बेजुबान कलम से निकलती, और खोखली होती वैचारिक दीवारों को थपथपाती हमजुबां कविताएँ ………|

१- 

सीमा आरिफ

सीमा आरिफ

अपनी सोच-विचारों को
अपनी जेब में रखो
जिसे तुम बड़े फ़ख्र से
मार्क्सवाद,साम्यवादी
विचारधारा कहते हो
इस में मुझे तुम्हारी छुपी हुई
मर्दवादी,दक़ियानूसी,संकुचित
सोच ज़्यादा नज़र आती है
अपने एक्टीविस्म को अपने
खादी के झोले में
छुपा कर रख लो
क्यूंकि मुझे इसमें
कार्ल मार्स्क,लेनिन,
के आदर्शो के साथ
एक खिखिलवाड़,
एक मज़ाक
होता हुआ दिखाई पड़ता है
सो अपनी विचारधारा को
चुपचाप
अपने बटवे में
दबा के रखो

२.

तेरे चेहरे में कई आकाश नज़र आते है
उठा लो अपनी बाँहों में कि
अब ज़मीन पर रह कर
पंख फैलाना नहीं मुमकिन
तेरे शरारत भरी हँसी में
बिस्मिल्लाह खां की बाँसुरी
उनकी उँगलियों से फ़िसल कर
तेरे जिस्म पर चहलक़दमी
करती है
हो जाओ हम ज़बान कि
अब आधी आबादी
की बुलन्द आवाज़
तुम्हारे रंग बिरंगे
ठहाकों से किसी भी मायने
में कमतर नहीं

३.

बहा गया तेरा लहू
मेरे रूह के हर ज़र्रे में
आओ इन जिस्मों
को मिटा दें
इश्क़ की
इंतिहा बन कर
खो जाओ मेरे लफ़्ज़ों में
मेरी सोच की इब्तेदा बनकर

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