स्त्री शिक्षा के लिये समर्पित रुकैया सखावत हुसैन का साहित्य में भी बड़ा योगदान है। वे उन प्रारंभिक महिलाओं में हैं जिन्होंने स्त्री विरोधी सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों के विरुद्ध तर्कपूर्ण ढंग से लिखा और साथ ही साहित्य-सृजन में योगदान दिया। बांग्ला भाषा में उनकी अनेक पुस्तकें हैं-मोतीचूर-प्रथम खण्ड (1904), मोतीचूर-द्वितीय खंड (1922)। मोतीचूर में अनेक निबंध ठोस तर्कों पर आधारित हैं। उन्होंने साहसपूर्वक लिखा “धर्मों की पुस्तकें आचरण-संहिताओं तथा पुरुषों द्वारा दिये गये निर्देशों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। पुरुष संतों द्वारा दी गयी व्यवस्थाएँ (आज्ञाएँ) यदि महिला संतों द्वारा दी गयी होती तो एकदम उलट दी जातीं।’’

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता के ऐतिहासिक सन्दर्भों को समेटता डॉ ० नमिता सिंह के आलेख की चौथी  क़िस्त …..

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता: ऐतिहासिक संदर्भ

डॉ० नमिता सिंह

लगभग इसी काल खंड में रुकैया खातून, (1884) का जन्म रंगपुर (जो अब बंगला देश में है) जिले के पेराबाउड में एक जमींदार परिवार में हुआ था। परिवार के कड़े नियम, बचपन से ही कट्टर पर्दा प्रथा, सिवाय कुरान के शिक्षा का निषेध जैसे परिवार के कड़े नियम उन्होंने झेले। रुकैया की शिक्षा के प्रति तीव्र इच्छा देख रात को मोमबत्ती जलाकर उनके भाई अंग्रेजी के प्रारंभिक पाठ पढ़ाने लगे। सोलह वर्ष की अवस्था में भागलपुर के डिप्टी मजिस्टेड सैयद सखावत हुसैन से जो अधेड़ उम्र के विधुर थे, विवाह हो गया। विवाह के बाद पति ने उनकी शिक्षा के प्रति तीव्र इच्छा देखकर अंग्रेजी सीखने में मदद की। रुकैया ख़ातून 13 वर्ष बाद ही विधवा हो गयीं लेकिन फिर उन्होंने भागलपुर में सखावत मेमोरियल गर्ल्स स्कूल शुरू किया। कुछ समय बाद ही पारिवारिक कारणों से अंततः स्कूल को कलकत्ता स्थानांतरित करना पड़ा। 11 बच्चियों से शुरू हुआ यह स्कूल उनकी मृत्यु के बाद सरकारी नियंत्रण में आ गया और आज ‘सखावत मेमोरियल गवर्मेन्ट गर्ल्स स्कूल’ के रूप में एक प्रतिष्ठित शिक्षा केन्द्र है।
रुकैया खातून की एक बेहद चर्चित और बहुउद्धृत कहानी है: ड्रीम ऑफ़ सुल्ताना (हिंदी अनुवाद: सुल्ताना का सपना) जिसमें एक लड़की जो अपने चारों ओर के स्त्री पराधीनता के सामाजिक वातावरण से मुक्ति पाना चाहती है वह कल्पना में सपना देखती है जो यथार्थ की परिस्थितियों से बिल्कुल उलट है। सपने में सुल्ताना को वही स्थितियाँ उपलब्ध हैं जिनका उपभोग दैनन्दिनी में लड़के या पुरुष समाज करता है। अंग्रेज़ी में लिखी गयी इस कहानी का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ।

स्त्री शिक्षा के लिये समर्पित रुकैया सखावत हुसैन का साहित्य में भी बड़ा योगदान है। वे उन प्रारंभिक महिलाओं में हैं जिन्होंने स्त्री विरोधी सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों के विरुद्ध तर्कपूर्ण ढंग से लिखा और साथ ही साहित्य-सृजन में योगदान दिया। बांग्ला भाषा में उनकी अनेक पुस्तकें हैं-मोतीचूर-प्रथम खण्ड (1904), मोतीचूर-द्वितीय खंड (1922)। मोतीचूर में अनेक निबंध ठोस तर्कों पर आधारित हैं। उन्होंने साहसपूर्वक लिखा “धर्मों की पुस्तकें आचरण-संहिताओं तथा पुरुषों द्वारा दिये गये निर्देशों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। पुरुष संतों द्वारा दी गयी व्यवस्थाएँ (आज्ञाएँ) यदि महिला संतों द्वारा दी गयी होती तो एकदम उलट दी जातीं।’’

उनकी अन्य पुस्तकें हैं, पद्मराग (1924), अवरोधवासिनी (1931)। अबरोधवासिनी में पर्दाप्रथा की कट्टरता के विविध प्रसंग हैं जो स्त्रियों के जीवन की दारुण घटनाओं पर आधारित हैं जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बाल्यावस्था से लेकर जीवन के अंतिम समय तक पर्दा के ये रूप, स्त्री जीवन का अभिशाप थे। ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ के समान ‘अवरोध वासिनी’ में उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं के अमानवीय बंदीकरण के ठोस उदाहरण दिये हैं। अपनी अधिकांश रचनाओं में उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को बलपूर्वक उनके घरों की चारदीवारी के भीतर दारुण कैद में डाले जाने के विरुद्ध विवेकपूर्ण तर्क दिये तथा शिक्षा के अधिकार पर जोर दिया। स्त्री-पुरुष के बीच असमानताओं का वर्णन करते हुए उन्होंने सभी संप्रदायों को दोषी ठहराया। ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ के समान उन्होंने भी स्त्रियों के आभूषणों के प्रति लालसा को धिक्कारते हुए उन्हें दासता का प्रतीक कहा। उनके निबंधों में समाज सुधार की जरूरतों पर तथा स्त्री -शिक्षा और उसके सशक्तीकरण पर बल दिया गया है। उन्होंने कविताएँ भी लिखीं और अभी भी उनकी अनेक अप्रकाशित पांडुलिपियाँ प्रकाशन की प्रतीक्षा कर रही हैं। पद्मराग उनका एकमात्र उपन्यास है जिसमें स्पष्ट संदेश है कि विवाह स्त्री जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। 9 दिसंबर 1932 को जब उनकी मृत्यु हुई, पिछली रात लिखा गया उनका अधूरा लेख-‘महिलाओं के अधिकार’ मेज पर मिला।

बीसवीं सदी की शुरूआत में जन्मी (1909) प्रख्यात मलयालम लेखिका ललितांबिका अंतर्जनम का लेखन भी मलियाली समाज की महिलाओं (विशेष रूप से कुलीन नम्बूदिरी ब्राह्मण स्त्रियों) के परंपरागत शोषण और दारुण अत्याचार को केंद्र में रखता है। केरल के उच्चकुलीन (नम्बूदिरी) ब्राह्मण परिवारों में केवल बड़े पुत्र को वैधानिक रूप से विवाह का अधिकार था। परिवार के अन्य पुरुष ‘संबंधम’ प्रथा द्वारा दूसरी जाति की स्त्रियों से संबंध बना सकते थे और सामान्यतः मातृसत्तात्मक संरचना वाले ‘नायर’ समाज की स्त्रियों के साथ उनका संबंध होता था। नायर स्त्रियों से प्राप्त संतानों को किसी प्रकार के वंशानुगत अधिकार प्राप्त नहीं होते थे। नम्बूदिरी कन्यायें अक्सर इसी कारण अविवाहित रह जाती थीं और इसीलिये अगर 80 वर्ष का नम्बूदिरी पुरुष किसी बालिका से भी विवाह कर ले तो यह उस बालिका का सौभाग्य गिना जाता था।

नम्बूदिरी स्त्रियाँ दुनिया से कटी हुई रहती थीं और भोर से लेकर रात तक श्रम करती उनका जीवन धुएँ भरी रसोई और सीलन भरे आँगन से लेकर पति की शय्या तक में बीत जाता था। उन्हें खिड़की से बाहर देखने तक की मनाही थी और अगर कभी बाहर निकलना ही पड़े तो मोटी चादर में लिपटी पूरी तरह से पर्दे में, बड़े से छाते के भीतर वे मुँह छिपाये रहतीं। इसी के विपरीत निम्न जाति की स्त्रियों को कुलीन समाज के सामने सीना ढकने की मनाही थी और उन्हें कमर तक वक्षस्थल खुले रखने होते थे।

ललितांबिका अंतर्जनम ने स्वयं के प्रयासों से, लुकछिप कर पढ़ना-लिखना सीखा। वे कुलीन नम्बूदिरी स्त्रियों के बंदी जीवन से बेहद आहत थीं। छिप-छिपकर रात में लैंप की मद्धिम रोशनी में लिखने-पढ़ने के कारण उनकी आँखें कमजोर हो गयी थीं। इन परिवारों में एक प्रथा और थी। किसी भी स्त्री के चरित्र के बारे में यदि किसी ने संदेह किया तो स्मार्त विचारम पद्धति से पुरुष समाज उस स्त्री का पारिवारिक अदालत में विचार करता। अधिकांश में अंततः स्त्री ही दोषी पायी जाती। स्मार्त साधनम् प्रक्रिया के द्वारा उसका अंतिम संस्कार कर उसे घर से बाहर निकाल दिया जाता और वह मृत घोषित कर दी जाती। वह स्त्री भटकने, आत्महत्या करने अथवा अपनी मर्जी मुताबिक जहाँ शरण मिले जाने को स्वतंत्रा होती। आपसी रंजिश या मनमानी न कर पाने के कारण कितनी ही स्त्रियों को स्मार्त साधनम द्वारा मृत घोषित कर जीते ही मार दिया जाता। इस अमानवीय प्रथा को केंद्र में रखकर ललितांबिका अंतर्जनम ने बड़ी उम्र में अपना सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘अग्नि साक्षी’ लिखा जो पहले ‘मातृभूमि’ में धारावाहिक छपा और फिर 1976 में पुस्तक कार में आया। ‘अग्निसाक्षी’ मलयालम साहित्य में क्लासिक उपन्यास का स्थान रखता है। इसके अतिरिक्त उनके नौ कहानी संग्रह और छह कविता संग्रह हैं। उनका लेखन स्त्रियों के प्रति समाज की अमानवीय परंपराओं, पाखंड और उनके बंदी जीवन के प्रतिरोध में खड़ा होता है और स्त्री यौनिकता तथा स्वातंत्रय के प्रश्नों को संवेदनशील रूप में प्रस्तुत करता है। बीसवीं सदी की जागरुक और साहसी स्त्री लेखन में ललितांबिका अंतर्जनम अग्रणी हैं।

मलयालम साहित्य में नयी दृष्टि से स्त्री यौनिकता के प्रश्नों को कमलादास (माधवी कुट्टी) जिन्होंने जीवन के अंतिम वर्षों में अपना धर्म परिवर्तन कर कमला सुरैया नाम रख लिया था, ने अपनी बेहद चर्चित पुस्तक ‘एंते कथा’ (माय स्टोरी-मेरी कहानी) में स्त्री के अंतर्मन को टटोलते हुए उसके मनोभाव, इच्छा-आकांक्षाओं के साथ प्रेम और देह के प्रश्नों को भी समेटा। इस संदर्भ में पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम का आत्मकथात्मक उपन्यास ‘रसीदी टिकट’ ऐसे ही बेबाक तरीके से स्त्री के विचार स्वातंत्रय और सामाजिक वर्जनाओं के सम्मुख स्त्री-पुरुष संबंधों पर सर्जनात्मक रूप से सक्रिय संवेदनशील स्त्री का पक्ष प्रस्तुत करता है। ‘रसीदी टिकट’ का रचनाकाल भी बीसवीं शताब्दी का उत्तर-मध्यकाल है।

स्त्री लेखन के इस ऐतिहासिक क्रम में तीन अन्य लेखिकाओं का उल्लेख करना आवश्यक है जिन्होंने बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की और नयी राहों का निर्माण किया। 1907 में जन्मी महादेवी वर्मा ने आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास के प्रारंभिक चरणों में कविता और गद्यलेखन, दोनों में ही अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई और छायावाद के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में स्थापित हुईं। केवल साहित्य ही नहीं उनका अनुराग संगीत, कला के क्षेत्र में भी था। वे गांधी जी की अन्य भक्त थीं, खादी पहनती थीं, चर्खा चलाती थीं और स्वाधीनता आंदोलन में सहयोगी थीं। बाद में स्त्री शिक्षा के लिये उनकी प्रतिबद्धता उनके द्वारा लड़कियों के लिये शुरू किये गये कन्या विद्यापीठ के रूप में हुई। वे संगीत में निपुण और उच्चकोटि की कलाकार भी थीं। कविता में उस संवेदनशील कवयित्राी का सहज मानवीय प्रेम आध्यात्मिकता के आवरण में आबद्ध हो मूर्त हुआ जिसने छायावाद की रहस्यवादी भाव विधा का सृजन किया। लौकिक-अलौकिक प्रेम के बीच कड़ी बनी उनकी कविताएँ दीपशिखा, नीरजा, रश्मि, यामा और सांध्यगीत में संग्रहित हैं। संभवतः प्रेम और अनुराग-विराग की मुक्त भावनाओं को निस्संकोच जैसे कमलादास और अमृता प्रीतम ने व्यक्त किया, वह तत्व महादेवी वर्मा की शैली में अनुपस्थित था। इसीलिये ‘आधुनिक मीरा’ जैसा विशेषण महादेवी पर सटीक बैठता है। आज से पाँच सौ साल पहले घर-परिवार, समाज और परंपराओं की रीति-नीति को ध्वस्त कर अपनी अस्मिता और भावाभिव्यक्ति के अधिकार को सुरक्षित रखने हेतु मीरा ने अपना जीवन और सर्जनात्मकता इष्ट देव के नाम को समर्पित कर दी और साहित्य को अपनी काव्य प्रतिभा से न सिर्फ समृद्ध किया, विद्रोह के स्वरों को भी मुखर किया। महादेवी ने भी एक पारलौकिक, निर्गुण सत्ता को अपनी भावनाएँ समर्पित कर उन्हें काव्य रूप प्रदान किया।
महादेवी जी ने गद्य के रूप में स्मृति की रेखाएँ, अतीत के चलचित्र और शृंखला की कड़ियाँ जैसी कृतियाँ दीं। ‘शृंखला की कड़ियाँ’ उनके सामाजिक चिंतन और स्त्री की पराधीनता के स्वरूप को इंगित करती हुई महत्वपूर्ण पुस्तक है। स्त्री विमर्श के क्षेत्र में फ्रांस की नारीवादी लेखिका सीमोन द बउवा की पुस्तक ‘दा सेकिंड सेक्स’ जो 1940 में आई, प्रारंभिक पुस्तक समझी जाती है। शृंखला की कड़ियाँ जो 1936 में प्रकाशित हुई, उसमें महादेवी स्त्री पराधीनता की मानसिकता पर विस्तार से चर्चा करती हैं और सशक्तीकरण हेतु शिक्षा तथा स्वावलंबन पर जोर देते हुए मानसिक दासता से मुक्ति पाने का आग्रह करती हैं। निश्चित रूप से इस पुस्तक के लेख पराधीन भारत में स्त्री स्वातंत्राय के प्रश्नों को सिलसिलेवार प्रस्तुत करते हैं।
महादेवी वर्मा के अलावा 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में दो अन्य क्रांतिकारी भारतीय स्त्रियों का जन्म हुआ जो राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में अग्रणी थीं और अपने व्यापक सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ अपने कालजयी लेखन के लिये जानी जाती हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान (जन्म 16 अगस्त, 1904) न केवल साहित्य में बल्कि भारतीय जनमानस में अपनी कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ के माध्यम से अमर रहेंगी। नौ वर्ष की अवस्था में नीम के पेड़ पर लिखी कविता प्रतिष्ठित पत्रिका ‘मर्यादा’ में छपी। हमेशा खादी पहना और अपने कर्मठ तथा राष्ट्रीय आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े पति ठाकुर लक्ष्मणसिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाई। 1923 और 1942 में वे जेल भी गयीं। जब उनकी रचनाकार बेटी सुधा चौहान का विवाह प्रेमचंद के लेखक बेटे अमृतराय से हुआ उस समय दोनों पति-पत्नी जेल में थे। राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत उनकी ओजपूर्ण कविताएँ-झांसी की रानी के अतिरिक्त वीरों का कैसा हो बसंत तथा जलियाँ वाले बाग में बसंत बहुत चर्चित हैं। उनके तीन काव्य संकलन त्रिधारा, मुकुल और ये कदंब का पेड़ प्रकाशित हुए।
सुभद्रा कुमारी चौहान एक कुशल गद्यकार भी थीं और विभिन्न सामाजिक-राजनैतिक पक्षों को केंद्रित कर उन्होंने अनेक कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियों के तीन संग्रह, बिखरे मोती, उन्मादिनी और सीधे सादे चित्र उपलब्ध हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक प्रश्न हैं, जात-पाँत, धार्मिकता की सीमाएँ ध्वस्त करते कथानक हैं और स्त्री-अस्मिता, स्वाभिमान के प्रसंग हैं। उनकी कहानियाँ उनके आसपास के परिवेश और जीवनानुभवों से उपजी हैं इसीलिये उनमें ईमानदारी के साथ-साथ भावों की गहराई है जो पाठक के हृदय में उतरती है। राष्ट्रीय आंदोलन और महात्मा गांधी के जीवन-दर्शन से निर्मित समाज-सुधार के आदर्श उन्होंने अपने जीवन में व्यवहारिक तौर पर ग्रहण किये। धर्म-जाति-समुदाय आधारित किसी प्रकार के भेदभाव का उनके जीवन में कोई चिह्न नहीं था और यह उनके जीवन-व्यवहार की ओढ़ी हुई नहीं, बल्कि सामान्य जीवन गति थी। नवजागरण काल से लेकर गांधी के जीवनकाल में इन आदर्श स्थितियों पर बहुत चर्चा हुई, व्यापक उपदेश-विमर्श हुए लेकिन व्यवहार में इसे अपने जीवन का ढंग बनाने का साहस कुछ ही लोगों में देखा गया। सुभद्रा कुमारी चैहान इस रूप में एक महान व्यक्तित्व थीं। उनके घर, चैके के दरवाजे सभी के लिये खुले थे और यह कोई प्रदर्शन-आडंबर नहीं था बल्कि वह उनका सामान्य व्यवहार था। उनकी आत्मकथा ‘हिंदी साहित्य के निर्माता’ शृंखला में साहित्य अकादमी ने प्रकाशित की जिसे उनकी पुत्री सुधा चौहान ने ‘जैसा जीवन जीया’ लिखा है, उसमें उन्होंने ऐसे अनेक प्रसंगों का वर्णन किया है। जबलपुर में एक बार जब वहाँ कांग्रेस की सरकार थी और वे कांग्रेसी विधायक थीं, मेहतरों ने हड़ताल की। सरकार हड़ताल तोड़ना चाहती थी और उनका दमन कर रही थी। ऐसे में सुभद्रा जी उन मेहतरों के घरों में जातीं, उनकी औरतों-बच्चों को धीरज बंधाती और स्नेह वश वे उनको चाय बनाकर देते, वे पूरे सम्मान से उसे ग्रहण करतीं। इसी तरह उनका घर, चैका और खानपान सभी के लिये खुला था, कवि, लेखक, भद्रजन, अछूत, गरीब, अमीर, किसी प्रकार के भेदभाव के लिये कोई जगह नहीं थी और सभी को, जो खाने पीने के लिये उपलब्ध होता, वे परोस देतीं। उनका न सिर्फ़ साहित्य, बल्कि उनका जीवन भी उतना ही प्रेरणास्पद है।

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