प्रेम के सूक्ष्म एहसासों और जीवन कि तरह ज़िंदा यादों के फाहों से मानवीय संवेदना कि परतों को बिना आवाज़ खोलने का प्रयास करतीं सीमा आरिफ‘ की  कविताएँ ………..संपादक 

१-

बारिश के इस मॊसम में खिड़की से बाहर
तुम झांकती तो आज भी होगी

लेकर हाथ में चाय का प्याला याद करती तो होगी
जब दोनों में चाय बनाने के झगडे खूब होते थे
और अंत में चाय कोई नहीं बनता था
बारिश की उन संगीतमय बूंदों को छुने से
एक सिहरन तो आज भी पैदा होती होगी
खामोश हो चुके उन एहसासों की परतें
आज भी खुलती तो होगी
बिस्तर में लिपटी उन रातों की
फेरहिस्त तकिये के नीचे
आज भी रखी तो होगी
क्योकि तेरे कानो की कुछ बालियाँ
लाल बिंदी,वो खत
आज भी मैंने अपने वीराने में
सहज के रखे है

2-

गांव मे नया दरख़्त उगा हैं कोई,

जिस की एक शाख़ पर नाम तेरा (लड़की) हैं
चर्चा है गली के चौराहे पर कि कभी उस जगह
पर कुछ लड़के/ लड़कियाँ गुड्डे,गुड़ियों का खेला
करते थे खेला,
एक लड़की गुड़्डा बन जाने की करती थी
हठ् और
करती थीं ख़ूब हगांमा
मानने को कोई नहीं था तैयार
उसकी अदना सी फरियाद
हुई लड़के-लड़कियों मे ख़ूब
लड़ाई
सबने उसकी ख़ूब खिल्ली उड़ाई
तू हैं गुड़िया क्यों भूल हैं जाती
ढक अपनी देह,लगा पाउडर/-लाली
पहन लाज का जोड़ा
हाथों पर लिख अन्सुना सा नाम
कर नूमाईशदारों का इन्तेज़ार
लड़की कहाँ थी मानने वाली
उसने भी
अपने किस्मत के क़लम की
रोशनाई ही बदल डाली
गुड़ियां है वह अभी भी
भेदभाव के इस खेला मे
और हमेशा ग़ुड़ियां ही
बनाई जायेगी लेकिन
यह क्या कम है कि उसने
दरख़्त पर अपने नाम की
एक शाख़ हैं उगा डाली

Otto Muller

Otto Muller

 

पसीने से भरी शर्ट से तुम्हारी

लिपट जाना मेरा
उस महक को प्रेम की
सौग़ात समझना
ऐसे ही प्रेम किया है मैंने तुम्हें

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