डॉ रशीद जहाँ वैचारिक रूप से समृद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता भी थीं और अपने वामपंथी पति महमूद ज़फर के साथ सभी राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों में सहयोग करती थीं। 1936 में जब प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई और लखनऊ में उसका स्थापना सम्मेलन हुआ, उसमें उनकी अग्रणी भूमिका थी। समाज के साथ उनके निकटतम संपर्क और व्यापक सरोकारों से उनका लेखन अपने समय का जीवंत और प्रेरणास्पद दस्तावेज है। उनकी कहानियों ने उर्दू कथा साहित्य की आगे आने वाली एक संपूर्ण पीढ़ी को प्रभावित किया और एक यथार्थवादी प्रगतिशील धारा का निर्माण किया।”

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता के ऐतिहासिक सन्दर्भों को समेटता डॉ ० नमिता सिंह के आलेख की पांचवी क़िस्त …..

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता: ऐतिहासिक संदर्भ 

डॉ० नमिता सिंह

आज साहित्य में और सामाजिक जीवन में भी स्त्री विमर्श का दायरा बेहद संकुचित हो गया है और केवल स्त्री अधिकार और स्त्री अस्मिता के लिये की जाने वाली जद्दो-जहद पर ही चिंतन करता है। ये आधारभूत सामाजिक प्रश्न जो सामाजिक अलगाव और भेदभाव की पुरातन पद्धति से जुड़े हैं, इन्हें स्त्री विमर्श के दायरे में लाकर विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास नहीं किया जाता। संभवतः इसीलिये स्त्री और पुरुष समाज के बीच परंपरागत अलगाव और भेदभाव की स्थितियों में वांछित सुधार नहीं हो पा रहा है। इस रूप में सुभद्राकुमारी चौहान का जीवन आदर्श की परिधि में आता है। उनकी कथनी और व्यवहार में भेद नहीं था। इसके अतिरिक्त स्त्री प्रश्नों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रति चिंता और क्रियाशीलता ने उन्हें एक प्रमुख आंदोलनकारी के रूप में स्थापित किया। उनके विचारों और कर्म की समरूपता के कारण ही उनकी लेखनी की प्रखरता से ओत-प्रोत उनकी रचनाएँ, भारतीय समाज का एक अनिवार्य हिस्सा बन गयी हैं।

स्त्री अस्मिता के नये आयामों से उन्होंने आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त किया। निरंतर जीवन संघर्ष के विविध रूपों से गुजरते हुए यह महान व्यक्तित्व अदम्य आशावाद से हमेशा परिपूर्ण रहा, मैंने हंसना सीखा है\ मैं नहीं जानती रोना। बरसा करता पलपल पर / मेरे जीवन में सोना… कहते हैं होती जाती/ खाली जीवन की प्याली। पर मैं उसमें पाती हूँ/ प्रतिपल मदिरा मतवाली। …सुख भरे सुनहले बादल/ रहते हैं मुझको घेरे/ विश्वास, प्रेम, साहस हैं/ जीवन के साथी मेरे।
1905 में जन्मी एक और क्रांतिकारी महिला जो राजनीति और सामाजिक मोर्चे पर सक्रिय रहीं और अपने साहित्य के माध्यम से दबे-कुचले पिछड़े समाज की सच्चाइयों को व्यापक पाठक वर्ग के सामने प्रस्तुत करने पर रूढ़िवादी समाज के गहन विरोधों को झेला, उन डा. रशीद जहाँ ने अपने समकालीन फैज़ अहमद फ़ैज जैसे युवा रचनाकारों को भी वैचारिक स्तर पर प्रेरित किया तथा सामाजिक स्तर पर उन्हें जागरुक करने का बीड़ा भी उठाया। डॉ रशीद जहाँ के पिता शेख अब्दुल्ला (कश्मीर के पूर्व वज़ीरे आजम नहीं) मुस्लिम स्त्री शिक्षा में अग्रणी थे और 1906 में उन्होंने घोर विरोध के बावजूद अपनी पत्नी के सहयोग से मुस्लिम लड़कियों के लिये अलीगढ़ में एक स्कूल खोला। अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे, प्रगतिशील विचारों के माता-पिता की यह सबसे बड़ी संतान थीं। यह मुस्लिम गर्ल्स स्कूल आज विशाल वृक्ष के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीमेन्स कालेज के रूप में प्रख्यात है।

रशीद जहाँ ने अलीगढ़ के बाद लखनऊ के आई.टी.काॅलेज से शिक्षा प्राप्त की और फिर लेडी हार्डिंग्ज से मेडिकल का कोर्स कर लखनऊ में मेडिकल आफिसर के रूप में तैनात हुईं। काॅलेज में रहते हुए काॅलेज मैगज़ीन के लिये उन्होंने पहली कहानी ‘द टाॅम टाॅम बीट्स’ लिखी जिसका उर्दू अनुवाद बहुत बाद में ‘सलमा’ के रूप में आया। सदैव खादी की धोती पहनने वाली रशीद जहाँ महात्मा गांधी के स्वाधीनता आंदोलन से बहुत प्रभावित थीं और स्वाधीनता आंदोलन की गतिविधियों में भरसक सहयोग करती थीं। लखनऊ में महिला चिकित्सक के रूप में वे व्यापक महिला समाज के संपर्क में आईं। उन्होंने देखा कि मुस्लिम समाज में अभिजात्य वर्ग की कुलीन कही जाने वाली महिलाएँ थीं तो निम्न वर्ग की, जीवन के लिये जद्दो-जहद करने वाली महिलाएँ भी थीं। सामंती समाज की इन कुलीन महिलाओं की स्थिति नरक से भी बदतर थी। अपने पति के लिये सिर्फ बच्चे पैदा करना और हमेशा सौत के डर से आक्रांत पर्दे के पीछे मूक-बधिर की तरह जिं़दगी गुजार देना उनकी नियति थी। उनकी त्रासद जिं़दगियों को उन्होंने पूरी संवेदना के साथ नजदीकी से देखा और यही उनके आगे के लेखन की भावभूमि और सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में कर्मभूमि बनी। काॅलेज के दिनों में लिखी गयी ‘सलमा’ कहानी (1923) में भी स्त्री के अपने बारे में स्वयम् निर्णय लेने के अधिकार को उन्होंने विषय बनाया था।
सज्जाद ज़हीर समेत चार युवा रचनाकारों का संग्रह ‘अंगारे’ 1932 में जब प्रकाशित हुआ तब रूढ़िवादी मुस्लिम समाज ने उन कहानियों को अश्लील, धर्म और परंपरा के विरुद्ध कहकर उसका भीषण विरोध किया। यूँ तो ‘अंगारे’ में सज्जाद जहीर, अहमद अली और महमूदज़्ज़फर के साथ रशीद जहाँ की कहानी ‘दिल्ली की सैर’ और नाटक ‘पर्दे के पीछे’ सम्मिलित थे लेकिन रशीद जहाँ का विरोध सबसे ज़्यादा इसलिये हुआ कि महिला होकर उसे मुस्लिम समाज के अंतरंग वातावरण की आलोचना करने की हिम्मत कैसे हुई। उनके नाक-कान काट लेने का फ़तवा जारी किया गया। उग्र विरोध के चलते अंततः ‘अंगारे’ प्रतिबंधित हो गयी। ‘दिल्ली की सैर’ कहानी में एक संपन्न परिवार का पति अपनी पर्देदार बुर्कापोश पत्नी को लखनऊ से दिल्ली लाकर और स्टेशन पर ही छोड़कर दोस्तों से शहर में मिलने-जुलने चला जाता है। भूखी, प्यासी, डरी-सहमी अकेली पत्नी जो पहली बार अपने शहर से बाहर गयी थी, पूरे समय स्टेशन पर सामान के साथ सामान की तरह ही पड़ी रही। शाम को खा-पीकर और घूम-घामकर पति महोदय आये और वापिसी की यात्रा हुई। यह एक सीधीसादी स्त्री की घोर उपेक्षा और उसके प्रति संवेदनहीनता की कहानी थी। ‘पर्दे के पीछे’ नाटक में कुलीन परिवार की औरतों की घुटन, आँसू, विवशताएँ, देह के शोषण और बीमारियों से जूझते अपने अस्तित्वहीन जीवन का वर्णन है जिसको विषय बनाने और सच्चाई बयान करने के कारण पुरुष समाज की खीझ और गुस्से को उन्होंने झेला।
रशीद जहाँ ने ढेर सारी कहानियाँ और नाटक लिखे। वे नाटक लिखतीं और समय-समय पर उनका मंचन भी होता। उनकी कुछ कहानियाँ ‘वह तथा अन्य कहानियाँ’ संग्रह में सम्मिलित हैं। अधिकांश कहानियाँ तथा नाटक स्त्री समाज की विडंबनाओं और त्रासद जीवन को प्रदर्शित करती हैं। धार्मिक संस्कारों और मान्यताओं की झाड़ में पितृसत्ता ने औरत को मात्र संतान पैदा करने की मशीन समझ लिया है। इस धारणा को उन्होंने अपनी कहानियों, नाटकों के अलावा लेखों में भी कहा और महिला संगठनों के बीच जाकर अपने भाषणों के दौरान भी बार-बार जिक्र किया और उन्हें शिक्षित होने के लिये प्रेरित किया। उनकी कहानियों में सांप्रदायिकता के प्रश्न भी उठाये गये हैं। सामाजिक पाखंड और स्त्री -पुरुष के प्रति समाज के दोहरे मानदंडों पर भी केंद्रित किया है।
रशीद जहाँ वैचारिक रूप से समृद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता भी थीं और अपने वामपंथी पति महमूदज़्ज़्ाफर के साथ सभी राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों में सहयोग करती थीं। 1936 में जब प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई और लखनऊ में उसका स्थापना सम्मेलन हुआ, उसमें उनकी अग्रणी भूमिका थी। उन्हींे के प्रयासों कार्यक्षेत्र दोनों में उन्होंने अपने अदम्य साहस और जिजीविषा का परिचय दिया। कठिन परिस्थितियों में जरूरत पड़ने पर उन्होंने पत्रकारिता भी की और वरिष्ठ राजनैतिक कार्यकर्ताओं के जेल चले जाने पर क्रांतिकारी पत्रिका ‘चिंगारी’ का संपादन, लेखन और प्रकाशन किया। समाज के साथ उनके निकटतम संपर्क और व्यापक सरोकारों से उनका लेखन अपने समय का जीवंत और प्रेरणास्पद दस्तावेज है। उनकी कहानियों ने उर्दू कथा साहित्य की आगे आने वाली एक संपूर्ण पीढ़ी को प्रभावित किया और एक यथार्थवादी प्रगतिशील धारा का निर्माण किया।
सुप्रसिद्ध उर्दू कथा लेखिका इस्मत चुगताई ने स्वयं रशीद जहाँ के बारे में लिखते हुए कहा | सन् 1938 में रशीदा आपा अंगारों वाली रशीदा आपा बन चुकी थीं। अब उनकी सुलगती हुई बातें पल्ले भी पड़ने लगी थीं।… मिट्टी से बनी रशीदा आपा ने सारे बुत मुनहदिम (ध्वस्त) कर दिये थे, जिं़दगी की नंगी सच्चाई सामने आकर खड़ी हो गयी थी…।’ स्वयम् इस्मत चुगताई (जन्म, 1915) ने सामाजिक यथार्थ का वही रास्ता अख्तियार किया और जीवन को उसकी समस्त विद्रूपताओं, पाखंडों और परंपरागत स्त्री के शोषण के विविध रूपों को अपनी कहानियों का केंद्र बिन्दु बनाया। विभाजन से पहले ही उनकी कहानी ‘लिहाफ़’ पर अश्लीलता का आरोप लगा क्योंकि सामंती समाज के भीतर औरत की घुटन और विकृतियों की इस कहानी में चर्चा थी। लाहौर में चले मुकदमे में अंततः यह आरोप निराधार सिद्ध हुआ। इस्मत चुगताई ने विपुल साहित्य लेखन किया और अपने बेबाक लेखन और विशिष्ट भाषा शैली के कारण जहाँ प्रसिद्धि पाई वहीं कट्टरवादी मुस्लिम समाज के विरोधों का भी समय-समय पर सामना किया। अपनी मृत्यु के समय उन्होंने अंतिम इच्छा के रूप में कब्र में दफ़नाने के बजाय दाह संस्कार की बात की। परिणामतः उन्हें मृत्यु के बाद भी अपने समुदाय से अभद्र और विरोधपूर्ण उद्गार झेलने पड़े।
इस्मत चुगताई की पहली कहानी ‘गेंदा’ थी जो उर्दू की सर्वोत्कृष्ट पत्रिका ‘साकी’ में छपी। उनका पहला उपन्यास ज़िद्दी 1941 में आया। मासूमा, सैदाई, जंगली कबूतर, दिल की दुनिया, अजीब आदमी तथा बांदी उनके अन्य उपन्यास हैं। उनके अनेक कहानी संग्रहों में कलियाँ, चोटें, एक रात, छुई-मुई, दो हाथ, दोज़खी, शैतान प्रमुख हैं। उनके लगभग सभी कहानी संग्रह हिंदी में लिप्यांतरित हो चुके हैं। तीन संग्रह अंग्रेज़ी में भी प्रकाशित हुए। उनकी आत्मकथा ‘कागज़ी है पैरहन’ भी हिंदी में अब उपलब्ध है। इस्मत ने मुस्लिम समाज की स्त्रियों की विशेष रूप से निम्न मध्यवर्गीय लड़कियों की दबी-कुचली जिं़दगियों की मनोदशा और समाज के परंपरावादी-पिछड़ेपन की मानसिकता को बहुत शिद्दत से अपनी कहानियों और उपन्यासों का विषय बनाया है।

उपरोक्त संघर्षशील महिलाओं की चर्चा बेहद संक्षिप्त है। हिंदी तथा दूसरी भारतीय भाषाओं में और भी प्रेरक नाम और उनका कृतित्व मिलेगा। सांकेतिक रूप में कुछ प्रतिनिधि नामों की चर्चा ही यहाँ संभव है।

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