साहित्य भी समलैंगिक संबंधो से अछूता नहीं। सर्वप्रथम इस्मत चुगतई ने 1941 में अपनी कहानी ‘लिहाफ’ में समलैंगिकता को रूपांतरित किया था जिसके कारण चुगतई को समाज तथा कई संस्थाओ की आलोचना का शिकार होना पड़ा था। इसके तदुपरांत आशा साहनी ने अपने उपन्यास 1947 ‘एकाकिनी’ में भी संमलैगिक संबंधों को उद्घाटित किया था।…..

समलैंगिकः ‘मैं भी हूँ’ 

अमिता महरौलिया शोधार्थी, हिन्दी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय

अमिता महरौलिया
शोधार्थी, हिन्दी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय

लव इज ब्यूटीफुल वर्ड, हाल ही में प्रदर्शित फिल्म अलीगढ़ का बेहद उम्दा डायलाग है जिसमें मनोज वाजपेयी ने प्रेम का यौनिकता से मुक्त रूप में परिभाषित किया है। देखा जाए तो हम जिस समाज में रहते है वहाँ केवल एक ही प्रकार की यौनिकता को मान्यता दी गई है- विवाहित स्त्री-पुरूष को। समाज में विवाहित दम्पत्ति के संबंधो को ही ‘प्राकृतिक’ और सामान्य माना गया है। इसमें भी पुरूषों की यौनिकता को निर्णायक एवं प्रधान माना गया है। औरतों की यौनिकता तो महज वंश चलाने का एक ज़रिया मात्र है। परन्तु समाज में यौन इच्छा रखने वाला एक अल्पसंख्यक समुदाय ऐसा भी है जिसे न चाहते हुए भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता जी हाँ आपने सही पहचाना- ‘‘समलैंगिक वर्ग। इस वर्ग के हितों के लिए न केवल ‘समलैंगिक’ अपितु ‘सामान्य जन’ भी संवैधानिक मानव अधिकारों की माँग देश के अलग-अलग कोनो से निरंतर उठाते रहते है। इस प्रकार अपने अघिकारों की माँग उठाये जाने से ‘समलैंगिक’, समाज तथा न्यायालय के समक्ष अपने अस्तित्व (मैं भी हूँ) की उपस्थिति को भी दर्ज कराते है।
यह जानकर आश्चर्य भी होता है कि भारतीय समाज में भी समलैंगिक हकों के लिए एक खेमा आज भी एकजुट हो जाता है। विगत कुछ माह पूर्व लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा ‘मैं हिजड़ा… में लक्ष्मी! ने समलैंगिकता के कई पुराने पूर्वाग्रह को तोडा है। साथ ही ज्तंदेहमदकमत तथा समलैंगिकता के नवीन पहलुओ को भी उजागर करती है। त्रिपाठी ने अपने और क्रिस प्रकरण के द्वारा यह भी बताया कि ‘प्यार’ सेक्सुअयिटी से बहुत ऊपर की चीज है।
तकरीबन डेढ़ सौ साल पहले अंग्रेजी शासकों ने धारा 377 का विधान कर समलैंगिक संबंधो को अप्राकृतिक एवम् दण्डनीय माना था। भारतीय समाज में भी इसे अप्राकृतिक एवम् अपराध माना जाता है। परन्तु सात वर्ष पूर्व 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिक संबंध को जायज ठहराया गया था। इस कानून के ठीक विपरीत एक बार फिर से सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक संबंधो को अपराध की श्रेणी में धकेल दिया। हालाँकि कोर्ट ने एक तरफ इस संबंध में कानून बनाने की बात संसद और सरकार के ऊपर छोड़ अपना पल्ला झाड़ लिया है; दूसरा सर्वोच्य न्यायालय के आय फैसले पर समाज दो खेमा (पक्ष/विपक्ष) में बंटता हुआ दिखाई दे रहा है।
यह भी सत्य है कि जब भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 377 के संदर्भ में कोई दलील दी जाती है। तो समाज में इस विषय पर चर्चा होना स्वाभाविक है। इस विषय पर कल शाम को मेरी गुरू जी से बहस हो गई। बहस की जगह विचार-विमर्श कहा जाए तो ज्यादा सही रहेगा। अब चूंकि में आधुनिक परिवेश में पली-बढी आधुनिक नारी हूँ तो मैंने अनुच्छेद 14,15,21 का हवाला देते हुए ‘जियो और जिने दो’ कहते हुए। समलैंगिक संबंधो का समर्थन किया। परंतु इस विषय पर अनके विचार अलग थे। उन्होंने कहा कि स्त्री-पुरूष का समागम एक नई पौधे के सृजन हेतु होता है। ऐसे संबंधो से सिवाए अनैतिकता और अपराध का ही सृजन होगा।
क्या वाकई में ‘समलैंगिकता’ समाज के विघटन का कारण बन सकती है? क्या ऐसे संबंध अप्राकृतिक है? इन प्रश्नों के उत्तर के संबंध में ‘द दबल फ्लेम’ नामक पुस्तक का जिक्र करना सही होगा जिसमें लेखक ओक्टाॅवियो पाॅप ने संसार के समस्त देशों की संस्कृतियों के मानवीय प्रेम संबंधो की सुंदर व्याख्या की गई है और यदि मनुष्य के यौन आनन्द के तरीकों का विश्लेषण करने लगे तो बहुत कुछ उपराध की श्रेणी में आ जाएगा।

विचारनीय प्रश्न यह भी है कि क्या समलैंगिकता को अवैध एवम् गैरकानूनी घोषित करने मात्र से ऐसे सम्बन्ध पनपना बन्द हो जाएँगे? या तब भी समलैंगिकता का अस्तित्व रहेगा? समाज का एक तंत्र जहाँ समलैंगिकता को सामाजिक संचरना के विरूद्ध मानता है। वहीं दूसरा तंत्र अनुच्छेद 21 के तहत निजी स्वतंत्रता की दुहाई देता है। विश्व के 11 देशों ने समलैंगिक संबंध को मान्यता दी है। दूर जाने की आवश्यकता नहीं दक्षिण एशिया में नेपाल जैसे परंपरावादी देश ने 2007 में ही समलैंगिकता की वैधता को स्वीकारा है।
साहित्य भी समलैंगिक संबंधो से अछूता नहीं। सर्वप्रथम इस्मत चुगतई ने 1941 में अपनी कहानी ‘लिहाफ’ में समलैंगिकता को रूपांतरित किया था जिसके कारण चुगतई को समाज तथा कई संस्थाओ की आलोचना का शिकार होना पड़ा था। इसके तदुपरांत आशा साहनी ने अपने उपन्यास 1947 ‘एकाकिनी’ में भी संमलैगिक संबंधों को उद्घाटित किया था।
अतः स्वतंत्रता पूर्व तथा स्वातंन्न्योपरांत कई साहित्यकारों ने समलैंगिक संबंधो को स्वीकारते हुए बेझिझक लिखा। रमेश बख्श का ‘मुर्गीखाना’, राजकमल चैधरी का ‘मछली मरी हुई’, गीता श्री का ‘तिरोहित’ (2001) प्रमुख है। यौन स्वच्छंदता का समकालीन साहित्य में भी बोलबाला रहा। आज उत्तर-आधुनिकता के इस युग में लोग अपने समलैगिक संबंधो को खुलकर स्वीकार कर रहे है।
उदाहरणः राजपीपला धराना (गुजरात) के मानवेन्द्र सिंह का 2001 में गुजराती पत्रकार को दिए इंटरव्यू में खुद को ‘गे’ घोषित करना एक साहसी कदम माना जा सकता है। अन्ततः राजपीपला और जनता ने अनकी भावनाओं को समझा तथा उनके काम को देखकर प्रजा और बाद में परिजनों ने भी उन्हें ‘गे’ के रूप में स्वीकार कर लिया। यूं तो कई नामी हस्तियो के भी समलैंगिक संबंध रहे है। जैसे सुकरात, आस्कर वाइल्ड, फिराक गोरखपुरी, नियोलाडौदा विचि, इत्यादि।

सिनेमा भी साहित्य की भाँति हमे सामाजिक परिवर्तनो से रू-ब-रू कराता है। स्त्री-समलैंगिकता पर आधारित फिल्म -फायर (1996) को कई सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ता था। कुछ वर्ष पहले प्रदर्शित फिल्म ‘गर्लफ्रेंड’ में भी समलैंगिक सरोकार को बखूबी दिखाया गया था।
अंततः समलैगिंक संबंधो को वैध अथवा अवैध घोषित करने से पहले कानून तथा समाज को उसके सैद्धांतिक पक्षों के साथ-साथ व्यवहारिक पक्षों पर भी मनन की आवश्यकता है।

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