आज स्त्री-लेखन साहित्यिक चर्चा में एक मुख्य विषय है। समकालीन स्त्री रचनाकारों ने ऐतिहासिक-सामाजिक विकास क्रम की स्थितियों में बड़ी सीमा तक संविधान-प्रदत्त बराबरी के अधिकारों का उपयोग करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त की है। हालांकि धर्म सम्मत सामाजिक नियम-कानूनों ने स्त्री को घर की चारदीवारी के भीतर सीमित कर उसे सामाजिक विकास की मुख्य धारा से अलग किया लेकिन उससे भी अधिक आपराधिक कृत्य हुआ उसे मानसिक-वैचारिक स्तर पर गुलामी की जंजीरों से जकड़ना। आज 21वीं सदी में जब बड़े सामाजिक परिवर्तनों के हम गवाह हैं लेकिन मानसिक गुलामी की ज़हनियत को दूर करना कितना मुश्किल है और इस बदलाव में कितने युग बीतेंगे… कहा नहीं जा सकता। इसके बावजूद स्त्री सर्जनात्मकता ने पिछड़े डेढ़-दो सौ वर्षों में न केवल अपनी प्रभावी उपस्थिति दिखाई है बल्कि इतिहास में नये आयाम भी रचे हैं।  स्त्री की अभिव्यक्तिक स्वतन्त्रता और सर्जनात्मकता के ऐतिहासिक संदर्भों की पड़ताल करता डॉ नमिता सिंहका यह आलेख …… | संपादक 

(आपकी सुबिधानुसार इस बड़े आलेख को भी हम यहाँ साप्ताहिक रूप से किस्तों में प्रकाशित करेंगे … आज पहली कड़ी )

साहित्य में स्त्राी सर्जनात्मकता: ऐतिहासिक संदर्भ 

डॉ० नमिता सिंह

आदिम समाज मातृसत्तात्मक था। उत्पादन का साधन केवल जानवरों का शिकार और जंगलों में घूमते हुए भोजनोपयोगी खाद्य सामग्री का संग्रहण था जिसमें स्त्री की नेतृत्वकारी भूमिका थी। सामाजिक विकास के इस प्रारंभिक चरण में जहाँ केवल मानव समूह थे और स्त्री-पुरुष मात्र यौनिक इकाई, स्त्री का नेतृत्व उसकी सर्जनात्मकता के कारण ही था जो संतानोत्पति के अलावा जीवनोपयोगी उत्पादन के काम में प्रमुख भूमिका के रूप में तथा समूह के संचालन के रूप में मान्य था।
सामाजिक विकास के अगले चरण में जब उत्पादन के साधन के रूप में कृषि-आधारित व्यवस्था स्वरूप ग्रहण करने लगी और स्थायी रूप से मानव समूह विभिन्न क्षेत्रों में बसने लगे तो उत्पादन और भोजन संबंधी व्यवस्था का मुख्य कार्यभार पुरुषों के हाथ में आ गया। पशु पालन, कृषि-उत्पाद तथा उनके विकास और आवश्यकता से अधिक अतिरिक्त उत्पादों के संग्रहण ने लेन-देन की प्रणाली विकसित की और व्यापार की ओर प्रेरित कर पुरुष वर्चस्व के सामाजिक स्वरूप का विस्तार कर उसकी सामाजिक स्थिति को मज़बूत किया, इसके साथ ही परिवार का स्वरूप धीरे-धीरे व्यवस्थित-संगठित होने लगा तो स्त्री को अंतःपुर की ओर धकेल दिया गया। उत्पादन संबंधी व्यवस्था में स्त्री की भूमिका नगण्य होने लगी तो सामाजिक विकास के परिदृश्य से भी वह गायब होने लगी। समूहों के बीच परस्पर संघर्ष से प्राप्त भूमिधन और पशुधन के साथ अंतःपुर में अवस्थित स्त्रियाँ भी संपत्ति के रूप में गिनी जाने लगीं। संतान की पहचान जब पुरुष से होने लगी तो स्त्री जीवन को संतानोत्पादकता तक सीमित कर दिया गया। कृषि-आधारित विकसित सामंती समाज में स्त्रियाँ अब पुरुष की संपत्ति थीं जिनका संरक्षण न केवल उसका दायित्व था, बल्कि समाज में उसकी प्रतिष्ठा का प्रतीक भी था। स्त्री की भूमिका अब उत्पादन प्रक्रिया में नहीं बल्कि पुनर्रूत्पादकता तक अर्थात केवल उसकी यौनिकता तक सीमित हो गयी। अब वह पुरुष की भोग्या थी, संतानोत्पत्ति का साधन भर थी। इसके साथ ही परिवार की संरचना की अवधारणा विकसित हुई, उत्तराधिकार के प्रश्न उठे तथा स्त्री की भूमिका और अधिक सीमित हो वंशबेल के दायित्व तक सिमट गयी।
भूमि का स्वामित्व, पशुधन और संपत्ति की रक्षा पुरुष के शौर्य और पराक्रम पर निर्भर था लेकिन स्त्री जो उसी की तरह हाड़-मांस की बनी थी, मन और मस्तिष्क के गुणों से परिपूर्ण थी, विचार और संवेदना के संवेगों से संचालित थी-उसे जड़ और मूक बनाना, विचार शून्य, उद्वेग और संवेदना रहित बनाना कैसे होता ? उत्तर वैदिक काल तक वर्णव्यवस्था स्थापित हो चुकी थी। बड़े भू-स्वामियों का वर्चस्व, मुख्य उत्पादन के संसाधन के रूप में कृषि का विस्तार दासों और शूद्रों के रूप में सस्ते या मुफ़्त श्रम की मांग करता था इसलिये लंबे समय तक संहिताओं और स्मृतियों के रूप में सामाजिक नियम-कानूनों का निर्माण होता रहा। उपनिषद, पुराण आदि धर्मग्रंथों ने सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था के संदर्भ में जहाँ चारों वर्णों की भूमिका को न सिर्फ स्थापित किया बल्कि उसे पुरुष वर्चस्ववादी दृष्टि से व्याख्यायित करते हुए नीति-रीति बना नियमबद्ध कर कठोरता से लागू किया। सामाजिक संगठन में ब्राह्मणों की आधिकारिक भूमिका पूर्णतः मान्य हो चुकी थी। राज्य व्यवस्थापक और सामाजिक व्यवस्थापक के रूप में क्षत्रिय और ब्राह्मण समुदाय परस्पर सहयोगी थे। स्त्राी जो अब मात्रा भोग्या के रूप में थी और जननी का दायित्व वहन कर रही थी, वह भी चतुवर्णीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था के नियम-कानूनों से संचालित थी। इस प्रकार दास, शूद्र और स्त्रियों के अमानवीय शोषण के सामाजिक नियम अब धर्मशास्त्रों द्वारा सम्मत थे जिसे राज्य व्यवस्था का समर्थन प्राप्त था और जिनके विरुद्ध जाने का किसी समाज-इकाई या समूह का साहस नहीं था, क्योंकि इस दशा में कठोर दंड विधान की व्यवस्था थी।
इस पृष्ठभूमि के साथ आज के संदर्भों में स्त्राी सर्जनात्मकता की बात करना शताब्दियों की यात्रा की पड़ताल करना जैसा है। मानव समाज के विकास का इतिहास वास्तव में शूद्रों और स्त्रियों के निरंतर बढ़ते अवमूल्यन और शोषण का इतिहास है।
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धर्म सम्मत सामाजिक नियम-कानूनों ने स्त्री को घर की चारदीवारी के भीतर सीमित कर उसे सामाजिक विकास की मुख्य धारा से अलग किया लेकिन उससे भी अधिक आपराधिक कृत्य हुआ उसे मानसिक-वैचारिक स्तर पर गुलामी की जंजीरों से जकड़ना। आज 21वीं सदी में जब बड़े सामाजिक परिवर्तनों के हम गवाह हैं लेकिन मानसिक गुलामी की ज़हनियत को दूर करना कितना मुश्किल है और इस बदलाव में कितने युग बीतेंगे… कहा नहीं जा सकता। इसके बावजूद स्त्री सर्जनात्मकता ने पिछड़े डेढ़-दो सौ वर्षों में न केवल अपनी प्रभावी उपस्थिति दिखाई है बल्कि इतिहास में नये आयाम भी रचे हैं। आज स्त्री-लेखन साहित्यिक चर्चा में एक मुख्य विषय है। समकालीन स्त्री रचनाकारों ने ऐतिहासिक-सामाजिक विकास क्रम की स्थितियों में बड़ी सीमा तक संविधान-प्रदत्त बराबरी के अधिकारों का उपयोग करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त की है। सदियों से दबी-कुचली स्त्री की आवाज़ को शब्द दिये हैं और समकालीन संदर्भों में स्त्री-स्वंत्रता और समानता के विभिन्न आयामों को अपनी सर्जनात्मकता द्वारा साहित्य में स्थापित किया है।

आज न सिर्फ हिंदी बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं में स्त्री-जीवन के प्रश्नों और मनोभावों को लेखन का विषय बनाकर भारतीय साहित्य को समृद्ध किया गया है। स्त्री-लेखन आज साहित्य के केंद्र में है लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने के लिये प्रारंभिक अवस्थाओं में जिन सर्जक-साधकों ने संघर्ष किये, वह बेहद महत्वपूर्ण हैं। आज समाज-संस्कृति की जिस ठोस धरती पर स्त्री -लेखन अपने मज़बूत पैरों पर खड़ा है, उस बंजर-पथरीली, कांटों भरी भूमि को हथियाने, उसे गोड़कर समतल करने और आगे आने वाली रचनाकार पीढ़ी के लिये रास्ता बनाने का काम जो पूर्ववर्ती रचनाकारों ने किया, उनके अनथक संघर्ष का ऐतिहासिक महत्व है जो सर्जनात्मकता की राह में रोशनी बिखेरता हुआ प्रेरणा पुंज है। इसे स्त्री सर्जनात्मकता का ऐतिहासिक विकास क्रम ही कहा जा सकता है। यहाँ यह जोड़ना आवश्यक है कि यह परिवर्तन नवजागरण काल से पहले संभव नहीं था। हम इतिहास की बहसों में नहीं जाना चाहते। आज कल इस पर बहस हो रही है कि इसे नवजागरण काल कहा जाय या पुनर्जागरण कहना ठीक होगा। इतिहासकार इस समय के व्यक्तियों व समाज सुधार आंदोलनों की विसंगतियों, द्वंद्वों और उसके सार्थक-अनर्थक पक्षों पर बौद्धिक बहस कर रहे हैं। तत्कालीन परिस्थितियों में बन रहे नये इतिहास के प्रत्यक्ष अनुभव और प्रमाणित स्थितियों के आधार पर कहना समीचीन होगा कि अंग्रेज़ों के बढ़ते राजनैतिक प्रभाव ने जो सामाजिक वातावरण निर्मित किया और जिसे लोगों ने नवजागरण काल कहा, स्त्री जीवन के प्रति बदलाव का वातावरण उसी से पैदा हुआ।

अंग्रेज़ी राज्य को सामाजिक भावभूमि पर मजबूती देने के लिये मिशनरियों की भूमिका अग्रणी थी। उन्होंने सामान्यतः शिक्षा का वातावरण बनाया और उसके साथ ही स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में पहल की। बंगाल में ब्रह्म समाज आंदोलन और उत्तर भारत में आर्य समाज आंदोलन अंग्रेज़ों और मिशनरियों के शिक्षा प्रसार कार्यक्रमों के (कुछ हद तक) प्रतिक्रिया स्वरूप उपजे क्योंकि यह संदेह व्यक्त किया जा रहा था कि मिशनरी अंग्रेज़ी शिक्षा के साथ-साथ ईसाईयत की शिक्षा पर जोर देते हैं और धर्मांतरण के लिये प्रोत्साहित करते हैं। भद्र समाज अंग्रेज़ी शिक्षा-दीक्षा के माध्यम से दुनिया के दूसरे भागों की समाज व्यवस्था, संस्कृति से परिचित हो रहा था। अपने भारतीय समाज की रूढ़ियों, वर्ण व्यवस्था से उपजी भेदभाव की पद्धति, सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों और विधवाओं की दुर्गति के बारे में परंपरावादी सोच से अलग नयी संवेदनशील दृष्टि से विचार कर रहा था। इसलिये स्त्री प्रश्नों पर, उनके प्रति दमनकारी परंपरागत व्यवस्था पर सवाल इसी काल में उठाये जा सकते थे। यंग बंगाल मूवमेंट के साथ ब्रह्मसमाज का बढ़ता प्रभाव और राम मोहन राय के अथक प्रयासों के बाद 1832 से सती प्रथा निषेध कानून ने इस नवोन्मेषकारी वातावरण की शुरूआत कर दी थी।
इस नये बनते वातावरण में सबसे पहले स्त्री शिक्षा का प्रश्न ही कंेद्र में आया क्योंकि परिवर्तन के दरवाजे शिक्षा की कुंजी से ही खुलते हैं जहाँ से नयी सृजन की राहें निकलती हैं।
इस क्रम में सावित्राी बाई फुले संभवतः पहली महिला शिक्षिका, पहली महिला शिक्षाविद के साथ ही पहली महिला कवयित्री और पहली महिला मुक्तिदात्री के रूप में स्मरण की जायेंगी। महाराष्ट्रीयन समाज के पिछड़े वर्ग से आने वाली इस अविस्मरणीय महिला का विवाह महात्मा कहलाये गये समाज सुधारक, लेखक और विचारक ज्योतिबा फुले से हुआ था। उच्च जातियों की संकीर्णता और रूढ़वादिता के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश अछूतों के सम्मान और अधिकार के लिये संघर्ष करने वाले ज्योतिबा फुले ने घर-परिवार, समाज का विरोध सहा और इसमें सावित्री बाई फुले कदम-दर-कदम साथ रहीं। पति की प्रेरणा और मदद से स्वयम् पढ़ना-लिखना सीखा, शिक्षित हुईं और फिर 1848 में प्रथम बालिका विद्यालय की स्थापना कर बालिकाओं को शिक्षा देने के काम में जुट गयीं। विद्यालय जाते समय रास्ते में सवर्ण समाज द्वारा उन पर गंदगी-कीचड़ फेंका जाता, अपशब्द कहे जाते लेकिन सारी कठिनाइयाँ सहते हुए उन लोगों ने और भी विद्यालय खोले और शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक न्याय के सभी आंदोलनों में अग्रणी रहे। ज्योतिबा स्वयम् कवि थे लेकिन सावित्री बाई फुले भी कविताएँ लिखती थीं। स्त्री अधिकारों के लिये संघर्ष करते हुए उन्होंने लेख भी लिखे जिनका बाद में प्रकाशन हुआ। जाहिर है संघर्षों की आँच में तपे हुए हाथों की कलम से ही प्रेरणा के स्वर निकलते हैं।

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