युवा कविता का समालोचना के साथ जायजा लेने का प्रयास कर रहे हैं नीलाभ अश्क | उनकी इस अंतर्दृष्टिय कविता यात्रा में कविता के स्वरुप, सम्प्रेषण, संवेदनशीलता और कविता के साथ रचना के साहित्यिक, सामाजिक सरोकारों की गहरी चिंताएं भी शामिल हैं | निश्चित ही यह एक जरूरी आलेख जान पड़ता है कविता और युवा कवियों के संदर्भ में …..| संपादक     

सारे दृश्य बदल रहे हैं…. 

अभी समय लगेगा इसका स्वाद पहचानने में

अभी तो आलाप है पहला पहला

आने को है सातों सुरों में रचा गया राग

अभी समय लगेगा असली आनन्द पाने में

धैर्य से सुनें आप

कवि का नहीं, कविता का नहीं,

प्रयत्न का करें सम्मान, श्रीमान!

“नये कवि की कविता” शीर्षक से लिखी गयी अपनी यह कविता मुझे आज बेसाख़्ता याद आ रही है, जब मैं ख़ुद युवा कवियों और उनकी कविता का एक जायज़ा लेने की कोशिश कर रहा हूं. इस प्रयास में शायद मेरा भी निवेदन यही है कि मेरे प्रयत्न ही को ख़ातिर में रखियेगा. कारण यह कि वैसे तो किसी एक कवि या रचनाकार का मूल्यांकन भी, अगर ईमानदारी से किया जाय तो, ख़ासा संकटपूर्ण काम साबित हो सकता है, लेकिन एक समूचे दौर की और वह भी ख़ास तौर पर युवा रचनाशीलता का जायज़ा, मूल्यांकन या समीक्षा निर्विवाद रूप से अजाने जोखिमों से भरा और नाशुक्रा काम होता है, जिसमें दोनों ही पक्षों के असन्तुष्ट रह जाने की गुंजाइशें रहती हैं. कवियों को शिकायत होती है कि उन्हें या तो ठीक से समझा नहीं गया या फिर सही वज़न नहीं मिला. जायज़ा लेने वाले को यह आपत्ति होती है कि उससे गागर में सागर भरने की उम्मीद क्यों रखी गयी, जो बुनियादी तौर पर रचना का काम है, समीक्षा या जायज़े का नहीं. मैं नहीं जानता कि इस गोष्ठी के आयोजकों ने क्या सोच कर यह आधार वक्तव्य प्रस्तुत करने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी है और मैंने भी जाने किस लगाव और जोश के तहत इसे स्वीकार कर लिया, मगर यह बात मैं एकदम शुरू ही में साफ़ कर देना चाहता हूं कि एक तो मैं कोई आलोचक नहीं, सहकर्मी हूं ऐन सम्भव है कि मैं न तो साथी कवियों की अपेक्षाओं पर खरा उतरूं, न आयोजकों की. इसे मेरी कमज़ोरी ही मानियेगा, इरादतन किया गया कृत्य नहीं.

मेरी कोशिश एक बदलते परिदृश्य तो कुछ इस तरह अंकित करने की है, जैसे तेज़ रफ़्तार से चल रही कार से किसी विराट और पैनोरैमिक दृश्यावली की विडियो तस्वीर पेश करना. ज़ाहिरा तौर पर रेखाएं मोटी होंगी और वही ब्योरे दर्ज होंगे जो नुमायां हैं. कुछ ध्वनियां छूट जायेंगी. बारीक़बीनी की गुंजाइश इस काम में शायद नहीं है.अस्तु.

साभार google से

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२.

जब मैं इस दौर पर निगाह दौड़ाता हूं, जिस में ज़िन्दगी ख़ासी कठिन हो गयी है और हिन्दी के कथा साहित्य और कथेतर गद्य ने पिछले डेढ़-पौने दो सौ साल में काफ़ी मंज़िलें तय कर ली हैं, तो एक सवाल जो मेरे मन में बार-बार उठता है. वह यह कि क्या कारण है – कविता आज पहले से कहीं ज़्यादा तादाद में लिखी जा रही है. कविता से शुरू करके कथा साहित्य में चले आने वाले राजेन्द्र यादव हालांकि कई बार कविता की मृत्यु की घोषणाएं कर चुके हैं तो भी कविता लोगों को आज भी अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने का एक कारगर साधन जान पड़ती है. इसमें एक ख़तरा भी छुपा हुआ है,जिस पर हम कवियों की नज़र अमूमन नहीं जाती और जिसके बारे में अर्सा पहले मैंने ध्यान दिलाया था. ख़तरा यह कि कई बार हम कविता से ऐसी उम्मीदें करने लगते हैं जो हमें अन्य विधाओं से करनी चाहिएं. एक आरोप जो हाल के वर्षों में कविता पर लगता रहा है वह यह कि आज कविता लिखना बहुत आसान हो गया है. छ्न्द की बन्दिश रही नहीं, रूप की दूसरी बन्दिशें, मसलन रस, अलंकार, आदि महत्व खो बैठी हैं, सो कुछ भी लिख दीजिये कविता हो जाता है. मगर क्या सचमुच ऐसा है ? अगर नहीं तो कविता ने आज अपने लिए कौन-सी कसौटियों की ईजाद की है ? कहीं इसी वजह से तो शायद पाठक कविता के सिलसिले में यह सवाल नहीं उठाते कि वह समझ में नहीं आती, या वह कविता जैसी नहीं लगती. मैं जानता हूं कि कई बार ये सवाल नाजानकारी में उठाये जाते हैं. पाठक एक विशेष प्रकार की कविता के अभ्यस्त होते हैं और नयी रचनाशीलता धैर्य और समझदारी की मांग करती है. और फिर ऐसे एतराज़ हमें उस पुरानी बहस की ओर ले जाते हैं कि कविता क्या है, जिसकी आज यहां बहुत गुंजाइश नहीं है. इसलिए मैं यहां बस आपका ध्यान इस पहलू की तरफ़ दिला कर एक और नुक़्ते की तरफ़ इशारा करूंगा जो मुझे कभी-कभी खटकता है.

सामाजिक विषमता की बात करते हुए क्या हमारा ध्यान इस ओर जाता है कि सामाजिक विषमता सिर्फ़ समाज तक ही महदूद नहीं है, वह सामाजिक गतिविधियों में भी नज़र आती है. मसलन रोज़मर्रा के काम-काज में. या फिर अगर साहित्य भी एक सामाजिक कार्रवाई है तो उस विषमता का अक्स साहित्य में भी दिखाई देता है क्या ? क्या कुछ विधाएं उच्चवर्गीय हैं, कुछ निम्न और कुछ बीच की. कुछ सवर्ण विधाएं हैं, कुछ दलित और कुछ बीच की जातियों की. अब यही देखिए कि नाटक एक उपेक्षित विधा है, भले ही कभी-कभी वह शाही ताम-झाम के साथ नज़र आती हो. आज तक किसी नाटककार को ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिला, कम-से-कम हिन्दी में; और साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी आज तक किसी नाटककार को नहीं दिया गया है. इसी तरह व्यंग्य पर अकेले परसाई को और कहानी की विधा पर निर्मल वर्मा और उदय प्रकाश को सहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया गया है. सब से दिलचस्प बात यह है कि सुरेन्द्र वर्मा को जो नाटककार के रूप में जाने जाते हैं नाटक पर नहीं उपन्यास पर पुरस्कृत किया गया.  कविताओं में नाटकीय लम्हे नज़र आते हैं पर नाटक बज़ाते-ख़ुद अछूत बना हुआ है.

एक ज़माना था कि कविता – या कहा जाय छ्न्द – ही सहित्यिक अभिव्यक्ति का एकमात्र साधन था. लेकिन जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ कविता और नाटक के साथ अन्य विधाएं भी ईजाद की गयीं क्योंकि यह महसूस किया गया कि ऐसा बहुत कुछ है जो कविता की पहुंच से बाहर है, भले ही किसी काव्यात्मक कृति का कलेवर कितना ही विराट क्यों न कर दिया जाये. इसी ज़रूरत के चलते कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, यात्रा विवरण, ललित निबन्ध, आलोचना, आदि अनेक विधाएं सामने आयीं और अच्छे-ख़ासे समय तक फलती-फूलती रहीं. फिर धीरे-धीरे पहिया उलटी तरफ़ चलने लगा. ले-दे कर कविता, कहानी और उपन्यास — इन्हीं तीन विधाओं का वर्चस्व साहित्य की वसुन्धरा पर दिखायी देने लगा. और बीच-बीच में इनके बीच में भी ऊंच-नीच की होड़ नज़र आने लगी. इसके सामाजिक कारणों की खोज ज़रूरी है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि सामाजिक समता की लड़ाई जैसे-जैसे हाल के वर्षों में कमज़ोर हुई है, वैसे-वैसे सामन्ती मूल्यों की वापसी के साथ जातीय कट्टरता बढ़ी है, और  इससे हुआ यह कि साहित्य में भी एक श्रेणी विभाजन हो गया है. वरना क्या कारण है कि बीसवीं सदी के शुरुआती पांच-छै दशकों तक अनेक साहित्यकार अनेक विधाओं में लिखते थे. कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने एक या दो विधाओं में ही रचनाएं कीं मगर वे अन्य विधाओं के प्रति असहिष्णु नहीं थे. यह तो हाल के वर्षों में हुआ है कि विधाओं और उनके अलमबर्दारों के बीच खींचातानी शुरू हुई है. राजेन्द्र यादव ने अगर कविता का फ़ातिहा पढ़ दिया तो अशोक वाजपेयी ने कविता के बाहर न झांकने की क़सम खा ली. मेरे निकट यह रवैया न तो कविता के लिए श्रेयस्कर है, न गद्य के लिए.

३.

इस हालत में जब हम कविता के मौजूदा परिदृश्य पर निगाह डालते हैं तो कविता की वसुन्धरा बहुत हरी-भरी नज़र आती है. केदारनाथ सिंह और कुंवर नारायण जैसे वयो-वृद्ध कवियों से ले कर अनुज लुगुन, मुकेश मानस, मुकुल सरल और रजनी अनुरागी तक — कवियों की तीन-चार पीढ़ियां इस समय सक्रिय हैं. सिर्फ़ सक्रिय ही नहीं हैं, बल्कि उनमें आश्चर्यजनक विविधता भी दिखायी देती है और कहना न होगा कि सबसे ज़्यादा विविधता हमारे युवतर साथियों में है. युवा कवियों में अगर हम गिरिराज किराडू और अशोक पाण्डेय से ले कर पूनम तुषामड़, आस्तीक वाजपेयी और महेश वर्मा की कविताओं को देखें तो विषय, कथ्य और अन्दाज़-ए-बयां के लिहाज़ से — उसी वसुन्धरा वाले रूपक को अगर और आगे बढ़ा कर कहूं तो — एक विशाल उपवन हमें फलता-फूलता नज़र आता है. एक ओर अगर वह सीधी-सपाट शैली है जो साठ और सत्तर के दशक की कविता की शक्ति थी तो दूसरी ओर वह वक्रता है जो बीसवीं सदी के अन्तिम दशक की कविता ने अपने समय की जटिलता को अभिव्यक्त करने के लिए अपनायी. इसके साथ-साथ एक खिलन्दड़ापन भी है — भाषा को नये ढंग से बरतने के सिलसिले में  — जो श्रीकान्त वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल जैसा न होते हुए भी उनके प्रयोगों की याद कराता है. मिसाल के लिए महेश वर्मा की कविता “पानी” में उनका ख़ास रंग —

“अब वही काम तो ठीक से करता , वहाँ भी पिछड़ ही गया वाक्य सफ़ेद कुर्ते में पान खाकर तर्जनी से चूना चाटने की तरह कहा जाता जहाँ उसी आसपास साईकिल अब कौन चढता है प्रश्न के उत्तर की तरह चलता हुआ ब्रेक इसलिए नहीं लगा पा रहा था कि रुकते ही प्यास लगेगी. बिना अपमान के सादा पानी छूंछे पीकर निकल जाना मुश्किल होते जाने के शहर में या तो त्री हो गए सहपाठी का किस्सा सुनाते परचूनिए से उधार ले लूं या पत्रकार बन जाऊं के विकल्प को छोड़ कर कविता लिखना तो ट्यूशन पढ़ाने से भी कमज़ोर काम कि पीटने के लिए छात्र और दांत दिखाने के लिए विद्यार्थी की महिला रिश्तेदार भी नहीं.”

इसी के बरक्स गिरिराज किराडू का अपना अन्दाज़-ए-बयां है —

रूपकों पर घिर आयी है एक बेरहम अजनबी छाया

कभी सपने जैसी भाषा में वे तैरते थे आँखों के आगे आपकी कविता की तरह

कितना िनकट आना होता है आपकी कविता के उसके जैसा न होने के लिए विनोदजी

एक उम्र गुजर रही है उस निकटता को पाने में

आप अपने नगर में आदिवास करते हुए मगन होंगे

जब सबसे छूटकर आपसे भी छूट जाऊंगा

हर तरफ हर बोली में लोग लाउडस्पीकर पर एक झूठा छत्तीसगढ़ बना रहे होंगे

लेकिन इस सब का स्वागत करते हुए हमें उन ख़तरों के प्रति जागरूक रहना चाहिए जो बहुत अधिक कला से पैदा होते हैं. इस सिलसिले में रघुवीर सहाय की एक पंक्ति मुझे हमेशा याद आती रहती है और एक कसौटी का-सा काम करती है कि “जहां बहुत अधिक कला होगी वहां परिवर्तन नहीं होगा.” सो, हमें कला का दामन वहीं तक थामे रहना है जहां तक वह परिवर्तन से हमें विमुख न करे.

गिरिराज किराडू की एक और विशेषता है. अक्सर उनकी कविता पहले के साहित्य से वस्तु या विषय या ख़याल या सन्दर्भ ग्रहण करती है, यों कहें कि उड़ान भरती है.  इस प्रवृत्ति के बारे में अशोक वाजपेयी ने बहुत लिखा है और उसकी ताईद की है. लेकिन जब वह एक कवि का मुहावरा बनने लगे तो ? या फिर पाठक से यह अपेक्षा रखने लगे कि उसे भी उतना सुपठित-बहुपठित होना होगा जितना कि कवि तो ? इस सन्दर्भ में मुझे अक्सर एज़रा पाउण्ड की चुनी हुई कविताओं पर लिखी गयी टी.एस.एलियट की भूमिका के उस अंश की याद हो आती है जहां वे मौलिकता की चर्चा करते हुए कहते हैं कि “सच्ची मौलिकता महज़ विकास है; और अगर वह सही विकास है तो अन्त में वह इतना अनिवार्य महसूस हो सकता है कि हम लगभग उस नज़रिये तक पहुंच जायें कि हम कवि को “मौलिकता” के गुण से पूरी तरह रहित ठहरा बैठें…एक सतही-सी कसौटी है जिसके अनुसार मौलिक कवि सीधा जीवन की ओर जाता है और ’डेरिवेटिव’ यानी उद्भूत कवि ’साहित्य’ की ओर. जब हम इस मामले को परखते हैं तो हम पाते हैं कि जो कवि सचमुच “उद्भूत” है वह साहित्य को जीवन समझने की भूल कर रह है और अक्सर इस भूल का कारण यह होता है कि उसने कफ़ी कुछ पढ़ा नहीं होता.” ज़ाहिर है कि गिरिराज के सिलसिले में यह मानने की भूल नहीं की जा सकती कि वे जीवन और साहित्य में अन्तर न कर पाते होंगे या उन्होंने काफ़ी कुछ पढ़ा न होगा, तो भी यह सवाल रह ही जाता है कि इस हद तक साहित्य को कविता का उपजीव्य बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस की जाती है ? जिन पाठकों को उन सन्दर्भों का पता नहीं है, वे ऐसी कविताओं को कैसे समझ पायेंगे, समझने शब्द से अगर एतराज़ हो तो उसकी जगह आप बेखटके आनन्द रख दीजिये? यह प्रवृत्ति महेश वर्मा की कविता “रेमेदिओस” और प्रत्यक्षा सिन्हा की कविताओं में भी दिखायी देती है.

इसके साथ ही युवा कविता में यह प्रवृत्ति भी दिखायी देती है कि कवि अपनी अलग राह खोजने के कठिन काम से बचने के लिए पहले की आज़मायी हुई हिकमतों से काम लेते हैं. यह प्रवृत्ति ख़ास तौर पर उन कवियों में दिखायी देती है जिनके पास चुस्त-दुरुस्त भाषा है. वे एक मुहावरा पकड़ते हैं और जल्दी से स्वीकृत कवियों की सफ़ में आने की जुगुत बैठाने लगते हैं. इसीलिए कई बार उनकी कविताओं में पहले के किसी प्रतिष्ठित कवि की झाईं नज़र आती है. पिछली पीढी के एक कवि की सलाह – “चालाक फ़िकरों से बच कर लिखो एक छोटा-सा सच और देखो कि वह कितना कारगर होता है” – उन्हें बेमानी लगती है. यक़ीनन इर्द-गिर्द की दुनिया पर ही लिखी जायेगी, देखना तो यह है कि कवि उस दुमिया को कैसे पेश कर रहा है. क्या वह इस देखी गयी दुनिया के अनदेखे पहलू उजागर कर रहा है ? चीज़ों को नये कोण से देख और दिखा कर हमें उन्हें बदलने की लड़ाई में और होशमन्द बना रहा है  या नहीं. इसलिए एक सवाल जो नये कवियों को अपने से पूछना होगा – और यह एक कसौटी का काम भी कर सकता है – कि कवियों ने अपने विषयों का चुनाव करने के साथ-साथ कितने तरीक़े इस्तेमाल किये हैं. हमेशा से अभिव्यक्ति के चार तरीक़े होते हैं — पुरानी बात को पुराने ढंग से कहना,  बात पुरानी हो मगर नये ढंग से कही जाय, नयी बात पुराने ढंग से कही जाय और नयी बात नये ढंग से कही जाय. प्रेम एक पुराना विषय है और जब से कविता कही-लिखी जाती रही है अपनी जगह पर मौजूद रह है. देखना यह होगा कि उसके साथ कवि ने क्या सुलूक़ किया है और कविता प्रेम के साथ-साथ इर्द-गिर्द के जीवन के कौन से पहलू खोलती है.

साभार google से

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४.

इसी सन्दर्भ में एक और पंक्ति का ज़िक्र करना चाहता हूं जो मुक्तिबोध अक्सर नये-से-नये मिलने वाले से पूछ बैठते थे — पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है ? यह लट्ठमार-सा प्रश्न उनकी ज़िन्दगी और कला का तो मूलमन्त्र बना ही रहा, आगे आने वालों के लिए भी एक ज़रूरी सवाल बन गया. यहां आप सब के सामने, जो कविता में ख़ूब रसे-पगे हैं, इस बात पर बल देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि आप सब जानते हैं कि दुनिया की श्रेष्ठतम कविता राजनीति से किनारा करके नहीं, बल्कि राजनीति से जुड़ कर लिखी गयी है. और यह भी हम जानते हैं कि अगर कविता जनोन्मुखी नहीं है तो वह अपना फ़र्ज़ नहीं अदा कर सकती. मुझे याद आता है कि आपातकाल के दौरान और उसके बाद जब “कविता की वापसी” के दौर में कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने वाम राजनीति से जुड़े लोगों पर चोट करते हुए कविता में “फूल-पत्ती-बच्चे-प्रेम” की गुहार लगायी थी तो हमारे मित्र ज्ञानरंजन ने “पहल” के एक सम्पादकीय में नेरूदा या नाज़िम हिकमत के हवाले से लिखा था कि घोषित राजनीति कला को चमकाती है. इसमें कोई शक नहीं है कि राजनैतिक कविता का अर्थ सिर्फ़ गोली बन्दूक पर लिखी कविता नहीं है, एक प्रेम कविता भी राजनैतिक कविता हो सकती है, होती है. और यह भी छिपी हुई बात नहीं है कि जो कहते हैं कि उनकी कोई राजनीति नहीं है, उनकी भी एक राजनीति होती है.सवाल तो पक्ष का. तय करने का है कि किस ओर हो तुम.

यह छोटा-सा नोट लिखने का ख़याल मुझे तब आया जब युवा कविता पर सोच-विचार करते हुए मैंने हिन्दी “आउटलुक” में पत्रकार और प्रतिभाशाली कवि-कहानीकार आकांक्षा पारे की दो कविताएं पढ़ीं –“घर” और “कैसे हो सकता है ऐसा.” पहली कविता में आकांक्षा ने सड़क किनारे कच्चे घरों और उन में रहने वालों की तस्वीर खींची है —

सड़क किनारे तनी हैं / सैकड़ों नीली, पीली पन्नियां / ठिठुरती रात / झुलसते दिन / गीली ज़मीन / टपकती छत             के बावजूद / गर्व से वे उन्हें कहते हैं घर.

कल की फ़िक्र किये बिना / वे जीते हैं आज / कभी अतिक्रमण / कभी सौन्दर्यीकरण / कभी बिना कारण / उजाड़             दिये जाते हैं वे

बिना शिकन बांधते हैं वे / अपनी ज़मीन / अपना आसमान / निकल पड़ते हैं / सड़क के नये किनारे की तलाश में

ज़ाहिर है कि सड़क किनारे रहने वालों की दुनिया हमारे आधुनिक शहरी जीवन की एक हक़ीक़त है, जिसे हम कई बार देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. पर इस कविता में औपरेटिव शब्द है घर – जो आकांक्षा की कविता के अनुसार “चूल्हे की राख, पेट की आग, सपनों की खाट, हौसले का बक्सा, उम्मीदों का कनस्तर” अपने भीतर समोये हुए है. और घर इन्हीं चीज़ों से तो बनता है. क्या आम तौर पर घर कहते समय इन चीज़ों का बिम्ब हमारे सामने उभरता है ? शायद नहीं, इसीलिए यह कविता अपनी सादगी में भी मानीख़ेज़ बन जाती है.

लेकिन जब मैंने आकांक्षा की दूसरी कविता “कैसे हो सकता है ऐसा” पढ़ी तो लगा कि कवित जितना उजागर कर रही है, उस से ज़्यादा छिपा रही है —

कैसे हो सकता है ऐसा जंगल में जब हार रही हो ख़ाकी वर्दी

उजड़ रहे हों सैनिकों के घर तब दो खिलाड़ियों के घर बसाने की चिन्ता में चर्चा करते रहें तमाम दिग्गज

विधवाओं के विलाप करते चेहरों पर ध्यान दिये बिना

चमकते रहें दो खिलाड़ियों के चेहरे टीवी पर दिन भर

इस कविता के साथ एक नोट भी आकांक्षा पारे ने दिया है — “छत्तीसगढ़ में 72 सैनिकों की शहादत के बजाय सानिया की शादी और आईपीएल को टीवी पर ज़्यादा तवज्जो दिये जाने पर.”

पहली बात तो यह है कि छत्तीसगढ़ में मारे गये सैनिकों से सम्बन्धित समाचार और इस घटना पर चर्चा किसी मानी में टीवी पर कम नहीं हुई थी. इसलिए अगर सानिया या आईपीएल की चर्चा को ज़्यादा तवज्जो दी गयी तो यह कोई नयी बात नहीं. मेरा सवाल यह है कि मीडिया की तरह कवयित्री को छत्तीसगढ़ ही में पुलिस और तमाम तरह के सशस्त्र बलों के शिकार आदिवासी नज़र नहीं आये, उनकी बलत्कृत औरतें और बेटियां दिखायी नहीं दीं, पुलिस द्वारा हेमचन्द्र पाण्डे जैसे सहकर्मी पत्रकार की निर्मम हत्या ने उद्वेलित नहीं किया, आज़ाद और दसियों लोगों के झूठे एन्काउण्टरों ने संवेदित नहीं किया, उनकी नज़र गयी तो वहां जहां हमारी हत्यारी सरकार और गृह मन्त्रालय चाहता है कि जाये. वे अगर मात्र कवयित्री होतीं तो शायद यह चूक राजनैतिक समझ की कमी कही जा सकती थी, पर वे उस पत्रिका से जुड़ी हैं जिसने आदिवासियों की हालत के बारे में अरुन्धती राय के दिल दहलाने वाले लेख प्रकाशित किये हैं. ऐसी हालत में जब इसी वसुन्धरा पर आकांक्षा पारे के यह कविता और अनुज लुगुन और निर्मला पुतुल की कविताएं एक साथ मौजूद हों तो जांच-परख का पैमाना क्या होगा ? क्या हम मुक्तिबोध के सवाल से बच कर चलने का खतरा मोल ले सकते हैं.

वैसे तो कविता की कसौटियां समय-समय पर बदलती रहती हैं, लेकिन कविता को जांचने के कुछ तरीक़े अब भी कारआमद साबित होते हैं. मसलन, जब हम कविता का, एक पुराना शब्द इस्तेमाल करूं तो, रसास्वादन करने से आगे बढ़ कर उसकी परख करने के काम की तरफ़ बढ़ते हैं तो हमें अनिवार्य रूप से कविता के बाहर आना पड़ता है, वैसे ही जैसे वास्तु-शिल्प के किसी नमूने का अन्दाज़ा हम अन्दर से कभी पूरी तरह नहीं लगा सकते. अगर हमारी आंखें बन्द करके हमें उस भवन में छोड़ दिया जाये तो हम कभी उसके रूपाकार के बारे में नहीं जान सकते चाहे हम उसके भीतर कितने ही दिन क्यों न बितायें. कविता को, या कहें कि साहित्य को, परखने के लिए हमें उसके बाहर आना ही पड़ेगा/पड़ता है भले ही कविता की जांच कविता के भीतर से करने की जितनी भी वकालत की जाये. और कविता के बाहर क्या है ? ज़ाहिर है, वह समय और उस समय का समाज जिसमें कविता लिखी जा रही है. इसीलिए कविता के बारे में कोई राय व्यक्त करते समय हम सबसे पहले यह देखते हैं कि जिस समय की कविता है, क्या उस समय की झाईं कविता में नज़र आ रही है या नहीं. यह सवाल उस समय और भी ज़रूरी हो उठता है जब चारों तरफ़ का समय और समाज तेज़ी से बदल रहा हो. युवा कवि मुकुल सरल ने अपनी एक कविता में इसी हक़ीक़त की तरफ़ इशारा किया है और एक वाजिब सवाल उठाया है –

सारे दृश्य बदल रहे हैं / कौन हो तुम? / साथ मेरे / हाथ थामे / जा रहे हैं हम कहां…

लेकिन कविता के अन्त तक पहुंचते-पहुंचते यह सवाल बदल जाता है —

सारे दृश्य बदल रहे हैं /  कौन हो तुम /  साथ उनके! /  जा रहे हो /   तुम कहां…?

लेकिन दृश्य तो हमेशा बदलते रहते हैं. ऐसा कोई समाज नहीं जो किसी विशाल चट्टान की तरह स्थिर और परिवर्तन की प्रक्रिया से अछूता रहा हो. सवाल तो यह है कि तब्दीली का स्वरूप क्या है और कारण कौन-से हैं. मुकुल इस तब्दीली के कारण कविता के उस अंश में स्पष्ट करते हैं जो इन दो उद्धरणों के बीच है. पृथ्वी की सुन्दरता की तरफ़ इशारा करते और इसी जगह घर बनाने की हसरत दर्ज करते हुए वे उस ओर भी नज़र डालते हैं, जहां आज लोग ‘कर रहे एक और विश्वयुद्ध की तैयारी.’ मुकुल को इस बात का पूरा एहसास है कि पागलपन दोनों ओर है, उनमें भी जो हथियार बना रहे हैं और उनमें भी जो हथियार जमा कर रहे हैं —

कर लिए कितने जमा हथियार घातक

एक हम-तुम दीखते पागल-दीवाने

घात में बैठे हैं लेकर बम विनाशक

जाने कब संहार कर दें इस जहां का

जिस बदलती हुई दुनिया के चित्र मुकुल अपनी कविताओं में दर्ज करते हैं वह हमारे समय ही की उत्तरोत्तर क्रूर और ख़ूंख़ार होती दुनिया है, जिस की छवियां हमें आज की युवा कविता में बराबर मिलती हैं. मिसाल के लिए मृत्युंजय की कविता में छत्तीसगढ़ के हवाले से  —

“बस्तरिया मैना के कण्ठ में उग आये कांटे…

अबकी बसन्त में टेसू के लाल फूल

सुर्ख़-सुर्ख़ रक्त चटख झन-झन कर बज उट्ठे

ख़ून की होली जो खेली सरकार बेक़रार ने.”

या फिर अशोक पाण्डेय की कविता “अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार” में —

“यह पहला दशक है इक्कीसवीं सदी का

एक सलोने राजकुमार की स्वप्नसदी का पहला दशक

इतिहासग्रस्त धर्मध्वजाधारियों की स्वप्न सदी का पहला दशक

पहला दशक एक भूमण्डलीय धुरी पर घूमते गांव का

सबके पास हैं अपने अपने हिस्से के स्वप्न

स्वप्नों के प्राणान्तक बोझ से कराहती सदी का पहला दशक.

“स्वप्नों के प्राणान्तक बोझ से कराहती सदी ” के इस पहले दशक में कुछ और भी स्वप्न हैं जिनकी शिनाख़्त हमें अनुज लुगुन और निर्मला पुतुल की कविताओं में होती है. अनुज लुगुन की कविता “हमारी अर्थी शाही नहीं हो सकती तो शुरू ही सपनों के ज़िक्र से होती है :

हमारे सपनों में रहा है

एक जोड़ी बैल से हल जोतते हुए

खेतों के सम्मान को बनाए रखना

हमारे सपनों में रहा है

कोइल नदी के किनारे एक घर

जहाँ हमसे ज्यादा हमारे सपने हों

और इन्हीं सपनों में है एक चाहत :

कि जंगल बचा रहे

अपने कुल-गोत्र के साथ

पृथ्वी को हम पृथ्वी की तरह ही देखें

पेड़ की जगह पेड़ ही देखें

नदी की जगह नदी

समुद्र की जगह समुद्र और

पहाड़ की जगह पहाड़

लेकिन यह कोई थोथी स्वप्नदर्शिता नहीं है, क्योंकि अनुज लुगुन को मालूम है कि

हमारी चाह और उसके होने के बीच एक खाई है

उतनी ही गहरी

उतनी ही लम्बी

जितनी गहरी खाई दिल्ली और सारण्डा जंगल के बीच है

जितनी दूरी राँची और जलडेगा के बीच है

और है इसके बीच “खड़े होने की जि़द” और इस ज़िद पर टिके रहने का संघर्ष.

ज़ाहिर है कि यह उत्तरोत्तर जटिल होती दुनिया के बिम्ब हैं, उस दुनिया के जिस में मनुष्यविरोधी ताक़तें प्रतिरोध के बावजूद बार-बार उभरती हैं. मृत्युंजय ने अपनी कविता “कीमोथेरेपी” में बड़ी दक्षता से इस लड़ाई को मनुष्य के शरीर में होने वाले कैंसर और कीमोथेरेपी से उसके इलाज के रूपक द्वारा व्यक्त किया है. वे बड़ी खूबी से परत-दर-परत पूंजीवाद का रूपक शरीर के कैंसर से गढ़ते हुए इस संघर्ष को एक नयी नज़र से देख कर अंकित करते हैं.  शरीर में कैंसर की मौजूदगी को संकेतित करते हुए जब वे लिखते हैं कि “यह एक समरभूमि है यहां लाख नियम एक साथ चलते हैं व्यूह भेद की लाख कलाएं लाखों मोर्चे एक ही वक़्त में एक ही जगह पर खुले रहते हैं” तो यह अन्दाज़ा नहीं होता कि वे उस विराट प्रक्रिया का ज़िक्र कर रहे हैं जो शरीर के अन्दर नहीं बाहर चल रही है और कविता की अन्तिम पंक्तियों में जब यह साफ़ होता है कि “कीमोथेरेपी” की इस समरगाथा में कटे-फटे टुकड़े मनुष्यता के पूंजी की भव्य-निर्जल चट्टानों पर यही कथा रोज़-रोज़ दुहराई जाती है”  तो कविता एक सर्वथा नया अर्थ ग्रहण कर लेती है.

जिन कवियों ने राजनीति से परहेज़ किये बिना कविता का सफ़र तय करने की कोशिश की है उन में अच्युतानन्द मिश्र और सन्तोष चतुर्वेदी के नाम लिये जा सकते हैं. हालांकि अच्युतानन्द की कविता में कहीं-कहीं अवसाद की हल्की सी अन्तर्धारा महसूस होती है, उनकी कविता “इस बेहद संकरे समय में” मिसाल की तरह पेश की जा सकती है :

वहाँ रास्ते खत्म हो रहे थे और

हमारे पास बचे हुए थे कुछ शब्द

एक फल काटने वाला चाकू

घिसी हुई चप्पलें

कुछ दोस्त

हमारे सिर पर आसमान था

और हमारे पाँवों को जमीन की आदत थी

और हमारी आँखें रोशनी में भी

ढूँढ़ लेती थीं धुंधलापन

हम अपने समय में जरूरी नहीं थे

यही कहा जाता था

गोकि हम धूल या पुराने अखबार

या बासी फूल या संतरे के छिलके

या इस्तेमाल के बाद टूटे हुए

कलम भी नहीं थे,

हम थे

और हम बस होने की हद तक थे

लेकिन तिस पर भी वे अगर आत्म-दया में नहीं डूबते तो इसका श्रेय उनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता ही को दिया जा सकता है, जो अचानक नहीं, बल्कि एक सचेत रूप से किया गया फ़ैसला है. इसीलिए कविता के अन्त में हताशा नहीं, बल्कि उम्मीद का स्वर ही उभरता है :

हमारी आँखों में

चमक रहे थे सूरज

और पैरों में दर्ज होने लगे थे

कुछ गुमनाम नदियों के रास्ते

खुद के होने की बेचैनी

और रास्तों की तरह बिछने का हौसला भी था।

सभ्यता की शिलाओं पर

बहती नदी की लकीरों की तरह

हम तलाश रहे थे रास्ते

एक बेहद सँकरे समय में!

और जहां अच्युतानन्द सीधे-सीधे राजनैतिक वस्तु को उठाते हैं, मसलन “म्यांमार की सड़कों पर ख़ून नहीं था” तो उनकी कविता में वैसी ही धार आ जाती है, जैसी मृत्युंजय जैसे उनके अन्य साथियों में. हां, यह ज़रूर ख़याल उन्हें रखना होगा कि वे भाषा के साथ चाहे जो सुलूक़ करें, व्याकरण को सही रखें. “कि” की जगह “की” का प्रयोग खटकता है और कई बार लिंग-प्रयोग में भी वे ड डगमगाते हैं.

युवा कवियों में सन्तोष चतुर्वेदी शायद उन गिने-चुने कवियों में हैं जिनकी कविताओं की लम्बाई पहले के दौर की याद कराती हैं, भले ही वे मौजूदा दौर की तस्वीरें उकेर रहे हों. “पेनड्राइव समय” हो या “मोछू नेटुआ” या “मां का घर” — सन्तोष चतुर्वेदी की कविताओं का कलेवरआज की औसत कविताओं से ज़्याद लम्बा है. इसके अलावा एक ओर नेटुआ और दूसरी ओर पेनड्राइव और दशमलव जैसे विषय चुनना भी सन्तोष की ख़ासियत है. “मोछू नेटुआ” इसलिए भी ध्यान आकर्षित करती है क्योंकि उसमें सन्तोष ने उस बिरादरी के एक फ़र्द पर निगाह डाली है जो अण्गेर्ज़ों के ज़माने ही से अभिशप्त ज़िन्दगी जीने को विवश है और अभी तक उसका कोई किस्तार नहीं. कविता में मोछू नेटुआ, जो सांप पकड़ने का काम करता है, कहता है :

हां मालिक यह ससुरी सरकार तो

कभी हमें आतंकवादी बताती है

तो कभी घोषित कर देती है नक्सलवादी

………….

अब आपे बताइए मालिक

कि कैसे धोयें हम

अपने माथे पर जबरिया लादा गया

बेमतलब का कलंक

दिक्कत की बात तो यह कि

कभी कोई समझ ही नहीं पाया हमें

अब देखिए न आपे हमारी नियति

कि पुराने जमाने का अछूत मैं

इस जमाने का अपराधी हो गया हूॅ

होता रहा हमारे साथ

हमेषा बदतर सलूक

उठती रही बराबर मन में

एक अजीब सी हूक

कविता लम्बी है और आख्यान का अन्दाज़ उसमें नुमायां है. लेकिन जब एक पूरा समुदाय साम्राज्यवादी शक्ति द्वारा जन्मना अपराधी क़रार दिया जाये और कथित आज़ादी के बाद भी उसका कोई पुर्सांहाल न हो तो ऐसी कविता एक ज़रूरी दस्तावेज़ बन जाती है, जिसमें महज़ एक समाज-शास्त्रीय कोण ही नहीं है, बल्कि जो हमारे समय को उसकी सारी जटिलता में परखती है, जिसमें सांपों को चीन्ह लेने वाले मोछू नेटुआ  के लिए “आदमी को आदमी की भीड़ से बीन कर / ज़हरीले तौर पर अलगा पाना”

“एकदमे से असंभव” होता जा रहा है. “और सबसे दिक्कत तलब यह कि / अभी तक के सारे तन्त्र-मन्त्रों को धता बताता / कांइयां किस्म का आदमी ऊपर से कुछ और / अन्दर से कुछ और हुआ जा रहा है ….बदलती हुई परिस्थितियों में / उसकी समस्या अब यह है कि/ लगातार जहरीली होती जा रही इस दुनिया में से / कुछ बेजहर लोगों को वह कैसे सामने लाये…..कैसे वह अपनी चाहत का कुछ रंग जुटा कर / अपने समय की / एक सुखद तस्वीर बनाये.”

हिन्दी में व्यक्ति-केन्द्रित कविताओं की एक सुदीर्घ परम्परा रही है. त्रिलोचन की “नगई मेहरा” हो या लीलाधर जगूड़ी की “बलदेव खटिक” — कवियों ने परिवर्तन की कामना से वंचित, दलित लोगों को हमेशा बीच मंच पर लाने का काम किया है. सन्तोष की कविता “मोछू नेटुआ” उसी परम्परा की अगली कड़ी है. अल्बत्ता, लम्बी कविताओं के साथ जो ख़तरा जुड़ा होता है — शब्द स्फीति में बह जाने का — उसके प्रति संतोष को सदा सजग तहना होगा.

६.

लेकिन कोई सवाल कर सकता है कि आज के समय का यथार्थ इतना भर ही नहीं है, उसके और भी पहलू हैं. स्त्रियों की आधी दुनिया है, बच्चे हैं, घर-परिवार है, प्रेम है. ये सारे पहलू आज के युवा कवियों की कविताओं की वसुधा में मौजूद हैं. सारे-के-सारे भले ही एक कवि में न पाये जायें लेकिन उनकी छवियां आज की युवा कविता में छिटकी हुई हैं. अलबत्ता यह ज़रूर चिह्नित किया जा सकता है कि प्रेम पहले ही की तरह आज भी एक सदाबहार विषय बना हुआ है और एक कसौटी का भी काम करता है. सन्ध्या नवोदिता अपनी एक कविता में साफ़-साफ़ अपने समय में प्रेम का एजेण्डा तय करते हुए लिखती हैं :

सारी कविताएँ

न तो युद्ध की होंगी

न प्रेम की

पर बिना प्रेम के…?

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    By: नीलाभ अश्क़

    जन्म 16 अगस्त 1945
    निधन 23 जुलाई 2016
    जन्म स्थान मुंबई, महाराष्ट्र, भारत।
    कुछ प्रमुख कृतियाँ
    संस्मरणारम्भ, अपने आप से लम्बी बातचीत, जंगल खामोश है, उत्तराधिकार, चीज़ें उपस्थित हैं (1988) शब्दों से नाता अटूट है, शोक का सुख, ख़तरा अगले मोड़ की उस तरफ़ है, ईश्वर को मोक्ष (सभी कविता-संग्रह)
    विविध
    प्रतिमानों की पुरोहिती, पूरा घर है कविता (गद्य संकलन) । हिन्दी में ढेर सारे अनुवाद किए हैं।

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