आधुनिक ज्ञान एक शक्ति है। उससे लैस होकर पुरुष खुद को शक्तिशाली बनाना चाहते थे, और स्त्रियों को कमज़ोर ही रखना चाहते थे। अपने इस स्वार्थ को पुरुष सुधारकों ने राष्ट्रवाद के सिद्धांत के आवरण में पेश किया कि ब्रिटिश शासन और सब मामलों में कानून बना सकता है और ज़रूर बनाए, लेकिन हमारे धर्म के मामले में हस्तक्षेप न करे। भारत अंग्रेज़ों का उपनिवेश भले ही बना रहे, लेकिन घर-परिवार पुरुषों का अपना उपनिवेश था, जहाँ ब्रिटिश शासन के कानून नहीं पहुँच सकते थे। राष्ट्रवाद की शक्ल में इस सिद्धांत को सबसे पहले तिलकपंथियों ने पेश किया और थोड़ा-बहुत विरोध करने के बाद सुधारकों ने भी इस ‘राष्ट्रवाद’ के आगे सिर झुका दिया।” 

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता के ऐतिहासिक संदर्भों को समेटता डॉ ० नमिता सिंहके आलेख की दूसरी क़िस्त …..

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता: ऐतिहासिक संदर्भ 

मैं पीछे क्यों रहूँ

अनीता चौधरी

श्रीमती रास सुंदरी देवी (1817) उच्च कुलीन बंगाली परिवार से थीं जिनका विवाह बारह वर्ष की अवस्था में एक जमींदार परिवार में हुआ। स्त्री शिक्षा निषेध की परंपरानुसार रास सुंदरी देवी भी शिक्षा से वंचित रहीं लेकिन लिखने-पढ़ने की अदम्य आकांक्षा से उन्होंने जो प्राप्त किया उसने उन्हें स्त्री-लेखन के इतिहास में अग्रणी स्थान दिलाया। अपनी जन्म स्थली, छोटे से गाँव पाबना में उनके घर के निकट एक ईसाई मिशनरी महिला द्वारा लड़कों के लिए पाठशाला खोली गयी। वे पाठशाला से लगे अपने घर के कक्ष में सटकर बैठ जातीं और जो सुनतीं उसे आत्मसात करने की कोशिश करतीं। शादी के बाद बच्चे हुए, स्कूल जाने लगे। अपने बेटे की काॅपी और किताब से पृष्ठ फाड़कर वे रसोई घर में छिपाकर रखतीं और समय मिलने पर छिप-छिपकर अध्ययन करतीं और लिखने का अभ्यास करतीं। इसी क्रम में उन्होंने अपनी जीवनी बांग्ला में ‘आमार जीबोन’ (मेरा जीवन) लिखी।

जब उनके पति का देहांत हो गया, उसके बाद ही 1876 में वह पुस्तक प्रकाशित हुई। यह उनकी संस्मरणात्मक जीवनी है जिसमें उन्होंने अपने बचपन, बाल अवस्था में विवाह और विवाह के बाद अपनी ससुराल की स्थितियों और जीवन-परिस्थितियों का और साथ ही अपने पढ़ने-लिखने और शिक्षित होने की उत्कट आकांक्षा के लिये की गयी जद्दोजहद का वर्णन है। बाद में इसके संशोधित रूप में उन्होंने अपनी जीवनी का दूसरा भाग भी जोड़ा और उस समय उनकी आयु 88 वर्ष की थी। ‘आमार जीबोन’ को विस्तृत जीवनी की प्रथम पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है जिसे एक कुलीन वर्ग की एक महिला ने लिखा और उसने इसके लिये स्वयम् ही अपने को शिक्षित किया। पुस्तक छपने में विलंब का वही कारण कि सामाजिक परंपराओं के अनुसार स्त्रियों का शिक्षित होना, लिखना पढ़ना निषेध था और परंपराओं के विरुद्ध आचरण था। यही कारण है कि नवजागरण काल में अनेक कुलीन घरानों ने और शिक्षा ग्रहण करने की इच्छुक स्त्रियों ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। बंदिनी स्त्री को सामान्य मनुष्यत्व के अधिकार प्रदान करने और उन पर होने वाले विविध अत्याचारों और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिये न केवल बंगाल में बल्कि मद्रास, महाराष्ट्र और उत्तरी भारत, पंजाब में भी इन विचारों का आंदोलन के रूप में प्रचार-प्रसार हुआ।

अंग्रेज़ों में स्त्री-पुरुष को समान अधिकार, स्त्री को शिक्षा के अवसर तथा समाज में उचित सम्मान मिलते देखकर बहुत लोग स्वेच्छा से ईसाईयत की ओर आकर्षित हुए। लेखक माइकेल मधुसूदन दत्त भी जो यंग बंगाल मूवमेंट का हिस्सा थे, उन्होंने ईसाई धर्म अंगीकार किया। बाद में पंडिता रमाबाई और महाराष्ट्र में ही कृपाबाई सत्तिनंदन ने भी तत्कालीन ‘नवमूल्यबोध’ और ‘नई सामाजिक व्यवस्था’ से प्रभावित होकर ईसाई धर्म स्वीकार किया। कृपाबाई सत्तीनंदन ने ‘सगुना’ नाम का आत्म कथात्मक उपन्यास लिखा जो स्त्री दृष्टि से लिखा गया अपने समय का दस्तावेज है। न केवल तत्कालीन हिन्दू समाज में स्त्री की दयनीय स्थिति का, बल्कि ईसाई समाज में अंग्रेज और भारतीय ईसाई समाज के अंतद्र्वन्द्वों को भी रेखांकित करता है। कृपाबाई सत्तिनंदन के पिता हरिपंत बंबई प्रेसीडेंसी में ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले पहले ब्राह्मण नवयुवक थे। उनके साथ उनका पूरा परिवार ईसाई हो गया। ‘सगुना’ उपन्यास का प्रथम प्रकाशन (1887-88) में मद्रास क्रिश्चियन काॅलेज की पत्रिका में धारावाहिक रूप से हुआ। इसका उपशीर्षक था-ए स्टोरी आॅफ नेटिव क्रिश्चियन लाइफ।’ कृपाबाई (1861-1894) की मृत्यु के बाद यह उपन्यास पुस्तक रूप में छपा। 1998 में पुनप्र्रकाशन के समय इसका शीर्षक कर दिया गया, ‘सगुना-द फस्र्ट आॅटोबायग्राफिकल नाॅवेल इन इंगलिश बाय एन इंडियन वुमेन’। (पत्रिका ‘आइना’-अवधेश कुमार मिश्र/ वी. आर. रामन-अंक-2, सं.-मंजु शुक्ला) दकन क्षेत्रा में सती-प्रसंग, बाल विवाह और उसके फलस्वरूप स्त्राी के जीवन की विभीषिका, परदा प्रथा, पुरुषों के बहुविवाह, वैधव्य और उससे उठने वाली समस्याओं को यह उपन्यास छूता है।

पेंटिंग ‘प्रीतिमा वत्स’

आज से सवा सौ साल पहले 1882 में महाराष्ट्र की ताराबाई शिंदे ने मराठी में एक छोटी सी पुस्तक ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ लिखी। इस पुस्तिका में ताराबाई ने पराधीन स्त्री समाज के संदर्भ में उस काल के तीन विषयों को प्रस्तुत किया हैµ(1) विधवाओं की दयनीय स्थिति और उन्हें पुनर्विवाह की अनुमति (2) पुरुष प्रधान संस्कृति में विवाहित स्त्री का पुरुष द्वारा शोषण (3) पुरुष के दुर्गुण। ताराबाई पुस्तक में स्त्री-पुरुष के गुणों-अवगुणों की चर्चा करती हैं। उनकी आकांक्षा है कि सारे जग में स्त्रियों की स्थिति पर विचार हो और उसे समानता मिले। शास्त्रों पर आधारित रूढ़िवादी परंपराएँ कितनी गलत हैं, यह वे तर्क सम्मत ढंग से सामने रखती हैं। लगभग एक शताब्दी बाद 1975 में इस पुस्तक की पहचान की गयी और श्री मालशे जी ने सबसे पहले इसे छपवाकर व्यापक पाठक जगत के सामने रखा। (हिंदी अनुवादक: जुई पालेकर)। ताराबाई शिंदे नवजागरण में अंग्रेज़ों द्वारा शिक्षा (विशेष रूप से स्त्री शिक्षा) के प्रचार-प्रसार को उत्साहजनक मानती हैं। उत्तर भारत और बंगाल में स्त्री शिक्षा की मुहिम बहुत तीव्र थी। विधवा विवाह के पक्ष तथा बाल विवाह के निषेध समाज सुधार आंदोलनों के प्रमुख मुद्दे थे।

महाराष्ट्र में यह प्रयास (बावजूद प्रार्थना समाज जैसे आंदोलनकारी संगठनों के) बहुत धीमे और कमजोर थे। ताराबाई शिंदे ने समाज सुधारकों की उस प्रवृत्ति का भी विरोध किया जहाँ वे स्त्री सशक्तीकरण के लिये अंग्रेज़ों द्वारा उठाये गये कदमों की आलोचना करते थे और उसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप समझते थे। ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ में उन्होंने लिखा, ‘जब से यह राज शुरू हुआ, स्त्रियों को शिक्षा का वरदान मिला और उनमें इतनी मानसिक दृढ़ता आई कि वे हर तरह की मानसिक और व्यवहारिक कठिनाइयों का हिम्मत से मुकाबला कर सकें। उनके दिल-दिमाग़ में घर बना कर बैठा अज्ञान का अंधकार दूर हुआ और उनमें यह समझ आनी शुरू हुई कि उनके लिए क्या भला और क्या बुरा है? किससे कैसा बर्ताव करना चाहिए और जीवन की गाड़ी सही ढंग से कैसे चलानी चाहिए? उन्हें यह भी समझ आने लगा कि सत्य क्या है, धर्म और पतिव्रत क्या है?’ ताराबाई शिंदे की स्त्राी चेतना का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी यह समझ है कि मध्यवर्गीय पुरुष ब्रिटिश शासन द्वारा पेश नई शिक्षा और सभ्यता को अपने लिए पूरी तरह हथिया लेना चाहते हैं, उसे स्त्रिायों तक पहुँचने देना नहीं चाहते। आधुनिक ज्ञान एक शक्ति है। उससे लैस होकर पुरुष खुद को शक्तिशाली बनाना चाहते थे, और स्त्रियों को कमज़ोर ही रखना चाहते थे। अपने इस स्वार्थ को पुरुष सुधारकों ने राष्ट्रवाद के सिद्धांत के आवरण में पेश किया कि ब्रिटिश शासन और सब मामलों में कानून बना सकता है और ज़रूर बनाए, लेकिन हमारे धर्म के मामले में हस्तक्षेप न करे। भारत अंग्रेज़ों का उपनिवेश भले ही बना रहे, लेकिन घर-परिवार पुरुषों का अपना उपनिवेश था, जहाँ ब्रिटिश शासन के कानून नहीं पहुँच सकते थे। राष्ट्रवाद की शक्ल में इस सिद्धांत को सबसे पहले तिलकपंथियों ने पेश किया और थोड़ा-बहुत विरोध करने के बाद सुधारकों ने भी इस ‘राष्ट्रवाद’ के आगे सिर झुका दिया। (वीर भारत तलवार, तद्भव)

बंगाल में ब्रह्मसमाज के पुरोधा केशवचंद्र सेन, रवींद्रनाथ टैगोर आदि भी स्त्रीशिक्षा की मुहिम में शामिल थे लेकिन स्त्री-सशक्तीकरण और स्त्री मुक्ति के लिये किये जा रहे अंग्रेज़ों के प्रयासों को भारत की संस्कृति और आस्था में हस्तक्षेप समझते हुए उनका विरोध भी कर रहे थे। महाराष्ट्र में प्रार्थना समाज के संस्थापक और प्रखर आंदोलनकर्ता महादेव गोविन्द रानाडे वहाँ के ब्राह्मण समाज के विरोध का सामना नहीं कर सके। वे स्त्रीशिक्षा के साथ-साथ बालविवाह का विरोध और विधवा विवाह के समर्थक थे लेकिन विधुर हो जाने पर उन्होंने दस वर्ष की कन्या रमाबाई के साथ विवाह रचाया। सती प्रथा पर कानूनी तौर पर प्रतिबंध लगने के बाद विशेष रूप से बंगाल में सती होने की घटनाएँ यकायक बढ़ गयीं। ‘‘अंग्रेज़ सरकार को कभी भी हमारे धर्म के मामले में हाथ नहीं डालना चाहिए।’’ रूढ़िवादी समाज के लोगों द्वारा निरंतर विरोध करने और ऐसा शोर मचाने पर ताराबाई ने सख्त प्रतिक्रिया कीµ‘‘अंग्रेज़ों और तुम्हारे धर्म के बीच अब फ़र्क़ बचा ही क्या है ? सिवाय अपनी जाति से बाहर विवाह न करने के। अंग्रेज़ों की कौन सी प्रथा है जिसकी नकल भारतीय पुरुषों ने नहीं की?’’ यह छोटी सी पुस्तक आज से सवा सौ साल पहले उभरती हुई स्त्री चेतना का विस्फोट थी।

(क्रमशः …….)

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