(पंखुरी सिन्हा की कविताओं में कवि की सोच और संवेदना मुखर होकर प्रकट होती है. स्त्री-विमर्श के नये आयाम खुलते हैं. खासकर सरकारी कलाभवन वाली कविता तो ज़बरदस्त है…मैं इन कविताओं से मुतास्सिर हूँ कि आपके पास कथ्य-शिल्प और पठनीयता/ सम्प्रेषनियता है और बड़ी साफगोई से आप अपनी बात रखती हैं कविताओं में.—  संपादक 

एक

सरकारी कलाभवन और तलाक शुदा औरतें 

पंखुरी सिन्हा

पंखुरी सिन्हा

ख़ूबसूरत सा एक बैठक खाना है

मेरे दोस्त अक्सर वहां जीमते हैं

और बातें होती हैं वहां कला

और ज़िन्दगी के सब माधुर्य्य की

बस एक मेरे जाते ही

ये बातें बहुत ज़्यादा होने लगती हैं

कि दरअसल आप करती क्या हैं

क्योंकि दरअसल

इन दिनों मैं केवल कलाकार हूँ

पत्नी नहीं

माँ अब तक बनी नहीं

बेटी तो हूँ

बहन भी

कुछ हद तक

सगी नहीं

पर बहन तो बड़ा सर्व व्यापी शब्द है

और मीठा सा

और बेटी होना पर्याप्त है

व्यक्ति होना

जहाँ इतना नाकाफी होता है

और कलाकार होना इतना कम

लेकिन जिस तरह पूरता है

पत्नी होना

और जिस तरह

कभी नहीं पूछते

पुरुष पत्नियों से

कि वो क्या करती हैं

जबकि अब छोड़ दिया है

ज़्यादातर महिलाओं ने सिंदूर चिन्हित होना

मुझसे पूछने वाले

ये जानते हैं

कि मैं अभी पत्नी नहीं

चयन प्रक्रिया में हूँ

वहां होने से भी काफी तय होती है

कलाकारी की गुणवत्ता मेरी

और इन दिनों ढलान पर है

लेकिन इस घनघोर सामाजिक संकुचन

नवीन संकीर्णता

से इतर

असल परेशानी है

कि यह बैठक खाना

दरअसल सरकारी है

सरकारी कलाभवन

और यहाँ नयी स्थापित होती

संकीर्णता के विरोधी तो अनेक होंगे

कला शायद इसी उम्मीद पर टिकी है…

क्योंकि उनकी कोई बात पूरी नहीं होती थी

किसी कला की पेशी नहीं

कम स कम इतना तक कहे

कि मुझे कोई मतलब नहीं

आप क्या करती हैं

बस कृति आपकी…

 

दो

हाथों में हाथ डाले एक जोड़ा 

साभार google से

साभार google से

 हमारे पहली बार साथ होते ही

एक बहुत आज़ाद

स्वावलम्बी औरत

क्यों खड़ी की गई थी

हमारे आगे इस तरह

कि रोज़ आते थे

न्योते उसके

और यकीन मानिए

कि टूटते ही मेरा घर

हाथों में हाथ थामे

कोई न कोई

एक जोड़ा

चलने लगा

हर वक़्त मेरे आगे

मेरे कहीं भी बाहर निकलते ही….

 

तीन

धरती का डोलना

वह जिसके अंतर में

धरकर एक नन्हा सा बीज

हम इतने आश्वस्त हो जाते हैं

पानी देकर कुछ और

कि उगेगा ही उगेगा

हरे पत्तों

साभार google से

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रंगीन फूलों

मीठे फलों वाला एक पेड़

वह जो हमें खाना परोसते नहीं थकती

वह जो इतनी बड़ी जादूगरनी है

मिनटों में भर देती है हमारे ज़ख्म

कल ईस्टर की लिलिज़ थी

आज सदा बहार के फूल हैं

वह ऐसे डोलेगी

डोलेगी हमारी जन्म दात्री धरती

डोलेगी कि सवाल जवाब का मौका भी नहीं देगी

कहाँ जाएगा कोई

ये तक भी उसने कहाँ पूछा

बस छोड़ गयी

मिनट भर के कम्पन के भग्नावशेष

वह जिसे यों भर लेते हैं मुट्ठी में हम

मिट्टी ही तो है

गमले में भी

कैसे तोड़ लेते हैं हम

निष्ठुरता से उसकी कलियाँ भी

वह ऐसे डोलेगी

कहाँ कहा था उसने?

 

चार

भूकम्प

सभी प्राकृतिक आपदाओं में

सबसे भयावह, सबसे अघोषित

सबसे अकस्मात् रूप से आने वाली विभीषिका है

भूकम्प

भू का कांपना

या लोगों के दिलों को कँपाना

इस तरह जोड़ दी है

लोगों ने ईंट से ईंट

धरती की देह पर

वह सांस भी ले तो कैसे

उँगलियाँ भी फैलाये तो कैसे

क्यों नहीं पकड़ लेते हम उसे कसकर

पौधों से

और पौधों के बीच लम्बी खुली जगहों से

घास के मैदानों से

ताकि कहे वह हमसे भी कुछ दिल की बात

वैसे सुना तो यह भी है

कि परमाणु परीक्षण के बाद भी

कांपती है धरती

तो क्या कंपाया भी जा सकता है उसे

ऐसे किन्ही संसाधनो से?

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    By: पंखुरी सिन्हा

    जन्म 1975
    जन्म स्थान मुजफ़्फ़रपुर, बिहार, भारत
    कुछ प्रमुख कृतियाँ
    ककहरा (कविता-संग्रह), कोई भी दिन, क़िस्सा-ए-कोहनूर (दोनों कहानी-संग्रह)
    विविध
    गिरजा कुमार माथुर पुरस्कार (1995)। शैलेश मटियानी कथा-सम्‍मान (2007), चित्रा कुमार पुरस्कार (2007) । आजकल न्यूयार्क में एक टेलीविज़न चैनल में कार्यरत। कविता और कहानी दोनों ही लिखती हैं।

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2 Responses

  1. identicon
    अनवर सुहैल

    पंखुरी सिन्हा की कविताएँ पाठकों से संवाद करती हैं और बड़ी सहजता से अपनी बात रखती हैं.

    Reply

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