उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध की अवधि में जिन भारतीय महिलाओं ने अपनी मेधा, विद्वत्ता और सामाजिक क्षेत्र में आंदोलनकारी व्यक्तित्व से समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित किया तथा स्त्री स्वातंत्रय को सार्थक रूप में ग्रहण कर अपनी शर्तों पर जीवन जिया, पंडिता रमाबाई उनमें अग्रणी हैं। उन्होंने जाति-भेद की परवाह न करते हुए प्रेम विवाह किया और वैधव्य के बाद पूरी तरह समाज को समर्पित हो गयीं। बाल विवाह, वैधव्य, सती प्रथा में बालिका का भस्म होना जैसे अमानवीय कृत्य उन्हें विचलित करते। अंततः उन्होंने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया और इंग्लैण्ड जाकर अंग्रेज़ी का ज्ञान हासिल किया।”

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता के ऐतिहासिक सन्दर्भों को समेटता डॉ ० नमिता सिंह के आलेख की तीसरी क़िस्त …..

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता: ऐतिहासिक संदर्भ 

डॉ० नमिता सिंह

1882 में ही उत्तर भारत में आर्य समाजी विचारों से प्रभावित ‘एक अज्ञात हिन्दू औरत’ ने ‘सीमन्तनी उपदेश’ नामक पुस्तक लिखी जो न सिर्फ दबी-कुचली भारतीय स्त्री के जीवन का चीत्कार है बल्कि स्त्री के प्रति होने वाले अमानवीय शोषण और असम्मान पर पूरी तरह से प्रहार करती है। पहली बार इस पुस्तक का प्रकाशन 01 फरवरी 1982 ई. में हुआ। बाद में डाॅ. धर्मवीर के प्रयासों से उनकी लंबी भूमिका के साथ यह 1988 में पुनः प्रकाशित हुई। डाॅ. धर्मवीर के अनुसार ‘ऐसा प्रतीत होता है कि महिला पढ़ी-लिखी, कुलीन परिवार की थी, निःसंतान थी, पंजाब की थी। धारदार भाषा में यह पुस्तक संभवतः पहले फारसी लिपि में लिखी गयी और किसी अन्य ने इसका देवनागरी में लिप्यांतरण किया।’

तेईस शीर्षकों के अंतर्गत लिखे गये विषयों में कुछ इस प्रकार हैं हिंदी औरतों की हालत, जूती, हिंदी औरतों की पोशाक, प्राचीन औरतों की हालत से आजकल की औरतों की निस्बत, औरतों के खराब होने के सबब, बदमाशों की हालत, मुसीबतें, जवाब एक औरत का, विधवा की दूसरी शादी, एक निहायत दर्दनाक विधवा औरत का हाल, पुरुष की हर रोज़ मार खाने से रांड रहना अच्छा है, आजकल औरतों की गुजरान, रांडों पर सितम, औलाद की ख्वाहिश, पतिव्रता धर्म आदि। इन पर तत्कालीन समाज में औरतों की स्थिति पर कठोर टिप्पणियाँ हैं। ‘निवेदन’ में लेखिका अपनी ‘तमाम हिंदी बहनों को पिंजरे में बंद पक्षी के रूप में’ देखती हैं और कहती हैं कि ‘खुद इस जेलखाने से निकलने की तदबीर करनी चाहिये।’ ‘शुक्र’ लेख में वे हिंदी औरतों को उन लोगों को ‘औतार’ मान शुक्रिया अदा करने की बात करती है जो औरतों के हित और उनकी समानता, शिक्षा के अधिकार की बात कहते हैं और पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं। इनमें स्वामी दयानंद सरस्वती के नाम का भी जिक्र है। ‘हिंदी औरतों की हालत’ में वे हिन्दुस्तान की औरतों को ललकारती हैं और लंबी नींद से जगाने की कोशिश करती हैं। ‘कुछ कथा का हाल लिखा जाता है’ लेख में लेखिका धर्मशास्त्रों में स्त्री के पतिव्रत्य धर्म की जिसकी कहानियाँ सुना-सुनाकर स्त्रियों को मूढ़ साबित कर मूक-बधिर की तरह रहने की शिक्षा दी जाती रही है, उसकी धज्जियाँ उड़ाती हैं ‘ऐ नेक भोली गरीब हिन्दनियों… तुमको पतिव्रता महात्म्य सुनाते हैं और तुम्हारे खाविंदों को कोकशास्त्र और नायिका भेद, बहार ऐश और लज्जतुल निसा की पोथियाँ सुनाकर कहते हैं | इस दुनिया में जिसने दो चार दस बीस कन्याओं से संग नहीं किया, उसका पैदा होना ही निष्फल है।’

सवा सौ साल पहले इस गुमनाम लेखिका ने जो अपना नाम उजागर करने का साहस नहीं कर सकी, अपने समय की ‘हिंदी’ औरतों की स्थितियों पर गंभीरता से सोचा और विचारों को शब्द दिये, आगे आने वाली पीढ़ी की स्त्रियों के लिये पथ प्रशस्त किया कि वे अपनी पूरी पहचान के साथ अपने मन और मस्तिष्क को समाज के सामने रखने का साहस करेंगी। सबसे बड़ी बात कि यह अज्ञात हिंदू औरत, ‘हिंदी’ स्त्रियों में भेद नहीं करती। उसने शास्त्रों द्वारा किये गये ‘ब्राह्मणी’, ‘क्षत्रिया’, ‘वैश्या’ और ‘शूद्रा’ के अंतर को भी स्वीकार नहीं किया है। वह सम्यक् रूप से समस्त स्त्री समाज के लिये चिंता करती है। सीमंतनी उपदेश में पूरी संवेदना के साथ लेखिका समाज में स्त्री के प्रति भेदभाव, उनकी शिक्षा का निषेध, पतिव्रता के नाम पर होने वाले अत्याचार, वैधव्य की दारुण स्थिति, विधवा विवाह के लिये उचित तर्क प्रस्तुत करते हुए स्त्रियों का औलाद के लिये अंधा मोह और ज़ेवर, पोशाकों के प्रति आसक्ति की भी आलोचना करती हैं। नवजागरण काल के समाज सुधारों को सचमुच हृदय से आत्मसात कर उस ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ ने ‘हिंदी’ स्त्रियों को जिस प्रखरता और बेबाकी के साथ संबोधित किया वह निश्चय ही एक क्रांतिकारी काम था।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध की अवधि में जिन भारतीय महिलाओं ने अपनी मेधा, विद्वत्ता और सामाजिक क्षेत्र में आंदोलनकारी व्यक्तित्व से समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित किया तथा स्त्री स्वातंत्रय को सार्थक रूप में ग्रहण कर अपनी शर्तों पर जीवन जिया, पंडिता रमाबाई उनमें अग्रणी हैं। संस्कृत की प्रकांड विद्वान, शास्त्रों की विदुषी जिन्होंने भूख देखी, अकाल से मृत्यु का ग्रास बनते अपने ऋषि तुल्य विद्वान पिता व माता को देखा। अपने भाई के साथ भ्रमण करते हुए विद्वत सभाओं में भाषण-प्रवचन कर आजीविका के लिये जीवन संघर्ष किया, जाति-भेद की परवाह न करते हुए प्रेम विवाह किया और वैधव्य के बाद पूरी तरह समाज को समर्पित हो गयीं। बाल विवाह, वैधव्य, सती प्रथा में बालिका का भस्म होना जैसे अमानवीय कृत्य उन्हें विचलित करते। अंततः उन्होंने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया और इंग्लैण्ड जाकर अंग्रेज़ी का ज्ञान हासिल किया। वे कांग्रेस के अधिवेशनों में शामिल हुईं और स्त्री विरोधी कुप्रथाओं के खिलाफ़ अधिवेशन को संवेदित करने का भी प्रयास किया। समाज द्वारा तिरस्कृत विधवाओं, असहाय स्त्रियों, बालिकाओं के लिए आश्रम खोला और उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिये शिक्षित करने व प्रशिक्षण के कार्यक्रम चलाए। घोर आलोचनाओं व संकटों के बीच भी दृढ़ रहीं। उनकी आत्मकथा बेहद प्रेरित करती है जो अपने समय के भारतीय समाज, आंदोलनों की स्थिति, स्त्रियों के प्रति समाज की संवेदनहीनता, समाज सुधारकों के चिंतन और कार्यशैली की विसंगतियों और द्वंद्वों तथा राजनैतिक परिस्थितियों का ऐतिहासिक दस्तावेज है।

1888 में उनकी पुस्तक ‘दा हाई कास्ट हिंदू वुमन’ न सिर्फ़ प्रकाशित हुई बल्कि बेहद चर्चित भी हुई। वे लगातार पत्र-पत्रिकाओं में स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं को केंद्र में रखकर लेख और पत्र लिखती रहती थीं। 1882 में शिक्षा संबंधी परिस्थितियों के आकलन और वस्तुपरक सुझावों के लिये हंटर कमीशन का गठन हुआ तो पंडिता रमाबाई ने स्त्री शिक्षा संबंधी अनेक महत्वपूर्ण और व्यवहारिक सुझाव भी दिये। स्त्रियों के स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी उनके सुझाव तथा महिला चिकित्सकों द्वारा ही स्त्रियों की जाँच और इलाज के लिये उनका आग्रह अंततः फलीभूत हुआ। भारत में महिलाओं की चिकित्सा के लिये डफ़रिन महिला अस्पतालों की एक पूरी शृंखला तैयार हो गयी।
पंडिता रमाबाई सरस्वती को ये उपाधियाँ उनकी विद्वता के आधार पर विद्वत सभा के लोगों ने प्रदान कीं। अपने प्रखर चिंतन, संघर्ष और क्रांतिकारी-सामाजिक आंदोलनकर्ता के रूप में भारतीय स्त्रीत्व की सर्जनात्मकता का प्रतीक कही जा सकती हैं।
‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ की तरह ‘बंग महिला’ (जन्म 1882) के नाम से राजेंद्रबाला घोष ने भी बीसवीं सदी के पहले दो दशकों में अपनी रचनात्मकता के साथ साहित्य में प्रवेश किया और अपनी सिर्फ़ जगह ही नहीं बनायी बल्कि हिंदी कथा साहित्य के लिये नयी भावभूमि भी तैयार की। जहाँ स्त्रियों के लिये शिक्षा का न सिर्फ निषेध हो, बल्कि उसे धर्म विरुद्ध भी समझा जाये, ऐसे समय में उत्तर प्रदेश के मीरजापुर के पढ़े लिखे बंगाली परिवार की पुत्री भी अपने असली नाम से लिखने का साहस नहीं जुटा सकी। शिक्षित परिवार होने के बावजूद तत्कालीन परंपरा के अनुसार उनकी शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई जहाँ पिता और भाइयों द्वारा निर्मित पढ़ने लिखने का वातावरण था। बंग महिला ने हिंदी में कहानियाँ लिखीं, लेख लिखे और मुख्यतः स्त्री समाज को संबोधित करते हुए उसके पिछड़ेपन और घर की चारदीवारी में कैद होकर रहने को ही अपनी नियति बना लेने की प्रवृत्ति पर प्रहार भी किया। बीसवीं सदी के पहले दशक में कहानी के स्वरूप को विधा के रूप में स्थापित करने वाली पत्रिका ‘सरस्वती’ (सं. महावीर प्रसाद दिवेदी) में उनके नाम से तीन कहानियाँ छपीं, ‘कुंभ में छोटी बहू’, ‘चंद्रदेव मेरी बातें’ तथा ‘दुलाई वाली’। विडंबना ही कही जायेगी कि उनकी पहली दो रचनाओं पर संदेह करते हुए इन्हें बंगला कृतियों का अनुवाद माना गया। बीसवीं सदी के पहले दशक की कहानियों के संकलन में डा. भवदेव पांडेय ने ‘कुंभ में छोटी बहू’ को बंग महिला द्वारा लिखी गयी कहानी के रूप में स्थान दिया है।

डाॅ. भवदेव पांडेय स्वयम् मीरजापुर के रहने वाले थे और राजेंद्रबाला घोष (बंग महिला) की प्रकाशित और अप्रकाशित पांडुलिपियों को हस्तगत कर उन्होंने गहन शोध कार्य किया था। वे इसे बंग महिला की मौलिक रचना मानते हैं। किन्हीं कारणों से स्वयं बंग महिला ने जो इस कहानी पर टिप्पणी दी कि यह उनकी माँ द्वारा लिखित कहानी का अनुवाद है | सत्य नहीं है। उनकी माँ इतनी पढ़ी-लिखी नहीं थीं। यह मौलिक रचना कहीं प्रकाशित नहीं हुई। उनकी माँ के नाम से अन्य कहीं कुछ नहीं छपा। भाषा-शैली भी बंग महिला की अन्य कहानियाँ के समान ही है। ‘कुंभ में छोटी बहू’ कहानी में पहली बार ग्रामीण समाज के परिवेश में एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार को कथा के केंद्र में रखा गया है। विषय वस्तु की दृष्टि से भी कुंभ के महात्म्य और गंगा स्नान से जुड़ी धार्मिकता को केंद्र में रख आलोचनात्मक स्वर में लिखी गयी यह एक साहसिक कहानी थी जिसने कथा साहित्य के उद्देश्य और फलक को विस्तार देने की शुरूआत की। पहली बार विस्तार से पात्रों का चरित्र- चित्रण, प्रभावी संवाद और पारिस्थितिक वर्णन है। आगे चलकर कथा-सम्राट प्रेमचंद ने इसी भावभूमि पर आधारित अपनी कहानियों और उपन्यासों की रचना की। उस समय जब हिंदी गद्य का विकास हो रहा था तथा कथानक अधिकतर समाज सुधार दृष्टि से निर्मित होते थे उस समय ‘कुंभ में छोटी बहू’ ने आधुनिक कथा साहित्य के निर्माण की नींव तैयार की। अफसोस ये है कि हमारे साहित्य-इतिहास के लेखक-विद्वानों ने उन्हें केवल ‘दुलाई वाली’ जैसी कहानी लेखिका तक सीमित कर दिया। ‘दुलाई वाली’ एक रोचक, हास्य व्यंग्य से परिपूर्ण सधी हुई रचना है जो 1907 में ‘सरस्वती’ में छपी थी।

प्रारंभ में बंग महिला की रचनाएँ साहित्यिक पत्रिका ‘आनंद कादंबिनी’ (सं. प्रेमघन) में छपीं। फिर ‘समालोचक’, ‘सरस्वती’ सहित सभी तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में वे सम्मानपूर्वक छपती रहीं। उनकी कहानियों और लेखों के अलावा उनके द्वारा अनूदित साहित्य का संग्रह ‘भारतेन्दु स्मारक ग्रंथ मालिका’ शृंखला के प्रथम अंक में छपा जिसका नामकरण शृंखला संपादक रामचंद्र शुक्ल ने ‘कुसुम संग्रह’ किया।

‘चन्द्रदेव से मेरी बातें’ आख्यायिका जो 1904 में सरस्वती में छपी, बंग महिला के साहसिक लेखन का दस्तावेज है। हिंदी में संभवतः पहली बार आत्म कथ्यात्मक शैली में सामयिक स्थितियों का उद्घाटन संबोधन के स्तर पर किया गया है। उन्होंने अंग्रेज़ शासकों के अनुग्रह पर जीने वाले भारतीयों पर व्यंग्य कर उनकी भरपूर खिल्ली उड़ाई है। ‘आत्मकथ्य और अभिकल्पना शैली के मिश्रित रूप से कथा लेखन की जो विधा व्यवहृत हुई वह आज के ललित निबंधों के रूप में सामने आई है’ (बंग महिला: नारी मुक्ति का संघर्ष-भवदेव पाण्डेय)। अपने लेखों में शिक्षा की ओर उन्मुख करते हुए बाल विवाह तथा विधवाओं की स्थिति पर उन्होंने बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने लिखा कि भारतीय स्त्री का जीवन रसोईघर से लेकर शय्या तक सीमित हो जाता है। तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य से नजदीकी बढ़ाने के लिये उत्सुक मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी नौजवानों पर उन्होंने अपनी रचनाओं में बहुत व्यंग्य किया है। बंग महिला ने अपने लेखों में निरंतर स्त्री शिक्षा के लिये जोरदार वकालत की और बाल विवाह, विधवाओं की स्थिति के साथ-साथ स्त्री-पुरुषों के बीच भेदभाव और स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखने पर क्षोभ जताया है। उन्होंने यूरोप की महिलाओं को शिक्षा और सम्मान में बराबरी का स्थान, अपनी इच्छा और पसंद से विवाह करने के तथा वैवाहिक जीवन अनुकूल न होने पर संबंध विच्छेद के अधिकार की भी सराहना की, हालांकि उनके इन प्रगतिशील विचारों की भरपूर आलोचना भी होती रही। बंग महिला अपनी कलम के माध्यम से बीसवीं सदी के आरंभिक काल में नारी मुक्ति अभियान की एक महत्वपूर्ण इकाई बनीं।

(क्रमशः ……..)

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