सहमा शहर: ग़ज़लें (सतेन्द्र कुमार सादिल)

फोटो -हनीफ मदार

सतेन्द्र कुमार “सादिल”

सतेन्द्र कुमार यूं तो भौतिकी के शोध छात्र हैं लेकिन खुशफहमी है कि वर्तमान में जहाँ युवाओं दृष्टि समाज सापेक्ष कम ही नज़र आती है ऐसे में भी सतेन्द्र की रचनाएं वक़्त की नब्ज़ को टटोलने की कोशिश में हैं | – संपादक 

1- सहमा शहर

शहर में रौनक थी कलतक, आज बस ख़ामोशियाँ हैं
सिलसिले हैं सिसकियों के, जल रहे अब आशियां हैं

कलतलक जिसके चमन में, रात – दिन गुलज़ार थे
आज घर – आँगन में उसके, खून के मिलते निशां हैं

अबतलक मशहूर था यूँ, ये शहर तहज़ीब का
और अब बस्ती में बिखरीं, माँ-बहन की चूड़ियाँ हैं

ज़ख्म पे मरहम लगाने, भी ना कोई आ सका
हर गली, नुक्कड़ पे अब जो, इसक़दर पाबंदियाँ हैं

माँ-बहन-मासूम बच्चे, बेइल्म हैं दंगों से ये सब
फिर उन्हीं की आज देखो, उठ रहीं अब अर्थियां हैं

किस क़दर हैं खौफ़ खाये, लोग अपने ही घरों में
ख़ुशहाल था हर घर यहाँ, अब हर तरफ बर्बादियाँ हैं

क्यों हैं फैलीं आग का, शोला हैं बनकर नफ़रतें
हर तरफ बरपा कहर है, क्या रहीं मजबूरियां हैं

मायने मंदिर के क्या हैं, क्या है मक़सद मस्जिदों का
दरमयां लोगों के अब तक, बढ़ रहीं बस दूरियाँ हैं……|

2- 

खौफ़ हम खाते नहीं हैं, घुप अँधेरों से कभी
है खबर कि रौशनी से, खौफ़ खाता है अँधेरा

घुप अँधेरों की बदौलत, हस्तियाँ हैं तारों की
हो गये ओझल सभी वो, बाद होने के सवेरा

एक सुबह हम खो गये, आब-ओ-हवा के लुत्फ़ में
हर तरफ थी ताज़गी, और खिल रहा था रंग मेरा

वो हमें मीठा ज़हर दे, होश भी देता रहा
साँप समझूँ या उसे फिर, एक बड़ा शातिर सपेरा

हम कहें कैसे कि आख़िर, है तरक्की मुल्क़ में
जब लूट कर बेबस घरौंदे, राज करता है लुटेरा

ये नफरतों की साज़िशें, हैं ख़ाक करतीं घर भी तेरा
मान मज़हब ही मोहब्बत, ना कोई उजड़े बसेरा

लोग कहते हैं कि जोड़ी, रब बनाता है सभी की
क्यों तलाकों के हैं मसले, साथ लेकर सात फेरा

कुछ अनछुई कुछ अनकही, बातों में ज़ज्बा है वही
दिल तुम्हारा सुन रहा है, कह रहा जो दिल है मेरा…..|

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