इक्कीसवीं सदी में हम स्त्रियाँ जिन्होंने स्वतंत्रता, समानता और विकास के अधिकार प्राप्त कर सृजन क्षेत्र में और समाज में अपने लिये स्थान बनाया, परंपरा जनित परिवार अथवा व्यवस्था जनित समाज के स्तर पर होने वाले अन्याय के प्रतिरोध के लिये अपनी पूर्ववर्ती महिलाओं के संघर्षों से ऊर्जा और प्रेरणा प्राप्त की-हम उनके प्रति भी नतमस्तक हैं। उनका यह संघर्ष स्वयम् के संस्कारों के साथ था और समाज की परंपराओं, रूढ़ियों से ग्रस्त मूढ़ समाज के द्वारा निर्मित भीषण विरोध के साथ था।……

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता के ऐतिहासिक सन्दर्भों को समेटता डॉ ० नमिता सिंह के आलेख की अंतिम क़िस्त …..

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता: ऐतिहासिक संदर्भ

डॉ० नमिता सिंह

आज इक्कीसवीं सदी में स्त्रियों की दशा-दिशा पर दृष्टिपात करें तो देखते हैं कि लगभग दो शताब्दियाँ बीत गयीं। स्त्री समाज इन दो सौ सालों में बहुत कुछ बदला है। छह-सात साल की कच्ची उम्र में विवाह, कुलीनता के अभिशाप स्वरूप पति की चिता से बंधी साँसें, बाल विधवाओं का नारकीय जीवन, सामान्य स्त्री का आँगन भर में सिमटा आकाश, बंद कपाटों के भीतर बंद मन-मस्तिष्क के भीतर कोई खुली खिड़की नहीं… अज्ञान, अशिक्षा के अंधकार में भटकता जीवन… ऐसी विकट परिस्थितियों के मध्य स्त्री ने राह टटोली, दीपक दिखाते हाथों का संबल लिया और फिर रोशनी की एक मद्धिम किरण भर पर्याप्त थी रास्ते बनाने के लिये। आज स्त्री अस्मिता के प्रश्न समाज के केंद्र में हैं। स्त्री सर्जनात्मकता ने केवल अपना पथ प्रशस्त नहीं किया, पूरे समाज के सम्मुख मानव जीवन का सर्वोत्तम प्रस्तुत किया। जीवन सार्थक्य के आयाम विस्तारित किये।
नवजागरण काल की अनेक चर्चित-अचर्चित आंदोलनकारी, समाज-सुधारक महान विभूतियाँ जिन्होंने बंदिनी स्त्री समाज की एक-एक बेड़ी को खोलने के लिये अनथक संघर्ष किया, उनके सम्मुख हम नतमस्तक हैं। इक्कीसवीं सदी में हम स्त्रियाँ जिन्होंने स्वतंत्रता, समानता और विकास के अधिकार प्राप्त कर सृजन क्षेत्र में और समाज में अपने लिये स्थान बनाया, परंपरा जनित परिवार अथवा व्यवस्था जनित समाज के स्तर पर होने वाले अन्याय के प्रतिरोध के लिये अपनी पूर्ववर्ती महिलाओं के संघर्षों से ऊर्जा और प्रेरणा प्राप्त की-हम उनके प्रति भी नतमस्तक हैं। उनका यह संघर्ष स्वयम् के संस्कारों के साथ था और समाज की परंपराओं, रूढ़ियों से ग्रस्त मूढ़ समाज के द्वारा निर्मित भीषण विरोध के साथ था। इसलिये स्त्री समाज आज ऋणी है नवजागरण काल के पुरोधाओं का। यद्यपि उनके भी अपने अंतर्विरोध थे, सामाजिक वातावरण से निर्मित प्रतिरोध के सम्मुख दुर्बलताएँ भी थीं फिर भी एक बार गतिमान होने के बाद नदी की धारा वापिस नहीं लौटती… घात-प्रतिघात सहती आगे बढ़ना ही नियति होती है। आज जब हम पलट कर पीछे देखते हैं तो पिछली दो शताब्दियाँ लहूलुहान शब्दों को थामे कलम की स्याही को रोशनी में बदलकर चमकती दिखाई देती हैं।
नवजागरण काल द्वारा प्रदत्त जीवन-मूल्यों और संघर्षों को स्वाधीनता संग्राम के दौरान निर्मित राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में गति मिली। आज़ादी के लिये अपना सर्वस्व बलिदान करने की भावना केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी। दलित प्रश्न थे, स्त्री स्वातंत्रय और समानता के प्रश्न थे और भावी समाज की रूपरेखा, रंगत की चिंताएँ थीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्वरूप और समाज की प्रगति को निर्धारित करने वाले सामाजिक मूल्य आज भी हमारे सम्मुख हैं। सामाजिक विविधताओं के साथ समानता और न्याय की अवधारणा को जीवन मूल्यों में तब्दील करना और उसे परंपरा के निर्माण की वस्तु बनाना आज स्त्री सर्जनात्मकता की कसौटी है और चुनौती भी है। स्त्री समाज के प्रति होने वाले अन्याय और असमानता के विरुद्ध स्त्री लेखन आज प्राथमिक सरोकारों में है। इसके साथ ही दूसरे सामाजिक समूहों की पीड़ा चाहे वे दलित हों, आदिवासी हों, अल्पसंख्यक धार्मिक समूह के लोग हों, उनके प्रति होने वाले अन्याय भेदभाव और असमानता के प्रश्न भी स्त्री -सर्जनात्मकता के दायरे में आने चाहिये। खानों में बँटा प्रतिरोध अंततः स्त्री-सशक्तीकरण को भी संकुचित करता है। सामाजिक अन्याय के प्रतिरोध की गाथा का एक सर्जनात्मक उदाहरण मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’ है। स्त्री लेखन ने चिंतन और परिवर्तन के विविध आयामों को अपने लेखन में मूर्त किया है। विशेष रूप से तेजी के बदलते भारतीय समाज और स्त्री स्वातंत्रय के नये अर्थ लेखिकाओं ने सृजित किये हैं। स्त्री यौनिकता के प्रश्न आज दबे-ढके वर्जित क्षेत्र नहीं हैं। वे जीवनतत्व के साथ गुंथे सहज, स्वाभाविक हैं। स्वतंत्र भारत में पहली बार ‘मित्रो मरजानी’ में कृष्णा सोबती सुमित्रावंती के रूप में एक अविस्मरणीय चरित्र प्रस्तुत करती हैं और परिवार की संरचना के बीच देह के संदर्भ में स्त्री यौनिकता के प्रश्न को फ़ोकस करती हैं।
मन्नू भंडारी और उषा प्रियंवदा जैसी ‘नयी कहानी’ दौर की लेखिकाओं ने सोद्देश्य इन प्रश्नों को उठाया। स्त्री स्वातंत्रय की अवधारणा को न केवल शिक्षा वरन् उसके स्वावलंबन और आर्थिक पक्ष से भी जोड़ा, जिसमें सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया का एक हिस्सा बनने का आग्रह था जो सामाजिक विकास का स्वाभाविक अंग है। आज स्त्रियाँ, दलित स्त्रियाँ अपने जीवनानुभवों को, अप्रिय प्रसंगों को सामने लेकर आ रही हैं। यह भी साहसपूर्ण कदम है। ये परंपरा राशसुंदरी देवी द्वारा उन्नीसवीं सदी में लुकछिपकर अक्षर ज्ञान प्राप्त कर अपने मनोभावों को अपनी आत्मकथा ‘आमार जीबोन’ की परंपरा से जोड़ती है।
महिला लेखन में अभी कई गह्नर खुलने हैं। जड़ सामाजिक परंपराएँ जो आज भी पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले समाज में जस की तस व्याप्त हैं, उन पर नये सिरे से विचार कर उन्हें चेतना और विचार के स्तर पर केंद्रित करने की जरूरत है। यह व्यवस्था जनित मूल प्रश्न हैं। व्यवस्था की यह सामाजिक रीति-नीति हज़ारों वर्ष पुरानी मानसिकता से जुड़ी है। सामाजिक भेदभाव के प्रश्न आज भी सामाजिक स्तर पर महत्वपूर्ण हैं। आज एक दूसरे प्रकार का अमानवीयकरण दिखाई देता है जो दूर जाकर भारतीय समाज के दूसरे धार्मिक समुदायों और जातियों के प्रति जड़ जमाये पूर्वाग्रहों से लबालब है। व्यवस्था का तंत्र इन प्रश्नों को राजनीति में सत्ता साधन के यंत्र के रूप में इस्तेमाल करता है।
स्त्री सर्जनात्मकता के सामने ये नयी चुनौतियों से भरे रणक्षेत्र हैं। केवल देह का अधिकार और स्त्री बनाम पुरुष के बीच का द्वंद्व अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिये संघर्षरत स्त्री की चेतना को संकीर्ण दायरे में निबद्ध कर देगा। अगर सामाजिक न्याय की व्यवस्था आहत होगी तो विभाजन की रेखाएँ गहरी होंगी। विभाजन की प्रक्रिया अगर एक बार शुरू हो जाती है तो धीरे-धीरे पूरे समाज की अस्मिता अलग-अलग स्तरों पर खंडित होने लगती है। आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस विभाजन दर विभाजन को रोकने की है। राज्य व्यवस्था सत्ता समीकरणों से संचालित होती है। एक ओर सामाजिक विकास की अवधारणा है तो दूसरी ओर जातिगत-धर्मगत-संप्रदायगत विभाजन की मानसिकता उत्तरोत्तर बढ़ रही है। स्त्री सर्जनात्मकता के लिये यह भी विचारणीय है। वरना समाज में अगर जाति-धर्म-समुदाय के आधार पर भेदभाव और विभाजन के प्रभाव में स्त्री समाज भी है, वो भी राजनीति द्वारा निर्मित घृणा और पूर्वाग्रह से ग्रसित है तो फिर कैसे समग्र स्त्री समुदाय सुरक्षित और विकसित होगा। ये अपने समय के ज्वलंत प्रश्न हैं राजनीति जनित सामाजिक प्रश्न हैं और इन्हें भी लेखन में समेटना होगा। अपने समय की इन ऐतिहासिक परिस्थितियों का प्रतिरोध भी स्त्री-सर्जनात्मकता का दायित्व होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published.