्री की अस्मिता को एक विशिष्ट पहचान दी है, उन्होंने साहित्य में सदियों की चुप्पी को तोडा है । मुस्लिम स्त्री की नयी सोच, नयी जीवन-दृष्टि और नए भाव-बोध उनके लेखन की पहचान हैं । उनके लेखन में स्वातंत्रचेतना सम्पन्न नारी ने पहचान बनाई है । वह पुरानी धार्मिक रूढ़ियों, रीति- रिवाजों को मानने के लिए विवश नहीं है, उसने नैतिकता, पुरानी मान्यताओं को तोड़ा है और अपने अनुकूल नए मानदण्डों का निर्माण स्वयं उसी ने किया है । आज अपने निर्णय वह स्वयं लेती है ।

         समकालीन मुस्लिम महिला लेखन धर्म के भी खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दी है । सदियों से बने बनाए ढर्रे पर चलने के बजाय वह आज अपनी खुद एक सशक्त रास्ता बना रही है । लेखिका मंजु आर्या हुस्न तबस्सुम निंहां की लगभग कई कहानियों व कविताओं का जिक्र किया है । निंहां के तीन कहानी संग्रह – “नीले पंखों वाली लड़कियां’, ‘नर्गिस फिर नहीं आएगी’, ‘गुरमोहर गर तुम्हारा नाम होता’ तथा दो कविता संग्रह – ‘मौसम भर याद’, चाँद ब चाँद । साहित्य के क्षेत्र में तबस्सुम की रचनाएँ एक क्रांति की तरह आगे बढ़ती हैं ।

         ‘साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे’ पुस्तक के माध्यम से लेखिका मंजु आर्या समकालीन मुस्लिम लेखिकाओं की रचनाधर्मिता व साहित्य में उनके योगदान को दिखाती हैं । विश्व साहित्य हो या भारतीय साहित्य में हिन्दी साहित्य हो, सभी जगह आज अभी मुस्लिम महिला लेखिकाओं का स्थान नगण्य है । इसके बावजूद कुछ लेखिकायें लड़ते-भिड़ते अपनी थोड़ी पहचान बनाने में सफल हुई हैं । इन्हीं में हुस्न तबस्सुम का नाम महत्वपूर्ण है । मंजु ने इस किताब के माध्यम से उनकी व्यक्तित्व व रचनाधर्मिता को मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास किया है ।

         हुस्न तबस्सुम के बारे में लेखिका लिखती हैं कि “हुस्न तबस्सुम निंहां ने अपने लेखन में महिलाओं को सदैव केंद्र में रखा है और मुस्लिम स्त्री को लेकर मुद्दे उठाए हैं । चाहे वो तलाक का मुद्दा हो, पर्दा हो, शिक्षा हो या अन्य । निंहां की कलाम मुस्लिम महिला का हर मर्म बहुत गहराई से पकड़कर आगे बढ़ती है । एक ओर अगर मुस्लिम समाज अपनी कट्टरता और दोखज-जन्नत की परिकल्पना में जीता है तो दूसरी तरफ निंहां परलोक (आखिरत) विचार को ही नकार देती है ।”[7]

         पुरातन नारी विद्रोह की गाथा, आधुनिक नारी मुक्ति तक आते आते और प्रबल हो गई है । केवल सामाजिक जीवन में ही स्वतंत्रता नही, आज, स्त्री को राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन में भी स्वतंत्रता पूरे आत्म सम्मान के साथ चाहिए । नारी विद्रोह ने समाज को और पुरूषवादी सोच को ये बता दिया है कि वो अधिकार छीनना भी जानती है । उसने बता दिया है कि नारी भावना को कोरी भावुकता समझ कर उसकी मति की अब उपेक्षा नहीं की जा सकती । आधुनिक नारी पुरूषवादी सोच के प्रति विद्रोह करती है । स्वतंत्र, व्यक्तित्व को स्थापित करने के लिए, वह न केवल जीवन में पति चयन, मित्र चयन में स्वतंत्रता चाहती वरन् प्राचीन संकीर्ण जीवन मूल्यों से मुक्ति भी चाहती है ।

          हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक प्रो. चौथीराम यादव भी इस विषय चिंता प्रकट करते हुए लिखते हैं कि – “खंडित विमर्श मानकर दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और पसमांदा विमर्श की उपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि ये आधे अधूरे नवजागरण को पूर्णता प्रदान करने वाले विमर्श हैं तथा दलित मुक्ति, स्त्री मुक्ति और आदिवासी मुक्ति के सवाल ही मानव मुक्ति के प्रवेश द्वार हैं ।”[8]

          वास्तव में मुस्लिम महिला लेखन हिन्दी के पसमांदा विमर्श का एक अंग है जो हिन्दी के दलित विमर्श का ही एक काउंटर पार्ट है । मुस्लिम महिलायेँ अपनी लेखनी से एक सशक्त रास्ता बनाती हुई चल रही हैं । इस प्रकार मंजु आर्या द्वारा लिखी गई प्रस्तुत पुस्तक 21 वीं सदी की एक महत्वपूर्ण मुद्दे को लेकर आगे आती हैं । आज इन सभी विषयों पर बहस व लेखनी जरूरी हो गया है । इसलिए वे सीधे तौर पर लिखती हैं “मुस्लिम महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें शिक्षा से वंचित रखा जाता है, दूसरे उन्हें बुर्के में बंद हो के रहना होता है । जबकि ये कहीं नहीं कहा गया है कि बुर्का पहनना महिलाओं के लिए अनिवार्य है । फिर भी इस प्रथा को महिलाओं पर जबरन थोपा गया है ।”[9]

          मुस्लिम महिलाएं स्त्री मुक्ति आंदोलनों से जुड़कर अपनी व अपने समाज की स्थिति से दुनियाँ को रूबरू करवा रहीं हैं । जिससे आज के समय में उन पर चर्चा संभव हो पाया है ।

संदर्भ ग्रंथ :-

  1. आर्या, मंजू. (2016). साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे. भोपाल : (साखी प्रकाशन).
  2. यादव, चौथीराम. (2014). उत्तरशती के विमर्श और हाशिये का समाज. नई दिल्ली : (अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा) लिमिटेड).

[1] आर्या, मंजू, साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, साखी प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ संख्या 8

[2] आर्या, मंजू, साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, साखी प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ संख्या 8-9

[3] आर्या, मंजू, साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, साखी प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ संख्या 9

[4] आर्या, मंजू, साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, साखी प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ संख्या 15

[5] आर्या, मंजू, साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, साखी प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ संख्या 20

[6] आर्या, मंजू, साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, साखी प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ संख्या 23

[7] आर्या, मंजू, साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, साखी प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ संख्या 50

[8]यादव, चौथीराम. (2014). उत्तरशती के विमर्श और हाशिये का समाज. नई दिल्ली : (अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा) लिमिटेड). पृष्ठ संख्या १३

[9] आर्या, मंजू, साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, साखी प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ संख्या 8

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